कहां से आते हैं जूते?

Submitted by admin on Thu, 10/29/2009 - 08:40
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गांधी मार्ग

कहां से आते हैं जूते?सबके नहीं। हम आप सबके नहीं। पर और बहुत से लोगों के जूते कहां से आते हैं? शायद यह पूछना ज्यादा ठीक होगा कि कहां-कहां से आते हैं? पहले हम सब ही नहीं, वे भी जो 'सीकरी' जाते-आते थे, उनकी पन्हैयां टूटती थीं तो वे भी अपने आसपास के चमड़े, आसपास के हाथों से नई पन्हैयां बनवा लेते थे। आज नहीं।अमेरिका की एक संस्था नार्थवेस्ट वाच ने सामान्य अमेरिकी परिवारों में इस्तेमाल होने वाले जूतों पर कुछ काम दिया है उनके पैर में यह जूता कहां से आता है इसे जानने की छोटी-सी जिज्ञासा ने उस संस्था को लगभग पूरी दुनिया का चक्कर लगवा दिया है। तो चलो शुरु करें इस जूते की यात्रा।

इस जूते पर अमेरिका की सबसे प्रसिध्द जूता कंपनी का ठप्पा लगा है। पर यह जूता इसने नहीं बनाया है। इस अमेरिकी कंपनी का एक अन्य बिलकुल अप्रसिध्द कंपनी से अनुबंध है। इस अप्रसिध्द कंपनी को खोज निकालने में थोड़ा समय लगा। पर मेहनत इसलिए करनी पड़ी कि दूरी भी तो बहुत थी हम दक्षिण कोरिया आ पहुंचे। इस लंबी, थकान भरी यात्रा से भी खुश ही थे कि चलो अब जूते की कहानी पूरी हुई। पर नहीं।

यह तो शुरूआत थी। दक्षिण कोरिया की यह कंपनी इस जूते को खुद नहीं बनाती। वह इसे इंडोनेशिया के जकार्ता शहर से जुड़े एक औद्योगिक हिस्से में लगी एक और गुमनाम कंपनी से बनवाती है। इस जगह का नाम है तांगेरैंग। सारा काम यहां से भी नहीं होता। यहां की कंपनी जूते के 'उच्च तकनीकी डिजाइन' को अपने कंम्प्यूटरों से ताइवान देश की एक और किसी गुमनाम कंपनी को 'संप्रेषित' करती है।

गंदे माने गए इस काम को अमेरिका में करना हो तो उनके बड़े सख्त नियम हैं। प्रदूषित पानी बिना साफ किए नदी, नालों में छोड़ा नहीं जा सकता। वहां पानी और साथ ही हवा तक को साफ बनाए रखने के पर्यावरण-मानक तगड़े हैं। कोई चूक हो जाए तो भारी मुआवजा चुकाना पड़ता है। यह काम वहां करना हो तो करने वालों को मेहनताना भी भारी भरकम देना पड़ता है। इस सबसे बचो और अपनी सारी मुसीबतें, गंदगी एशिया के ऐसे किसी देश के आंगन में फेंक दो, जो डालर की लालच में फंसा बैठा है। इस डिजाइन के तीन भाग हैं। पहला है ऊपरी हिस्सा जो पैर के पंजे को ठीक से ढंकता है। दूसरा भाग है पैर के तलुए से चिपक कर रहने वाला जूते का सुफतला। तीसरा है सड़क या पगडंडी से टकराने वाला निचला तला। अब ये सब कोई मामूली जूते के अंग थोड़े हैं। इसलिए इन तीन प्रमुख अंगों के बीस हिस्से और हैं।

जो इस जूते का मुख्य भाग है, वह है चमड़ा। यह गाय का चमड़ा है। इन गायों को इसी काम के लिए विशेष रूप से अमेरिका के टेक्सास में पाला जाता है। यहीं इन्हें आधुनिक तकनीक से बने कत्लखानों में मशीनों से मारा जाता है। फिर बड़ी बारीकी से इनका चमड़ा निकाला जाता है। खाल में काटे जाते समय की नरमी बनाए रखने के लिए उसे न जाने कितनी रासायनिक क्रियाओं से निकाला जाता है। नमक के पानी में उपचारित किया जाता है। चमड़े का एक टुकड़ा इस पूरी प्रक्रिया में कोई 750 किस्म के रसायनों से गुजरा जाता है।

अब तैयार यह चमड़ा बड़ी-बड़ी मालगाड़ियों में लद कर अमेरिका के ही लॉस एंजलीस भेजा जाता है। यहां से इस शोधित चमड़े की यात्रा सड़क के बदले जल मार्ग पर शुरु होती है। पानी के जहाजों से चमड़े के ये भीमकाय गट्ठर दक्षिण कोरिया देश के पुसान नाम की जगह तक पहुंचते हैं। यहां अब इनकी और बेतहर सफाई और फिर तरह-तरह की रंगाई का काम होता है।

ये सारे काम चमड़े से ही जुड़े हैं इसलिए ये सभी समाजों में थोड़ी टेढ़ी और नीची निगाह से देखे जाते हैं। हम इन्हें क्यों करें। तुम करो ये गंदा काम! फिर गंदे माने गए इस काम को अमेरिका में करना हो तो उनके बड़े सख्त नियम हैं। प्रदूषित पानी बिना साफ किए नदी, नालों में छोड़ा नहीं जा सकता। वहां पानी और साथ ही हवा तक को साफ बनाए रखने के पर्यावरण-मानक तगड़े हैं। कोई चूक हो जाए तो भारी मुआवजा चुकाना पड़ता है। यह काम वहां करना हो तो करने वालों को मेहनताना भी भारी भरकम देना पड़ता है। इस सबसे बचो और अपनी सारी मुसीबतें, गंदगी एशिया के ऐसे किसी देश के आंगन में फेंक दो, जो डालर की लालच में फंसा बैठा है। पानी के जहाज का भाड़ा चुकाने के बाद भी यह सब अमेरिका से सस्ता ही बैठता है। जूते पर मुनाफा बढ़ गया सो अलग।

जूते की यह यात्रा अपने पहले कदम से आखिर तक कहीं पशुओं को क्रूरता से मारती है, पर्यावरण नष्ट करती है, बनाने वालों का स्वास्थ्य खराब करती है, तो कहीं आसपास की भारी ऊर्जा खा जाती है। पूरा बन कर तैयार हो जाने के बाद भी यह विनाशकारी यात्रा खत्म नहीं होती। चमड़े की कमाई-रंगाई यहां पुसान की फैक्टरियों में होती है। इस काम में यहां हरेक टुकड़ा 20 चरणों की बेहद खतरनाक रासायनिक क्रियाओं से गुजारा जाता है। इसमें क्रोम, कैल्शियम, हाइड्राक्साइड शामिल हैं। इस दौरान चमड़े की सारी गंदगी, कचरा, बाल, ऊपरी परत- सब कुछ अंतिम रूप में अगल हो जाते हैं। यह सब गंदगी फैक्टरी के पड़ोस में बह रही नाकटोंग नदी में छोड़ दी जाती है। अब हल्का, बेहद कीमती, शुद्ध चमड़ा हवाई जहाजों में लद कर जकार्ता पहुंचता है।

चमड़े को यहां छोड़ दें। अब जूते में लगने वाले तले को देखें। बीच के तले में फोम का उपयोग होता है। यह खूब हल्का, खूब मजबूत फोम गरमी-सरदी से बचाता है। इसे बनाने में एथीलीन और न जो कौन-कौन से पदार्थ लगते हैं। एथीलीन विनाइल एसीटेट को संक्षेप में ई.टी.ए. कहते हैं। यह सउदी अरब से निकलने वाले पैट्रोल से बनता है।

अब बारी है बाहरी तले की। इसे स्टाइरीन ब्यूटाडाइन रबर से बनाया जाता है। कुछ भाग इसका सउदी अरब से निकले पैट्रोल से बनता तो कुछ भाग ताइवान की कोयला खदानों से निकले बेंजीन से। बेंजीन निकालने का कारखाना ताइवान के अणु बिजलीघर से मिलने वाली ऊर्जा से चलता है। खैर इसे भी यहीं छोड़िए।

अब तो बाहरी सोल भी बन गया। अब बस इसे अलग-अलग आकार-प्रकार के जूतों के हिसाब से डाई से काट-काट कर जूता-जोड़ी बनाना बाकी है। फिर इन्हें बेहद दबाव और गरमी देने वाले सांचों में ढाल कर, काट कर अब तक बन चुके आधो जूते में चिपका दिया जाता है।

यह बताना अच्छा नहीं लगता पर हमारा पढ़ा-लिखा संसार प्रसिद्ध जूता कंपनियों के जितने भी नाम जानता है, उनके सभी जूते इन्हीं सब जगहों से बनते हैं। इनमें कोई भी अंतर नहीं रहता। अंतर है नामों की चिपकी का, ‘ब्रांडनेम’ का। इन लगभग एक से जूतों पर एडिडास, नाइक और रिबॉक नामक कंपनियां अपने-अपने कीमती ठप्पे ठोक देती हैं। अब कोई यह न पूछे कि ऐसे विचित्र ढंग से तैयार होने वाले, पूरी दुनिया का चक्कर काटकर बनने वाले जूतों को पहन कर ये लोग कितना पैदल चलते हैं? इन जूतों का ज्यादातर समय तो मोटर गाड़ियों में बीतता है। जूते की यह यात्रा अपने पहले कदम से आखिर तक कहीं पशुओं को क्रूरता से मारती है, पर्यावरण नष्ट करती है, कहीं बनाने वालों का स्वास्थ्य खराब करती है, तो कहीं आसपास की भारी ऊर्जा खा जाती है। पूरा बन कर तैयार हो जाने के बाद भी यह विनाशकारी यात्रा खत्म नहीं होती।

तैयार जूता जोड़ी को अब बहुत ही हल्के टिशू पेपर में लपेटना बाकी है। इस विशेष कागज को सुमात्रा के वर्षा वनों में उगने वाले कुछ खास पेड़ों को काट कर बनाया जाता है। पहले तो जूते का डिब्बा भी ताजे गत्तों से बनता था। अब नई जूता कंपनियों को पर्यावरण बचाने की भी सुध आ गई है! अब ये डिब्बे पुराने कागजों को 'रिसाइकल' करके बनाए जाते हैं। एक जूते की इस विचित्र यात्रा में कुल तीन सप्ताह का समय लगता है। पुरुषों के पास औसत ऐसे 6 से 10 जोड़ी जूते होते हैं। महिलाएं थोड़ी और आगे हैं।
उनके पास 15 से 25 जोड़ी जूते रहते हैं।

अब कोई यह न पूछे कि ऐसे विचित्र ढंग से तैयार होने वाले, पूरी दुनिया का चक्कर काटकर बनने वाले जूतों को पहन कर ये लोग कितना पैदल चलते हैं? इन जूतों का ज्यादातर समय तो मोटर गाड़ियां में बीतता है। जूतों का यह किस्सा किसी देश विशेष के विरोध में नहीं है। जो हाल अमेरिका का है, वही कैनाडा, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और यूरोप सब जगह का है। यदि हम नहीं संभले तो हमारा हाल भी ऐसा ही होने जा रहा है। हमें भी जूते इसी भाव पड़ेंगे।
 

इस खबर के स्रोत का लिंक:

नार्थवेस्ट वॉच की एक विज्ञप्ति के आधार पर हिन्दी में अनुपम मिश्र द्वारा प्रस्तुत।

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Submitted by Anonymous (not verified) on Mon, 11/16/2009 - 12:38

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