कोमा में सत्ता की संवेदना

Submitted by Hindi on Thu, 06/16/2011 - 09:37
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समय लाइव, 16 जून 2011

संत निगमानंदसंत निगमानंदगंगा मुक्ति अभियानों में सक्रिय लोगों के लिए स्वामी निगमानंद की मृत्यु की खबर उसी परिमाण की वेदना पैदा करने वाली है जैसे अपने किसी निकटतम की मौत राष्ट्रीय मीडिया के लिए निगमानंद नाम भले सुपरिचित नहीं था लेकिन हरिद्वार के मीडिया कर्मियों के लिए गंगा के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगा देने वाले महामानव के रूप में वे हमेशा श्रद्धेय थे। 19 फरवरी से शुरू हुआ उनका अनशन उनकी जीवनलीला के अंत के साथ ही खत्म हुआ। विडम्बना देखिए, जिस दिन देश व उत्तराखंड के नामी साधु-संत हिमालयन अस्पताल में बाबा रामदेव का अनशन तुड़वा रहे थे वहीं निगमानंद अंतिम विदाई ले रहे थे। रामदेव जी के प्रति जितना सम्मान और आत्मीयता के भाव अनुचित नहीं था लेकिन प्रश्न है कि निगमानंद जैसे लोग हमारी अमानवीय उपेक्षा के शिकार क्यों हो गए?

दरअसल, महान सभ्यता का वारिस, हमारा यह देश जिस दशा में पहुंच गया है, उसमें निगमानंद जैसों की यही स्वाभाविक परिणति है। वस्तुत: निगमानंद की त्रासदी किसी अकेले व्यक्ति की त्रासदी नहीं है। देश के लिए, न्याय के लिए, सच की रक्षा के लिए, प्रकृति की धरोहर बचाने के लिए... संघर्ष करने वालों की ऐसी लम्बी कतार है। यह सोचना मुश्किल है कि यदि बाबा हिमालयन अस्पताल में भर्ती नहीं होते तब भी क्या ‘राष्ट्रीय मीडिया’ के लिए निगमानंद की मृत्यु ऐसी ही सुर्खियां बनतीं? निगमानंद की तरह न जाने कितने लोग सत्याग्रह की भेंट चढ़ काल के गाल में समा जाते हैं और उनका नामोनिशान तक हम रहने नहीं देते।उत्तराखंड में ही गंगा को बड़े-बड़े बांधों की योजनाओं से बचाने के लिए संघर्षरत अनेक लोग जेल में हैं और साथियों के सिवाय उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। अगर आप किसी प्रकार सत्ता, सम्पत्ति और शक्ति से सम्पन्न हो गए, आपका समाज पर प्रभाव कायम हुआ तो आपकी आवाज का वह संज्ञान लेगा, अन्यथा आप चाहे अपना सर्वस्व अर्पित करके समाज के लिए ही आवाज उठाइए, ज्यादातर समय वह नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है। निगमानंद सम्पूर्ण समाज की इन्हीं विडम्बनाओं का निवाला बने।

कांग्रेस द्वारा भाजपा सरकार की आलोचना अनैतिक है, क्योंकि उसने अनशनकारियों के साथ जैसा बर्ताव किया वह भी हमारे सामने है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक अगर अखबार नहीं पढ़ते हों तो और बात है, अन्यथा यह सम्भव ही नहीं कि निगमानंद के लम्बे अनशन की उन्हें जानकारी नहीं हो। उनकी सरकार कह सकती है कि उसने निगमानंद को अस्पताल में भर्ती कराया था। लेकिन 27 अप्रैल 2011 को जब पुलिस ने उन्हें हरिद्वार के जिला चिकित्सालय में भर्ती किया, उस दिन उनके अनशन के दो महीने आठ दिन बीत चुके थे। उनके इलाज के लिए विशिष्ट चिकित्सा की आवश्यकता थी। निगमानंद को वह नसीब नहीं हुई और 2 मई को वे कोमा में चले गए। उनके मित्रों ने इसकी सूचना मेल-वेबसाइट से देश भर में भेजी। जब लोगों ने पूछताछ शुरू की तो उन्हें दून अस्पताल भेजा गया। जब सुधार न हुआ तो हिमालयन अस्पताल में दाखिल किया गया। लेकिन काफी देर हो चुकी थी।

 

 

गंगा को व्यापार बनाकर उससे धन निचोड़ने की नीति सर्वोपरि है और उसके विरुद्ध संघर्ष करने वालों को विकास का दुश्मन मानकर उनके साथ अपराधी की तरह व्यवहार हो रहा है। शासन एवं आम समाज दोनों अहिंसक सत्याग्रहियों के साथ क्रूर और संवेदनहीन व्यवहार करते हैं। निगमानंद की त्रासदी यदि हमारी आंख खोल सके तभी उनका बलिदान सार्थक होगा।

निगमानंद गंगा में हो रहे खनन को बंद कराना चाहते थे। निर्दयतापूर्वक खनन से हरिद्वार एवं आसपास गंगा की कैसी हालत हो गई है, यह न सरकार से छुपा था न समाज से। क्रशर गंगा की पेटी में पत्थरों के साथ गंगा को ही काट रहे थे। मातृसदन ने 1997 में क्रशर के विरुद्ध आवाज उठाई। पत्थर खोदकर उन्हें चूरा बनाना ऐसा लाभकारी व्यापार हो गया था जिसमें हर कोई हाथ डालना चाहता था। लालची व्यापारियों और सरकारी महकमों के संरक्षण और शह के कारण क्रशरों का शोर तथा धूल भरा आकाश मानो गंगा और हरिद्वार की नियति हो गई थी। जब सतह के पत्थर खत्म होने लगे तो विशालकाय जेसीबी मशीनें गंगा में उतर गई। केवल साधु-संत एवं आश्रम ही नहीं, बुद्धिजीवी व आम आदमी भी इसमें विनाश की दस्तक देख रहे थे। अनेक व्यक्तियों एवं संगठनों ने इसका विरोध किया। स्वयं निगमानंद ने 2008 में ही 73 दिनों का अनशन किया। लेकिन कटाई जारी रही। हालांकि मातृसदन की संगठित लड़ाई के कारण क्रशर क्रमशः बंद हुए और सरकार भी इन्हें बंद का आदेश देने पर विवश हुई। लेकिन यह पूर्ण विराम नहीं लगा।

उत्तराखंड सरकार से पूछा जाना चाहिए कि शासन में आने के पूर्व भाजपा गंगा आंदोलन के साथ थी। फिर शासन में आते ही उसने क्रशर बंद करने का आदेश क्यों नहीं दिया? कांग्रेस के भी शासनकाल में गंगा का पेट काटा जाता रहा। निगमानंद के अनशन के बाद जब सरकारी आदेश जारी हुआ तो इसके विरुद्ध याचिका दायर करने वाली कम्पनी को 26 मई को नैनीताल हाईकोर्ट से स्टे मिल गया। यह संघर्षरत संतों को धक्का पहुंचाने वाला था। निगमानंद और मातृसदन के साथियों ने तब स्टे के विरुद्ध ही अनशन आरम्भ किया। अंतत: 26 मई को हाईकोर्ट ने कंपनी की याचिका खारिज की लेकिन इतने लम्बे संघर्ष में न जाने कितने साधु-संतों और गंगा प्रेमियों का शरीर बर्बाद हो गया।

सरकार का तर्क था कि न्यायालय के मामले में हम दखल नहीं दे सकते। ठीक है, लेकिन सरकार यदि संकल्पबद्धता दिखाती तो कम्पनी को काम बंद करना पड़ता। चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस की, उनके लिए गंगा को व्यापार बनाकर उससे धन निचोड़ने की नीति सर्वोपरि है और उसके विरुद्ध संघर्ष करने वालों को विकास का दुश्मन मानकर उनके साथ अपराधी की तरह व्यवहार हो रहा है। शासन एवं आम समाज दोनों अहिंसक सत्याग्रहियों के साथ क्रूर और संवेदनहीन व्यवहार करते हैं। निगमानंद की त्रासदी यदि हमारी आंख खोल सके तभी उनका बलिदान सार्थक होगा। भविष्य में कोई निगमानंद के हश्र को न प्राप्त हो, ऐसा समाज और देश बनाना भी हमारा-आपका ही दायित्व है। इसलिए तमाम आतंक, हताशाओं और प्रतिकूलताओं के बावजूद व्यवस्था बदलाव का अहिंसक अभियान जारी रखना होगा।
 

 

 

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