उम्मीदों का मौसम मानसून

Submitted by Hindi on Thu, 06/16/2011 - 09:05
Source
हिन्दुस्तान, 16 जून 2011
मानसून भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए तो बेहद अहम है हीं, भारत के लोक जीवन से भी गहरे जुड़ा है। यह गर्मी की तपिश से निजात दिलाता है और लोगों में उत्साह व खुशी का संचार करता है। मानसून से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विश्लेषण।

इन दिनों दो समस्याओं से लोग परेशान हैं, एक गर्मी और दूसरी महंगाई। दोनों को काबू करने का इलाज मानसून के पास है। दरअसल हमारे देश के लिए मानसून समृद्धि का सूचक है। यह आर्थिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी भारतीय जीवनशैली में गहरे रचा-बसा है। मानसून हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है, क्योंकि देश में 65 फीसदी कृषि आज भी मानसून की बारिश पर निर्भर है। बारिश अच्छी होगी तो कृषि उपज बढ़ेगी और महंगाई काबू में रहेगी। यदि मानसून बिगड़ा तो अनाज कम पैदा होगा और महंगाई बढ़ेगी। पौराणिक ग्रंथों एवं कथाओं में भी मानसून का जिक्र है। इसलिए आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में संगीत, वेशभूषा, मकानों की बनावट व खान-पान पर मानसून का प्रभाव साफ दिखता है। तीसरे, मानसून जब देश में दस्तक देता है, उस समय करीब-करीब सारा भारत तप रहा होता है और मानसून की फुहारें तन-मन को राहत प्रदान करती हैं।

अरबी शब्द मौसिम से मानसून शब्द निकला, जिसका मतलब है हवाओं का मिजाज। मानसून का इतिहास काफी पुराना है। 16वीं शताब्दी में मानसून शब्द का सबसे पहले प्रयोग समुद्र मार्ग से होने वाले व्यापार के संदर्भ में हुआ। तब भारतीय व्यापारी शीत ऋतु में इन हवाओं के सहारे व्यापार के लिए अरब व अफ्रीकी देशों में जाते थे और ग्रीष्म ऋतु में अपने देश वापस लौटते थे। शीत ऋतु में हवाएं उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती हैं, जिसे शीत ऋतु का मानसून कहा जाता है, जबकि ग्रीष्म ऋतु में इसके विपरीत बहती हैं। इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून या गर्मी का मानसून कहा जाता है। इन हवाओं से व्यापारियों को नौकायन में सहायता मिलती थी। इसलिए इन्हें ट्रेड विंड भी कहा जाता है।

ग्रीष्म ऋतु में जब हिन्द महासागर में सूर्य विषुवत रेखा के ठीक ऊपर होता है तो मानसून की स्थितियां बननी शुरू होती हैं। इससे समुद्र गरमाने लगता है और उसका तापमान 30 डिग्री तक पहुंच जाता है। उस समय धरती का तापमान 45-46 डिग्री तक पहुंच चुका होता है। तब हिन्द महासागर के दक्षिणी हिस्से में मानसूनी हवाएं सक्रिय होती हैं। ये हवाएं आपस में क्रॉस करते हुए विषुवत रेखा पार कर एशिया की तरफ बढ़नी शुरू होती हैं। इसी दौरान समुद्र के ऊपर बादलों के बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। ये हवाएं समुद्र के जल के वाष्पन से उत्पन्न जल वाष्प को सोख लेती हैं तथा पृथ्वी पर आते ही ऊपर उठती हैं और वर्षा देती हैं। जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरे देश में झमाझम पानी बरसाने लगता है।

कृषि की प्राणवायु है मानसून


देश में खेती-बाड़ी का 65 फीसदी दारोमदार मानसूनी बारिश पर टिका है। सिंचाई की सुविधा सिर्फ 40 फीसदी क्षेत्र को उपलब्ध है। लेकिन इसके लिए भी बारिश चाहिए, क्योंकि बारिश न होने से नदियों का पानी घट जाता है, जिसका असर बांधों पर पड़ता है। बांधों में पानी की कमी होती है। भूजल भी तभी रिचार्ज होता है, जब बारिश होती है। बांधों में पानी की कमी से बिजली उत्पादन प्रभावित होता है। बिजली नहीं होगी तो नलकूप भी नहीं चल पाएंगे। इसी प्रकार नदियों का पानी घटने से नहरें सूखने लगती हैं। इस प्रकार कृषि के लिए मानसून की भूमिका अहम है। यहां एक बात और, जलवायु परिवर्तन से मानसून के भी प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है, जो भारत के लिए सर्वाधिक चिंताजनक स्थिति होगी।

सुधर रही है मानसून की भविष्यवाणी


गर्मी शुरू होते ही किसान मानसून का इंतजार करने लगते हैं। मानसून विभाग अप्रैल मध्य में मानसून को लेकर दीर्घावधि पूर्वानुमान जारी करता है। इसके बाद फिर मध्यम अवधि और लघु अवधि के पूर्वानुमान जारी होते हैं। मौसम विभाग की भविष्यवाणियों में हाल के वर्षो में सुधार हुआ है। इधर, देश भर में कई जगहों पर डॉप्लर राडार लगाए जा रहे हैं, जिससे आगे स्थिति और सुधरेगी। अभी मध्यम अवधि की भविष्यवाणी, जो 15 दिन से एक महीने की होती है, 70-80 फीसदी तक सटीक निकलती है। हां, लघु अवधि की भविष्यवाणी, जो अगले 24 घंटों के लिए होती है, करीब 90 फीसदी तक सही होती है। अलबत्ता नावकास्ट की भविष्यवाणी करीब-करीब 99 फीसदी सही निकलती है।

अल-नीनो व लॉ-नीनो असर डालते हैं मानसून पर


प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका के निकट खासकर पेरू वाले क्षेत्र में यदि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द समुद्र की सतह अचानक गर्म होनी शुरू हो जाए तो अल-नीनो सिस्टम बनता है। लेकिन इसका मानसून पर असर तभी होता है, जब तापमान में यह बढ़ोत्तरी .5 डिग्री से 2.5 डिग्री के बीच हो। इस तापमान वृद्धि से मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागर में हवा के दबाव में कमी आने लगती है। असर यह होता है कि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द चलने वाली ट्रेड विंड कमजोर पड़ने लगती हैं। यही हवाएं मानसूनी हवाएं हैं। इससे मानसून कमजोर पड़ जाता है। कभी-कभी यहां पर ठीक इसके उलट मौसमी घटना होती है। समुद्र की सतह ठंडी होने लगती है, जिसे लॉ-नीनो कहा जाता है। इससे पैदा होने से हवा के दबाव में तेजी आती है और ट्रेड विंड को गति मिलती है, जो भारतीय मानसून के लिए अच्छी स्थिति होती है।

मानसून का विकल्प हो सकती है क्लाउड सीडिंग


मानसून का विकल्प अभी तो नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक इस मोर्चे पर चुप नहीं बैठे हैं। क्लाउड सीडिंग इसका विकल्प हो सकता है। भारत में इस विषय को उठाया जा चुका है। इस दिशा में अभी कुछ अरसे पूर्व इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटरोलॉजी, पुणे (आईआईटीएम) के वैज्ञानिकों ने क्लाउड सीडिंग को लेकर स्टडी शुरू की है। स्टडी में यह पता लगाया जा रहा है कि देश में ऐसे कौन-कौन से इलाके हैं, जहां बादल तो बनते हैं, लेकिन अक्सर मानसून धोखा दे जाता है। क्लाउड सीडिंग से पूर्व कई और पैरामीटर देखे जाते हैं। इन स्थानों में मौजूद धूल कणों तथा अन्य तत्वों को भी मापा जा रहा है। ऐसे सभी क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें क्लाउड सीडिंग के लिए चिन्हित किया जाएगा। क्लाउड सीडिंग में यदि आसमान में बादल छाए हैं और हवा में नमी है तो वायुयान से बादलों के ऊपर सिल्वर आयोडाइड रसायन का छिड़काव किया जाता है, जिससे बादल बरसने लगते हैं। पूर्व में कुछ राज्य सरकारों ने ऐसे उपाय किए, लेकिन वे खास सफल नहीं हो पाए। अर्थ साइंस मंत्रालय इसके सभी पहलुओं की स्टडी कर रहा है। यह बेहद महंगी प्रक्रिया है तथा इसके मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कुछ बुरे प्रभाव भी हैं, लेकिन सूखे के खतरे के सामने वे नगण्य हैं।

मानसून: कुछ तथ्य


- मानसून हिन्द महासागर में पैदा होता है और मई के दूसरे सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान निकोबार द्वीप समूह में दस्तक देता है। 1 जून को केरल में इसकी एंट्री होती है।

- देश में मानसून के चार महीनों में 89.0 सेंटीमीटर औसत बारिश होती है। 80 फीसदी बारिश मानसून के चार महीनों जून-सितंबर के दौरान होती है।

- देश की 65 फीसदी खेती-बाड़ी मानसूनी बारिश पर निर्भर है। बिजली उत्पादन, भूजल रिचार्ज, नदियों का पानी भी मानसून पर निर्भर है।

- पश्चिमी तट और पूर्वोत्तर के राज्यों में 200 से 1000 सेमी बारिश होती है, जबकि राजस्थान और तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा सिर्फ 10-15 सेमी होती है।

- केरल में मानसून जून के शुरू में दस्तक देता है और अक्टूबर तक करीब पांच महीने रहता है, जबकि राजस्थान में सिर्फ डेढ़ महीने ही मानसूनी बारिश होती है। वहीं से मानसून की विदाई होती है।

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