निगमानंद मौत के मामले ने तूल पकड़ा

Submitted by Hindi on Thu, 06/16/2011 - 11:00
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नई दुनिया, 16 जून 2011
देहरादून (ब्यूरो)। मातृ सदन के संत निगमानंद की मौत के मामले ने तूल पकड़ लिया है। अखिल भारतीय संत समाज ने निगमानंद की मौत के लिए उत्तराखंड सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। जबकि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने इस मामले की सीबीआई जांच की मांग करते हुए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजा है। दूसरी ओर मातृ सदन में निगमानंद का शव तीन दिनों तक रखे जाने के बाद गुरुवार को उन्हें दफनाए जाने की तैयारियां चल रही हैं। निगमानंद की मौत पर संत समाज की भी व्यापक प्रतिक्रियाऐं आ रही हैं।

अखिल भारतीय संत समाज के महासचिव हरिसंतोषानंद ने कहा कि यह उत्तराखंड की भाजपा सरकार की बड़ी लापरवाही है कि एक संत की उचित मांग को अनदेखा करते हुए उन्हें मरने को मजबूर किया गया। साथ ही यह आश्चर्यजनक है कि एक संत को तो वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जाता है और दूसरे की अनदेखी कर उसे तिलतिल मरने को मजबूर किया जाता है। एक ओर तो भाजपा सरकार संतों की रक्षा करने का ढोल पीटती है। वहीं दूसरी ओर राष्ट्र हित के कार्यों की ओर ध्यान दिलाने वाले संतों के साथ क्रूर व्यवहार करती है। निगमानंद की मौत के बाद राज्य का सियासी पारा भी चढ़ गया है।

बुधवार को कांग्रेस ने सभी जिला मुख्यालयों में धरना प्रदर्शन कर इस मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। गुरुवार को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य व खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री हरीश रावत पहले मातृसदन पहुंचकर स्वामी निगमानंद को श्रद्घांजलि देंगे और बाद में हरिद्वार में आयोजित कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन में शामिल होंगे। इस मामले में भाजपा सरकार चौतरफा हमले झेल रही है। नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत का कहना है कि इस मामले में अगर राज्य सरकार समय पर कदम उठाती तो संत निगमानंद को बचाया जा सकता था। जबकि सांसद सतपाल महाराज का कहना है कि निगमानंद की मौत से सरकार का संवेदनहीन एवं उदासीन रवैया सामने आ गया है। उन्होंने कहा कि स्वामी निगमानंद की मौत पर सरकार को जवाब देना चाहिए।

सत्य की खोज में घरबार छोड़ संन्यासी बने थे निगमानंद


राघवेंद्र नारायण मिश्र
संत निगमानंद की बचपन की तस्वीरसंत निगमानंद की बचपन की तस्वीरपटना। गंगा को बचाने के लिए जिंदगी की आहुति देने वाले संत निगमानंद ने सत्य की तलाश में सोलह साल पहले घरबार छोड़ दिया था। दरभंगा के लदारी गांव के इस संत का लक्ष्य के प्रति अडिग समर्पण बचपन से ही दिखने लगा था। संत के निधन पर उनके पैतृक गांव में शोक की लहर छाई है। परिजन मानते हैं कि निगमानंद को अस्पताल में माफिया तत्वों के इशारे पर जहर दिया गया। अब इस गांव के लोगों को अपने उस सपूत के शव का इंतजार है जो सोलह साल पहले बिना बताए एक पत्र छोड़कर हरिद्वार चला गया था।

निगमानंद के पिता प्राशचंद्र झा और चाचा सुभाषचंद्र झा शव लेने हरिद्वार गए हैं। संत के जीवित रहते उनके परिजनों को निगमानंद से मिलने की इजाजत नहीं दी जाती थी। उनके दादा सूर्य नारायण झा बताते हैं कि निगमानंद के गुरु शिवानंद ने कभी पोते से मिलने नहीं दिया। सोलह साल पहले 1995 में सूर्य नारायण सिंचाई विभाग में पूर्व चंपारण के एसडीओ थे। वे सपरिवार पूजा के लिए वैजनाथ धाम देवघर जा रहे थे। रास्ते में ही उनका पोता स्वरुपम कुमार गिरीश गायब हो गया। बाद में उसके कमरे से एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि वह सत्य की खोज में जा रहा है। हरिद्वार में उसने स्वामी शिवानंद से दीक्षा ली और फिर लौटकर घर नहीं आया। घर वालों ने जब-जब उससे मिलने की कोशिश तो गुरु ने इसकी इजाजत नहीं दी। इस 37 वर्षीय संत ने गंगा को खनन मुक्त करने के लिए 68 दिन के अनशन के बाद देह त्याग किया।

निगमानंद की चाची रेखा झा कहती हैं कि निगमानंद की दसवीं तक की शिक्षा दरभंगा सर्वोदय उच्च विद्यालय से और बारहवीं की पढ़ाई दिल्ली के कैलाशपुरी ग्रीनव्यू से हुई थी। निगमानंद के पिता सुभाषचंद्र झा, दादा सूर्यनारायण और दादी जयकली देवी ने आरोप लगाया कि उनके स्वरुपम को जहर देकर मारा गया है। उन्होंने इस मामले में बिहार पुलिस के डीजीपी नीलमणि और गृहसचिव आमिर सुबहानी को आवेदन दिया है। आवेदन में उत्तराखंड सरकार से बातचीत कर मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है।

संत निगमानंद के दादा-दादीसंत निगमानंद के दादा-दादीपिता ने शव को गांव तक लाने में मदद के लिए भी गृहसचिव और डीजीपी से गुहार लगाई है। परिजनों के मुताबिक निगमानंद गंगा बचाओ अभियान के तहत क्रशर मशीनों का विरोध कर रहे थे। उन्हीं लोगों में से किसी ने हत्या करवाई है। उनके दादा ने निगमानंद के गुरु पर भी आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि मामले में शिवानंद से भी पूछताछ की जानी चाहिए। उनका कहना है कि जब वे लोग आश्रम मातृसदन जाते थे तो निगमानंद से मिलने नहीं दिया जाता था। जब गुरु के कहने से निगमानंद अनशन पर थे तो उसकी सेहत का ध्यान क्यों नहीं रखा गया। इस पूरे मामले की जांच की जानी चाहिए। उनके मुताबिक निगमानंद इससे पहले भी दो बार अनशन कर चुके थे। इस बार उन्होंने 19 फरवरी से अनशन शुरू किया था और दो मई को कोमा में चले गए थे।

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