जौ की खेती बंद मत कीजिए

Submitted by Hindi on Fri, 06/17/2011 - 12:03
Source
मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

यदि हर व्यक्ति को चौथाई एकड़ जमीन दी जाती है तो पांच व्यक्तियों के एक परिवार के लिए सवा एकड़ जमीन मिल जाएगी और वह इस परिवार को पूरे वर्ष पलने के लिए काफी होगी। यदि प्राकृतिक कृषि को अपनाया जाए तो किसान के पास फुर्सत और गांव की सामाजिक-गतिविधियों के लिए भी ढेर सा समय बच रहेगा। मेरे विचार से तो देश को एक सुखी और सुखद भूमि बनाने का यह सबसे सीधा तरीका है।

दूसरे विश्व युद्ध के पूर्व अमेरिका और जापान के बीच बढ़ती हुई शत्रुता के कारण वहां से गेहूं का आयात करना असंभव हो गया था। सारे देश में गेहूं की खेती, जापान में ही करने का आंदोलन छिड़ गया। जिन अमेरिकी किस्मों के गेहूं का उपयोग किया जा रहा था उसके लिए बहुत लंबी अवधि का मौसम चाहिए होता था, और उसके पकते-पकते जापान में वर्षा ऋतु आ जाती थी। इसका नतीजा यह होता था कि, सारी मेहनत के बाद फसल काटते-काटते वह खेतों में ही सड़ जाती थी। गेहूं की ये किस्में, चूंकि बहुत ही गैर भरोसेमंद साबित हुईं और उन्हें कई बीमारियां भी लग जाती थीं, किसान उन्हें उगाना नहीं चाहते थे। इस गेहूं को पीसकर उस आटे को जब परम्परागत ढंग से सेंका जाता था तो उसका स्वाद इतना खराब हो जाता था कि उसे निगलना भी मुश्किल हो जाता था। जापानी जौ और राई की परम्परागत किस्में, चूंकि बारिश के पहले मई में काट ली जाती हैं, वे तुलनात्मक रूप से कहीं ज्यादा सुरक्षित फसलें हैं। यह सब होने के बाद भी गेहूं की खेती किसानों पर थोपी गई। हर कोई गेहूं की खेती पर हंसता था और कहता था कि इससे बुरी और कोई चीज नहीं हो सकती, लेकिन सरकारी नीति होने के कारण वे धैर्य के साथ उसका पालन करते रहे।

युद्ध के बाद फिर से भारी मात्रा में गेहूं का आयात होने लगा और देश में उगाए गए गेहूं के भाव गिरने लगे। गेहूं की खेती न करने के कई अन्य कारणों में यह एक और जुड़ गया। देश के किसान नेताओं ने नारा बुलंद किया, ‘गेहूं मत उगाओ, गेहूं का त्याग करो।’ और किसानों ने गेहूं की खेती बंद कर दी। उसी समय आयातित गेहूं सस्ता होने के कारण, सरकार ने किसानों को जौ और राई उगाना बंद करने के लिए प्रोत्साहित किया। यह नीति भी क्रियान्वित हुई और जापान में खेत जाड़ों के मौसम में खाली पड़े रहने लगे। आज से कोई दस बरस पहले मुझे एहाइम परिक्षेत्र की तरफ से एन एच के टेलिविजन द्वारा आयोजित ‘वर्ष का सर्वश्रेष्ठ किसान’ प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए चुना गया। उस समय चयन-समिति के एक सदस्य ने मुझसे पूछा, ‘मिस्टर फुकूओका, आप जौ और राई की खेती बंद क्यों नहीं कर देते?,’ मैंने उत्तर दिया, ‘क्योंकि राई और जौ की फसलें उगाने में आसान होती हैं तथा उन्हें चावल के साथ बारी-बारी से बोकर हम जापानी खेतों से अधिकतम कॅलोरियां पैदा कर सकते हैं। इसकी खेती बंद न करने का यही कारण है।’

मुझे यह बतला दिया गया कि जो भी व्यक्ति कृषि-मंत्रालय की इच्छा के खिलाफ अड़ेगा उसे सर्वश्रेष्ठ किसान का सम्मान नहीं मिल सकेगा। इस पर मैंने कहा, ‘यदि इस कारण से कोई पुरस्कार नहीं प्राप्त कर पाता तो मैं उसके बिना ही भला हूं।’ चयन-समिति के एक सदस्य ने बाद में मुझसे कहा था, ‘यदि मुझे कभी विश्वविद्यालय छोड़कर किसानी करनी पड़े तो शायद मैं आपके ढंग से ही खेती करूंगा और लड़ाई के पूर्व की तरह गर्मियों में चावल और सर्दियों में जौ और राई उगाऊंगा।’ इस घटना के कुछ समय बाद ही मैं एन एच के टेलिविजन के एक परिसंवाद जिसमें विश्वविद्यालयों के कई प्राध्यापक भी थे, उस परिसंवाद में शामिल हुआ और तब भी मुझसे पूछा गया, ‘आप जौ और राई उगाना बंद क्यों नहीं कर देते?’ मैंने फिर कहा कि, ऐसा करने के यदि कोई दर्जन भर उचित कारण हों तो उनमें से एक के लिए भी मैं ऐसा नहीं करूंगा। उन दिनों जाड़े के अनाज की खेती बंद करने के लिए नारा दिया गया थाः ‘उनकी दया-मृत्यु’ यानी इस खेती को शांति से मर जाने दिया जाए लकिन ‘दया-मृत्यु’ तो बहुत ही सौम्य शब्दावली है। कृषि मंत्रालय की तो इच्छा थी कि जौ और राई कुत्ते की मौत मरें। जब मुझे यह समझ में आ गया कि सरकार की योजना जाड़े के अनाज की खेती पर तुरंत लगाम लगाने की है तो मुझे बेहद दुख हुआ।

चालीस बरस पहले इन लोगों ने गेहूं जैसे एक विदेशी अनाज, एक बेकार तथा असंभव फसल को उगाने का आह्वान किया था। तब यह कहा गया था कि राई और जौ की जापानी किस्मों में अमेरिकी गेहूं जैसे पौष्टिक तत्व नहीं हैं, और किसानों ने बड़े बेमन से इन परम्परागत अनाजों को उगाना बंद कर दिया। जैसे-जैसे रहन-सहन का स्तर छलांगे लगाते हुए बढ़ा, लोगों ने कहना शुरू किया, मांस खाओ, अंडे खाओ, दूध् पियो और चावल खाना छोड़कर रोटी खाना शुरू कर दो। मक्का, सोयाबीन तथा गेहूं का आयात बढ़ता ही गया। चूंकि अमेरिकी गेहूं सस्ता था, देसी जौ और राई की खेती बिल्कुल त्याग दी गई। जापानी कृषि ने ऐसे तरीके अपनाए जिनके कारण किसानों को शहरों में जाकर छोटे-मोटे काम ढूंढने पड़े, ताकि वे फसले खरीद सकें, जिन्हें उगाने के लिए उन्हें मना किया गया था। और अब खाद्य संसाधनों की कमी के बारे में नई चिंताएं खड़ी हो रही हैं। अब जौ और राई की खेती में आत्मनिर्भरता की फिर से हिमायत की जा रही है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि किसानों को इनके लिए राज-सहायता तक प्राप्त होगी। लेकिन यही काफी नहीं है कि कुछ बरस तक जाड़े का अनाज उगा कर फिर उसे बंद कर दिया जाए।

एक ठोस और सही कृषि-नीति बनाई जानी चाहिए मगर एक कायम रहने योग्य कृषि-नीति इसलिए नहीं बन पाती कि अव्वल तो कृषि मंत्रालय को यही नहीं पता कि उगाया क्या जाना चाहिए और इसलिए कि उसे यही नहीं समझ में आता कि, जो कुछ खेतों में उगाया जाता है उसमें और लोगों को खुराक में क्या संबंध है। यदि कृषि-मंत्रालय के कर्मचारी पर्वतों और वादियों में जाएं और सात जड़ी-बूटियां वसंत की तथा सात बूटियां सर्दियों की एकत्रित करें और चखने का कष्ट भी उठाएं तो उन्हें पता चल जाएगा कि मानव के पोषण का स्रोत क्या है। यदि वे और ज्यादा पड़ताल करें तो वे देखेंगे कि हम बड़ी अच्छी तरह चावल, राई, जौ, कुटकी (कोदो) तथा सब्जियों जैसी परम्परागत देसी फसलों के सहारे जी सकते हैं, और वही वे यह भी तय कर पायेंगे कि, जापानी कृषकों को सिर्फ यही फसलें उगाने की जरूरत है। यदि किसानों को सिर्फ यही उगाना पड़े तो खेती का काम उनके लिए बहुत ही आसान हो जाएगा। आधुनिक अर्थशास्त्रियों का अब तक का सोच यह रहा है कि छोटे पैमाने की आत्मनिर्भर खेती गलत है। क्योंकि वह पुराने जमाने की है और ऐसी है, जिसे तत्काल बंद कर दिया जाना चाहिए।

कहा जा रहा है कि, हर काश्त का क्षेत्रफल बढ़ाकर अमेरिकी ढंग से खेती जैसा कर दिया जाना चाहिए। इस ढंग का सोच सिर्फ कृषि पर ही नहीं लागू होता है बल्कि सभी क्षेत्रों का विकास इसी दिशा में अग्रसर हो रहा है। इसका लक्ष्य यह है कि, खेती के काम में कम-से-कम लोग रहें। कृषि-अधिकारियों का कहना है कि, थोड़े से लोग भी आधुनिक मशीनों की मदद से उतने ही रकबे में अधिक पैदावार ले सकते हैं। इसे ही खेती की प्रगति कहा जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान के 70 से 80 प्रतिशत लोग किसान थे। बहुत जल्द ही यह आंकड़ा 50 पर आकर ठहरा है। कृषि-मंत्रालय का इरादा है कि, यूरोप और अमेरिका की तरह जापान में भी किसानों की संख्या आबादी के 10 प्रतिशत के स्तर पर रखी जाए और अन्य लोगों को इस क्षेत्रा में आने से रोका जाए। मेरी राय में तो आदर्श स्थिति यह होगी कि, शत-प्रतिशत लोग किसान हों। जापान में प्रत्येक व्यक्ति के लिए केवल चौथाई एकड़ कृषि योग्य भूमि है। यदि हर व्यक्ति को चौथाई एकड़ जमीन दी जाती है तो पांच व्यक्तियों के एक परिवार के लिए सवा एकड़ जमीन मिल जाएगी और वह इस परिवार को पूरे वर्ष पलने के लिए काफी होगी। यदि प्राकृतिक कृषि को अपनाया जाए तो किसान के पास फुर्सत और गांव की सामाजिक-गतिविधियों के लिए भी ढेर सा समय बच रहेगा। मेरे विचार से तो देश को एक सुखी और सुखद भूमि बनाने का यह सबसे सीधा तरीका है।

Disqus Comment