‘लो’ कार्बन के साथ ‘लो’ वॉटर इकॉनमी भी जरूरी

Submitted by Hindi on Thu, 06/23/2011 - 11:17
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नवभारत टाइम्स, 23 जून 2011

‘लो’ वॉटर इकॉनमी का अर्थ है, पानी को कम खर्च करना और उसका दोबारा इस्तेमाल करना। इसके पीछे यह सिद्धांत है कि पर्यावरण में प्राकृतिक अवस्था में जितना भी पानी है, उसे जहां तक संभव है बचाया जाए। पानी की हर बूंद का दोबारा इस्तेमाल किया जाए।

पानी के बिना जीवन की कल्पना मुश्किल है। गर्मियों के मौसम में पानी की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है और यही वह समय होता है, जब इसकी सबसे ज्यादा किल्लत होती है। भारतीय उपमहाद्वीप की भीषण गर्मी के बीच हर साल मानसून में हम अच्छी बारिश की कामना करते हैं। हमारे जल स्रोत बहुत हद तक बारिश पर निर्भर करते हैं। वैसे पानी की कमी सिर्फ गर्मियों की समस्या नहीं है। अगर पिछले दशक का सारा संघर्ष तेल को लेकर था, तो बेशक यह दशक पानी के नाम रहने वाला है। धरती पर पानी तेजी से खत्म हो रहा है और जो उपलब्ध है, वह भी अच्छी क्वालिटी का नहीं है।

पानी हो केंद्र में


भारत में आबादी बढ़ रही है, पर जल संसाधन सीमित हैं। इसीलिए सन् 1947 से देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में लगातार गिरावट हुई है। अनुमान है कि यह दशक भारत के लिए पानी की विकराल समस्या लेकर आएगा और पानी की प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1700 क्यूबिक मीटर के स्तर से भी नीचे चली जाएगी, जो कि एक स्वीकृत मानक है। समस्या का यह एक मानव केंद्रित नजरिया है। पर प्रकृति में भी पानी का बहुत महत्व है। हवा के बाद पानी ही पृथ्वी पर दूसरा जीवनदायी पदार्थ है। इसीलिए पानी के दुरुपयोग का असर पर्यावरण और पारिस्थितिकी, दोनों पर पड़ेगा इसी पर अर्थव्यवस्था भी टिकी हुई है। पानी का असल मूल्य उसका पारिस्थितिकीय मूल्य है। अगर अपनी पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था को बचाना है तो हमें ऐसी राष्ट्रीय रणनीति अपनानी चाहिए, जो देश की विकास योजनाओं के केंद्र में पानी को रखे। आजकल ‘लो’ कार्बन इकॉनमी पर जोर दिया जा रहा है। आने वाले समय में फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता को कम करने और जलवायु परिवर्तन के खतरे को रोकने के लिए ऐसा करना जरूरी है। ‘लो’ कार्बन इकॉनमी की ही तरह ‘लो’ वॉटर इकॉनमी के बारे में विचार करना चाहिए। इससे हमारा भविष्य सुरक्षित होगा।

 

 

सबकी भागीदारी जरूरी


‘लो’ वॉटर इकॉनमी का अर्थ है, पानी को कम खर्च करना और उसका दोबारा इस्तेमाल करना। इसके पीछे यह सिद्धांत है कि पर्यावरण में प्राकृतिक अवस्था में जितना भी पानी है, उसे जहां तक संभव है बचाया जाए। पानी की हर बूंद का दोबारा इस्तेमाल किया जाए। एक उदाहरण पेश है। पानी की 80 प्रतिशत मांग कृषि क्षेत्र में है। यहां पानी की हर बूंद के जरिए ज्यादा से ज्यादा पैदावार हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए पर इसके लिए वैसी नीति बनाने और उसे लागू करने के लिए आर्थिक सहायता तथा प्रतिबद्धता की जरूरत है। किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए ड्रिप इरिगेशन जैसी पानी बचाने वाली तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहिए। अब उपभोक्ताओं को भी अपनी पसंद बदलनी चाहिए। उन्हें ऐसे अनाज खाने चाहिए, जिन्हें उगाने के लिए कम पानी की जरूरत पड़ती है। जैसे चावल की बजाय बाजरा या दूसरे मोटे अनाजों का सेवन ये स्वास्थ्य के लिहाज से भी अच्छे होते हैं। उद्योग जगत को भी ‘लो’ वॉटर इकॉनमी के विचार पर काम करना चाहिए। कारखानों में खेती में इस्तेमाल होने वाले पानी का दोबारा इस्तेमाल करना चाहिए। सबसे ज्यादा जल प्रदूषण करने वाले क्षेत्रों, जैसे ऊर्जा क्षेत्र को अपने कामकाज के तरीकों को बदलना चाहिए। जल स्रोतों को प्रदूषित करने वाले क्षेत्रों को भी इस राष्ट्रीय लक्ष्य को आगे बढ़ाना चाहिए।

 

 

 

 

व्यक्तिगत स्तर पर हम क्या कर सकते हैं?

 

 

 

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र पानी को गैर जिम्मेदार तरीके से इस्तेमाल करने वालों में सबसे आगे है। दूसरे शहर भी उसकी देखा-देखी ऐसा कर रहे हैं। अगर अगले दो दशकों में देश के 5000 बड़े-छोटे शहरों में 30 करोड़ लोग और पहुंच जाएं तो हमें तुरंत ही अपनी जल नीति पर पुनर्विचार करना होगा।

हमारे गांवों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि गांवों में प्रति व्यक्ति प्रति दिन पानी की उपलब्धता 55 लीटर है। इसे कम करना संभव नहीं है, क्योंकि लोगों को पीने, खाना पकाने, नहाने और साफ-सफाई के लिए हर दिन कम से कम 50 लीटर पानी तो मिलना ही चाहिए। शहरों में स्थिति इससे एकदम अलग है। यहां पानी के इस्तेमाल के तरीकों पर विचार किया जा सकता है। शहरों में जलस्रोतों का इस्तेमाल असमान और असंतुलित तरीके से किया जाता है। दिल्ली में प्रति व्यक्ति प्रति दिन पानी की उपलब्धता 36 लीटर से लेकर 400 लीटर के बीच है पर जिस शहर के पिछवाड़े में यमुना जैसी नदी बहती है, उस शहर में हजारों किलोमीटर दूर से पानी मंगाया जाता है। वह भी अच्छा-खासा पैसा खर्च करके। उस पर आलम यह है कि दिल्ली इस महंगे पानी को दोबारा इस्तेमाल करने पर कोई ध्यान नहीं देती। न ही पानी का दुरुपयोग करने वाले बड़े लोगों को कोई सजा दी जाती है। एक तरफ यह बेपरवाही है, दूसरी तरफ लोगों की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं होतीं।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र पानी को गैर जिम्मेदार तरीके से इस्तेमाल करने वालों में सबसे आगे है। दूसरे शहर भी उसकी देखा-देखी ऐसा कर रहे हैं। अगर अगले दो दशकों में देश के 5000 बड़े-छोटे शहरों में 30 करोड़ लोग और पहुंच जाएं तो हमें तुरंत ही अपनी जल नीति पर पुनर्विचार करना होगा। एक एकीकृत नीति अपनानी होगी। इसमें स्थानीय जलस्रोतों के इस्तेमाल तथा पानी के दोबारा उपयोग पर विचार करना होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शहरी जल नीति पर होने वाली तमाम चर्चा अनावश्यक रूप से पानी के निजीकरण पर जाकर खत्म हो जाती है पर हमारी बातचीत का आधार अधिक तर्कसंगत होना चाहिए।

 

 

 

अनूठा भारतीय मॉडल


हालांकि आज के दौर में ‘लो’ वॉटर इकॉनमी विकसित करना आसान नहीं है- वह भी तब, जब पर्सनल स्विमिंग पूल होना शान की बात हो और रेगिस्तानी इलाकों के होटलों में मेहमान 12 इंच के शॉवर का मजा लूटते हों। क्या ऐसा कोई अनूठा भारतीय मॉडल विकसित किया जा सकता है, जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ जल संरक्षण भी करे। ऐसा करना बहुत जरूरी है, वरना दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था का विकास संभव नहीं होगा। अच्छा है कि निश्चित मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद पानी का बार-बार, लगातार इस्तेमाल किया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि हम दिल और दिमाग से उसके मोल को समझें।

रोहिणी निलेकणीरोहिणी निलेकणी(लेखिका अक्षरा फाउंडेशन और अर्घ्यम की चेयरपर्सन हैं)

 

 

 

 

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