प्राकृतिक कृषि की विभिन्न शैलियां

Submitted by Hindi on Tue, 06/28/2011 - 15:41
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

विधिहीन विधि विजय की इच्छा-रहित कर्म तथा प्रतिरोध-रहित मनःस्थिति ही प्राकृतिक कृषि के सबसे पास पहुंचाता है जब हम इस तथ्य को समझ लेते हैं कि, आनंद और सुख पर अधिकार करने की कोशिश में हम उसे खो बैठते हैं, तो हम प्राकृतिक कृषि के सार को भी पकड़ लेते हैं। खेती का अंतिम लक्ष्य फसलें उगाना नहीं बल्कि इंसानों को शिक्षित कर परिपूर्ण बनाना है।

‘काम’ शब्द को मैं कुछ खास पसंद नहीं करता। प्राणियों में सिर्फ इंसान को ही काम करना पड़ता है। यह मेरे हिसाब से दुनिया की सबसे हास्यास्पद बात है। अन्य प्राणियों को आजीविका सिर्फ जिंदा रहने में ही प्राप्त हो जाती है। लेकिन लोग यह सोचकर, काम में पागलों की तरह भिड़े रहते हैं कि, जिंदा रहने के लिए उन्हें ऐसा करना ही चाहिए। काम जितना बड़ा हो, चुनौती जितनी ज्यादा हो, उनके हिसाब से वह उतना ही ज्यादा चमत्कारी होता है। हमारा बहुत भला होगा यदि हम ऐसी सोच को त्याग कर ऐसी सहज और आराम की जिंदगी जीना शुरू करें, जिसमें फुर्सत का वक्त ढेर सा हो। मेरे खयाल से तो जिस तरह से कटिबंधीय (ट्रापिकल) इलाकों में प्राणी रहते हैं, वही सबसे अच्छा तरीका है। वे सिर्फ सुबह और शाम को बाहर निकलकर देख लेते हैं कि, खाने के लिए कुछ है या नहीं, और बाकी दोपहरी में मजे से लंबी तान कर सोते हैं। सादगी का ऐसा जीवन इंसानों के लिए तभी संभव होगा जब वे सीधे अपनी दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं पैदा करने के लिए ही काम करें। इस तरह के जीवन के काम, वैसा काम नहीं रह जाता है, जैसा कि लोग उसके बारे में सोचते हैं, बल्कि हम सिर्फ वही करते हैं, जिसको करने की जरूरत है।

चीजों को इस तरफ मोड़ना ही मेरे जीवन का लक्ष्य है। यही लक्ष्य उन सात-आठ युवाओं का भी है, जो सामुदायिक ढंग से पहाड़ी पर की झोपड़ियों में रहकर किसानी कामों में मेरा हाथ बंटाते हैं। ये नौजवान किसान बनना चाहते हैं, नये गांव और समुदाय स्थापित कर इस प्रकार के जीवन को एक मौका देना चाहते हैं। वे मेरे फार्म पर व्यावहारिक हुनर सीखने के लिए आते हैं, जिनकी उन्हें इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए जरूरत पड़ेगी। यदि आप देश में इधर-उधर नजर डालेंगे तो आपको इस तरह के कई समुदाय इधर कुछ समय में उभर आए नजर आ जाएंगे। यदि कुछ लोग उन्हें हिप्पियों का जमावड़ा कहते हैं तो भी मुझे कोई ऐतराज नहीं है। उन्हें आप वैसा भी मान सकते हैं, लेकिन एक साथ रहते हुए और काम करते हुए प्रकृति तक वापस पहुंचने के रास्ते पर चलते ये युवक ‘नए किसान’ के मॉडल हैं। वे यह समझ गए हैं कि, अपनी जड़ों के साथ जुड़ने का मतलब यह है कि, वे अपनी ही जमीन की पैदावार पर निर्भर रहें। जो समुदाय अपना खाद्य खुद नहीं पैदा कर सकता वह ज्यादा समय तक नहीं टिकेगा।

इनमें से कई युवा भारत जाते हैं या फ्रांस के गांधी-ग्राम, इसराइल के ‘किबुटजों’ में भी जाकर रहते हैं और पश्चिम अमेरिका के पर्वतों और मरूस्थलों के कबीलों में भी। कुछ बिरादरियां दक्षिण जापान की तोकार द्वीप श्रृंखला के सुवानी द्वीप में भी रह रही है, जो नये पारिवारिक ढंग से आदिवासियों जैसी घनिष्टता के साथ रहने का प्रयोग कर रही है। मेरे खयाल से उन मुट्ठी भर लोगों का यह आंदोलन बेहतर युग का पथ-प्रदर्शन कर रहा है। इन्हीं जैसे लोगों के बीच प्राकृतिक खेती अब अपने पैर जमाकर गति प्राप्त कर रही है। इनके अलावा बहुत से धार्मिक संप्रदायों और संगठनों ने भी प्राकृतिक खेती को अपनाया है। मानव की सारभूत प्रकृति की तलाश करते हुए, आप इस काम को कैसे भी कर रहे हो, आपको शुरूआत स्वास्थ्य के बारे में सोचते हुए ही करनी होगी। सही चेतना की तरफ ले जाने वाले रास्ते पर चलने वालों के लिए प्रतिदिन सादगी से रहना तथा पौष्टिक, प्राकृतिक खाद्य उगाना और खाना आवश्यक होता है। इससे यही समझ में आता है कि, कई लोगों के लिए इसकी शुरूआत करने की सबसे अच्छी जगह प्राकृतिक कृषि ही रही है।

मैं खुद किसी खास धार्मिक सम्प्रदाय में विश्वास नहीं करता और अपने विचारों पर किसी से बातचीत करने में मुझे कोई ऐतराज नहीं है। ईसाई, बौद्ध धर्म, शिंतों तथा कई अन्य धर्मों की बारीकियों और विशेषताओं में जाने की भी मुझे कोई खास रूचि नहीं है, लेकिन यह बात जरूर मुझे विचित्र लगती है कि, गहरी धार्मिक प्रतिबद्धताओं वाले लोग बराबर मेरे फार्म की तरफ आकर्षित होते हैं। मेरे विचार से इसका कारण यही है कि, अन्य प्रकार की खेतियों के विपरीत प्राकृतिक खेती एक ऐसे दर्शन पर आधारित है जो मिट्टी विश्लेषण, पानी में ऑक्सीजन और हाईड्रोजन के घनत्व तथा फसल पैदावार जैसी चीजों से परे जाती है। कुछ दिनों पहले पेरिस स्थित जैव-बागवानी केंद्र से एक शख्स यहां पहाड़ी पर चढ़कर आए और दिन भर हमने बातचीत करते बिताया। फ्रांस की हालातों को सुनने पर मुझे पता चला कि वे लोग जैव कृषि पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की योजना बना रहे हैं और उस बैठक की तैयारी के लिए ही ये फ्रांसीसी सज्जन सारी दुनिया के जैव तथा प्राकृतिक कृषि फार्मों की यात्रा कर रहे हैं। मैंने उन्हें बागान और खेतों का दौरा करवाया, और फिर मगवर्ट चास की चुस्कियां भरते हुए मैंने अपने पिछले तीस सालों के तजुर्बों पर आधारित विचार उसे बतलाए।

सबसे पहले तो मैंने उससे कहा कि, जब आप पश्चिम में प्रचलित जैव कृषि के सिद्धांतों पर विचार करते हैं तो आपको पता चलता है कि, उनमें और चीन, कोरिया तथा जापान में सदियों से प्रचलित परम्परागत प्राचीन कृषि रीतियों में कोई खास अंतर नहीं है। जापान में सारे किसान मेईजी तथा ताइशो-युग (1868-1926) से लेकर अभी द्वितीय विश्व युद्ध के पहले तक इसी प्रकार की खेती करते चले आ रहे थे। यह वह प्रणाली थी जो खाद और प्राणी तथा मानव द्वारा फेकें पदार्थों को री-साइकिल करने के बुनियादी महत्व पर जोर देती थी। प्रबंधन का रूप गहन खेती का था (विस्तृत नहीं) तथा उसमें फसल अदला-बदली, मिश्रित रोपण तथा हरे खाद के उपयोग जैसी प्रथाएं शामिल थीं। चूंकि जगह सीमित थी, खेत कभी खाली नहीं रहने दिए जाते थे, और बुआई तथा कटाई के कार्यक्रम वक्त की सख्त पाबंदी के साथ चलते थे। सारे जैव अपशिष्टों (फेंकी हुई चीजों) को खाद बनाकर खेतों को वापस लौटा दिया जाता था। जैव खाद के प्रयोग को पुख्ता तौर पर प्रोत्साहित किया जाता था। तथा कृषि अनुसंधान मुख्यतः जैव पदार्थों तथा खाद बनाने की तकनीकों से ही मतलब रखता था।

इसी तरह अभी आधुनिक समय तक किसान जापान में जो खेती करते थे, उसमें प्राणी, फसलें तथा मानव मिलकर एकात्म हस्ती बन जाते थे। यह कहा जा सकता है कि, पश्चिम में जिस तरह की जैव कृषि हो रही है वह वहां की प्रचलित खेती से भिन्न होने के लिए इसी पूरब की परम्परागत खेती को ही अपना रही है। मैंने आगे यह भी कहा कि, प्राकृतिक खेती के विभिन्न तरीकों में से इन दो को अलग किया जा सकता है। व्यापक प्राकृतिक खेती को आप साधारण बौद्ध शब्दावली में ‘महायान’ तथा ‘हीनयान’ प्राकृतिक कृषि कह सकते हैं। व्यापक, महायान कृषि अपने में से ही तब उपजती है, जब मानव और प्रकृति में एकता बनी रहती है। वह प्रकृति और मन की नकल, जैसे वे हैं, उसी रूप में करती है। वह इस विश्वास पर चलती है कि, यदि मानव कुछ देर के लिए अपनी इच्छाशक्ति को त्याग कर खुद को प्रकृति के द्वारा निर्देशित होने देता है तो, इसके बदले में प्रकृति उसे सब-कुछ अपनी तरफ से देती है। इसे इस दृष्टांत द्वारा भी समझा जा सकता है कि, प्राकृतिक कृषि में मानव और प्रकृति के संबंध एक आदर्श परिवार में पति-पत्नी जैसे होते हैं। यह दाम्पत्य न तो (बाहर से) प्रदान किया जाता है न ग्रहण किया जाता है। आदर्श जोड़ी अपने आप बन जाती है।

दूसरी तरफ संकुचित प्राकृतिक कृषि में प्रकृति की प्रयास-पूर्वक नकल की जाती है और इसके लिए ‘जैव’ या अन्य तरीके सोच-समझकर अपनाए जाते हैं। खेती दिए गए लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए की जाती है। हालांकि आप प्रकृति को सच्चा प्यार करते हैं तथा ईमानदारी से उसका हाथ भी मांगतें हैं लेकिन यह रिश्ता तब भी आजमाईशी ही रहता है। आधुनिक औद्योगिक कृषि, बगैर उसका मतलब पकड़े, दैवी बुद्धि की तलब भी करती है और अपने मकसद के लिए प्रकृति का उपयोग करना चाहती है। बेचैनी से यहां-वहां भटकने के बावजूद वह ऐसा कोई नहीं पाती जिसके सामने वह प्रेम निवेदन कर सके। प्राकृतिक कृषि का संकुचित विचार कहता है कि, किसान के लिए यह अच्छा है कि, वह मिट्टी में जैव पदार्थ मिलाए और मवेशी पाले और प्रकृति का उपयोग करने का यही सर्वश्रेष्ठ तथा कार्यकुशल तरीका है। व्यक्तिगत व्यवहार के लिहाज से तो उसमें कोई हर्ज नहीं है लेकिन केवल ऐसा ही करके प्राकृतिक कृषि की असली भावना को जिंदा नहीं रखा जा सकता। इस तरह की संकुचित प्राकृतिक कृषि की तुलना तलवारबाजी की उस शैली से की जा सकती है, जिसे एक प्रहार-वाली शैली कहते हैं। इस शैली में विजय, तकनीक के कुशल, लेकिन संकोची प्रयोग द्वारा हासिल की जाती है। आधुनिक औद्योगिक कृषि दो-प्रहार-वाली शैली को अपनानी है, जो मानती है कि, तलवार के ढेर सारे प्रहार, एक-के-बाद-एक करके ही जीत हासिल की जाती है।

शुद्ध प्राकृतिक कृषि में किसी भी तरह के प्रहार के लिए कोई जगह नहीं है। न तो उसे कहीं जाना है, न कोई जीत हासिल करनी है। ‘कुछ न करने’ को व्यवहार में लाना ही एक चीज है, जिसे प्राप्त करने के लिए किसान को प्रयत्नशील होना चाहिए। लाओत्जू ने क्रियारहित प्रकृति की बात की थी और मुझे विश्वास है कि यदि वे किसान होते तो निश्चय ही उन्होंने प्राकृतिक कृषि ही की होती। मेरे खयाल से गांधी का तरीका एक विधिहीन विधि विजय की इच्छा-रहित कर्म तथा प्रतिरोध-रहित मनःस्थिति ही प्राकृतिक कृषि के सबसे पास पहुंचाता है जब हम इस तथ्य को समझ लेते हैं कि, आनंद और सुख पर अधिकार करने की कोशिश में हम उसे खो बैठते हैं, तो हम प्राकृतिक कृषि के सार को भी पकड़ लेते हैं। खेती का अंतिम लक्ष्य फसलें उगाना नहीं बल्कि इंसानों को शिक्षित कर परिपूर्ण बनाना है।

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