मर रही हैं नदियां

Submitted by admin on Fri, 11/06/2009 - 18:01
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क्षिप्रा : सिमट रही आस्थाक्षिप्रा : सिमट रही आस्था‘विकास अप्सरा’ के चाहत में नर्मदा जल भोपाल पहुंचाने के लिए लंबी पाईपलाइन योजना और बिजली उत्पादन के नाम पर 183 बांधों की योजना पर काम चल रहा है। यह सब हो रहा है, प्रदेश की चंद बड़ी नदियों के दम पर। लेकिन क्या इन नदियों का पानी बचा रह पायेगा? मध्यप्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जिस तेजी से छोटी नदियाँ सिमटती, सूखती जा रही हैं उससे बड़ी नदियों पर खतरा बढ़ने ही वाला है। चिंता की बात तो यह है कि प्रकृति प्रदत्त छोटी नदियों के जीवन को लेकर राज्य की कोई रणनीति नही दिखाई पड़ती। मध्यप्रदेश के कुछ नदियों की कहानी हमारे सामने है . . .

 

कोलांस की ‘कोली’ खो गयी है


भोपाल से लगा औद्योगिक क्षेत्र मण्डीदीप भूमिजल के दोहन का एक बड़ा केंद्र है। जहां एक ओर प्रदेश सरकार बड़ा ताल बचाने के लिए श्रमदान करा रही है वहीं प्रतिदिन लाखो लीटर पानी इन उद्योगों द्वारा दोहन किया जा रहा है। झील संरक्षण का बजट गैर कार्यो में खर्चकर जिम्मेदार प्रशासन ने जता दिया कि वह तथाकथित सुंदरता के नाम पर कुछ भी कर सकती है। हालांकि उसका जल संसाधन अमला लंबे समय से यही कुछ करता आया है। मण्डीदिप कि नदी ”कोलांस” कभी समृध्द नदी हुआ करती, लेकिन अब नाले से अधिक वह कुछ नहीं है। वड़ी झील के जोश में यहां भी श्रमदान शुरू हुआ लेकिन थोड़े ही दिनों में मामला ठंड़ा पड़ गया। अब कोलांस वापस, उद्योगो, कचरों ओर उदासीनता के चंगुल में घिरती जा रही है। गत दिनों में भूमिजल का तेजी से बाजारीकरण हुआ है, जिससे छोटी नदियों, बावड़ी कुंओ का जल स्तर लुप्तप्राय होता जा रहा है। राज्य में जिस तेजी से मिनिरल्स, शराब व अन्य उद्योगों की कतार बढ़ रही है उसमें जल की खपत का कोई अंदाज शायद ही किया गया हो। प्रदेश की तमाम छोटी नदियों को लेकर बरती गई प्रशासनिक उदासीनता और भ्रष्टाचार का ही नतीजा है कि हर वर्ष प्रदेश का बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में पड़ता जा रहा है। रोजगार गारंटी योजना व बी.आर.जी.एफ. जैसे मदों के बावजूद प्रदेश में जल स्त्रोतो के संरक्षण-संवर्धन की रफ्तार अत्यंत धीमी रही है। 90 के बाद समूचे देश में राजीव गांधी जल ग्रहण मिशन जैसे व्यापक कार्यक्रम चलाये गये लेकिन अपने 7 वें बैच के पहुंचने तक वह भी सरकारी कमीशनखोरी का शिकार हो गया जिससे ग्रामीण विकास विभाग, भूमि संरक्षण विभाग व जल संसाधन विभाग ने व्यापक कार्यक्रम की बजाय बड़े बांध बनाकर कमाई की पक्की जमीन तैयार कर ली। अब हर वर्ष इन्ही बांधों के रखरखाव, सुधार के नाम पर अरबों की राशि खपत की जाने लगी है।

 

पातरा का पता नहीं


पुल तो है, नदी पता नहीं भोपाल की बड़ी झील को न जोने कितनी नदियों से पानी मिलता है। केरवा और कोलांस हो कलियासोत। सभी कभी जल स्रोत का बड़ा खजाना हुआ करती थीं। हबीबगंज से सीधे मेन स्ठेशन की ओर जायें तो रास्ते में पड़ता है पातरा पुल कभी यहां से पातरा नदी बहा करती थी, आज यह बात मानने को हम तैयार भी न हो कि 15 वर्ष पहले तक इसे छाटी नदी के रूप में देखा जा सकता था, लेकिन धीरे धीरे शहरीकरण ने नदी को लील लिया। घरों की सभी नालियों का मुंह पातरा में खोल दिया गया। नतीजतन आज उसे नाला भी कहना ठीक न होगा। हां, जब कभी भारी बारिश हुई तो ऐसी नदियों का अस्तित्व महसूस किया गया। घरों से निकलने वाले मलबों और गंदगी को सीधे नदी में डालने से रोकने की कभी कोशिश नही की गई। भानपुर गांव के करीब नदी 10 कदम जिंदा दिखाई पड़ती है। रेलवे पुल के नजदीक ही नदी में एक पंप हाउस है, जो सिंचाई का पानी किसानों को देता है, लेकिन नदी पूरी तरह से कचरे ओर शैवाल से सिंकड गई है। खंती में नदी के ठीक किनारे पर जो कचरा डाला और जलाया जा रहा है, वह नदी का मारने को कोशिश से कम नहीं। नदी के सहारे आज भी कई किसान खेती कर रहे है, लेकिन नगर निगम या जिला प्रशासन चने एक बार भी नदी के जीर्णोध्दार के बारे में नहीं सोचा। शायद भोपाल को अधिक पानीदार होन का गुमान हो गया है? हालाकि बड़ी झील ने खुद ही यह गुमान तोड़कर दिया है।

 

उमरार : नाम गुम जायेगा


बाद्यों की धरती बांधवगढ़ के जिला मुख्यालय उमरिया से दक्षिण दिशा में 20 कि.मी. की दूरी पर स्थित है आकाशकोट। जंगल, पहाड़ों और 20 आदिवासी गांवो का संकुल आकाशकोट। यहीं किसी चट्टानी तल या पुराने वृक्ष के नीचे से बह निकली थी उमरार की धार। पथरीली संरचनाओ से गुजरती यह छोटी नदी अपने 40 कि. मी. के सफर में हजारों एकड़ जमीनों को सीचंती साथ ही साथ समूची उमरिया को पानी देती। खेतों को जीवन देने वाली जीवनदायिनी 1980 के पूर्व बारहमासी बहने वाली जीवंत नदी हुआ करती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब नदी के नाम पर बचा है तो उमरार बांध और यदा कदा दिखाई पड़ती उसकी धार। 1984 के समय उमरार बांध क्या बना कि मानों खुद ही नदी का सारा पानी पी गया और नदी पर जिंदा रहने वालों को प्यासा तड़पता छोड़ दिया है। उमरार बांध से लगभग 700 परिवार विस्तापित हुए, जो आज भी अपने हक के लिए लड़ रहे है। गिंजरी से लेकर अमड़ी गांव तक की खेती नदी का प्रवाह सूखने के कारण समाप्त हो गई। इधर, जल संसाधन विभाग बांध का पानी और डूब की जमीन लीज पर देकर अपनी जेब भरता आया है। सो कमाई के लिए उसने बड़े-बड़े ठेकेदारों को पानी व जमीनें दीं। सिंचाई सुविधा के नाम पर जिन किसानों की जमीनों पर यह बांध बना उन अमड़ी, उफरी, ददरी, महरोई गांव के विस्थापितों को लेकर एक योजना तक नही है। बांध के ऊपर व नीचे के क्षेत्र में उमड़ार नदी का सूखा प्रवाह दिखाई देता है। इस क्षेत्र को मिट्टी के कटे किनारों, रेत, कंकड़ पत्थरों और मलबों से पटे नाल में बदल चुके ढांचे के रूप में देखा जा सकता है। बीच -बीच में पानी के गंदे डबरे मिल जायेंगे, यह अहसास दिलाने के लिए कि उमड़ार की ष्वास पुरी तरह से अभी थमी नहीं। जल संरक्षण विभाग हो यह पूरी तरह से अभी थमी नही। जल संरक्षण विभाग सभी ने नदी की जितनी लंबाई नहीं उतने कंक्रीट के बांध खड़े कर दिये, लेकिन कभी बड़ी नदी का जलस्तर अंदर दब गया और उसका मूल स्रोत भी कमजोर हुआ है। शहर में प्रवेश करते ही नदी की दुर्दषा और तेज हो जाती है। जहां ज्वालामुखी मंदिर से लंकर जिला जेल तक वह गंदे नाले-सी दिख्ती है। नगर पालिका ने अपने क्षेत्र में तो बीआरजीएफ मंद से श्रमदान के साथ नदी की सफाई करा दी है, लेकिन इस पूरी नदी के संरक्षण को लेंकर अभी भी कोई कार्ययोजना नहीं प्रतीत होती। अमड़ी संघर्ष मोर्चा के राम मिलन यादव कहते हैं कि पहले किसान खुद नदी की सफाई करके व उस पर मिट्टी के छोटे-छोटै बांध बनाकर पानी सहेजते थे, लेकिन बाज विस्थापित अपनी ही रोजी-रोटी व दैनिक मजदूरी की समस्या से उबर नहीं पा रहे है।

 

सीवन : सीहोर की जीवन रेखा


सीहोर जिले की सीवन नदी बाकी नदियों की अपेक्षा भले ही ठीक दिखती हो, लेकिन गर्मी आते ही इसकी भी हड्डियां दिखने लगती हैं। ग्रामीण शहरी क्षेत्र में फैली यह नदी जलकुंभी, बेसरम और पॉलीथीन भर जाने के कारण संकटग्रस्त है। बेंगनघाठ से लेकर करबला पुल तक सबसे आधिक कचरा हो जाता है। आबादी का बढ़ता दबाव नदी पर साफ दिखाई देता है। नदी में मिलने वाली नालियों के बहाव पर रोक न लगाने तथा मंदिरों के फूल, जवा इत्यादि विसर्जन सीधे नदी में करने से इसका पानी गंदा हो चुका है। जिला प्रशासन द्वारा नदी की स्वच्छता का कार्यक्रम तो चलाया गया लेकिन ग्रामीण क्षेत्र क़े प्रवाह हिस्से में नदी के सफाई व गहरीकरण के प्रयास नहीं किये गये हैं। सीवन नदी के सौदर्यीकरण को लेकर स्थानीय युवा गिरीश भवसार, लोकश वशिष्ठ, राजकुमार खत्री और राजेश भावसार बताते हैं कि उन्होने जिला प्रशासन के समक्ष एक नक्शा रखा है। नक्शा में नदी के किनारों व टापू पर पौधरोपण करने की योजना बनाई गई है। नक्शे में बताया गया है कि नीलकंठ, रामद्वारा, हनुमान फाटक, करबला मस्जिद के चारों तरफ पौधरोपण की योजना है। हालंकि शहरी क्षेत्र की अपेक्षा ग्रामीण अंचल में सीवान की स्थिति काफी कमजोर है, जिस पर विस्तृत योजना बनाकर जीर्णोद्धार करने की जरूरत है। जीवन रेखा सीवन को आज भी अपने उद्धारकों का इंतजार है।

 

क्षिप्रा : सिमट रही आस्था


कभी मालवा की जीवन रेखा मानी जाने वाली क्षिप्रा नदी आज मैदान में तब्दील हो चुकी है। यह नदी 200 किलोमीटर परिक्षेत्र से गुजरकर उज्जैन, देवास, महिदनुर आदि शहरों की करीब छह लाख आबादी की प्यास बुझाती रही है। साथ ही क्षेत्र के लघु एवं मझोले किसानों को सिंचाई और पशुपालन के लिए पानी प्राप्त होता था। पिछले दो दशकों में इसकी दुर्गति इस हद तक हुई है कि इससे पशुओं तक को पानी पिलाना संभव नहीं रह गया है। इसका खास कारण इस क्षेत्र में उद्योग , पेयजल एवं सिंचाई के लिए खोदे गए टयुबवेल है, जिनकी दिशा में होकर उनमें चला गया। आज हालत यह है कि क्षिप्रा नदी में पानी सिर्फ गर्मी में ही नही सूखता बाल्कि बारिश के मौसम को छोड़कर किसी भी मौसम में इसमें पानी नही मिलता। क्षिप्रा नदी की इस दशा के बावजूद उसके संरक्षण और विकास की काई योजना आज तक नही बनी। क्षिप्रा नदी के खत्म होने से उसके आसपास के क्षेत्र में जनजीवन को हुए नुकसान की ओर आज तक किसी का ध्यान नहीं गया। इस क्षेत्र के लघु एवं सीमान्त किसान पशुपालन के जरिये अपनी आजीविका चलाते थे, पानी के अभाव में उन्हें अपने पशु बेचने पड़े। 200 किलोमीटर के क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के आसपास के करीब 35 गांवों के लोगों की आजीविका का यह साधन हमेशा के लिए खत्म हो गया। इस क्षेत्र के कई लोग आज उद्योगों में मजदूरी करने को विवश हैं।

 

 

 

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