मौसम क्या है?

Submitted by Hindi on Mon, 07/11/2011 - 16:53
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विज्ञान प्रसार

पृथ्वी द्वारा वापस भेजी जाने वाली ऊर्जा को पहले पृथ्वी पर ही काफी “कार्य” करना पड़ता है तब वह अंतरिक्ष में जाती है। साथ ही वायुमंडल में मौजूद जल वाष्प अवरक्त किरणों को पृथ्वी की ओर केवल परावर्तित ही नहीं करती वरन् उनमें निहित ऊर्जा को बड़ी मात्रा में अपने में भंडारित भी कर लेती है। वायुमंडल उस ऊर्जा के बड़े भाग को पवन के माध्यम से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र को स्थानांतरित करता रहता है।

मौसम का अर्थ है किसी स्थान विशेष पर, किसी खास समय, वायुमंडल की स्थिति। यहाँ “स्थिति” की परिभाषा कुछ व्यापक परिप्रेक्ष्य में की जाती है। उसमें अनेक कारकों यथा हवा का ताप, दाब, उसके बहने की गति और दिशा तथा बादल, कोहरा, वर्षा, हिमपात आदि की उपस्थिति और उनकी परस्पर अंतः क्रियाएं शामिल होती हैं। ये अंतक्रियाएं ही मुख्यतः किसी स्थान के मौसम का निर्धारण करती हैं। यदि किसी स्थान पर होने वाली इन अंतःक्रियाओं के लंबे समय तक उदाहरणार्थ एक पूरे वर्ष तक, अवलोकन करके जो निष्कर्ष निकाला जाता हैं तब वह उस स्थान की “जलवायु” कहलाती है। मौसम हर दिन बल्कि दिन में कई बार बदल सकता है। पर जलवायु आसानी से नहीं बदलती। किसी स्थान की जलवायु बदलने में कई हजार ही नहीं वरन् लाखों वर्ष भी लग सकते हैं। इसीलिए हम ‘बदलते मौसम’ की बात करते हैं, ‘बदलती हुई जलवायु’ की नहीं। हम मौसम के बारे में ही समाचार-पत्रों में पढ़ते हैं, रेडियों पर सुनते हैं और टेलीविजन पर देखते हैं।

मौसम लोगों को तेवर से लेकर इतिहास तक को प्रभावित कर सकता है जबकि जलवायु किसी जीवधारी के समूचे वंश को प्रभावित कर सकती है। जलवायु में होने वाले परिवर्तन जीव-जंतुओं के समूचे वंशों को ही समाप्त कर सकते हैं। अतीत में ऐसा अनेक बार हुआ भी है। ये परिवर्तन हिमयुगों के आगमन अथवा उनके समापन जैसी बड़ी घटनाओं के फलस्वरूप बहुत धीरे-धीरे ही प्रगट होते हैं।

यह निर्विवाद तथ्य है कि किसी स्थान का मौसम ही अंततः उस स्थान या क्षेत्र की जलवायु का निर्माण करता है। लंबे समय तक चलने वाला मौसम ही जलवायु का रूप ले लेता है। उदाहरणार्थ उत्तर भारत में गर्मी की ऋतु में जलवायु गर्म और शुष्क रहती है, वर्षा गर्मी के अंत में होती है और सर्दियों में जलवायु ठंडी और शुष्क रहती है। हमारे तटीय प्रदेशों में जलवायु लगभग वर्ष भर गर्म और नम रहती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि गर्मी में और सर्दी के महीनों में वर्षा कभी भी नहीं होती। उस वर्षा से सर्दी या गर्मी में मौसम बदल सकता है- जलवायु नहीं।

यद्यपि वायुमंडल के विभिन्न घटकों की पारस्परिक क्रियाओं के फलस्वरूप ही मौसम का निर्माण होता है पर इन घटकों की गतिविधियों को कुछ “बड़े तत्व” अत्यधिक प्रभावित करते हैं। वे इनको नियंत्रित करते हैं। ये तत्व हैं सूर्य, पृथ्वी और पृथ्वी की भौतिक संरचनाएं। ये भौतिक संरचनाएं हैं पर्वत, घाटी, सागर, मरुस्थल आदि। वैसे स्वयं वायुमंडल की भी अपनी गतिविधियां हैं; उसके अपने स्वाभाविक गुण हैं। इन तत्वों में सबसे शक्तिशाली है सूर्य। इसलिए अपनी चर्चा सूर्य के गुणगान से ही आरंभ करें।

सूर्य


सूर्य, हमारी आकाश-गंगा के अरबों तारों में से एक साधारण तारा है। वह जलती गैसों का गोला है और पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किमी. दूर स्थित है परंतु इसके बावजूद भी, वह पृथ्वी की हर जड़ और चेतन वस्तु को और लगभग हर प्राकृतिक घटना को, प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करता है। उसकी वजह से ही हमारी धरती पर जीवन है और वह इतनी हरी-भरी है।

आकार में यह पृथ्वी से 13,06,000 गुना बड़ा है- उसका व्यास 13,90,440 किमी. है। जलती गैसों का गोला होने के फलस्वरूप उसके बाहरी भाग, फोटोस्फीयर, का ताप 61000 सै. है जबकि उसके आंतरिक भाग के ताप को 1,70,00,0000 सै. जैसा ऊंचा अनुमानित किया जाता है। पृथ्वी की तुलना में उसका वजन 3,33,420 गुना है।

सूर्य एक अत्यंत विशाल तापनाभिकीय भट्टी है जिसमें हाइड्रोजन ‘जलकर’ निरंतर हीलियम में परिवर्तित होती रहती है। वास्तव में सूर्य के आंतरिक भागों में संलयन क्रिया (फ्यूजन) से हाइड्रोजन हीलियम में बदलती रहती है। संलयन क्रिया विखंडन (फिशन) से एकदम विपरीत होती है। इसमें हल्के तत्वों के परमाणु आपस में संलयित होकर किसी भारी तत्व के (बड़े) परमाणु बनाते हैं। इस क्रिया में कुछ द्रव्य ऊर्जा में भी परिवर्तित हो जाता है जिससे बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है।

सूर्य अत्यधिक विशाल मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करता है। पृथ्वी को उसका बहुत सूक्ष्म अंश- केवल एक बटे दो अरबवां अंश- ही प्राप्त होता है। फिर भी यह ऊर्जा 23x1012 अर्थात् 230 खरब अश्व शक्ति (170 खरब किलोवाट) प्रति मिनट के तुल्य है। यह ऊर्जा की उस मात्रा से कहीं अधिक है जो हम किसी भी रूप में एक पूरे वर्ष में इस्तेमाल करते हैं। यदि इस मात्रा में 13 प्रतिशत की भी कमी हो जाए तो संपूर्ण पृथ्वी 1 मील (1.6 किमी.) मोटी बर्फ की तह में ढंक जाए और अगर कहीं इसमें 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो जाए तब पृथ्वी पर जीवन के सब रूप जलकर खाक हो जाएं।

सूर्य से हमें ऊर्जा, तीन प्रकार की विद्युतचुंबकीय तरंगों के रूप में, प्राप्त होती है। ये तरंगे हैं पराबैंगनी किरणें (तरंग दैर्घ्य 0.000001 से 0.000041 सेमी. तक), दृश्य प्रकाश किरणें (तरंग दैर्घ्य 0.000041 से 0.000076 सेमी. तक) और अवरक्त किरणें (तरंग दैर्घ्य 0.000076 से एक सेमी. तक)। पराबैंगनी और अवरक्त किरणों में हम वस्तुओं को देख नहीं सकते। फिर भी वे हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं। सूर्य से पृथ्वी की ओर आने वाली ऊर्जा का लगभग आधा भाग ही पृथ्वी की सतह तक पहुंच पाता है। जितनी सौर ऊर्जा वायुमंडल की ऊपरी सतह पर पहुंचती है उसका लगभग 35 प्रतिशत भाग, अपने मूल रूप में- लघु तरंगों के रूप में- बादलों, सूक्ष्म धूल कणों, गैसों के अणुओं आदि द्वारा प्रकीर्णित और परावर्तित कर दिया जाता है। इसलिए वह ऊर्जा न तो पृथ्वी की सतह को गर्म करने में इस्तेमाल होती है और न ही वायुमंडल को।

पृथ्वी की ओर आने वाली सौर ऊर्जा का बाकी भाग किरणों के रूप में वायुमंडल में से गुजरता है। उसका लगभग 14 प्रतिशत भाग वायुमंडल में उपस्थित धूल कणों, जल वाष्प, ओजोन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे रचकों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। इस सब के बाद जो सौर ऊर्जा बचती है (लगभग 51 प्रतिशत), वह धरती की सतह पर पहुंचती है। इसका अधिकांश भाग (लगभग 34 प्रतिशत) प्रकाश ऊर्जा के रूप में होता है और बाकी 17 प्रतिशत विसरित प्रकाश के रूप में।

जब सौर किरणें चट्टान, रेत, मिट्टी, जल आदि से टकराती हैं तब उनमें निहित अणु गतिशील हो जाते हैं। अणुओं के गतिशील होने से ऊर्जा का वह रूप मिलता है जिसे हम ‘ऊष्मा’ कहते हैं जिस वस्तु के अणु जितनी तेजी से गति करते हैं वह हमें उतनी ही गर्म महसूस होती है। दूसरे शब्द में यदि कोई वस्तु ठंडी है तब उसके अणुओं की गति अपेक्षाकृत धीमी है। किसी वस्तु के ताप को कम करते जाने से उसके अणुओं की गति भी कम होती जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार किसी वस्तु का ताप परम शून्य (-273.160 सै.) जैसा निम्न कर दिए जाने पर उसके अणुओं की गति एकदम समाप्त हो जाती है।

वैसे गतिशील अणुओं पर सौर ऊर्जा के आपतन का एक और परिणाम होता है स्वयं अणुओं द्वारा ऊर्जा की कुछ मात्रा को वापस भेज देना। ये परावर्तित किरणें अवरक्त किरणों जैसी दीर्घ तरंगदैर्घ्यों वाली होती हैं- लघु तरंगदैर्घ्य वाली नहीं। ये दीर्घ किरणें अपने मार्ग में आने वाले अणुओं को उत्तेजित कर देती हैं। इस प्रकार पूरी पृथ्वी ही ऊष्मा की एक अत्यंत विशाल विकरक (रेडिएटर) बन जाती है।

पृथ्वी के हर क्षेत्र से अथवा उसकी हर वस्तु से ऊष्मा का विकिरण समान रूप से नहीं होता। उसकी नदियां, पर्वत, सागर, रेतीले मैदान आदि एक सी मात्रा में न तो ऊष्मा पैदा करते हैं और न ही उसे अवरक्त किरणों के रूप में विकरित करते हैं। इसीलिए अनेक गर्म क्षेत्रों के बीच में ठंडे स्थल बन जाते हैं। इसी कारण एक ही स्थान पर रात और दिन के तापों में अंतर आ जाता है। थल और सागर के ताप भिन्न-भिन्न हो जाते हैं और भूमध्यरैखिक प्रदेशों और ध्रुवीय क्षेत्रों के तापों में इतना अंतर आ जाता है। तापों का यह अंतर वायुमंडल की विशाल मशीनरी को गतिशील कर देता है। वायुमंडल की हलचल मौसम का निर्माण करती है, उसका निर्धारण करती है।

पृथ्वी


मौसम का निर्माण करने वाले या उसे प्रभावित करने वाले कारक के रूप में पृथ्वी की स्थिति पूर्णतः सूर्य पर निर्भर नहीं है। इस बारे में स्वयं उसका भी महत्त्वपूर्ण योग है। सौर परिवार के एक सदस्य के रूप में उसमें भी स्वयं के ऐसे गुण मौजूद हैं जो उस पर मौसम का निर्माण करते हैं। सूर्य के चारों ओर 96.6 करोड़ किमी. की दीर्घवृत्तीय कक्षा में परिक्रमा करने के अतिरिक्त वह स्वयं भी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर, लगभग 1690 किमी. प्रतिघंटे की दर से घूमती है। पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना ही बहती हुई पवन और जलधाराओं की दिशाओं का निर्धारण करता है। ये दोनों कारक भी मौसम को प्रभावित करते हैं।

मौसम को प्रभावित करने वाला पृथ्वी का एक अन्य गुण है उसकी विशेष आकृति। वह एक ऐसी गेंद के समान है जो ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है। इस प्रकार पृथ्वी की आकृति नासपाती के सदृश्य हो गयी है और यह भी उसके विभिन्न क्षेत्रों के तापों में अंतर के लिए उत्तरदायी है।

पृथ्वी की विशिष्ट आकृति के कारण सौर किरणें उसके हर क्षेत्र पर एक समान तीव्रता से नहीं पड़ती। उसके मध्य भाग में, भूमध्यरेखा के आस-पास के क्षेत्र में, उनकी तीव्रता सबसे अधिक होती है। जैसे-जैसे मध्य भाग से ऊपर (उत्तर) और नीचे (दक्षिण) की ओर बढ़ते हैं उनकी तीव्रता कम होती जाती है। ध्रुवों तक पहुंचते-पहुंचते वह अत्यंत क्षीण हो जाती है। साथ ही उत्तर और दक्षिण की ओर जाते समय सौर किरणों द्वारा तय की जाने वाली दूरियां भी बढ़ती जाती हैं। इन कारणों से भूमध्य रेखा के आस-पास वाले क्षेत्रों में बहुत अधिक गर्मी पड़ती है। उत्तर अथवा दक्षिण की ओर जाते समय वह कम होती जाती है और ध्रुवों तक पहुंचते-पहुंचते लगभग नगण्य हो जाती है। इसलिए ध्रुवीय प्रदेश सदैव बर्फ से आच्छादित रहते हैं।

पृथ्वी की एक और विशेषता है उसकी धुरी का झुकाव। उसकी धुरी उसके परिक्रमा पथ के तल से 23½0 के कोण पर झुकी हुई है। यह झुकाव पृथ्वी पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों को भी प्रभावित करता है। इस झुकाव की वजह से ही पृथ्वी का एक गोलार्द्ध छह माह तक सूर्य की ओर झुका रहता है और अगले छह मास तक दूसरा गोलार्द्ध। यह क्रम निरंतर चलता रहता है। इसके फलस्वरूप ही ऋतुएं-वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर- उत्पन्न होती हैं।

पृथ्वी की धुरी के झुकाव के कारण ही उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्धों में वर्ष के एक ही समय अलग-अलग ऋतुएं होती हैं। जब उत्तरी गोलार्द्ध में भीषण गर्मी पड़ रही होती है तब दक्षिणी गोलार्द्ध में लोग ठंड से ठिठुर रहे होते हैं और जब उत्तरी गोलार्द्ध में सर्दी की ऋतु आ जाती है तब दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मी पड़ती है।

मौसम का निर्माण करने वाली और उसको प्रभावित करने वाली पृथ्वी की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भौतिक संरचनाएं हैं- सागर और पर्वत।

सागर


सागर पृथ्वी के लगभग 71 प्रतिशत भाग को घेरे हुए हैं और उसमें संपूर्ण पृथ्वी के जल भंडार का 97 प्रतिशत भाग भरा हुआ है। उससे ही वह जल वाष्प बनती है जो वर्षा के रूप में बरसती है उसमें ही सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा का बड़ा भाग संचयित होता है जो जलवायु को प्रभावित करता है। उसी में वे धाराएं विद्यमान हैं जो संचयित सौर ऊर्जा के बहुत बड़े भाग को पृथ्वी के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र को स्थानांतरित करती हैं और उससे ही समय-समय पर वायुमंडल में गैसों की पूर्ति होती रहती है।

सागर का थल और वायुमंडल के साथ अटूट संबंध है। वायुमंडल का लगभग तीन-चौथाई भाग सागर के ऊपर ही स्थित है। इसलिए उस पर सागर का प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी हैं। वास्तव में सागर को “वायुमंडल की स्मृति” कहा जाता है।

वायुमंडल मुख्य रूप से नीचे से गर्म होता है पर सागर ऊपर से। सागर के पानी में निरंतर हलचल होते रहने से सौर ऊर्जा काफी गहराई तक लगभग 100 मीटर गहराई तक, प्रवेश कर जाती है। सागर के जल के ताप में वृद्धि उसकी स्थिति (वह किन अक्षांशों के बीच स्थित है), मौसम तथा जलधाराओं पर निर्भर करती है। साथ ही उसके जल के दिन और रात के तापों में बहुत अंतर नहीं होता।

सौर ऊर्जा उसकी ऊपरी सतह पर आपतित होती है। इसलिए सतह का ताप ही सबसे अधिक होता है। सतह से तली की ओर जाते समय ताप में तेजी से कमी होती जाती है पर लगभग 500 मीटर गहराई पर- “थर्मोक्लाइन क्षेत्र” में पहुंच जाने पर- ताप का घटना रुक जाता है। उसके नीचे पानी का ताप लगभग स्थिर रहता है। यद्यपि भौतिकी के एक प्रसिद्ध नियम के अनुसार सागर की तली के पानी का ताप 40 सै. रहना चाहिए परंतु वास्तव में उसका ताप -10 सैं. जैसा नीचे हो जाता है।

सौर ऊर्जा और सागर पर से बहती हुई पवन जल में लहरें उत्पन्न करती हैं जबकि विभिन्न क्षेत्रों के जलों की लवणताओं में अंतर और पवन जलधाराओं को जन्म देती हैं तथा चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण ज्वार-भाटा पैदा करते हैं।

कोष्ण जलधारा सागर के ताप को नीचे नहीं गिरने देती और ठंडी जलधारा निकटवर्ती सागर के ताप को उससे कहीं नीचे गिरा देती है जितना वह अन्यथा गिरता।

भूगोलवेत्ताओं के अनुसार सागर की जलधाराओं के बहने का एक विशेष नियम है। निचले अक्षांशों में (भूमध्यरेखा से लेकर 400 उत्तर और 400 दक्षिण अक्षांशों तक) कोष्ण जलधाराएं महाद्वीपों के पूर्वी तट के निकट से बहती हैं और ठंडी जलधाराएं पश्चिमी तट के निकट से । मध्य और उच्च अक्षांशों में स्थित इसके विपरीत होती है। वहां महाद्वीपों के पूर्वी तट के निकट से ठंडी जलधाराएं और पश्चिमी तट के निकट से कोष्ण जलधाराएं गुजरती है।

इसीलिए उष्ण और उपोष्ण कटिबंधों में महाद्वीपों के पूर्वी तट की जलवायु अक्सर कोष्ण और नम होती है। दूसरी ओर मध्य और उच्च अक्षांशों में- समशीतोष्ण और शीत कटिबंधों- में निकट के सागर से ठंडी जलधाराओं के गुजरने से महाद्वीपों के पूर्वी भाग और ठंडे हो जाते हैं। वहां गर्मी की ऋतु में मौसम अधिक सुखद रहता है। तटीय प्रदेश पर जलधारा के प्रभाव उसी समय पड़ते हैं जब पवन सागर से थल की ओर बहती है। पश्चिम से पूर्व की ओर, उत्तरी (कोष्ण) अंध महासागर पर से आने वाली पश्चिमी पवन ही उत्तर-पश्चिमी यूरोप को जनवरी के महीने में उन्हीं अक्षांशों पर स्थित अन्य क्षेत्रों की तुलना में 15 से 200 सै. अधिक गर्म रखती है।

पर्वतः जलवायु विभाजकः-


जलवायु विभाजक पर्वत मौसम संबंधी अनेक प्रकार की घटनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। वे तड़ित झंझा, विक्षोभ और पर्वत तरंग उत्पन्न कर सकते हैं, जेट प्रवाह को विभाजित अथवा त्वरित कर सकते हैं, बर्फ के संचयन में मदद दे सकते हैं और वायु के बहने के पैटर्न को ‘विकृत’ कर सकते हैं।

जलवायु की दृष्टि से किसी क्षेत्र में पर्वतों की स्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। उस क्षेत्र का पर्वत पर स्थित होना (सागर तल से ऊंचाई पर स्थित होना) तो मौसम को प्रभावित करता ही है साथ ही यह भी महत्त्वपूर्ण है कि यह पर्वत के किस ढाल-पवनाभिमुख (विंडवर्ड) ढाल अथवा प्रतिपवन (लीवर्ड) ढाल-पर स्थित है।

किसी स्थान की जलवायु को निर्धारित करने वाले कारकों की चर्चा करते समय मौसमवैज्ञानिक और भूगोलवेत्ता अक्सर ही क्विटो शहर का उदाहरण देते हैं। क्विटो दक्षिण अमेरिका के इक्वेडोर देश की राजधानी है और भूमध्यरेखा पर स्थित है। इसलिए उसकी जलवायु को सामान्यतः वर्ष भर गर्म और आर्द्र रहना चाहिए और वहां सर्दी की ऋतु होनी ही नहीं चाहिए। परंतु क्विटो एंडीज पर्वत की एक चोटी पर स्थित है जिसकी सागर तल से ऊंचाई काफी अधिक है। इसलिए सर्दी की ऋतु में वहां वायुमंडल का ताप इतना गिर जाता है कि पानी जमने लगता है।

इसी प्रकार हिमालय के अक्षांशों में ही स्थित मैदानी इलाकों में सर्दियों में ताप इतने नीचे नहीं गिरता कि पानी जम जाए। आप जानते ही हैं कि हिमालय की अधिकांश चोटियां सदैव बर्फ से ढंकी रहती हैं। इसका कारण हिमालय की ऊंचाई ही है।

ऊंचे पर्वत पर स्थित होने के फलस्वरूप किसी स्थान की जलवायु के अपेक्षाकृत अधिक ठंडी हो जाने का एक मुख्य कारण है धरती की सतह से परावर्तित होने वाली सौर ऊर्जा की काफी मात्रा का उस स्थान तक न पहुंच पाना। बादल और धूलकण जो वायुमंडल में अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उपस्थित होते हैं, अंतरिक्ष की ओर परावर्तित होने वाली ऊर्जा की काफी मात्रा को पुनः धरती की ओर परावर्तित कर देते हैं। इसलिए ऊंचे क्षेत्र मैदानी क्षेत्र की अपेक्षा अधिक ठंडे रहते हैं। सर्दियों में अनेक ऊंचे क्षेत्रों में जलाशय जम कर बर्फ में परावर्तित हो जाते हैं। यह बर्फ उस क्षेत्र के ताप को और कम कर देती है क्योंकि बर्फ का ऐल्बिडो काफी अधिक, 70-90 प्रतिशत तक, होता है, अर्थात् बर्फ उस पर पड़ने वाली सौर ऊर्जा के 70-90 प्रतिशत भाग को परावर्तित कर देती है। इससे ऊंचे पर्वतों पर धरती की सतह बहुत कम गर्म हो पाती है। धरती की सतह के बहुत कम ऊष्मा प्राप्त करने के कारण उसके द्वारा परावर्तित की जाने वाली ऊर्जा की मात्रा भी कम होती है। फलस्वरूप धरती की सतह से परावर्तित होने वाली दीर्घ तरंगों से ऊंचे पर्वतों का वायुमंडल भी अपेक्षाकृत कम गर्म हो पाता है। ऊंचे पर्वतों पर वायुमंडल का दाब भी अपेक्षाकृत कम होता है।

किसी क्षेत्र की जलवायु पर उसके निकटवर्ती पर्वत की दिशा का भी अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। हमारे देश की उत्तरी सीमा बनाने वाला पर्वतराज, हिमालय, पूर्व-पश्चिम दिशा में स्थित है। अपनी स्थिति के फलस्वरूप ही वह गर्मी की मानसून पवन को तिब्बत में नहीं जाने देता तथा उनके संपूर्ण जलवाष्प भंडार को अपनी तलहटी में ही रिक्त करा देता है। इसी वर्षा के फलस्वरूप गंगा-यमुना के कछार में पर्याप्त वर्षा होती है और उत्तर की नदियों को पानी मिलता है। साथ ही उस बर्फ के लिए भी पानी मिलता है जो हिमालय की चोटियों पर सदा जमी रहती है। इस वर्षा की वजह से ही हिमनदियां बनती हैं। हिमालय की पूर्व-पश्चिम दिशा में स्थिति यदि मानसून पवन को भारत से बाहर नहीं जाने देती तो वह साइबेरिया और मध्य एशिया की बर्फीली पवन को भारत में आने भी नहीं देती। हिमालय की विशेष स्थिति के फलस्वरूप ही भारत की जलवायु इतनी सुखद है और तिब्बत की इतनी विषम। मौसम- वैज्ञानिकों के अनुसार दक्षिण-पूर्वी एशिया में गर्मी में मानसून की प्रबलता का श्रेय मुख्य रूप से हिमालय की विशेष स्थिति को ही है।

हमारे देश के ही दो अन्य पर्वतों, पश्चिमी घाट और अरावली की स्थितियां भी अपने निकटवर्ती क्षेत्रों की जलवायु की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। पश्चिमी तट के एकदम निकट, उत्तर-दक्षिण दिशा में, लगभग 1000 किमी. तक फैले पश्चिमी घाट की ऊंचाई 1 से 1.5 किमी. तक है परंतु वह दक्षिण-पश्चिम से आने वाली गर्मी की मानसून के मार्ग में “बाधा” उत्पन्न कर देता है। उसे पार करने के लिए इस पवन को ऊपर उठना पड़ता है और इस कोशिश में वह अपने जलवाष्प भंडार के बड़े भाग को वर्षा के रूप में त्याग कर लगभग “सूखी” हो जाती हैं। पश्चिमी तट पर स्थित मुंबई को वर्ष भर में लगभग 190 सेमी. वर्षा मिलती है, खंडाला जो 540 मीटर ऊंचाई पर स्थित है, 460 सेमी. और मुंबई से केवल 130 किमी. दूर परंतु पश्चिमी घाट के दूसरी ओर (प्रतिपवन ढाल पर) स्थित पुणे को मात्र 50 सेमी.।

यद्यपि अरब सागर से आने वाली गर्मी की मानसून राजस्थान के ऊपर से गुजरती हैं पर नमी के विशाल भंडार को संजोए रखने के बावजूद वह वहां बहुत कम वर्षा करती है। इस अल्प वर्षा के लिए बहुत हद तक अरावली पर्वत की स्थिति उत्तरदायी है। वह उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित है और मानसून के मार्ग में बहुत कम “बाधा” डालता है। फिर भी अरावली का दक्षिणी भाग कुछ हद तक मानसून पवन को वर्षा करने के लिए मजबूर कर देता है। इसीलिए माउंट आबू पर वर्ष भर में 170 सेमी. वर्षा हो जाती है जबकि उसके आसपास के मैदानी इलाकों में वर्ष भर में केवल 60 से 80 सेमी. ही है।

वायुमंडल


पृथ्वी को चारों ओर से कई हजार किमी. ऊंचाई तक घेरे गैसों का मंडल पृथ्वी पर मौसम निर्धारण के लिए ही नहीं वरन् स्वयं जीवन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। अगर यह मंडल, जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के फलस्वरूप ही अब तक उस पर मौजूद है, न होता तब पृथ्वी पर किसी भी प्रकार के जीवन का अस्तित्व नहीं होता। उस समय पृथ्वी, चांद की भांति एकदम निर्जीव होती जिसमें सूर्य की किरणें बिना किसी रोक-टोक के बिना किसी संशोधन के सीधी धरती की सतह पर पड़ती। इससे भूमध्यरेखा पर दिन का ताप 820 सै. जैसे ऊंचा हो जाता और रात का ताप गिर कर शून्य से भी 1400 सै. नीचा हो जाता है। उस समय न तो आकाश चमकीला दिखता न उस पर बादल होते और न ऊषा और संध्या की लालिमा दिखाई देती।

वायुमंडल विभिन्न गैसों का मिश्रण है जिसमें नाइट्रोजन की मात्रा सबसे अधिक लगभग 80 प्रतिशत है। इसके बाद ऑक्सीजन का स्थान आता है (मात्रा लगभग 20 प्रतिशत) इसके अतिरिक्त वायुमंडल में सदैव बहुत थोड़ी मात्राओं में कार्बन डाइऑक्साइड (लगभग 0.03 प्रतिशत), हीलियम, निओन, आर्गोन और ओजोन तथा प्रदूषण जन्य क्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न अमोनिया, सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें और जल वाष्प तथा धूल कण भी मौजूद रहते हैं। इनमें मौसम के निर्धारक के रूप में कदाचित् जल वाष्प सबसे महत्त्वपूर्ण है। वैसे कार्बन डाइऑक्साइड भी पृथ्वी की सतह पर तथा उच्च वायुमंडल में ताप के स्थायीकरण में बहुत योग देती है। वायुमंडल की समांगता सब क्षेत्रों में एक सी नहीं है। वास्तव में उसमें विभिन्न परतें हैं जिनमें हर एक की मोटाई और घनत्व अलग-अलग हैं। वायुमंडल की विभिन्न परतों के गुण अलग-अलग हैं- उनकी संरचनाएं और भौतिक गुण भिन्न-भिन्न हैं। उनके बारे में कदाचित सबसे विचित्र बात है- कम से कम एक सामान्य पाठक की दृष्टि में- ऊंचाई के साथ हमेशा वायु के ताप में कमी नहीं आती। कुछ परतों में ऊंचाई के साथ ताप बढ़ता भी है।

जल वाष्प वायुमंडल में लगभग हर स्थान पर- अत्यंत शुष्क मरुस्थली क्षेत्र के अलावा- हर समय मौजूद होती है। यह वायुमंडल में 40 से 45 हजार फुट (12,000 से 13,700 मीटर) ऊंचाई तक मौजूद होती है। वायुमंडल में उसकी मात्रा शून्य से लेकर 4 प्रतिशत तक होती है। वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प की कुल मात्रा कितना विशाल है इसका अनुमान इससे हो सकता है कि अगर उसे पानी में बदल दिया जाए तो पूरी पृथ्वी पर पानी की लगभग 2.5 सेमी. ऊंची परत इकट्ठी हो जाएगी। एक छोटे से मेघ में भी 90 से लेकर 900 टन तक जलवाष्प मौजूद होती है।

वायुमंडल में जल तीन रूपों- वाष्प, द्रव और ठोस (हिम के रवों के रूप) – में मौजूद होता है।

वायुमंडल की सबसे निचली परत, क्षोभमंडल ही मौसम उत्पन्न करने वाला क्षेत्र है। इसमें भूमध्यरेखा पर आर्द्र वायु धरती से गर्मी लेकर ऊपर उठती है और ध्रुवीय प्रदेशों में सूखी ठंडी वायु धरती की ओर आती है। बर्फीले मैदानों पर हवाएं धरती- सतह के लगभग समानांतर, प्रचंड वेग से बहती हैं।

वायुमंडल को अक्सर “अत्यंत अदक्ष” मशीन कहा जाता है क्योंकि वह प्राप्त होने वाली ऊर्जा के केवल 3 प्रतिशत भाग का ही इस्तेमाल कर पाता है। फिर भी यह अत्यंत बलशाली कारक है। यह अपने अत्यंत विशाल वजन के बावजूद लगभग 450 किमी. प्रति घंटे से भी अधिक गति से हरकत कर सकता है। वह अरबों-खरबों टन पानी को वाष्प में परिवर्तित कर हजारों किमी. दूर ले जाकर फिर से पानी में बदल कर बरसा सकता है। इन कार्यों में लगने वाले बल की मात्रा इतनी विशाल होती है कि उसकी कल्पना करना भी कठिन है।

वायुमंडल के रौद्र रूप कितनी ऊर्जा व्यय करते हैं इसका अंदाज एक साधारण तड़ित झंझा (तेज आंधी जिसमें गरजने वाले और मूसलाधार वर्षा करने वाले मेघ भी उपस्थित होते हैं) द्वारा मुक्त की जाने वाली ऊर्जा से हो सकता है। वह हिरोशिमा किस्म के लगभग एक दर्जन परमाणु बमों के तुल्य ऊर्जा प्रति सेकेंड खर्च कर देता है। अविश्वसनीय प्रतीत होते हुए भी यह सच है कि पृथ्वी पर इस प्रकार के लगभग 45,000 तड़ित झंझा हर दिन आते हैं।

वायुमंडल का एक प्रमुख कार्य है ऊष्मा (गर्मी) का स्थानांतरण- मोटे तौर से उष्ण कटिबंधों को प्राप्त होने वाली ऊष्मा (सौर ऊर्जा) को ध्रुवों की ओर ले जाना। दूसरे शब्दों में वायुमंडल का काम है पूरी पृथ्वी पर ऊष्मा को समान रूप से वितरित करना। मौसम के संदर्भ में ऊष्मा बहुत महत्त्वपूर्ण है।

अत्यंत विशाल और जटिल संवहन चक्र की मदद से और जल वाष्प के माध्यम से ऊष्मा पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में वितरित होती है। सिद्धांततः यह संवहन चक्र वही है जो हमारे रसोईघरों, प्रयोगशालाओं और अन्य स्थानों पर पानी को गर्म करता है। ऐसे संवहन चक्र से पानी ही नहीं हर तरल-द्रव और गैस-गर्म होता है। इसके अनुसार ऊष्मा मिलने पर पहले तरल की तली के अणु गर्म होते हैं, गर्म होकर वे ऊपर उठते हैं और ऊपरी सतह के ठंडे अणु उनका स्थान लेने के लिए तली में चले जाते हैं। वहां वे गर्म होकर फिर ऊपर आ जाते हैं और ऊपरी सतह के ठंडे अणु उनका स्थान ले लेते हैं। इस प्रकार पूरा द्रव गर्म हो जाता है।

वायु भी इसी प्रकार गर्म होती है, पर वायु को गर्म करके उसे गति प्रदान करने वाला संवहन चक्र अत्यंत विशाल और जटिल होता है। यह संवहन चक्र किसी क्षेत्र की वायु के आस-पास के क्षेत्रों की वायु की तुलना में, अधिक गर्म हो जाने से आरंभ होता है। गर्म होने पर वायु में उपस्थित गैसों के अणु उत्तेजित हो जाते हैं। वे एक-दूसरे को धकेलने लगते हैं। इससे गैसें फैल जाती है, उनका घनत्व कम हो जाता है और वे हल्की हो जाती हैं। इससे उनके द्वारा डाले जाने वाला दाब भी कम हो जाता है। परिणामस्वरूप आसपास के क्षेत्रों की भारी (अधिक घनत्व वाली), ठंडी वायु उसे धकेलने लगती है। पर हल्की वायु केवल एक ही दिशा में, ऊपर की ओर गति कर सकती है। अतएव वह ऊपर उठ जाती है।

वायु की गति और उसके दाब में भी संबंध होता है। उसका दाब उसकी गति के वर्ग का समानुपाती होता है। जब गति दुगनी हो जाती है, तब उसका दाब चार गुना हो जाता है। जब गति चार गुना हो जाती है तब दाब सोलह गुना हो जाता है।

पृथ्वी पर भी, उसके विभिन्न क्षेत्रों में तापांतरों और दाबांतरों के कारण संवहन चक्र चलते रहते हैं। पर वे उपर्युक्त चक्र से कहीं अधिक विशाल होते हैं। उन्हें पृथ्वी का घूर्णन पर्वतों की दिशा आदि अनेक कारक भी अत्यधिक प्रभावित करते हैं। पर इन्हीं चक्रों के कारण पवन बहती हैं। इन्हीं के कारण पवन घाटियों से चोटियों की ओर बहती हैं और चोटियों से घाटियों की ओर।

मोटे तौर पर विश्वव्यापी संवहन चक्र का आरंभ उष्ण कटिबंध से होता है। यह कटिबंध पृथ्वी के मध्य में स्थित भूमध्य रेखा, के आसपास का वह क्षेत्र है जिसमें पृथ्वी के उष्णतम क्षेत्र स्थित हैं। यह भूमध्यरेखा के दोनों ओर स्थित है जिसे मध्य युग में “डोलड्रम” (शांत क्षेत्र) नाम दे दिया गया था। यह नाम आज भी प्रचलित है यद्यपि मौसम-वैज्ञानिक इसे “अंतःउष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र” (इंटर ट्रापिकल कन्वरजेंस जोन- आई.टी.सी. जैड.) कहना अधिक पसंद करते हैं।

भूमध्य रेखा और उसके आसपास के क्षेत्रों को ध्रुवीय प्रदेशों की तुलना में कहीं अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। यदि वायुमंडल एकदम साफ और शुष्क रहता है तब पृथ्वी द्वारा विकरित की जाने वाली ऊर्जा बहुत शीघ्रता से अंतरिक्ष में चली जाती है। पर पृथ्वी पर केवल थल ही नहीं अत्यंत विशाल जल राशियां भी उपस्थित हैं। साथ ही वायुमंडल में हमेशा ही बहुत बड़ी मात्रा में जल वाष्प मौजूद रहती है। यह जल वाष्प पृथ्वी पर जीव के लिए वरदान है। पर यह उस ऊष्मा ऊर्जा का जो बहुत बड़ी मात्रा में थल और सागरों द्वारा अंतरिक्ष की ओर भेजी जाती है, एक बड़ा भाग स्वयं अवशोषित कर लेती है और बाद में उसे फिर से पृथ्वी की ओर भेज देती है। इस प्रकार जल वाष्प से भरा वायुमंडल “ग्रीनहाउस प्रभाव” पैदा कर देता है।

इसके अतिरिक्त जलवाष्प सूर्य से आने वाली दृश्य प्रकाश किरणों तथा पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी की ओर आने तो देती है पर अवरक्त किरणों के रूप में पृथ्वी से अंतरिक्ष की ओर जाने वाली (ऊष्मा) ऊर्जा को रोक लेती है। इन सब का अंतपरिणाम होता है भूमध्यरेखा के आसपास के क्षेत्र का एक बहुत बड़े “बॉयलर” में परिवर्तित हो जाना। इससे उस क्षेत्र में अंतरिक्ष में विकरित की जा सकने वाली ऊष्मा से कहीं अधिक मात्रा में ऊष्मा पैदा हो जाती है। अंततः यह ऊष्मा ध्रुवीय प्रदेशों में अंतरिक्ष में विकरित हो जाती है। इस प्रकार ध्रुवीय प्रदेश सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊष्मा की तुलना में कहीं अधिक ऊष्मा अंतरिक्ष में विकरित करते हैं। इस प्रकार पृथ्वी को सूर्य से हर दिन जितनी ऊर्जा प्राप्त होती है वह संपूर्ण रूप से परावर्तित कर दी जाती है। इस प्रकार पृथ्वी का औसत ताप 150 सै. के आसपास स्थित रहता है।

यहां यह बता देना तर्क संगत होगा कि उपर्युक्त ऊष्मा चक्र इतना सरल नहीं है जितना पहली दृष्टि में प्रतीत होता है। पृथ्वी द्वारा वापस भेजी जाने वाली ऊर्जा को पहले पृथ्वी पर ही काफी “कार्य” करना पड़ता है तब वह अंतरिक्ष में जाती है। साथ ही वायुमंडल में मौजूद जल वाष्प अवरक्त किरणों को पृथ्वी की ओर केवल परावर्तित ही नहीं करती वरन् उनमें निहित ऊर्जा को बड़ी मात्रा में अपने में भंडारित भी कर लेती है। वायुमंडल उस ऊर्जा के बड़े भाग को पवन के माध्यम से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र को स्थानांतरित करता रहता है। जब सौर ऊर्जा किसी जल राशि पर पड़ती है तब परिणाम होता है जल का बड़ी मात्रा में वाष्पन। इस वाष्पन में जल की गुप्त ऊष्मा निहित होती है जो वाष्प के पुनः पानी में परिवर्तित होते समय मुक्त हो जाती है। इस प्रकार जब जल वाष्प ठंडी होकर बादलों में (पानी की बुंदकियों में) परिवर्तित होती है तब यह ऊर्जा वायुमंडल में मुक्त हो जाती है। इस प्रकार मुक्त होने वाली ऊर्जा की मात्रा कितनी होती है, इसका अनुमान मौसम-वैज्ञानिकों ने लगाया है। उनका मत है कि किसी क्षेत्र पर होने वाली एक इंच (2.54 सेमी.) वर्षा क्षेत्र पर तीन दिन तक पड़ने वाली धूप के तुल्य ऊर्जा मुक्त करती है।

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