स्वामी शिवकुमार और उनके मंत्र का जादू

Submitted by admin on Sat, 11/07/2009 - 13:02
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स्वामी शिवकुमारस्वामी शिवकुमारकर्नाटक के 70,000 एकड़ में फ़ैली कपोटागिरि पहाड़ियां धातुओं के अवैध खनन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की वजह से बंजर और वीरान हो चुकी थीं, लेकिन वन अधिकारियों के साथ मिलकर सिध्दगंगा मठ के 100 वर्ष के स्वामी शिवकुमार और उनके “ॐ जलाय नमः' मंत्र ने कमाल का जादू किया, नंगी पहाड़ियां पर हरियाली की चादर ओढ़ा दी। इस अनोखे प्रयास के बारे में बता रहे हैं शिवराम पेल्लूर।

स्वामी शिवकुमार ने स्थानीय जनता और अपने अनुयायियों से 'ॐ शिवाय नमः' के साथ-साथ 'ॐ जलाय नमः' के मंत्र का जाप करने की सलाह दी। मठ के पास से बहने वाली बंगारा हल्ला की ओर इशारा करते हुए स्वामी जी कहते हैं, 'पानी हमारा धर्म है, इसकी पूजा होनी ही चाहिये…' हमारा पहला लक्ष्य है कि बंगारा हल्ला पूरे वर्ष भर एक जैसी सुन्दरता के साथ कलकल बहे, और हमने इसके लिये कड़ी मेहनत की। ॐ जलाय नमः के नये मंत्र पर अब उनका और उनके अनुयायियों का पूरा विश्वास है। एक प्राकृतिक जलीय पौधा 'आप' बंगारा हल्ला नदी के कायाकल्प की कहानी खुद बयां करता है।

कपोटागिरि की पहाड़ियां उत्तरी कर्नाटक के गदग जिले के शिराहट्टी, गदग तथा मुन्दरागी तहसीलों के बीच 70,000 एकड़ में फ़ैली श्रृंखला है। आज से पाँच दशक पहले तक इन पहाड़ियों को 'दक्षिण का शिमला' कहा जाता था, घने जंगल, जंगली जानवर और महत्वपूर्ण औषधीय पौधे यहां मिलते थे।

लेकिन जल्दी ही 'आधुनिकीकरण' और औद्योगिकीकरण ने इस क्षेत्र को बुरी तरह से प्रभावित किया तथा प्राकृतिक स्रोतों पर लालच का ग्रहण लग गया। लौह अयस्क तथा मैंगनीज़ की खुदाई और खानों की वजह से हरियाली खत्म होने लगी। जलावन और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिये हरे-भरे पेड़ बेरहमी से काटे जाने लगे, देखते ही देखते उच्च प्राकृतिक उत्पादक क्षमता वाली पहाड़ियां बंजर और वीरान होने लगीं।

पिछले एक वर्ष से कपोटागिरि की पहाड़ियों को पुनर्जीवन मिलने लगा, जब एक महात्मा ने इसका कायाकल्प करने का बीड़ा उठाया। इन पहाड़ियों की तलहटी में स्थित नंदीदेवी मठ के स्वामी शिवकुमार ने वन विभाग के साथ मिलकर काम करने का अभियान चलाया। इस अभियान में प्रमुखतः दो बिन्दुओं पर जोर दिया गया, पहला मिट्टी और पानी का संरक्षण और उपचार तथा नये पौधे लगाना। अगस्त 2003 में स्वामी शिवकुमार ने जब नंदीमठ का कार्यभार संभाला तभी उन्हें वहां पानी की कमी महसूस हुई। आसपास के नलकूपों में भी पानी काफ़ी नीचे जा चुका था, मठ में स्थित दोनों कुंओं में भी पानी वर्ष भर नहीं रहता था। साथ ही रोज सुबह उन्हें दातून करने के लिये नीम की टहनी के लिए भी कुछ किलोमीटर तक जाना पड़ता था। स्वामी जी को जल्दी ही अहसास हो गया कि अपनी धार्मिक गतिविधियां चलाने के लिये उन्हें आसपास के जंगल और जल संसाधनों का कायाकल्प करना ही पड़ेगा। ऐसे में 'पानी' उनके लिये एक पवित्र मंत्र बन गया।

स्वामी जी ने अपने विचारों और किये जाने वाले प्रयासों को आसपास के गांवों के लोगों तथा प्रमुख जनप्रतिनिधियों के साथ साझा किया और उन्हें इस कार्य में सहभागी होने का निमन्त्रण दिया, स्वामी जी को उत्साहवर्धक सहयोग भी मिला। स्थानीय वन अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी से स्वामी जी ने विभिन्न कार्यक्रमों और योजनाओं को जल्दी से जल्दी पूरा करने का लक्ष्य रखा। सबसे पहले मठ के आसपास के 235 एकड़ के इलाके में विभिन्न जल संरक्षण तथा मिट्टी उपचार के कार्यक्रम हाथ में लिये गये। वन विभाग ने भी शिवकुमार जी से प्रेरणा लेकर सामाजिक वानिकी का वृहद कार्यक्रम शुरु किया। जिला प्रशासन तथा जिला पंचायत ने भी सूखा-राहत के कार्यक्रमों के माध्यम से प्रयास करना शुरु किया।

 

 

सपना हुआ हकीकत…


पहाड़ी के ढलानों पर 32 हजार खाइयां खोद दी गयीं ताकि पानी का रिसाव जमीन में हो।पहाड़ी के ढलानों पर 32 हजार खाइयां खोद दी गयीं ताकि पानी का रिसाव जमीन में हो। बंगारा हल्ला नाम की छोटी सी नदी को उसके चार दशक पुराने स्वरूप में लाने को प्राथमिकता दी गई। सिर्फ़ मानसून के महीनों में बहने वाली इस नदी में वर्ष भर पानी रहे इस प्रमुख योजना पर काम शुरु किया गया। जल संग्रहण हेतु पहाड़ी पर ढांचों, खंतियों का निर्माण किया गया ताकि वर्षाकाल में बरसने वाला पानी अधिक से अधिक समय रुका रहे, जो पहले बहकर 12 किमी दूर स्थित दम्बाला बांध में जमा हो जाता था। छोटी-छोटी खंतियों के द्वारा पानी को रोककर घाटी में बहने से रोका गया। बंगारा हल्ला के उदगम स्थल पर एक विशाल टैंक (बंगारा केरे) बनाया गया, चूंकि यह टैंक पहाड़ी में काफ़ी उंचाई पर स्थित है इसलिये बंगारा हल्ला के जलबहाव क्षेत्र में पानी की उपलब्धता में काफ़ी बढ़ोतरी हुई।

बंगारा हल्ला के किनारों पर पत्थरों के ढांचे तैयार किये गये ताकि पानी का बहाव धीमा हो और पानी ज़मीन के भीतर अधिक से अधिक जाए। टैंक के जलग्रहण क्षेत्र में बांस और ब्लूबेरी के पेड़ अधिकाधिक लगाये गये ताकि बहकर आने वाले पानी को प्राकृतिक रूप से ज़मीन में ही रोका जा सके। ऐसा उन सभी 13 नालों के मुहाने पर किया गया जो आकर बंगारा हल्ला में मिलते थे। इस तरह से पानी रोकने के कुल 2750 ढांचे बना दिये गये। इनकी वजह से बंगारा हल्ला में पानी के बहाव में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई।

स्वामीजी की महानतम उपलब्धि यह है कि उन्होंने मानव सेवा के रूप में ईश्वर की सेवा में अपने जीवन के सभी 100 वर्ष लगा दिए हैं। गुरूकुल परम्परा में शिक्षा, आध्यात्मिक, जागरूकता, सांस्कृतिक विरासत की रक्षा, संस्कृत के पुनर्जीवन, अंधे और निस्सहाय लोगों की देखभाल, कृषि के विकास, बड़ी संख्या में बच्चों को भोजन और सभी धर्मों और समुदायों के लोगों में सद्भाव और सौहार्द को प्रोत्साहन जैसे क्षेत्रों में स्वामीजी के नेतृत्व में श्री सिध्दगंगा मठ ने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वे इसके विस्तार और प्रभाव की दृष्टि से अतुलनीय है। यह जानकर कौन प्रेरित नहीं होगा कि इस संत ने 125 से अधिक शैक्षिक संस्थाओं की स्थापना की है जिनमें लगभग 10,000 जरूरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा, आवास और भोजन की लगभग नि:शुल्क सुविधाएं दी जाती हैं। इस सारी प्रक्रिया को स्थायी और मजबूत बनाने के लिये गहन वनीकरण और पौधे लगाने का काम भी साथ-साथ चलाया गया। शुरुआत में लगभग 50 हजार बीजों और रोप के जरिये नीम, इमली, पीपल, करौंदा तथा बड़ के पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया। हर पौधे को लगाने के बाद उसके आसपास अंग्रेजी के 'V' आकार का ढांचा बनाकर पौधे के पास एक छोटा गढ्ढा रखा गया, इस प्रकार बहकर आने वाले पानी को सीधे पौधे की जड़ में जाने की व्यवस्था की गई। इसी के साथ, पूरे पहाड़ी इलाके में 4x1.5x1.5 मीटर आकार की लगभग 32 हजार छोटी-छोटी खंतियां खोदी गईं। मात्र एक ही बारिश में लगभग डेढ़ करोड़ लीटर पानी इन खंतियों के जरिये ज़मीन में उतारा गया। नीम, इमली आदि जो पेड़ जल्दी बड़े हो गये उनके बीजों के जरिये जल्दी-जल्दी नये पौधे लगा दिये गये। इस तरह से इस जंगल के कायाकल्प में 50 हजार पौधे और नये लगा दिये गये। धरती में पानी की उपलब्धता के कारण लगभग 90% पौधे पनप गये और जल्दी बढ़ने लगे। पहाड़ी से बहकर आने वाले पानी को रोकने के लिये दस छोटे बांध तथा आठ स्टॉपडेम भी बना दिये गये। मुख्य वन अधिकारी एमडी केंचप्पानवर कहते हैं कि जल्दी और अच्छे मानसून ने हमारा उत्साह दोगुना कर दिया था, देखते ही देखते सारी पहाड़ियां हरियाली से आच्छादित हो उठीं। इस युवा अफ़सर की ऊर्जा तथा उम्दा नेतृत्व में यह काम सही ढंग से चल रहा है और 'मैदानी हकीकत' किसी से छिप नहीं सकती। वे कहते हैं, 'अभी तो हमें एक लम्बा रास्ता तय करना है, इन पौधों का पेड़ बनने तक संरक्षण करना असली चुनौती है, इसलिये हम एक बड़े इलाके की तारबंदी करने की भी योजना बना रहे हैं।“

और जादू चल गयाऔर जादू चल गया स्वामी शिवकुमार का 'हरित मंत्र' और 'जल मंत्र' अब काम करने लगे हैं, मठ के दो सूख चुके कुंओं में भरपूर पानी आ गया है, स्वामी जी कहते हैं कि 'कुंए में इतना पानी होना चाहिये कि उसे आराम से हाथ से भी निकाला जा सके…'।

स्वामी जी के प्रयासों की वजह से आसपास के दोनी, दम्बाला, मेवुण्डी, कदमपुरा आदि गांवों में भूजल स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और किसानों का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। उनकी योजना है कि आने वाले समय में समूचे कपोटागिरि क्षेत्र में कम से कम 50 तालाब बनाये जायें, ताकि भविष्य में कभी भी पानी की कमीं न हो। इस वर्ष 9 सितम्बर को नंदीवेरी मठ के वार्षिकोत्सव (जिसे जत्रा महोत्सव कहा जाता है) को पर्यावरण उत्सव के रूप में मनाया गया।

कपोटागिरि पहाड़ियों पर जारी खनन गतिविधियों से स्वामी जी के इन सद्प्रयासों को कठिन चुनौती मिल रही है। स्वामी जी कहते हैं कि 'हम लगातार इन पहाड़ियों पर खनन का विरोध कर रहे हैं और चाहते हैं कि सम्बन्धित व्यक्ति, उद्योगपति तथा नेता इस दुष्प्रवृत्ति पर लगाम लगायें। प्रकृति का खोया हुआ वैभव हासिल करने के लिये स्वामी जी जो प्रयास कर रहे हैं वे प्रेरणा का स्रोत हैं। एक व्यक्ति भी समाज और प्रकृति को बदल सकता है, यदि उसमें लगन और मेहनत करने का जज़्बा हो।



Dr.Shivaram Pailoor is Director of the Centre for Alternative Agricultural Media (CAAM) and Assistant News Editor at All India Radio, Dharwad. This article comes to India Together from CAAM, through Space Share, our content-sharing program for publishers of other public-interest content. Click here to learn more about Space Share. CAAM is online at www.farmedia.org.

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श्री पद्रेश्री पद्रेश्री पद्रे खुद को पेशे से किसान और दिल तथा जुनून से अपने को पत्रकार कहते हैं, जबकि देखा जाये तो असल में श्री पद्रे इन दोनों का समुचित मिश्रण हैं। श्री पद्रे कृषि पत्रकारिता के गुरू हैं, लेकिन इस कृषि पत्रकारिता को वे “स्व-सहायता पत्रकारिता” कहते हैं। भारत में कृषि का क्षेत्

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