जंगल बचाने का संघर्ष

Submitted by Hindi on Thu, 07/14/2011 - 08:07
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जनादेश

सोनभद्र, जुलाई। जनपद में सावन की दस्तक शुरू होते ही आदिवासी महिलाओं ने शासन प्रशासन को चुनौती दे डाली हैं। आदिवासी महिलाओं ने वनों के अंदर वनाधिकार कानून में निहित सामुदायिक अधिकारों के तहत 10000 से भी अधिक पौधों को लगाने का ऐलान किया है। इस कार्यक्रम की शुरुआत जिला मुख्यालय सोनभद्र से की गई। जिला मुख्यालय सैकड़ों की संख्या में पहुंची आदिवासी महिलाओं ने लाल व हरी साड़ी पहन रखी थीं। हाथ में तमाम तरह के पौधों को लिए पूरे शहर का भ्रमण किया। प्रतीकात्मक तौर पर जिला कचहरी व तहसील परिसर के पौधशाला में पौधों को लगाया। इस मौके पर आदिवासी महिलाओं ने, संदेश दिया कि वनों को बचाने व वृक्षों को लगाने का काम समाज का है न कि विदेशी कम्पनीयों का, जो पौधे महिलाओं के हाथ में थे वे वनविभाग द्वारा रोपित व्यापारिक हितों वाले पौधे नहीं बल्कि समाज के काम आने वाले फल, फूल व पर्यावरण को बचाने वाले वृक्ष थे। नीम, नींबू, आंवला, महुआ, जामुन, अमरूद, सहजन, आम आदि के पेड़ लिए आदिवासी महिलाएं रंग-बिरंगे परिधानों में पूरे नगर को जो संदेश दिया उसे देख कर सभी नगरवासी आत्मविभोर हो उठे।

इस अभियान की शुरूआत पिछले माह पर्यावरण दिवस पर ही हो गई थी जब महिलाओं ने यह ऐलान किया कि इस बार बारिश आने पर वनों में आदिवासियों व वनाश्रित समुदाय की पहल पर ही वृक्षारोपण होगा। वनविभाग द्वारा वृक्षारोपण कार्यक्रम का जमकर विरोध किया जाएगा। राजकुमारी भुइयां का कहना था की यह विरोध इसलिए हैं क्योंकि वन-विभाग द्वारा जितना भी वृक्षारोपण किया जा रहा है वह विदेशी धन या विश्व बैंक फंड से उन पेड़ों का हो रहा है जो कि न तो पर्यावरण के लिए अच्छा है और न ही लोगों के लिए उपयोगी है। यह पेड़ केवल कागज पर ही लग रहे हैं वन-विभाग द्वारा पौधा-रोपण की आड़ में आदिवासियों को वनाधिकार कानून के तहत मिली मालिकाना हक वाली भूमि पर ही प्लांटेशन किया जा रहा है। उनसे उनकी भूमि दोबारा छीनी जा रही है। वन-विभाग भूमि कब्जा करने की नियत से केवल गड्ढे ही खोदता है। इनके द्वारा किया गया वृक्षारोपण 99 फीसदी फेल हो जाता है। इस तथ्य की सच्चाई पिछले वर्षो में किए गए वृक्षारोपण का जमींनी स्तर पर मुआईना करने व इनके दस्तावेज़ों में अंकित आंकड़ों से समझा जा सकता है। इस समय यह वृक्षारोपण जापान की एक कम्पनी जाईका के माध्यम से कराया जा रहा है जिसके लिए उत्तरप्रदेश वन-विभाग को लगभग 500 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट मिला है। वन-विभाग द्वारा इस पैसे को गांव के दबंगों की समिति को चयन कर के किया जा रहा है जिनका पर्यावरण से कोई लेना देना नहीं है। सिर्फ लालच के रूप में इस योजना से कुछ लोग जुड़े हैं। वन-विभाग की इस समिति को आदिवासियों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है और यहीं नहीं इस योजना के तहत वनाधिकार कानून को विफल करने की कोशिश की जा रही है।

सुकालो पनिका ने कहा की कैमूर क्षेत्र व सोनभद्र वन व खनिज सम्पदा के लिये पूरे विश्व में मशहूर है लेकिन इस पूरी सम्पदा पर वन-विभाग, पूँजीपतियों, कम्पनियों व माफियाओं का कब्जा है। यहां के आदिवासी व गरीब तबका ऐतिहासिक काल से इन जंगलों के मालिक थे लेकिन देश आजाद होते ही इन जंगलों का मालिक वन-विभाग बन बैठा। वन विभाग को अंग्रेजी शासन ने राजस्व कमाने, जंगल काटने व वन्य जन्तुओं के शिकार का लाईसेन्स देने के लिए स्थापित किया था। जब से जंगल वन-विभाग के अधीन हुये जंगल बर्बाद ही हुए जिसके साथ आदिवासी व वन्य जन्तु भी बर्बाद हुए। अब यही वन-विभाग इन बचे हुए जंगलों को कम्पनियों से बचाने में नाकाम है। वन-विभाग की इस नाकामी की वजह से ही संसद को सन् 2006 में वनाधिकार कानून पारित करना पड़ा। इसके पीछे मूल कारण था कि जंगल व वन्य जन्तु राष्ट्रीय धरोहर हैं व इनको केवल वनों पर जीविका के लिये आश्रित समुदाय ही बचा सकते हैं। इस कानून का आधार ही वनाश्रित समुदाय के सामुदायिक अधिकारों से है लेकिन समुदाय को सामुदायिक अधिकार के तहत जंगल मिल जाएंगे तो वन-विभाग को खतरा है कि उनकी जमींदारी खत्म हो जाएगी इसलिए समुदाय इन सामुदायिक अधिकारों को न प्राप्त कर सके। इसके लिए बिना समुदाय की राय के वनविभाग जाईका के तहत वृक्षारोपण करने की योजना को चलाया जा रहा है। जाईका जापान की एक कंपनी हैं संयुक्त वन-प्रबंधन एक योजना है यह किसी भी कानून के अंतर्गत नहीं आती। दूसरी ओर वनाधिकार कानून 2006 एक केन्द्रीय कानून है। इसके तहत वनों में अधिकारों के साथ-साथ वनों की देखरेख, प्रबंधन व वन्य जन्तुओं के देखभाल के लिये भी समितियों को गठित कर उनको अधिकार देने के प्रावधान है।

दुर्गावती अगरिया ने कहा की सरकार एवं वन-विभाग द्वारा वनाश्रित समुदाय के वनों के अधिकार की अनदेखी करने की वजह से ही आदिवासी महिलाओं द्वारा वृक्षारोपण की कमान को अपने हाथों में लेने का निर्णय लिया गया है। महिलाओं ने यह ऐलान किया है कि अगर वन-विभाग नहीं चेता तो जल्द ही महिलाऐं वन-विभाग के वृक्षारोपण को विफल करेंगी। वन-विभाग को भगाने के लिए वनों में वृक्षारोपण कार्य को आदिवासी समाज करेगा। सोनभद्र मुख्यालय पर किये गये प्रतीकात्मक वृक्षारोपण से महिलाओं ने एक चुनौती शासन, प्रशासन व वन-विभाग को दी है। आदिवासी महिलाओं ने कहाँ कि अब जंगलों पर केवल वनाश्रित समुदाय का ही अधिकार होगा व वे ही इसकी सुरक्षा करेंगी। फिर से जंगल को हरा-भरा कर अपनी जीविकोपार्जन करेंगी। विदेशी कम्पनियों को भगाया जाएगा, व्यपारिक पौधा-रोपण का बहिष्कार किया जाएगा आदि जैसे कई निर्णय महिलाओं ने लिए। इस मौके पर आदिवासी महिलाओं के द्वारा गाए गए गीतों की मधुर धुन ने सबको मोहित कर के रख दिया।
 

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