होशियार बनने की कोशिश में ही हम बेवकूफ बनते हैं

Submitted by Hindi on Thu, 07/14/2011 - 14:10
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

दुःख की बात तो यह है कि, अपनी निराधार उद्दंडता के चलते वे प्रकृति को अपनी इच्छानुसार झुकाने की कोशिश भी करते रहते हैं। इंसान प्रकृति के रूपों को नष्ट कर सकता है, लेकिन उनका सृजन नहीं कर सकता। विभेदक दृष्टि जो कि एक खंडित और अपूर्व समझदारी है, वह प्रारंभिक बिंदु है जहां से मानव का ज्ञान आगे बढ़ता है।

जापान में जाड़ों में रातें लंबी और सर्द होती हैं। इन दिनों दहकते अंगारों को देखना और चाय की चुस्कियां लेना बहुत अच्छा लगता है। कहा जाता है कि अलाव के इर्द-गिर्द बैठ किसी भी विषय पर बतियाना अच्छा लगता है। यही सोच कर मुझे लगा कि, अपने साथी किसान भाईयों की शिकायतों-शिकवों पर चर्चा करना, ऐसे समय बुरा नहीं है, सो मैंने यह बात चलाई है लेकिन ऐसा लगता है कि, इसमें भी कुछ दिक्कतें आ सकती हैं। यहां मैं इतने दिनों से कहता चला आ रहा हूं कि, सब कुछ बे-मतलब है, मानव बिल्कुल अज्ञानी है, उसे कुछ भी हासिल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और हम जो कुछ भी करते हैं सब व्यर्थ है। यह सब कहने के बाद भी मेरा उपरोक्त बातें कहने का क्या मतलब हो सकता है? यदि मैं लिखने बैठूं भी तो यही लिख सकता हूं कि, लेखन बेकार की कवायद है। यह सब बातें बड़ी उलझाने वाली हैं।

लिखने बैठने पर मैं अपने अतीत के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिख सकता, और भविष्य के बारे में कुछ कह सकूं इतना समझदार भी नहीं हूं। अंगीठी के कोयलों को उलट-पुलट करते हुए तथा रोजाना की सामान्य बातों पर बतियाते मैं किसी से कैसे यह उम्मीद कर सकता हूं कि, वह किसी बूढ़े अज्ञानी किसान की बकवास को झेले? बागान की पहाड़ी कगार पर, प्रशस्त दोगो के मैदानों, तथा मात्सूयामा की खाड़ी की तरफ छोटी-छोटी मिट्टी की दीवारों वाली झोंपड़ियाँ बनी हुई हैं। यहां कुछ लोग इकट्ठा हो गए हैं, और मिल-जुल कर सादा जीवन जी रहे हैं। उन्हें कोई आधुनिक सुख-सुविधा उपलब्ध नहीं है। मोमबत्ती या कंदील की रोशनी में वे शांत शामें बिताते हैं और उनका जीवन कुछ थोड़ी सी एकदम जरूरी चीजों (बिना पॉलिश किए चावल, सब्जियां, छोटा सा लबादा और कटोरा) के सहारे चलता है। वे कहां-कहां से आते हैं, कुछ दिन ठहरते हैं और फिर अपनी राह चल देते हैं।

इन मेहमानों में होते हैं कृषि अनुसंधान-कर्ता, छात्र, विद्वान, किसान, हिप्पीगण, कवि, यायावर, छोटे-बड़े तथा किस्म-किस्म के विभिन्न देशों के सभी स्त्री-पुरुष जो लोग ज्यादा समय तक ठहरते हैं उनमें अधिकांश वे युवा होते हैं, जिन्हें कुछ समय तक आत्मचिंतन की जरूरत होती है। मेरा काम इस सड़क के किनारे की सराय की देखभाल करना है। आने-जाने वाले इन मुसाफिरों को मैं चाय पेश करता हूं और वे जब खेतों में हाथ बंटाते हैं तो उनसे बाहरी दुनिया जो कुछ हो रहा है उसके बारे में जानकारी लेता हूं। यह सब सुनने में बड़ा अच्छा लगता है लेकिन वास्तव में यह जीवन इतना आसान और आरामदेह नहीं है। चूंकि मैं ‘कुछ-मत-करो’ खेती की हिमायत करता हूं, बहुत से लोग यह सोच कर यहां आते हैं कि यहां उन्हें ऐसा आदर्श लोक मिलेगा, जहां उन्हें बिस्तर से बाहर निकलने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। ऐसे लोगों को यहां आकर बड़ा धक्का सा लगता है। सुबह के कोहरे में झरने से पानी भर कर लाना, हाथों में छाले पड़ जाएं तक जलाऊ लकड़ी चीरना, टखनों तक कीचड़ में खड़े होकर काम करना, ऐसी चीजें हैं, जिनसे घबराकर कुछ लोग जल्द ही मैदान छोड़ जाते हैं।

आज जब मैं कुछ युवाओं के समूह को एक छोटी सी झोपड़ी खड़े करते देख रहा था, फूनाबाशी इलाके की एक युवती चलकर मेरे पास आ खड़ी हुई। जब मैंने पूछा कि वह यहां क्यों आई है तो उसने कहा, ‘मैं बस यहां चली आई हूं। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं जानती।’ प्रतिभाशाली लेकिन कुछ बे-परवाह यह युवती समझदार है। मैंने फिर पूछा, ‘यदि तुम्हें पता है कि तुम अबोध हो, तो कहने को कुछ नहीं बचता, ठीक है ना?’ इस दुनिया को अपनी विभेदक (डिस्क्रिमनेटिंग) शक्ति के द्वारा जानने-समझने की कोशिश में लगे लोग उसके अर्थ की अनदेखी कर जाते हैं। क्या इस दुनिया में चल रही सारी धक्का-पेल और कशमकश का कारण यही नहीं है।? उसने धीमे से कहा, ‘हां यदि आप ऐसा सोचते हैं तो।’ ‘हो सकता है, तुम्हें यह ठीक से न मालूम हो कि, सच्चा ज्ञान क्या होता है। यहां आने से पहले तुमने किस प्रकार की किताबें पढ़ीं?’ उसने सिर हिलाकर जतलाया कि वह पढ़ने में विश्वास नहीं करती।

लोग पढ़ते हुए सोचते हैं कि वे ना-समझ हैं लेकिन पढ़ने से लोगों को चीजों को समझने में कोई मदद नहीं मिलती। खूब परिश्रम से पढ़ने के बाद वे इसी नतीजे पर पहुंचते हैं कि, लोग कुछ जान ही नहीं सकते और कुछ भी समझ लेना इंसान के बस के बाहर की चीज है। आमतौर से लोग सोचते हैं कि, ‘ना-समझी’ शब्द का प्रयोग तब किया जाता है जब, मिसाल के लिए आप दस में से नौ चीजें तो समझते हैं, एक नहीं समझ पाते, लेकिन दस चीजों को समझने के चक्कर में हम एक को भी ठीक से नहीं समझ पाते। यदि आप सौ फूलों को पहचानते हैं तो ‘जानते’ एक को भी नहीं हैं। लोग समझ पाने के लिए कठोर परिश्रम करते हैं, अपने आप को तसल्ली दे लेते हैं कि, वे समझ गए हैं, और बगैर कुछ जाने-समझे मर जाते हैं। लड़के-लड़कियां अपना बढ़ईगीरी का काम कुछ देर के लिए रोक, नारंगी के पेड़ के तले सुस्ताने बैठ गए और दक्षिण की तरफ आसमान में तैरते बादलों को निहारने लगे। लोग सोचते हैं कि जब वे धरती से आंखें हटाकर आसमान की तरफ देखते हैं तो उन्हें ईश्वर नजर आता है। वे संतरे के फल को हरी पत्तियों से अलग करते हैं और फिर कहते हैं कि उन्हें पता है कि, पत्तियां हरी हैं और फल नारंगी। मगर जिस क्षण हम हरे और नारंगी में फर्क की बात करते हैं, असली रंग गायब हो जाते हैं।

लोग इसलिए ऐसा सोच लेते हैं कि, वे चीजों को समझने लगे हैं, कि वे उनकी सुपरिचित हो गई हैं। यह ज्ञान बिल्कुल सतही होता है। यह ज्ञान कुछ वैसा ही होता है, जैसा उस ज्योतिषी का, जो कुछ ग्रहों और सितारों के नाम जान लेता है या उस वनस्पति-विज्ञानी का जो कुछ फूल और पत्तियों का वर्गीकरण जानता है या उस कलाकार जैसा जो हरे और नारंगी रंग में फर्क कर लेता है। इस ज्ञान का यह अर्थ नहीं है कि, आप स्वयं प्रकृति, धरती, आकाश, हरे और नारंगी रंग को जान गए हैं। खगोलशास्त्री, वनस्पति-विज्ञानी तथा कलाकार ने केवल कुछ प्रभाव ग्रहण किए हैं और हर एक ने अपने दिमागी बक्से में अच्छी व्याख्या कर डाली है। वे जितने ज्यादा बौद्धिक गतिविधियों में उलझते हैं, वे उतने ही ज्यादा प्रकृति से अलग-थलग होते जाते हैं और उनके लिए कुदरती ढंग से जीना उतना ही मुश्किल होता जाता है।

दुःख की बात तो यह है कि, अपनी निराधार उद्दंडता के चलते वे प्रकृति को अपनी इच्छानुसार झुकाने की कोशिश भी करते रहते हैं। इंसान प्रकृति के रूपों को नष्ट कर सकता है, लेकिन उनका सृजन नहीं कर सकता। विभेदक दृष्टि जो कि एक खंडित और अपूर्व समझदारी है, वह प्रारंभिक बिंदु है जहां से मानव का ज्ञान आगे बढ़ता है। प्रकृति की पूर्णता को जानने में असमर्थ होने के कारण मानव इससे ज्यादा कुछ नहीं कर पाता कि, वह उसका एक अपूर्ण चित्र रचे और फिर यह खुशफहमी पालने लगे, कि उसने कुछ प्राकृतिक चीज गढ़ी है। प्रकृति को जानने के लिए हमें सिर्फ इतना ही करना है कि, हम यह समझ लें कि हम वास्तव में जानते कुछ नहीं और जानने में समर्थ भी नहीं हैं। इसके बाद ही उससे यह उम्मीद की जा सकती है कि, वह विभेदकारी ज्ञान में अपनी दिलचस्पी खो देगा। जैसे ही वह विभेदकारी ज्ञान छोड़ेगा, अ-विभेदकारी ज्ञान अपने आप उसके भीतर से पैदा होगा। यदि वह जानने के बारे में कभी सोचता ही नहीं, यदि उसे परवाह ही नहीं है कि, वह कुछ जाने तो एक वक्त आएगा जब वह सब समझने लगेगा। उसके सामने अपने अहंकार को त्याग करने, इस विचार को त्यागने कि मानव धरती (प्रकृति) और आसमान (ईश्वर) से अलग कोई हस्ती है, इसके अलावा और कोई रास्ता ही नहीं है।

‘इसका मतलब है चतुर होने की बजाए मूर्ख होना।’ मैंने उस युवक को डांटा, जिसके चेहरे पर आत्मसंतुष्टि की समझदारी के भाव दिखलाई दे रहा था। ‘यह तुम्हारी आंखों में कैसा भाव है? आदमी बहुत चतुर होने की कोशिश में ही मूर्ख बन जाता है। क्या तुम निश्चित रूप से जानते हो कि, चतुर मूर्ख हो यह मूर्ख किस्म का चतुर लड़का बनने की कोशिश कर रहे हो। तुम न तो चतुर बन सकोगे न बेवकूफ, बस जहां के तहां रह जाओगे। क्या इस समय भी तुम इसी जगह नहीं हो?’ अचानक मुझे खुद पर गुस्सा आया कि, मैं उन्हीं शब्दों को बार-बार दुहरा रहा हूं जो मौन की कभी बराबरी नहीं कर पाएंगे और फिर इन शब्दों का मतलब तो मैं खुद भी नहीं समझता था। शरद ऋतु का सूरज आसमान में ढलने लगा था। पुराने पेड़ के नीचे झुरमुटे के रंग बिखरने लगे थे। समुद्र से लौटती रोशनी उन युवकों की पीठ पर पड़ रही थी और युवकगण खामोशी के साथ-साथ शाम के भोजन के लिए अपनी झोपड़ियों में लौटने लगे। दरख्तों के साए से होता हुआ मैं भी चुपचाप उनके पीछे हो लिया।

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