दवा का मर्ज बन जाना

Submitted by Hindi on Fri, 07/15/2011 - 12:19
Source
पर्यावरण डाइजेस्ट, 24 अप्रैल 2011

रासायनिक सहायक औषधि मात्र 4 माह तक औषधि को सुरक्षित रख पाती है। हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक ने पहली बार हेपेटाईटिस- बी के लिए थियोमेरोसाल मुफ्त वेक्सीन का निर्माण किया है। बार - बार अनुरोध करने के बावजूद कंपनी ने वेक्सीन निर्माण में इस्तेमाल किए गए विकल्प का खुलासा नहीं किया।

भारत में एलिनिउकाल ड्रग ट्रायल (दवाई परीक्षण) पर सख्त नियमन न होने से अनेक दवाई कंपनियां बेरोकटोक एवं अनैतिक रूप से मरीजों को बिना संज्ञान में लिए उन पर परीक्षण कर रही है। इंदौर जैसे मध्यम आकार के शहर अब इसकी चपेट में है। समाचार पत्रों में विज्ञापनों के माध्यम से परीक्षण के लिए मरीजों को इकट्ठा करना स्थितियों को और जटिल बना रहा है। अजय और पूजा उस दिन को धिक्कारते है जब वे अपने बच्चे को विशेष टीकाकरण कार्यक्रम में ले गए। अजय को पता चला कि मध्यप्रदेश के इंदौर शहर का एक सरकारी अस्पताल अनेक बीमारियाँ जिसमें पोलियो, स्वाइन फ्लू और पीलिया शामिल है के लिए मुफ्त टीकाकरण कर रही है। जो बात वही नहीं जानता था वह यह कि दवाई कंपनियां चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में वेक्सीन (टीकों) का परीक्षण कर रही है। दोनों अपने बेटे यथार्थ को अस्पताल ले गए। अगले ही दिन उसके पूरे शरीर पर सफेद दाग उभर आए। दूसरे ही दिन चिंतातुर होकर वे अस्पताल पहुंचे तो उनसे मात्र साबुन बदलने को कहा गया। परंतु दाग बढ़ते ही गए। उन्होनें अस्पताल से पुन: संपर्क किया तो इस बार डॉक्टरों ने उन्हें कुछ दवांइया दे दी। इसके बाद पिछले आठ महीनों से यथार्थ का लगातार इलाज चल रहा है।

पांचवी तक पढ़ी पूजा का कहना है हमें अंग्रेजी में एक फार्म भरने को कहा गया। वहीं 10वीं उत्तीर्ण अजय का कहना है कि मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि अब मैं। क्या करूँ? मैं नहीं चाहता कि मेरा बेटा इन सफेद दागों के साथ बड़ा हो। वह बच्चे के उपचार में अब तक 15000 रूपए खर्च कर चुका है। साथ ही उसका कहना है कि मेरे साथ धोखा हुआ है। हम गरीब है तो क्या इसीलिए हमें जीने का हक नही है? राज्य के स्वास्थ मंत्री महेन्द्र हार्डिया के अनुसार यथार्थ जैसे 2000 बच्चों पर इंदौर में टीकाकरण का परीक्षण चल रहा है उनमें से अनेक बुखार, चकत्ते और फोड़े फुंसियों से पीड़ित है। आर.टी.आई. का सच - यथार्थ की स्थिति की जानकारी मिलने पर एक सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता डॉ. आनन्द राय ने चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय से टीकाकरण परीक्षण के मामले में जानकारी पाने हेतु प्रार्थना पत्र दिया। प्राप्त सूचना के अनुसार वेक्सीन से कुछ ऐसे रसायन थे जो अपनी प्रकृति में जहरीले थे। परंतु चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के शिशु रोग विशेषज्ञ विभाग के प्रोफेसर डॉ. हेमन्त जैन का कहना है कि इन परीक्षणों की अनुमति ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीजीजीआई) ने दी थी और इसे वेक्सीन में प्रयोग किये गए किसी भी रसायन के कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। अपनी बात को विस्तार देते हुए जैन का कहना है अधिकांश ट्रायल तीसरे और चौथे दौर की है। इसमें से कुछ वेक्सीन तो बाजार में व्यापक रूप से उपलब्ध भी हैं।

ट्रायल संचालित करने वाली दवाई कंपनियों के लिए अनिवार्य है कि वे संबंधित अस्पताल को वेक्सीन के विपरीत प्रभावों की जानकारी दें। इस पर डॉ. राय ने गत अक्टूबर में चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में सूचना का अधिकार कानून के अंतर्गत दूसरा प्रार्थना पत्र लगाया जिसमें दवाई कंपनियों द्वारा साईड इफेक्ट की सूची की मांग की गई थी। राय का कहना है कि सूचना का अधिकार के नियमों के अंतर्गत 30 दिन में जवाब मिल जाना चाहिए। मुझे नहीं पता इतनी देर क्यों लग रहा है। अंतर्निहित रसायन - वेक्सीन में थियोमेरोसाल, रक्यूलीन फार्मलडिहाइड और ट्वीन - 80 का सम्मिश्रण है। डॉ. राय का कहना है इन रसायनों की सुरक्षा सिद्ध करने का कोई वैज्ञानिक तथ्य मौजूद नहीं है। उदाहरण के लिए थियोमेरोसाल जिसका प्रयोग इसे लम्बे समय तक वेक्सीन को सुरक्षित रखने के लिए होता है मैं इसके वजन का 50 प्रतिशत पारा होता है। नेशनल एक्रीडेशन बोर्ड फॉर हॉस्पीटल के सदस्य अजय गंभीर का कहना है हालांकि टीके में जितनी मात्रा पाई गई है उस मात्रा में थियोमेरोसाल हानिकारक नहीं है लेकिन अधिक मात्रा में लेने से इससे स्नायुतंत्र में गड़बड़ी हो सकती है।

अमेरिका में 6 वर्ष और उससे छोटे बच्चे के लिए प्रति खुराक में थियोमेरोसाल की मात्रा या तो नहीं होती या बहुत कम मात्रा (0.5 मिली) ही होती है। जबकि रूस, डेनमार्क और आस्ट्रिया ने इसके उपयोग पर पूरा प्रतिबंध ही लगा दिया है। वहीं भारत में इसका स्वीकृत मात्रा 25-100 माईक्रोग्राम प्रति खुराक है। राय का कहना है कि विकसित विश्व थियोमेरोसाल के उपयोग के खिलाफ हैं। वहीं भारत ने इसके मानकों में छूट दे दी है। इसी से स्वास्थ्य समस्याएं खड़ी हो रही हैं। भारत में सम्मिश्रण को लेकर वैसे तो कोई पैमाना ही नहीं है और यदि कहीं है भी तो बहुत ही लचर है। गंभीर का कहना है इसे स्वेअलीन, फार्मलडिहाइड और ट्वीन - 80 के मामलों में देखा जा सकता है। स्वेअलीन एक सहायक औषधि है जो कि वेक्सीन के संदर्भ में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है और भारत में इसके इस्तेमाल की सीमा परिभाषित नहीं की गई है। अमेरिका में इसका प्रयोग प्रतिबंधित है। फार्मलडिहाइड का इस्तेमाल वेक्सीन में बैक्टीरिया को असक्रिय करने के लिए होता है और ट्वीन-80 ऊपरी तनाव को कम करती है इन दोनों को भारत के अंदर और बाहर दोनों ही स्थानों पर इस्तेमाल होता है। जहां भारत में इन दोनों के इस्तेमाल के लिए कोई मानक तय नहीं है वहीं अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने इस हेतु मानक तय कर रखे हैं। डाउन टू अर्थ ने जब भारत के औषधि नियंत्रक से इनके प्रयोग की सीमा जानना चाही तो उन्होनें कोई जवाब नहीं दिया। सूचना का अधिकार के अंतर्गत चाही गई जानकारी में चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय ने इन रसायनों के बीच का अंतर स्पष्ट नहीं किया।

डॉ. राय का कहना है इन सबको एक औषधि के साथ मिला दिया गया है। यह आवरण धक्का पहुंचाता है। जब डाउन टू अर्थ ने औषधि निर्माताओं से जानना चाहा कि इनका वेक्सीन में क्यों प्रयोग किया जाता है तो उन्होने कोई जवाब नहीं दिया। मध्यप्रदेश के रतलाम नगर के विधायक पारस सखलेचा ने अक्टूबर 2010 में विधानसभा में प्रश्न पूछा था कि खतरनाक रसायन जिनका विकसित देशों में इस्तेमाल प्रतिबंधित है उनका हमारे बच्चों पर परीक्षण क्यों हो रहा है। इसके जवाब में सरकार ने अक्टूबर से मध्यप्रदेश में नए परीक्षणों पर तो प्रतिबंध लगा दिया लेकिन वर्तमान में हो रहे परीक्षणों को नहीं रोका। सरकार ने इस संबंध में एक कमेटी का गठन भी कर दिया है लेकिन उसकी रिपोर्ट का अभी भी इंतजार है। नियमन की कमी - वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेन के पूर्व विभागाध्यक्ष टी. जेकब जान का कहना है कि मुख्य समस्या सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लचर नियमन की है। वहीं डॉ. राय का कहना भारत में अमेरिका की तरह वेक्सीन के दुष्परिणाम बताने हेतु वेक्सीन एडवर्स इवेन्ट रिपोर्टिंग सिस्टम भी नहीं है।

लागत एक और बड़ी रूकावट है। भारत में बनने वाले अधिकांश वेक्सीन बहु खुराक (मल्टी डोज) होते है। जिसके लिए प्रिजरवेटिव इस्तेमाल करना आवश्यक है। जॉन का कहना है कि निर्माता को बजाए एकल खुराक (सिंगल डोस) वेक्सीन बनाने के बहु खुराक वेक्सीन बनाना सस्ता पड़ता है। विकसित देशों में प्रिजरवेटिव का इस्तेमाल न करने हेतु सिंगल डोज वेक्सीन को प्राथमिकता दी जाती है। दिल्ली के सेंट स्टीफन अस्पताल के शिशु रोग विभाग के अध्यक्ष का कहना है कि इसका हल शोध और विकास हेतु अधिक धन मुहैया कराने में छुपा है। सुरक्षित विकल्प - वर्तमान में विश्व भर में पीलिया, पोलियो, टिटनेस और गर्भाश्य के कैंसल की वेक्सीन में एल्युमीनियम हाइड्रो-ऑक्साइड को सहायक औषधि के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। अब दिल्ली के एक संस्थान में एक किस्म की आयुर्वेदिक सहायक औषधि की खोज कर ली है इसे दिल्ली स्थित रक्षा शोध एवं विकास संगठन के डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोलॉजी एण्ड अलाइड साइंस ने विकसित किया है। इसे भारत में लेह और उत्तराखंड में पाई जाने वाली लेह बेरी की पत्तियों से बनाया गया है। इसका एक अन्य लाभ यह है कि इसके मिश्रण से वेक्सीन को 3 वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। रासायनिक सहायक औषधि मात्र 4 माह तक औषधि को सुरक्षित रख पाती है। हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक ने पहली बार हेपेटाईटिस- बी के लिए थियोमेरोसाल मुफ्त वेक्सीन का निर्माण किया है। बार - बार अनुरोध करने के बावजूद कंपनी ने वेक्सीन निर्माण में इस्तेमाल किए गए विकल्प का खुलासा नहीं किया।
 

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