पूरी संस्कृति है कावेरी

Submitted by admin on Mon, 11/16/2009 - 09:26
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जागरण याहू

कावेरी उद्गमदक्षिण भारत के कर्नाटक में दो पर्वत मालाएं हैं-पश्चिम और पूर्व, जिन्हें पश्चिमी और पूर्वी घाट के नाम से जाना और पुकारा जाता है। पश्चिमी घाट के उत्तारी भाग में एक बहुत ही सुंदर 'कुर्ग' नामक स्थान है। इसी स्थान पर 'सहा' नामक पर्वत है, जिसे 'ब्रह्माकपाल' भी कहते हैं, जिसके कोने में एक छोटा-सा तालाब है। यही तालाब कावेरी नदी का उद्गम स्थल है। यहां देवी कावेरी की मूर्ति है, जहां एक दीपक सदा जलता रहता है और नित्य पूजा भी होती है।

'कुर्ग' की पहाड़ियों से लेकर समुद्र तक की लंबी यात्रा में कावेरी का रूप कई बार बदलता है। कहीं यह पतली धारा की तरह हो जाती है, तो कहीं इसकी जलधाराएं सागर-सी दिखाई देती हैं। कभी यह सरलता से चुपचाप बहती है, तो कभी ऊंचाई से जलप्रपात के रूप में गिरती है। पचास से अधिक छोटी-बड़ी नदियां इसमें आकर मिलती हैं। समुद्र में विलीन होने से पहले कावेरी से कई शाखाएं निकलती हैं और अलग-अलग नामों से अलग-अलग नदियों के रूप में बहती हैं।

कावेरी के तट पर दर्जनों बड़े-बड़े नगर और उपनगर बसे हैं। बीसियों तीर्थ-स्थान हैं। अनगिनत प्राचीन मंदिर हैं और सैकड़ों कल-कारखाने भी इसके तट पर चल रहे हैं। इतना ही नहीं, लोगों को अन्न देने वाली कावेरी के जल का प्रयोग बिजली पैदा करने में भी होता है। कावेरी के पावन जल और तट ने देश को कई महान संत, कवि, राजा, रानी एवं प्रतापी वीर दिए हैं। इसी कारण कावेरी को तमिल भाषी माता कहकर पुकारते हैं।

कावेर की पुत्री

तमिल भाषा में कावेरी को 'काविरि' भी कहते हैं। काविरि का अर्थ है- उपवनों का विस्तार करने वाली। अपने जल से यह बंजर भूमि को भी उपजाऊ बना देती है। इस कारण इसे 'काविरि' कहते हैं। कावेरी का एक अर्थ है- कावेर की पुत्री। कथा है कि राजा कवेर ने इसे पुत्री की तरह पाला था, इस कारण इसका यह नाम पड़ा।

कावेरी को 'सहा-आमलक-तीर्थ' और 'शंख-तीर्थ' भी कहते हैं। ब्रह्मा ने शंख के कमंडल से आंवले के पेड़ की जड़ में विरजा नदी का जल चढ़ाया था। कहा जाता है कि वह जल इसके साथ मिलकर बहा, तो कावेरी के सहा आमलक तीर्थ या शंख तीर्थ नाम पड़े। तमिल भाषा में कावेरी को प्यार से 'पोन्नी' कहते हैं। पोन्नी का अर्थ है सोना उगाने वाली। कहा जाता है कि कावेरी के जल में सोने की धूल मिली हुई है। इस कारण इसका यह नाम पड़ा।

वैष्णव और शैव मंदिर
कावेरी के तट पर वैष्णवों का विख्यात मंदिर 'श्रीरंगम' है, जो भगवान विष्णु का मंदिर है। इसके तट पर शैव धर्म के भी कई तीर्थ हैं। चिदंबरम का मंदिर कावेरी की ही देन है। श्रीरंगम के पास बना हुआ जंबुकेश्वरम का प्राचीन मंदिर भी प्रसिद्ध है। तिरुवैयारु, कुंभकोणम, तंजावूर शीरकाल आदि जैसे अनेक स्थान पर शिवजी के मंदिर कावेरी के तट पर बने हैं। तिरुचिरापल्ली शहर के बीच में एक ऊंचे टीले पर बना हुआ मातृभूतेश्वर का मंदिर और उसके चारों ओर का किला विख्यात है।

रामायण रची कंबन ने

शैव और वैष्णव संप्रदाय के कितने ही आचार्य, संत और कवि कावेरी के तट पर हुए हैं। विख्यात वैष्णव आचार्य श्री रामानुज को आश्रय देनेवाला श्रीरंगपट्टनम का राजा विष्णुव‌र्द्धन था। तिरुमंगै आलवर और कुछ अन्य वैष्णव संतों का जन्म कावेरी-तीर पर ही हुआ था। सोलह वर्ष की आयु में शैव धर्म का देश-भर में प्रचार करने वाले संत कवि ज्ञानसंबंधर का जन्म भी कावेरी-तट पर हुआ था। तमिल भाषा के कितने ही विख्यात कवि इसी नदी के किनारे पले-बढ़े। महाकवि कंबन ने तमिल भाषा में अपनी विख्यात रामायण की रचना इसी नदी के तट पर की थी। दक्षिण संगीत को नया प्राण देने वाले संत त्यागराज, श्यामा शास्त्री और मुत्ताु दीक्षित इसी कावेरी तट के वासी थे। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि दक्षिण की संस्कृति कावेरी की देन है।

विदाई उत्सव
कावेरी के उद्गम स्थान पर हर साल सावन के महीने में बड़ा उत्सव मनाया जाता है। इसे कावेरी की विदाई का उत्सव कहा जाता है। कुर्ग के सभी हिंदू लोग, विशेषकर स्त्रियां, इस उत्सव में बड़ी श्रद्धा के साथ भाग लेती हैं। इस दिन कावेरी की मूर्ति की विशेष पूजा होती है। 'तलैकावेरी' कहलाने वाले उद्गम-स्थान पर सब स्नान करते हैं। स्नान करने के बाद प्रत्येक स्त्री कोई न कोई गहना, उपहार के रूप में इस तालाब में डालती है।

इतिहास

-कावेरी के तट पर तिरुवैयारु नामक स्थान पर पेशवाओं ने जो संस्कृत विद्यालय स्थापित किया था, वह आज भी विद्यमान है।

-इसी तट पर चोल साम्राज्य बना और फैला।

-रिकालन के समय में समुद्र तट पर कावेरी के संगम-स्थल पर पुहार नामक विशाल बंदरगाह बना।

-यूनानी लोगों ने इस नगर को 'कबेरस' नाम दिया था। यह 'कबेरस' शब्द भी कावेरी शब्द से ही बना है।

[शशिकांत सदैव]
 

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