Yamuna River in Hindi

Submitted by Hindi on Wed, 07/27/2011 - 09:15


भारत की सर्वाधिक प्राचीन और पवित्र नदियों में गंगा के समकक्ष ही यमुना की गणना की जाती है। भगवान कृष्‍ण की लीलाओं की साक्षी रही यह नदी ब्रज संस्‍कृति की संवाहक है। भारतवासियों के लिए यह सिर्फ एक नदी नहीं है, भारतीय संस्‍कृति में इसे माँ का दर्जा दिया गया है। यमुना नदी का उद्गम हिमालय में स्थित यमुनोत्री से हुआ है। हिन्दू धर्म के चार धामों में यमुनोत्री का भी स्‍थान है। यमुना नदी की तीर्थस्‍थली यमुनोत्री हिमालय की खूबसूरत वादियों में स्थित है। हिमालय में पश्चिम गढ़वाल के बर्फ से ढँके श्रृंग बंदरपूंछ (सुमेरु) के उत्‍तर-पश्चिम में कालिंद पर्वत है। इसी पर्वत से यमुना नदी का उद्गम हुआ है। कालिंद पर्वत से नदी का उद्गम होने की वजह से ही लोग इसे कालिंदी भी कहते हैं। यमुना नदी का वास्‍तविक स्रोत कालिंद पर्वत के ऊपर बर्फ की एक जमी हुई झील और हिमनद चंपासर ग्‍लेश्यिर है। इसी ग्‍लेश्यिर से यमुना नदी निकलती हैं और ऊँचे-नीचे, पथरीले रास्‍तों पर इठलाती, बलखाती हुई पर्वत से नीचे उतरती हैं। यमुना नदी के इस शुद्ध निर्मल जल और स्‍वछंद प्रवाह के दर्शन करने अनेक तीर्थयात्री और पर्यटन हर साल हजारों की संख्‍या में यमुनोत्री धाम पहुँचते हैं। भक्तिभाव से यमुना नदी के दर्शन करने आने वालों के साथ-साथ प्रकृति-प्रेमियों के लिए यह जगह किसी स्‍वर्ग से कम नहीं है।

तीर्थयात्री और पर्यटक देवी यमुना के मंदिर तक ही आते हैं। इस मंदिर तक पहुँचने का मार्ग अत्‍यंत खूबसूरत है। इस मंदिर की चढ़ाई करते हुए आस-पास की हिमाच्‍छादित पहाड़ियों के मनोहारी दृश्‍य यात्रियों की सारी थकान को हर लेते हैं। यमुना नदी के मंदिर के अतिरिक्‍त यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण है- सूर्यकुंड। यह गर्म पानी का कुंड है जिसका पानी 80 डिग्री सेल्सियस तक गर्म रहता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु इस कुंड में आलू और चावल उबालकर उसका भोग यमुना देवी को लगाते हैं। सूर्यकुंड के समीप एक शिला है, जिसे दिव्यशिला या ज्‍योतिशिला भी कहा जाता है। श्रद्धालु यमुना मैया की पूजा करने से पहले इस शिला की पूजा करते हैं। यमुना नदी का नाम वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में आता है। कहते हैं, यमुना मैया सूरज की बेटी है। सूरज की बेटी होने के कारण ‘सूर्य-तनया’ कहलाती हैं। इसके भाई यमराज हैं इसलिए इनका एक नाम ‘यमी’ भी है। इसका पानी बहुत साफ पर कुछ नीला, कुछ सांवला है, इसलिए इन्हें ‘काली गंगा’ भी कहते हैं।

बहुत दूर तक यमुना पहाड़ों में उछलती-कूदती चलती है। छोटे-मोटे बहुत से झरने, बहुत-सी नदियां इसमें मिलती हैं। फिर यमुना देहरादून की घाटी में पहुंच जाती है। यहां टौंस (तमसा) नदी से इसका संगम होता है जो बड़ा पावन माना जाता है। कुछ दूर शिवालिक पहाड़ियों में घूमकर यमुना नदी पहाड़ों से विदा लेती है। अपना पीहर छोड़ देती है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मैदानों में प्रवेश करती है। यहाँ पर सिंचाई के लिए यमुना से नहरें निकली गयी हैं। नहरों का दान करने के बाद यमुना बहुत धीरे-धीरे चलने लगती है। बहुत दूर तक वह हरियाणा और उत्तरप्रदेश की सीमा बनी रहती है। एक ओर पानीपत, रोहतक के जिले हैं तो दूसरी ओर मुजफ्फरनगर और मेरठ के। पानीपत में तीन-तीन बार भारत के भाग्य का फैसला हुआ। कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध लड़ा गया। ये दोनों यमुना से दूर नहीं हैं। वह वीरों का सिंहनाद सुनती हैं। गीता की वाणी भी सुनती हैं। मेरठ में 1857 की आजादी की लड़ाई को भी वह अच्छी तरह जानती हैं। यही सब जानती-बूझती वह भारत की राजधानी दिल्ली के पास आ पहुंचती हैं। कितनी बार यह राजधानी बनी, कितनी बार उजड़ी, कितने राज उठे, कितने राज मिटे, यमुना सब कुछ देखती रहीं। दिल्ली में ही यमुना के किनारे राजघाट पर महात्मा गाँधी की समाधी है। दिल्ली में यमुना ने राजाओं को देखा, शूर-वीरों को देखा, साहित्य के दीवानों को भी देखा। व्यास यहां न जाने कितनी बार आये। चन्दबरदाई ने यहीं रासो की रचना की। फिर गालिब, जौक, मीर, सौदा और मोमिन एक से एक बढ़कर शायर यहीं पर हुए। यहीं हिन्दी जन्मी और उर्दू परवान चढ़ी। और दिल्ली की कला, यहां का लाल किला, यहां के भवन, यहां की मस्जिदें, मीनारें, मकबरे इस कहानी का कोई अंत नहीं।

दिल्ली के बाद यमुना श्री कृष्ण की जन्म भूमि ब्रज में प्रवेश करती हैं। ब्रज क्षेत्र में यमुना के तट पर बसा हुआ पहिला उल्लेखनीय स्थान शेरगढ़ है। शेरगढ़ से कुछ दूर तक पूर्व की दिशा में बह कर फिर यह मथुरा तक दक्षिण दिशा में ही बहती है। मार्ग में इसके दोनों ओर पुराण प्रसिद्ध वन और उपवन तथा कृष्ण लीला स्थान विद्यमान हैं। यहाँ पर यह भाँट से वृन्दावन तक बलखाती हुई बहती है और वृन्दावन को यह तीन ओर से घेर लेती है। पुराणों से ज्ञात होता है। प्राचीन काल में वृन्दावन में यमुना की कई धाराएँ थी, जिनके कारण वह लगभग प्रायद्वीप सा बन गया था। उसमें अनेक सुन्दर वनखंड और घास के मैदान थे, जहाँ भगवान श्री कृष्ण अपने साथी गोप बालकों के गाय चराया करते थे। वर्तमान काल में यमुना की एक ही धारा है और उसी के तट पर वृन्दावन बसा हुआ है। वहाँ मध्य काल में अनेक धर्माचार्यों और भक्त कवियों ने निवास कर कृष्णोपासना और कृष्ण भक्ति का प्रचार किया था। वृन्दावन में यमुना के किनारों पर बड़े सुन्दर घाट बने हुए हैं और उन पर अनेक मंदिर-देवालय, छतरियां और धर्मशालाएँ है। इनसे यमुना के तट की शोभा अधिक बड़ जाती है। वृन्दावन से आगे दक्षिण की ओर बहती हुई यह नदी मथुरा नगर में प्रवेश करती है।

मथुरा यमुना के तट पर बसा हुआ एक ऐसा ऐतिहासिक और धार्मिक स्थान है, जिसकी दीर्घकालिन गौरव गाथा प्रसिद्ध है। यहां भी यमुना के तट पर बड़े सुन्दर घाट बने हुए हैं। यमुना में नाव से अथवा पुल से देखने पर मथुरा नगर और उसके घाटों का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। विगत काल में यमुना मथुरा-वृन्दावन में एक विशाल नदी के रुप में प्रवाहित होती थी, किन्तु जबसे इससे नहरें निकाली गयी हैं, तब से इसका जलीय आकार छोटा हो गया है। केवल वर्षा ॠतु मे यह अपना पूर्ववर्ती रूप धारण कर लेती हैं। उस समय मीलों तक इसका पानी फैल जाता है। मथुरा से आगे यमुना के तट पर बायीं ओर गोकुल और महावन जैसे धार्मिक स्थल हैं। आगरा जिले में प्रवेश करने पर इसके पानी से निर्मित कीठम झील है, जो सैलानियों के लिये बड़ी आकर्षक है। कीठम से रुनकता तक यमुना के किनारे एक संरक्षित वनखंड का निर्माण किया गया है, जो 'सूरदास वन' कहलाता है। रुनकता के समीप ही यमुना तट पर 'गोघात' का वह प्राचीन धार्मिक स्थल है, जहाँ महात्मा सूरदास 12 वर्षों तक निवास किया था और जहाँ उन्होंने महाप्रभु बल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी। आगरा बहुत पुराना नगर है। आगरे का ताजमहल दुनिया के सात अजूबों में से एक है। यमुना अब पूरब की ओर बढ़ जाती है। रास्ते में उससे आकर कई नदियाँ मिलती हैं। दक्षिण से चम्बल आती है और यमुना में समा जाती है। चम्बल विन्ध्य पर्वत की बेटी हैं। साथ में अरावली का जल भी लाती हैं। यमुना में मिलकर वह उत्तर-दक्षिण का भेद मिटा देती है। चम्बल वैदिक काल की नदी है। प्रसिद्ध दानी राजा रन्तिदेव इसी के किनारे पर राज करते थे। महाभारत और पुराण उसके यश के गीतों से भरे पड़े हैं। उसने अनेक यज्ञ किये।

आगे आता है कोसम। आज यह गांव है, पर कभी इसी का नाम कौशाम्बी था। इसके साथ उदयन और वासवदत्ता की प्रेम-कहानी जुड़ी हुई है। कालिदास ने ‘मेघदूतम’ में इस प्रेम कहानी की चर्चा की है। इस नगर की खुदाई में बहुत-सी पुरानी चीजें मिली हैं, जो पुराने भारत के बारे में बहुत जानकारी देती हैं। कहते हैं, जब गंगा हस्तिनापुर को बहा ले गई थी, तब कौरवों का राजघराना यहीं आ बसा था। इसी राजकुल में राजा उदयन हुआ। उसी के समय में गौतम बुद्ध यहां दो साल रहे। बौद्ध धर्म का यहां एक बहुत बड़ा विहार था। चन्दन की बनी तथागत की एक विशाल मूर्ति भी थी। इसे राजा उदयन ने बनवाया था। एक कुंए और स्नानघर का भी पता लगा है। तथागत वहां नहाया करते थे। वहां एक स्तूप भी था। इसमें तथागत के केश और नाखून रखे थे। राजा होने से पहले अशोक भी कौशाम्बी में रहता था। बाद में उसने यहां अपनी लाट खड़ी की। यह लाट अब इलाहाबाद के किले में है। यहीं पर समुद्रगुप्त ने एक साथ आर्यवर्त्त के राजाओं का मान मर्दन किया था। इसके बाद यमुना आगे बढ़ी और प्रयाग में बहन गंगा के गले से जा मिली।

हिमालय में दोनों बहनों का घर बहुत पास-पास है। पर यहां 1065 कि.मी. चलकर यमुना गंगा से मिल पाती हैं। यमुना ने गंगा को अपना जल ही नहीं दिया, जीवन भी दे दिया। तब से आजतक लाख-लाख नर-नारी इस अनोखे मिलन को देखने के लिए आते रहते हैं। इसे देखकर राम ने सीता से कहा था, “देखो, यमुना की सांवली लहरों से मिली हुई उजली लहरों वाली गंगाजी कैसी सुन्दर लग रही हैं। कहीं ऐसा लगता है कि मानो सफेद कमल के हार में नील कमल गूंथ दिये हों, कहीं छाया में विली चांदनी, धूप-छांव सी छिटकी हुई सी लगती हैं। कहीं जैसे शरद के आकाश में बादलों की रेखा के भीतर से नील गगन छलक पड़ता हो। जो गंगा-यमुना के संगम में नहाते हैं, वे ज्ञानी न भी हों, तो भी संसार से पार हो जाते है।” प्रयाग में गंगा यमुना एक-दूसरे के गले मिलीं। गंगा-यमुना के बारे में कई कथाएं कही जाती हैं। गंगा का जल सफेद है और यमुना का नीला। दोनों का रंग अलग-अलग दिखाई देता है। पर संगम से आगे गंगा का जल भी नीला हो जाता है। कहते हैं कि यहां से नाम गंगा का रह जाता है और रंग यमुना का। जहां संगम है, वह स्थान त्रिवेणी कहलाता है। कहते हैं, सरस्वती भी यहीं पर गंगा में मिलती हैं, लेकिन वह दिखाई नहीं देतीं। माघ के महीने में हर साल यहां मेला लगता है। बारहवें साल कुम्भ के अवसर पर लाखों नर-नारी यहां इकट्ठे होते हैं। छठे साल अर्द्धकुम्भी का मेला भी जोर-शोर से लगता है। देश के कोने-कोने से लाखों नर-नारी, साधु सन्त यहां आते हैं।

आज से साढ़े बारह सौ साल पहले हर्ष भारत का राजा था। वह हर पांचवे साल संगम पर एक सभा किया करता था। ऐसी ही सभा में हुएनसांग भी शामिल हुआ था। उसने लिखा, “इस सभा में भारत के अनेक राजा आये थे। महाराजा ने अपना सब धन पुजारियों, विधवाओं और दीन-दुखियों को दान कर दिया था। जब कुछ न बचा तो राजमुकुट दे दिया, मोतियों का हार भी दे दिया, यहां तक कि पहनने के कीमती कपड़े भी दे दिये। अपने पहनने के लिए एक वस्त्र अपनी बहन जयश्री से मांगा।”

Hindi Title

यमुना


विकिपीडिया से (Meaning from Wikipedia)




अन्य स्रोतों से




संदर्भ
बाहरी कड़ियाँ
1 -
2 -
3 -

Disqus Comment