Narmada River in Hindi

Submitted by Hindi on Wed, 07/27/2011 - 10:29


रेवा को ही नर्मदा कहा जाता है। नर्मदा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर (सतपुडा और विंध्याचल की पर्वत श्रेणियों का संधि स्थल) से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। इसकी लम्बाई 1310 कि.मी. है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर गुजरात राज्य में खम्भात की खाड़ी में गिरती है। इस नदी के किनारे अमरकण्टक, मण्डला, भेड़ा-घाट, नेमावर, ॐकारेश्वर , महेश्वर आदि प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं जहाँ काफी दूर-दूर से यात्री आते हैं। अमृतमयी पुण्य सलिला नर्मदा की गणना देश की प्रमुख नदियों में की जाती है। पवित्रता में इसका स्थान गंगा के तुरन्त बाद है। कहा जाता है कि गंगा में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है वह नर्मदा के दर्शन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है। हमारे देश में नदियों को केवल बहते हुये जल के रूप में ही नहीं देखा जाता है। वे जीवनदायिनी माँ के रूप में पूज्य होती हैं। नर्मदा में भी अपार आस्था समाई हुई हैं। इसे ‘मइया’ और देवी होने का गौरव प्राप्त है। पुरातन काल से ऋषि मुनियों की तपस्या स्थली रही नर्मदा आज भी धार्मिक अनुष्ठानों का गढ़ है। पूरे देश में यही एक मात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। मन में अपार श्रद्धा लिये हुये सैकडों पदयात्री पैरों के छालों की परवाह किए बगैर लगभग तीन हज़ार किलोमीटर की यात्रा पूरी करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं।

नर्मदा के किनारे सैकड़ों तीर्थस्थल और मंदिर तो हैं ही साथ ही अनेक स्थानों पर इसका सौंदर्य देखते ही बनता है। असंख्य जड़ी बूटियों और वृक्षों के बीच से बहती हुई नर्मदा को मध्यप्रदेश की जीवन रेखा भी कहा जाता है। सैकडों छोटी-मोटी नदियों को अपने में समेटती हुई यह नदी कभी इठलाती हुई चलती है, कभी शांत बहती है तो कभी सहस्त्र धाराओं में विभाजित हो जाती है। संगमरमरी दूधिया चट्टानों को चीर कर इसको बहता देख दर्शकों को अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। नर्मदा के निर्मल जल में स्नान से जो सुख प्राप्त होता है वह अवर्णनीय है। आराम देती है इसी से इसका नाम ‘नर्मदा’ है और चुलबुली शरारती भी है और इसी कारण इसे ‘रेवा’ कहा गया है। पुराणों में नर्मदा को शंकर जी की पुत्री कहा गया है, इसका प्रत्येक कंकड़ शंकर माना जाता है।

आइये अब माँ नर्मदा की पावन यात्रा शुरू करते हैं। नर्मदा का उद्गम स्थल, अमरकण्टक, विन्ध्याचल और सतपुड़ा पर्वतों के संधि स्थल पर स्थित है। अमरकण्टक के पास से नर्मदा एक गोमुख से निकलती है। यहां पर एक कुंड है और आसपास कई छोटे-बड़े मंदिर हैं। कहते हैं यहां पर व्यास, भृगु और कपिल आदि ऋषियों और स्वयं भगवान शंकर ने तपस्या की थी। नर्मदा का उद्गम होने से अमरकण्टक एक बड़ा तीर्थ है। इसके चारों ओर बियाबान जंगल है जिसके कारण जानवरों का डर सदा बना रहता है। यहाँ पछुआ हवा जोर से चलती रहती है। जाड़े के दिनों में ठंडक बहुत रहती है। लगभग 3000 फुट से भी अधिक ऊंचाई पर होने के कारण गर्मी के दिनों में बड़ा आनंद रहता है। यहां पर पर्वत बहुत ही रमणीय है। जड़ी बूटियों और फूल फलों का भण्डार है। आसपास बने हुए मंदिरों में दो नर्मदा के, दो गौरी शंकर के, एक श्रीरामचंद्र का, एक मुरली मनोहर का और अनेक दूसरे देवी-देवताओं के हैं। अमरकण्टक में हर साल महाशिवरात्रि पर मेला लगता है। उस समय हजारों यात्री आते हैं कुण्ड में स्नान करते हैं और शंकर की तथा नर्मदा की पूजा करते हैं। यहीं से नर्मदा की पावन यात्रा प्रारंभ होती है। नर्मदा का पहला पड़ाव मंडला है, जो अमरकंटक से लगभग 295 किमी की दूरी पर नर्मदा के उत्तरी तट पर बसा है। सुंदर घाटों और मंदिरों के कारण यहाँ पर स्थित सहस्त्रधारा का दृश्य बहुत सुन्दर है। कहते हैं कि राजा सहस्त्रबाहु ने यहीं अपनी हजार भुजाओं से नर्मदा के प्रवाह को रोकने का प्रयत्न किया था इसीलिए इसका नाम 'सहस्त्रधारा' है।

मण्डला के बाद दूसरा सुन्दर स्थान है भेड़ा-घाट। यह जबलपुर से 19 कि. मी. पर है। कहते हैं कि किसी जमाने में भृगु ऋषि ने यहां पर तप किया था। उत्तर की ओर से वामन गंगा नाम की एक छोटी नदी नर्मदा में मिलती है। इस संगम, 'भेड़ा' के कारण ही इस स्थान को भेड़ा घाट कहते हैं। भेड़ा-घाट से थोड़ी दूर पर नर्मदा का एक प्रपात है जिसे धुआंधार कहते हैं। यहां नर्मदा की धारा 40 फुट ऊपर से बड़ी तेजी से नीचे गिरती है। जल के कण दूर से धुएं के समान दिखते हैं। इसी से इसे धुआंधार कहते हैं। धुआंधार के बाद साढ़े तीन कि. मी. तक नर्मदा का प्रवाह सफेद संगमरमर की चट्रानों के बीच से गुजरता है। दोनों ओर सौ-सौ फुट से भी अधिक ऊंची सफेद दीवारें खड़ी हैं और इठलाती हुई नर्मदा उनके बीच से होकर निकलती है। चांदनी रात में यह दृश्य बड़ा ही आकर्षक लगता है। भेड़ा घाट में एक छोटी सी पहाड़ी पर गौरीशंकर मंदिर है। इसे चौसठ योगिनियों का मंदिर भी कहते हैं। इस पहाड़ी के दोनों ओर नर्मदा बहती है।

भेड़ा-घाट के बाद दूसरे मनोरम तीर्थ हैं- ब्राह्मण घाट, रामघाट, सूर्यकुंड और होशंगाबाद। इसमें होशंगाबाद प्रसिद्ध है। यहाँ पहले जो गाँव था, उसका नाम 'नर्मदापुर' था। इस गाँव को होशंगशाह ने नए सिरे से बसाया था। यहाँ सुंदर और पक्के घाट है, लेकिन होशंगाबाद के पूर्व के घाटों का ही धार्मिक महत्व है। होशंगाबाद के बाद नेमावर में नर्मदा विश्राम करती है। नेमावर में सिद्धेश्वर महादेव का महाभारत कालीन प्राचीन मंदिर है। नेमावर नर्मदा की यात्रा का बीच का पड़ाव है, इसलिए इसे 'नाभि स्थान' भी कहते हैं। यहाँ से भडूच और अमरकंटक दोनों ही समान दूरी पर है। पुराणों में इस स्थान का 'रेवाखंड' नाम से कई जगह महिमामंडन किया गया है। नेमावर और ॐकारेश्वर के बीच धायड़ी कुंड नर्मदा का सबसे बड़ा जल-प्रपात है। 50 फुट की ऊँचाई से यहाँ नर्मदा का जल एक कुंड में गिरता है। जल के साथ-साथ इस कुंड में छोटे-बड़े पत्थर भी गिरते रहते हैं, जो जलघर्षण के कारण सुंदर, गोल और चमकीले शिवलिंग बन जाते हैं। सारे देश में शिवलिंग अधिकतर यहीं से जाते हैं।

कहते हैं कि वराह कल्प में जब सारी पृथ्‍वी जल में मग्न हो गई थी तो उस वक्त भी मार्केंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता था। यह आश्रम नर्मदा के तट पर ॐकारेश्वर में है। ॐकारेश्वर में ज्योर्तिलिंग होने के कारण यह प्रसिद्ध प्राचीन हिंदू तीर्थ है। यह स्थल प्राकृतिक सौंदर्य, इतिहास और साधना की दृष्टि से रेवा तीर पर सबसे महान और पवित्र माना जाता है। यहां नर्मदा के बीच में एक विशाल ऊंची पहाड़ी है जिसके दोनों ओर से नर्मदा की धाराएं बहती हैं। यह द्वीप हिन्दू पवित्र चिन्ह ॐ के आकार में बना है। यहां दो मंदिर स्थित हैं- ॐकारेश्वर और अमरेश्वर। ॐकारेश्वर का निर्माण नर्मदा नदी से स्वतः ही हुआ है। माना जाता है कि जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ उस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। यहाँ पर मार्कण्डेय ऋषि का सुन्दर मन्दिर भी है। ॐकारेश्वर के आसपास दोनों तीरों पर बड़ा घना वन है, जिसे 'सीता वन' कहते हैं। वाल्मीकि ऋषि का आश्रम यहीं था। ॐकारेश्वर और अमरेश्वर का यह पुण्य धाम जाने कितने योगियों और ऋषियों का सिद्ध क्षेत्र रहा है। इस द्वीप में और आसपास कहीं भी चले जाइये किसी न किसी महापुरुष या ऋषि का नाम उसके साथ जुड़ा हुआ मिलेगा। शंकराचार्य, उनके गुरु गोविन्द पादाचार्य और उनके भी गुरु गौड पादाचार्य यहीं रहे थे। उनके बाद भी आज तक यह सिद्धों और तपस्वियों का आश्रम स्थान रहा है। ॐकारेश्वर में वर्ष में दो बार बड़े मेले लगते हैं कार्तिकी पूर्णिमा पर और महाशिवरात्रि पर।

ॐकारेश्वर से महेश्वर 65 कि.मी. है। महेश्वर से पहले नर्मदा के उत्तर तट पर एक स्थान है मंडलेश्वर। अनेक विद्धानों का मत है कि मंडन मिश्र का असली स्थान यही है और महेश्वर प्राचीन माहिष्मती है। मण्डलेश्वर से महेश्वर लगभग 8 कि.मी. है। संभव है माहिष्मती का फैलाव पुराने जमाने में यहां तक रहा हो। शंकराचार्य अपनी यात्रा में जिस रास्ते से आये उसका वर्णन 'शांकर-दिग्विजय’ में है। यह वर्णन महेश्वर और मण्डलेश्वर की स्थिति से और आसपास के प्रदेश से मिलता है। मण्डलेश्वर में एक पुराना मन्दिर है, जिसमें मण्डन मिश्र, भारती और शंकराचार्य की मूर्तियां हैं, परन्तु इनके नाम दूसरे हैं। भारती का नाम ‘सरस्वती’ है और जिसे शंकराचार्य की मूर्ति बताया जाता है, उसे वहां ‘कार्तिकेय स्वामी’ कहा जाता है परन्तु ये दोनों कार्तिकेय स्वामी और सरस्वती शंकर के मन्दिर में कहीं नहीं देखे गये। इससे साफ है कि वास्तव में यह मण्डन मिश्र का ही स्थान है। मन्दिर का वर्णन भी ‘शांकर-दिग्विजय’ के वर्णन से मिलता जुलता है।

इन्दुमती के स्वयंवर के लिए आये हुए अनेक राजाओं में अनूप देश के राजा, माहिष्मती के अधिपति का उल्लेख कालिदास ने ‘रघुवंश’ में किया है। उसमें इन्दुमती की सखी सुनन्दा कहती है, अपने महल की खिड़की में बैठकर रेवा को देखने का आनंद उठाना हो तो अनूप देश के इस सकल गुणों से विभूषित नरेश को वर लो। महेश्वर से यह वर्णन पूरी तरह मिलता है। आधुनिक इतिहास में भी महेश्वर का अपना स्थान है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर की राजधानी महेश्वर थी। उनके समय से लेकर अब तक यह वस्त्र-कला का एक सुन्दर केन्द्र रहा है। महेश्वर में किला, मन्दिर, अहिल्याबाई का महल, उनकी छत्री और घाट देखने योग्य हैं। घाटों को देखकर तो काशी की याद आ जाती है। सन 1948 में महात्मा गांधी की अस्थियाँ यहाँ नर्मदा में विसर्जित की गई थीं। महेश्वर के सामने नर्मदा के उस पार एक छोटा सा गांव है जिसे ‘वायु पुराण’ में स्वर्ग-द्वीप तीर्थ कहा गया है। यहां शालिवाहन का मन्दिर है। यह कहा जाता है कि दक्षिण के शालिवाहन या सातवाहन राजाओं ने मिट्टी में से सिपाही पैदा करके यवनों को नर्मदा पार खदेड़ दिया था। महेश्वर से 19 किमी. पर खलघाट है। बम्बई-आगरा सड़क यहीं से नर्मदा को एक पुल पर से होकर पार करती है। इस स्थान को 'कपिला तीर्थ' कहते हैं। कपिला तीर्थ से 12 किमी पश्चिम में धर्मपुरी के पास महर्षि दधीचि का आश्रम बताया गया है। स्कंद-पुराण और वायु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। धर्मपुरी के बाद कुश ऋषि की तपोभूति शुक्लेश्वर है।

शुक्लेश्वर से लगभग पाँच किलोमीटर बड़वानी के पास सतपुड़ा की घनी पहाड़ियों में 'बावन गजा' में भगवान पार्श्वनाथ की 84 फुट ऊँची मूर्ति है। यह एक जैन तीर्थ है। बावन गजा की पहाड़ी के ऊपर एक मन्दिर भी है। हिन्दुजन इसे दत्तात्रेय की पादुका कहते हैं। जैन इसे मेघनाद और कुंभकर्ण की तपोभूमि मानते हैं। इधर के शिखरों में यह सतपुड़ा का शायद सबसे ऊंचा शिखर है और जब आसमान साफ होता है तो माण्डव यहां से दिखाई देता है। कुछ किलोमीटर पश्चिम में बढ़ने पर हापेश्वर की शोभा देखते ही बनती है। पहाड़ी पर शंकर का एक भव्य और सुन्दर मन्दिर है, जहां से आसपास का दृश्य बड़ा ही मनोहारी लगता है। यहां पर वरुण ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। इस सारे प्रदेश में बड़े-बड़े और दुर्गम वन हैं। हापेश्वर के बाद उल्लेखनीय तीर्थ है - शूलपाणी। यहाँ शूलपाणी का बहुत प्राचीन मन्दिर है। कमलेश्वर, राजराजेश्वर आदि और भी कई मन्दिर हैं। गरुड़ेश्वर में भगवान दत्तात्रेय के मन्दिर है। शुक्रतीर्थ, अकतेश्व, कर्नाली, चांदोद, शुकेश्वर, व्यासतीर्थ होते हुए हम अनुसूयामाई पहुंचते हैं, जहां अत्रि-ऋषि की आज्ञा से देवी श्री अनुसूयाजी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तप किया था और उससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवताओं ने यहीं दत्तात्रेय के रुप में उनका पुत्र होना स्वीकार कर जन्म ग्रहण किया था। कंजेठा में शकुन्तला-पुत्र महाराज भरत ने अनेक यज्ञ किये। सीनोर में ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अनेक पवित्र स्थान हैं।

सीनोर के बाद भड़ोंच तक कई छोटे-बड़े गांव, तीर्थ और तपश्चर्या के स्थान हैं। अंगारेश्वर में मंगल ने तप करके अंगारेश्वर की स्थापना की थी। निकोरा में पृथ्वी का उद्धार करने के बाद वराह भगवान ने इस तीर्थ की स्थापना की। लाडवां में कुसुमेश्वर तीर्थ है। मंगलेश्वर में कश्यप कुल में पैदा हुए भार्गव ऋषि ने तप किया था। शुक्रतीर्थ में नर्मदा के बीच टापू में एक विशाल बरगद का पेड़ है। शायद यह संसार में सबसे बड़ा वट-वृक्ष है। यहां महात्मा कबीर ने कुछ समय तक निवास किया था। इसलिए इसे ‘कबीर-वट’ कहते हैं। यह इतना विशाल है कि इसके नीचे हजारों आदमी विश्राम कर सकते हैं। इसके बाद कुछ मील चलकर नर्मदा भडूच पहुँचती हैं, जहाँ नर्मदा समुद्र में मिल जाती है। भडूच को 'भृगु-कच्छ' अथवा 'भृगु-तीर्थ' भी कहते हैं। यहाँ भृगु ऋषि का निवास था। यहीं राजा बलि ने दस अश्वमेध-यज्ञ किए थे। भडूच के सामने के तीर पर समुद्र के निकट विमलेश्वर नामक स्थान है। भारत की नदियों में नर्मदा का अपना महत्व है। न जाने कितनी भूमि को उसने हरा-भरा बनाया है और उसके किनारे पर बने तीर्थ न जाने कब से अनगिनत नर-नारियों को प्ररेणा देते रहे हैं और आगे भी देते रहेंगे।

Hindi Title

रेवा/नर्मदा


विकिपीडिया से (Meaning from Wikipedia)




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