अग्निदेवता

Submitted by Hindi on Wed, 07/27/2011 - 13:09
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अग्निदेवता संसार के मान्य धर्मों में अग्नि की उपासना प्रतिष्ठित देवता के रूप में अत्यंत प्राचीन काल से प्रचलित है। यूनान तथा रोम में भी अग्नि की पूजा राष्ट्रदेवी के रूप में होती थी। रोम में अग्नि वेस्ता देवी के रूप में उपासना का विषय थी। उसकी प्रतिकृति नहीं बनाई जाती थी, क्योंकि रोमन कवि ओविद के कथनानुसार अग्नि इतना सूक्ष्म तथा उदात्त देवता है कि उसकी प्रतिकृति के द्वारा कथमपि बाह्य अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती थी। पवित्र मंदिर में अग्नि सदा प्रज्वलित रखी जाती थी और उसकी उपासना का अधिकार पावन चरित श्वेतांगो कुमारियों की ही था। जरथुस्त्री धर्म में भी अग्नि का पूजन प्रत्येक ईरानी आर्य का मुख्य कर्तव्य था। अवेस्ता में अग्नि दृढ़ तथा विकसित अनुष्ठान का मुख्य केंद्र थी और अग्निपूजक ऋत्विज्‌ अ्थ्रावन्‌ वैदिक अथर्वण के समान उस धर्म में श्रद्धा और प्रतिष्ठा के पात्र थे। अवेस्ता में अग्निपूजा के प्रकार तथा प्रयुक्त मंत्रों का रूप ऋग्वेद से बहुत अधिक साम्य रखता है। पारसी धर्म में अग्नि इतना पवित्र, विशुद्ध तथा उदात्त देवता माना जाता है कि कोई अशुद्ध वस्तु अग्नि में नहीं डाली जाती। इस प्रकार वैदिक आर्यों के समान पारसी लोग शवदाह के लिए अग्नि का उपयोग नहीं करते, मरी हुई अशुद्ध वस्तु को वे अग्नि में डालने की कल्पना तक नहीं कर सकते। अवेस्ता में अग्नि पाँच प्रकार का माना जाता है।

परंतु अग्नि की जितनी उदात्त तथा विशद कल्पना भारतीय वैदिक धर्म में है उतनी अन्यत्र नहीं है। वैदिक कर्मकांड का श्रोत भाग और गृह्य का मुख्य केंद्र अग्निपूजन ही है। वैदिक देवमंडल में इंद्र के अनंतर अग्नि का ही दूसरा स्थान है जिसकी स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में वर्णित है। अग्नि के वर्णन में उसका पार्थिव रूप ज्वाला, प्रकाश आदि वैदिक ऋषियों के सामने सदा विद्यमान रहता है। अग्नि की तुलना अनेक पशुओं से की गई है। प्रज्वलित अग्नि गर्जनशील वृषभ के समान है। उसकी ज्वाला सौर किरणों के तुल्य, उषा की प्रभा तथा विद्युत की चमक के समान है। उसकी आवाज आकाश के गर्जन जैसी गंभीर है। अग्नि के लिए विशेष गुणों को लक्ष्य कर अनेक अभिधान प्रयुक्त किए जाते हैं। अग्नि शब्द का संबंध लातीनी इग्निस्‌ और लिथुएनियाई उग्निस्‌ के साथ कुछ अनिश्चित सा है, यद्यपि प्रेरणार्थक अज्‌ धातु के साथ भाषा शास्त्रीय दृष्टि से असंभव नहीं है। प्रज्वलित होने पर धूमशिखा के निकलने के कारण धूमकेतु इस विशिष्टता का द्योतक एक प्रख्यात अभिधान है। अग्नि का ज्ञान सवातिशायी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह जातिवेदी के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र और कभी द्यो का सूनु (पुत्र) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है जिनके स्थान हैं स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल; स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी। अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुल निर्देश वेद में उपलब्ध होता है। अग्नि के दो जन्मों का भी उल्लेख मिलता है भूमि तथा स्वर्ग।

अग्नि के आनयन की एक प्रख्यात वैदिक कथा ग्रीक कहानी से साम्य रखती है। अग्नि का जन्म स्वर्ग में ही मुख्यत हुआ जहाँ से मातरिश्वा ने मनुष्यों के कल्याणार्थ उसका इस भूतल पर आनयन किया। अग्नि प्रसंगत अन्य समस्त वैदिक देवों में प्रमुख माना गया है। अग्नि का पूजन भारतीय आर्य संस्कृति का प्रमुख चिन्ह हैं और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि गृह्य, गृहपति (घर का स्वामी) तथा विश्पति (जन का रक्षक) कहलाता है। शंतपथ ब्राह्मण (14।1।10) में गौतम राहूगण तथा विदेध माथव के नेतृत्व में अग्नि का सारस्वत मंडल से पूरब की ओर जाने का वर्णन मिलती है। इसका तात्पर्य यह है कि जो आय संस्कृति संहिता काल में सरस्वती के तारस्थ प्रदेशों तक सीमित रही, वह ब्राह्मण युग में पूरवी प्रांतों में भी फैल गई। इस प्रकार अग्नि की उपासना वैदिक धर्म का नितांत आवश्यक अंग है। पुराणों में अग्नि के उदय तथा कार्य विषयक अनेक कथाएँ मिलती है। अग्नि की स्त्री का नाम स्वाहा है तथा उसके तीन पुत्रों के नाम पावक, पवमान और शुचि हैं। अश्वमेध, वाजपेय आदि श्रुति योग में गाहपत्य, आहवनाय और दक्षिण नामक तीन श्रोताग्नियों का आधान होता है। इन अग्नियों में अधिश्रयण, प्रतपन, हविश्रवण आदि यज्ञक्रियाएँ संपन्न की जाती हैं। इनका विस्तृत विवरण कात्यायन श्रोत सूत्र में हैं।

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संदर्भ
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