अजगर

Submitted by Hindi on Wed, 07/27/2011 - 13:20
अजगर (पाइथॉन) एक साँप है जो बहुत बड़ा होता है और गर्म देशों में पाया जाता है। प्राचीन यूनानी ग्रंथों में एक विशालकाय साँप का उल्लेख मिलता है जिसका वध अपोलो (यवन सूर्य देवता) ने डेल्फ़ी में किया था। आधुनिकप्राणिविज्ञान में यह साँप बोइडी वंश एवं पाइथॉनिनी उपवंश के अंतर्गत परिगणित होता है। इसकी विभिन्न जातियाँ पुरातन जगत्‌ के समस्त उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में पाई जाती हैं। सर्पों के इस वर्ग में कुछ तो तीस फुट या इससे भी अधिक लंबे मिलते हैं। अधिकांश अजगर वृक्षों पर रहते हैं, परंतु कुछ जल के आसपास पाए जाते हैं, जहाँ वे जल में डूबे या उतराए पड़े रहते हैं।

अजगरों में पश्चपादों के अवशेष मिलते हैं। इनकी श्रोणिमेखला (पेलविक गर्डिल) की संरचना जटिल होती है तथा वह कछुओं की श्रोणि मेखला के समान पसलियों के भीतर एक विचित्र स्थिति में रहती है। पश्चपाद एक छोटी हड्डी के रूप में दिखाई पड़ता है जिसे उरु-अस्थि कहते हैं। पश्चपाद के बाहरी भाग, उरु-अस्थि के अंत में स्थित एक या दो अस्थि ग्रंथिकाओं एवं अवस्कर (क्लोएका) के दोनों ओर शल्क (स्केल) से बाहर निकले हुए नखर (क्लॉ) के रूप में, दिखाई पड़ते हैं। ये नखर लैंगिक भिन्नता के भी सूचक हैं, क्योंकि नर में मादा की अपेक्षा ये अधिक बड़े होते हैं। ये पर्याप्त चलिष्ण होते हैं और ऐसा विश्वास किया जाता है कि मैथुन के समय ये मादा को उत्तेजित करते हैं।

अजगर पेड़ों पर चुपचाप पड़ा रहता है और शिकार के पास आते ही उस पर कद पड़ता है तथा गला घोंटकर उसे निगल जाता है।

समस्त पृष्ठवंशी प्राणियों में कशेरुकों (वर्टिब्रे) की सर्वाधिक संख्या अजगरों में ही पाई जाती है; यहाँ तक कि एक जाति के अजगर में तो इनकी संख्या 435 तक बताई गई हैं। इनके जबड़ों के पार्श्ववर्ती शल्कों में संवेदन कोशों (सेंसरी पिट्स) की श्रृंखला रहती है। ये कोश तापग्राही माने जाते हैं, क्योंकि रात के समय उष्ण रुधिर वाले जंतुओं पर प्रहार करने में ये सहायक होते हैं। अजगर विषरहित होते हैं। अपने शिकार पर वे वृक्षों पर से गिरकर उसे अपने शरीर के एक या अधिक कुंडलों से जकड़ लेते हैं और फिर अपनी सशक्त मांसपेशियों की दाब डालकर उसे कसना आरंभ कर देते हैं तथा साथ-साथ सिर का प्रहार भी करते जाते हैं। परिणाम यह होता है कि शिकार श्वासरोध से मर जाता है। उसे निगलते समय इसके मुँह से बहुत सी लार निकलती है। अपना मुख काफी फैला सकने के कारण ये शिकार को समूचा ही निगल जाते हैं, परंतु मुख का फैलाव इतना नहीं होता कि सामान्य सुअर से अधिक बड़े जंतु समूचे निगले जा सकें।

दोनों नखरों की स्थिति तीरों से बताई गई है। पेड़ों पर चढ़ने में ये नखर अजगर को सहायता पहुँचाते हैं।

ये अपने अंडों की देखभाल बहुत सावधानी से करते हैं। मादा अजगर एक समय में सौ या इससे अधिक अंडे देती है और बड़ी सावधानी से उनकी रक्षा करती है। वह उनके चारों ओर कुंडली मारकर बैठ जाती है तथा उन्हें सेती रहती है। यह क्रिया कभी-कभी चार महीने या इससे भी अधिक समय तक चलती रहती है जिसके मध्य इसके शरीर का ताप सामान्य ताप से कई अंश अधिक हो जाता है।

इसकी सबसे बड़ी जाति मलय प्रदेश में पाई जाती है जिसे जालवत्‌ अजगर (पाइथन रेटिक्युलेटस) कहते हैं। यह अजगर कभी-कभी तैंतीस फुट से भी अधिक लंबा और लगभग सवा दो मन तक भारी होता है। अपने देश में पाया जाने वाला अजगर (पाइथन मोलूरस) तीस फुट तक लंबा होता है। अफ्रीका महाद्वीप का चट्टानी अजगर (पा. स्पाइलोटिस) बीस फुट लंबा होता है। अजगर की दो जातियाँ अमरीका में भी मिलती हैं, किंतु केवल पश्चिमी मेक्सिको में ही। इतिहास में एक पचहत्तर फुट लंबे रोमन तथा दो सौ फुट लंबे ट्यूनीशियाई अजगरों का उल्लेख मिलता है जो केवल दंतकथाओं पर ही आधारित प्रतीत होता है।

अजगर के दाँतों में विष नहीं होता
अजगर कुछ छोटे जानवरों की अत्यधिक वृद्धि रोकने में उपयोगी सिद्ध होते हैं। पकड़कर बंदी बनाए जाने पर वे कभी-कभी आहार का त्याग भी करते देखे गए हैं। इनका सामान्य जीवनमान लगभग 23 वर्ष का होता है।

भारतीय अजगर भूरे रंग का होता है और इसकी देह पर गहरे धूसर सीमांत वाले तिर्यगागत (बर्फीनुमा) चकत्ते बने होते हैं। सिर पर बर्छी की आकृति का एक भूरा चिह्न होता है तथा शीर्ष के पार्श्वों पर धीरे-धीरे सँकरी होती हुई गुलाबी भूरी पट्टियाँ होती हैं जो नेत्रों के आगे तक भी पहुँच जाती हैं। अजगर का निचला भाग पीले और भूरे धब्बों से युक्त हलके धूसर रंग का होता है।

अजगर भारत का सबसे बड़ा मोटा साँप है। यह वजन में 250 पौंड तक का पाया गया है। भारतीय अजगर की अधिकतम लंबाई 7,000 मि. मी. तक और स्थूलतम स्थान पर मोटाई 900 मि. मी. तक पाई गई है।

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