अजमेर

Submitted by Hindi on Wed, 07/27/2011 - 13:29
अजमेर राजस्थान के अजमेर जिले का मुख्य नगर है, जो अरावली पर्वत श्रेणी की तारागढ़ पहाड़ी की ढाल पर स्थित है। यह नगर 145 ई. में अजयपाल नामक एक चौहान राजा द्वारा बसाया गया था जिसने चौहान वंश की स्थापना की। सन्‌ 1365 में मेवाड़ के शासक, 1556 में अकबर और 1770 से 1880 तक मेवाड़ तथा मारवाड़ के अनेक शासकों द्वारा शासित होकर अंत में 1881 में यह अंग्रेजों के आधिपत्य में चला गया।

नगर के उत्तर में अनासागर तथा कुछ आगे फ्वायसागर नामक कृत्रिम झीलें हैं। मुख्य आकर्षक वस्तु प्रसिद्ध मुसलमान फकीर मुइनुद्दीन चिश्ती का मकबरा है जो तारागढ़ पहाड़ी की तलहटी में बना है। यह लोगों में दरगाह के नाम से प्रसिद्ध है। एक प्राचीन जैन मंदिर, जो 1200 ई. में मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था, तारागढ़ पहाड़ी की निचली ढाल पर स्थित है। इसके खंडहर अब भी प्राची हिंदू कला की प्रगति का स्मरण दिलाते हैं। इसमें कुल 40 स्तंभ हैं और सब में नए-नए प्रकार की नक्काशी है; कोई भी दो स्तंभ नक्काशी में समान नहीं हैं। तारागढ़ पहाड़ी की चोटी पर एक दुर्ग भी है।

इसका आधुनिक नगर एक प्रसिद्ध रेलवे केंद्र भी है। यहाँ पर नमक का व्यापार होता है जो साँभर झील से लाया जाता है। यहाँ खाद्य, वस्त्र तथा रेलवे के कारखाने हैं। तेल तैयार करना भी यहाँ का एक प्रमुख व्यापार है।

अजमेर मेरवाड़ा राजस्थान का एक छोटा जिला था जो ब्रिटिश राज्य के अंतर्गत था। वस्तुत अजमेर और मेरवाड़ा अलग-अलग थे और उनके बीच कुछ देशी राज्य पड़ते थे, 1 नवंबर, 1956 को यह भारत में मिला लिया गया। यह अजमेर तथा मेरवाड़ा (क्षेत्रफल 2.599 वर्ग मील) दो जिलों को मिलाकर बना था। अरावली पर्वत श्रेणी यहाँ की मुख्य भौगोलिक विशेषताएँ हैं, जो अजमेर तथा नासिराबाद के बीच फैली हुई प्रमुख जल विभाजक है। इसके एक ओर होने वाली वर्षा चंबल नदी में होकर बंगाल की खाड़ी में तथा दूसरी ओर लूनी नदी से होकर अरब सागर में चली जाती है। अजमेर एक मैदानी भाग तथा मेरवाड़ा पहाड़ियों का समूह है। यहाँ की जलवायु स्वास्थ्यप्रद है। गरमी में बहुत गरमी तथा शुष्कता एवं जाड़े में बहुत ठंड रहती है। अधिकतम ताप 37.7सेंटीग्रेड तथा न्यूनतम 4.4 सेंटीग्रेड है। वर्षा साल भर में लगभग 20” होती है। यहाँ की भूमि में चट्टानों की तहें पाई जाती हैं। उपजाऊ भूमि तालाबों के किनारे मिलती है। यहाँ की मुख्य फसलें ज्वार, बाजरा, कपास, मक्का (भुट्टा), जौ, गेहूँ तथा तेलहन हैं। कृत्रिम तालाबों से सिंचाई काफी मात्रा में होती है। अभी तक हिंदुओं में राजपूत यहाँ के भूमिस्वामी तथा जाट और गुजर कृषक थे। जैन यहाँ के व्यापारी तथा महाजन हैं। रुई तैयार करने के कई कारखाने यहाँ हैं। बीवर और केकरी यहाँ के मुख्य व्यापारिक केंद्र हैं।

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