जोहिला के गहनों पर किसकी नजर

Submitted by Hindi on Sat, 11/28/2009 - 16:03
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बाला सिंह तेकाम
जोहिला नदीजोहिला नदीजोहिला, सोन संगम पर स्थित दशरथ घाट की धुधंली सी स्मृति मानस में अभी भी अंकित है। बात काफी पुरानी है, तब मैं दोस्तों के साथ दशरथ घाट का मेला देखने गया था और उस स्थान की विशेषता को नहीं जिसकी वजह से जहां मेला भरा होता है। अमृता प्रीतम की कविता की भाषा में कहना हो तो-‘‘मुझे वह समय याद है-जब धूप का एक टुकड़ा सूरज की उंगली थाम कर अंधेरे का मेला देखता, उस भीड़ में कहीं खो गया.....’’ लेकिन सरसरी अवलोकन में जोहिला-सोन संगम, जिसे दशरथ घाट कहा जाता है, उसके सौंदर्य की जो छाप मन में बैठी थी वहीं मुझे दुबारा खींच ले गई।

नर्मदा जी के गहने जिन्हें जोहिला ने पहन रखे हैं और जो काले सख्त पत्थरों में बदल गये हैं, पर हैं तो वे गहने ही और वे आज भी जोहिला को सोंदर्य और सौभाग्यशाली बनाये हुए हैं। तटवासी उसके सौंदर्य को जीभर कर निहारते हैं, उसके गहनों की खनक सुनते और मुग्ध होकर गाते हैं। बारिश के दिनों में जब जोहिला अपने शबाब पर होती है, तो वह अपने पायल की रुन-झुन भूल कर सीटी बजाती और नगाड़े ठोंकती भैरवी गाती चलती है। किन्तु अब पत्थर के कारोबारियों की नजर जोहिला के गहनों पर लग गई है। जगह-जगह से जोहिला के गहने उसके तन से अलग किये जा रहे हें। परिवहन कर क्रेशरों से पीसे जा रहे हैं। उसके (दोनों तरफ से) पाट खोदे जा रहे हैं। पत्थर, मुरुम व मिट्टी के लिए जोहिला की परिस्थिति को तहस-नहस किया जा रहा है। यह अपने रूप में कहीं हैं तो संगम क्षेत्र में जिसे दशरथ घाट कहा जाता है।सरकारी सेवा में रहते हुए कई बार संगम के सिराने पर स्थित खिचकिड़ी गांव तक जाने का अवसर आया पर दशरथ घाट तक जाना नहीं हो सका था। किन्तु आज तो बस ठान ही लिया था कि किसी भी कीमत पर दशरथ घाट पहुंचना है। यह समूचा इलाका मेरे कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत है। आज मै अपने दो इंजीनियर दोस्तों के साथ जोहिला-सोन संगम को लक्ष्य करके निकला। हम लोग सायं 5 बजे के आस-पास केल्हारी गांव पहुंचे, रास्ते में खेल रहे बच्चों में से दो जानकार बच्चों को गाड़ी में बिठाया, वे हमें संगम (दशरथ घाट) तक ले गये।

जोहिला-सोन संगम इस क्षेत्र के हजारों लोगों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना लाखों लोगों के लिए नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक है। दशरथ घाट पर लोग सिर्फ मकरसंक्रांति पर्व पर आते हैं। लेकिन किस्से-कहानियों में जोहिला-सोन को अपने अन्दर काल-कालांतर से समेटे हुए हैं। आज समूचा प्रदेश सूखे की चपेट में बारिश नहीं होने से सोन का चैड़ा घाट सिकुड़ा-सिमटा तो जोहिला बिल्कुल कमजोर दिखाई दे रही है। यद्यपि हमारे साथ चैरी गांव से आये शिक्षक राम सिंह परस्ते संगम-मझधार से तकरीबन 40 फिट ऊंचे टीले को ठोंक कर कह रहे थे कि बाढ़ यहां तक चढ़ती है।

हमने भूगोल में पढ़ा है कि कैसे संगम में एक नदी-दूसरी नदी की बाढ़ को रोकती है और ठहरा पानी नदी का पारंपरिक बहाव छोड़कर रास्ता बदल लेता है। लेकिन ऐसी स्थिति मैदानी भागों में होती है। यह पहाड़ी इलाका है यहां गहरी खाई बनाते हुए दोनों नदियां बहती हैं। जोहिला तो अधिकांश जगहों पर खतरनाक ढंग से संकरी खाई बनाते हुए बहती है। जोहिला बड़ी नदी के रूप में सबसे अधिक रोमांचकारी नदी है। मैने जोहिला नदी को पुष्पराजगढ़ अमरकंटक में कई जगह देखा है, जोहिला का पानी पिया है, जोहिला में नहाया है और जोहिला में बहते-बहते मोवा घांस के सहारे बचा हूं।

जोहिला नदी में बहने के कारण ही सही मायने में मोवा घांस के प्रति मैं कृतज्ञ हो सका। यद्यपि इसके पहले मोवा के अस्तित्व और महत्व का ध्यान मेरे मन में नहीं था। मोवा इतनी ताकतवर होती है कि इसे घास कहना इसकी तौहीन जान पड़ती है। मोवे के ऊपरी हिस्से से रस्सी बनाई जाती है जिसे सूमा भी कहा जाता है, जो विशेष रूप से चार पाई गूथने, गाय, बैल, भैंस व बकरी बांधने के काम में लायी जाती है। मोवा घांस इतनी मजबूत होती है कि उसे पकड़ कर हाथी भी तेज धार वाली नदी को पार कर सकता है, पार कर लेता है।

पुष्पराजगढ़ में मोवा बहुतायत में पायी जाती है और एक तरह से जोहिला को ढके रहती है। जोहिला पुष्पराजगढ़ के ओर से छोर तक अमरकंटक के जालेश्वर भुंडाकोना से लेकर उमरिया जिले की ओर बहती है। अमरकंटक में उत्तर पूर्व में स्थित भुंडाकोना पहाड़ से जोहिला उत्तर की ओर नीचे उतरती है, जहां पोडकी गांव के पास उसे रोक कर जोहिला जलाशय बनाया गया है जिससे पोंडी गांव में स्थित शासकीय कृषि फार्म में सिंचाई की जाती है। कृषि फार्म पोंड़ी के आगे जोहिला ताली व डोनिया गांव से बहते हुए राजेन्द्रग्राम पहुंचती है यहां पर उसका विस्तार दिखाई देता है, राजेन्द्रग्राम से आगे उमरिया जिले की ओर करौंदा, जुहिली विचारपुर अमगंवा, पुष्पराजगढ़ एवं मैकल पर्वत श्रेणियों से गजरते हुए उमरिया जिले के मछेहा गांव में उतरती है। यहीं से सुन्दरदादर, लखनपुरा, कुरकुचा एवं मंगठार गांव तक बमुश्किल 6 कि.मी. दूरी तय करती है। जहां पर मंगठार के समीप उस पर विशाल जलाशय बना कर संजय गांधी सुपर थर्मल पावर बिरसिंहपुर की स्थापना की गई है। मंगठार गांव के नीचे जोहिला की एक तरफ बिरसिंहपुर तो दूसरी तरफ नौरोजाबाद कालरी है। जोहिला के इस कछार में कोयला की अधिकता होने के कारण एस.ई.सी.एल. ने जोहिला क्षेत्र गठित कर यहां पर महा प्रबंधक कार्यालय ही स्थापना की है और जोहिला नदी को अहमियत दी है। कालरी क्षेत्र से निकल कर बरबसपुर, सलैया, डोडगवां, चेचरिया, मकरा गांव होते हुए जोहिला केल्हारी गांव पहुंच कर सोन से मिल जाती है।

इस तरह अमरकंटक के भुंडाकोना से उमरिया जिले के केल्हारी गांव तक लगभग 100 कि.मी. दूरी तय कर जोहिला अन्ततः अपने प्रेमी से एकाकार हो जाती है। अमरकंटक से निकलने वाली नदियों में नर्मदा, सोन व जोहिला का पौराणिक महत्व और लोक मानस इनके संबंध में प्रचलित लोक-गाथा से भरा पड़ा है। जिनमें नर्मदा जी को मिले महत्व तथा सोन और जोहिला को मिली उपेक्षा के कारणों का उल्लेख करती कई रोचक कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है सोन एक आकर्षक युवक था जिसके साथ युवती नर्मदा का विवाह तय हुआ था। विवाह के एन वक्त पहले जोहिला-नर्मदा के सारे गहने पहन कर अलग रास्ते से भागी और सोन अलग रास्ते से भागा। आगे मिलकर दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया। नर्मदा का विवाह सोन से नहीं हो सका फलतः कुपित होकर उसने जोहिला को यह श्राप दे दिया कि ‘‘उसके सारे गहने काले और भारी पत्थरों में बदल जायें। जिन्हें वह जीवन भर ढोती रहे और सांवली हो जाये।’’ श्राप देकर नर्मदा उल्टी दिशा में खम्भात की ओर चल पड़ी। नर्मदा कुंवारी और पवित्र मानी जाती है लेकिन जोहिला श्रापित होने के बावजूद लोक मंगल से नहीं दिखती अपनी छोटी सी यात्रा में उसने तटवासियों के प्रति बहुत उपकार किये हैं। जोहिला पर बने बांध से सिंचाई और बिजली, सिंचाई, विद्युत पावर हाऊस कालरियां और वन पर्यावरण इसी की देन है। जिनका लाभ दूर प्रांतरों तक मिलता है।

नर्मदा जी के गहने जिन्हें जोहिला ने पहन रखे हैं और जो काले सख्त पत्थरों में बदल गये हैं, पर हैं तो वे गहने ही और वे आज भी जोहिला को सोंदर्य और सौभाग्यशाली बनाये हुए हैं। तटवासी उसके सौंदर्य को जीभर कर निहारते हैं, उसके गहनों की खनक सुनते और मुग्ध होकर गाते हैं। बारिश के दिनों में जब जोहिला अपने शबाब पर होती है, तो वह अपने पायल की रुन-झुन भूल कर सीटी बजाती और नगाड़े ठोंकती भैरवी गाती चलती है। किन्तु अब पत्थर के कारोबारियों की नजर जोहिला के गहनों पर लग गई है। जगह-जगह से जोहिला के गहने उसके तन से अलग किये जा रहे हें। परिवहन कर क्रेशरों से पीसे जा रहे हैं। उसके (दोनों तरफ से) पाट खोदे जा रहे हैं। पत्थर, मुरुम व मिट्टी के लिए जोहिला की परिस्थिति को तहस-नहस किया जा रहा है। यह अपने रूप में कहीं हैं तो संगम क्षेत्र में जिसे दशरथ घाट कहा जाता है। यहां पर भगवान कार्तिकेय जी की मूर्ति विराजमान है जो शांत भाव से नदी के सौंदर्य को निहारती रहती है।

बाला सिंह तेकाम
स्टेशन रोड
विटनरी के सामने
उमरिया, जिला-उमरिया (म.प्र.)

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