रोजगार के नाम पर धोखा

Submitted by admin on Mon, 11/30/2009 - 10:12
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विमल भाई
5 दिसम्बर को फिर राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की बैठक होने वाली है। और उसमें रिपोर्ट देने के लिए ऊर्जा सचिव के साथ पर्यावरण एंव वन मंत्रालय के सचिव अपने पूरे अमले के साथ भागीरथी पर बंद पडे़ बांधो की समीक्षा करने वहां गये। 5 अक्तूबर 2009 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण ने उत्तराखंड में भागीरथी नदी पर निमार्णाधीन लोहारीनाग-पाला बांध पर दो महिने के लिए स्थगित किया था। दिल्ली में इस बैठक से पहले 3 अक्तूबर को ही नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन व कार्यदायी कंपनियों ने स्थानीय लोगों को काम से हटा दिया। जिन्हें हटाया गया उन्हें पैसा भी पूरा नही मिला जो मिला वो भी संघर्ष के बाद।

एनटीपीसी व कार्यदायी कंपनियों में स्थानियों को छोड़कर नये उनके अपने लोग अभी भी मौजूद हैं। इस सबके पीछे कोशिश यही है की रोजगार के मुद्दे पर स्थानीय लोगो को भ्रम में डाला जाये। इसके पीछे पूरी ठेकेदार लाबी और सरकारी तंत्र भी खड़ा दिखता है। जो बांध के विरोध के सारे गम्भीर मुद्दों को अस्थायी रोजगार के भ्रम में छुपा रहा है।

बांध रोजगार का एकमात्र विकल्प नहीं


बांध बंद होने से रोजगार छिन जायेगा, बेरोजगारी-भुखमरी फैल जायेगी ऐसी स्थिति दिखाकर बांध कम्पनियां कुछ संस्थाओं के द्वारा मात्र अपना हित साध रही है। क्या इससे पहले लोग भीख मांग कर खाते थे? क्या भुखमरी थी? और इस आवरण में तमाम दूसरे मुद्दे छुपाये जा रहे हैं। लोहारीनाग-पाला बांध के स्थगित होने पर जो बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न हुई है वो यदि बांध बनता तो पूरा होने पर भी यही होगा।

माटू जनसंगठन ने बांध निर्माण से पूर्व ही 2005 में लोहारीनाग-पाला व पाला-मनेरी बांध की पर्यावरण स्वीकृति को भी चुनौति दी थी। जिसके आदेशों का सरकार ने पालन नहीं किया। माटू जनसंगठन के प्रयास से फरवरी 2009 में एक स्वतंत्र जांच रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेजी गई। इस स्वतंत्र जांच से सिद्ध हुआ कि लोहारीनाग-पाला जल विद्युत परियोजना को दी गई कमजोर व नाममात्र की पर्यावरण स्वीकृति शर्तो का भी सीधा उलंघन हो रहा है। सरकार ने उस पर कार्यवाही क्यों नही की?

बांध से रोजगार कितना स्थायी है? रोजगार को बांध के संदर्भ में राज्य भर में देखा जा सकता है कि कितना रोजगार, कितनों को, कितने समय तक के लिए मिलता है? गंभीरता से इन प्रश्नों पर/तथ्यों पर विचार करना पड़ेगा। माटू जनसंगठन ने 2004 में स्थानीय लोगो के लिये 70 फीसदी स्थायी रोजगार का मुद्दा उठाया था। किसी भी परियोजना में 70 फीसदी स्थायी रोजगार, स्थानीयों को नही मिला। जो मिले है वो कोई स्थायी नहीं वरन चौथे दर्जे के हैं।

आज भी बन चुके बांधों के प्रभावितों से पूछा जा सकता है रोजगार कितना मिला था? कितना स्थायी था। पुराने टिहरी शहर के एक अध्ययन में यह बात आई थी कि 5 फीसदी परिवार के लोगों को भी रोजगार नहीं मिल पाया था। बांध का कार्य पूरा होने के बाद सैकडों की नौकरी छूट गई। यह बात हाल ही में लोहारीनाग-पाला बांध के स्थगन होने पर सामने दिखती है। उत्तराखण्ड जलविद्युत निगम ने मनेरी भाली चरण एक व दो में कितनों को स्थायी रोजगार दिया? कुछ सालों के बांध काम के बाद क्या? और इस बीच बांध काम के कारण किसी दूसरी नौकरी या रोजगार की उम्र भी निकल जाती है।

दूसरी तरफ बांधों के दुष्प्रभाव पीढ़ियों तक पहाड़वासी झेलेगें। रोजगार का प्रश्न गहरा है समयानुसार है। ‘‘बांध से रोजगार’’ की अल्पकालीन चीज दिखाकर हमारे पहाड़ के भविष्य पर कालिख पोतने की बात दिखती है। औद्योगिक प्रशिक्षण के व्यवस्था नहीं। हमने शुरू में ही मांग की थी कि राज्य भर में बांध तो बन रहे हैं किन्तु स्थानीय लोगों के औद्योगिक प्रशिक्षण के लिए किसी भी सरकार या किसी भी बांध कम्पनी ने प्रभावित क्षेत्र मे कोई व्यवस्था नही की। किसी भी बांध निर्माता एन.टी.पी.सी., उत्तराखंड जल-विद्युत निगम, टी.एच.डी.सी. आदि ने रोजगार को पुनर्वास की शर्त नही माना है। मात्र वरीयता पर रोजगार देने के लिए कहा है। जब कोई औद्योगिक प्रशिक्षण ही नहीं दिया तो क्या नौकरी मिलेगी मिलेगी? और वरीयता किसको मिलती है? रोजगार के लिए राज्य भर की परियोजनाओं मे धरने प्रदर्शन करने पर ही कुछ हो पा रहा हैं। ग्रामीण स्तर पर और कोई रोजगार का साधन बनाया ही नहीं गया। सरकारी स्तर पर बांधों को आगे बढ़ाने के लिए रोजगार का प्रश्न खड़ा करना एक चाल रही है। भागीरथी घाटी में तो खासकर कोई व्यवसायिक प्रशिक्षण संस्थान ही नहीं है।

सरकार और बांध निर्माता कम्पनियों की कुचेष्टायें


आज पूरे उत्तराखंड की स्थिति यह हो गई है कि विकास के नाम पर, ऊर्जा प्रदेश के नाम पर थोपी गई परियोजनायें ही लोगों को रोजगार व छोटे मोटे ठेके का साधन दिखती हैं। रोजगार का प्रश्न बड़ा है। पूरे उत्तराखण्ड में बेरोजगारी की मार है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन का बड़ा मुद्दा ही रोजगार था। किन्तु राज्य बनने के बाद अभी तक आई राज्य सरकारों ने ऐसी योजनाओं पर ध्यान नही दिया जो कि पहाड़ की जवानी और पानी को पहाड़ के लिए उपयोगी बनाये। आज भी खाली बंटे और सूखे खेत पानी को तरस रहे हैं। इस साल कई जगह लोग रोपाई भी नहीं कर सके। फिर ऐसे बांधों का क्या करना। जो सूखा पड़ने पर भी खेतों को नहीं सींच सकते हैं।

शिक्षा का स्तर भी अच्छा नही है फिर उच्च शिक्षा की बात तो और भी ऊंची है। उत्तराखण्ड़ में बन रही या प्रस्तावित जल-विद्युत परियोजनाओं में रोजगार की आशा देख युवा को थोड़े समय के अस्थायी असंगठित क्षेत्र के रोजगार पर ही भरोसा आया है। सरकार और बांध निर्माता कम्पनियों की यह कुचेष्टा रही है किः-

0 शिक्षा का स्तर प्राथमिक स्तर से ही निम्नस्तर का रखा जाये। क्योकि अच्छी पढाई वाले अच्छी नौकरी मांगेंगे।
0 बांध से जुड़ी व्यवसायिक शिक्षा भी नही दी जाये ताकि मामला सिर्फ ठेकेदारों (वे भी पहाड़ और प्रभावितों में से नहीं) के द्वारा कुछ रोजगार या छोटे ठेके देने तक सीमित रहा है। जब कुछ नही तो बांध में कोई भी रोजगार मिले यही उम्मीद शेष बचे।

हम मानते हैं- पहाड़ का विकास यहां के संसाधनों को यही के लिए गुणात्मक रूप से इस्तेमाल करके हो सकेगा। बांधों से निर्माण के समय कुछ रोजगार मिलता है। बड़े ठेकेदारे को अवश्य फायदा मिलता है। उनके बच्चे भी बाहर उच्चशिक्षा आराम से पाते है किन्तु सामान्य युवा कितनी मुश्किल में बाहर जाकर शिक्षा/नौकरी ले पाता है इसे युवा बेहतर जानते है। हमारा मानना है है-रोजगार मूलभूत प्रश्न है। लोहारीनाग-पाला बांध प्रभावित क्षेत्र उजड़ा किन्तु अन्य कोई रोजगार के साधन ना हो के सिर्फ बांध सामने दिखाया गया इसीलिए युवा बेचैन हैं। हम युवाओं के साथ है। किन्तु रोजगार का उŸार बांध नही है। बांध की अस्थायी नौकरी में जो समय जायेगा वो अन्य स्थायी रोजगारों के लिए उम्र से ऊपर हो जायेगा। बांध के दुष्प्रभावो को, सरकारी कमियांे को रोजगार की बात से नही छुपाया जा सकता।

उत्तराखण्ड में स्थायी रोजगार की व्यवस्था हो सके, इसलिए हमारा कहना है, मानना है और सक्षम मंत्रालयों से मांग है किः-

0 ऐसे बांधो से बेहतर घराटों को उच्चीकृत किया जाये जिनसे ग्रामीणों को स्थायी रोजगार/खेतो को पानी/गांव को बिजली भी मिल सके।

0 छोटी किलोवाटो, 1-2 मेगावाट की बिजली परियोजनायें जिनकों यही के लोगों को सहकारी समिति बनाकर दिया जाये। पंचायतें भी छोटी- छोटी परियोजनायें बना सकें। ऽ सेवा क्षेत्र आई. टी, शिक्षा-स्वास्थ्य अनुसंधान केंद्र, बागवानी, फलखेती, औषधि उत्पादन जैसी स्थायी रोजगार योजनाये बनायीं जाये।

0 नदियों के जल को उपर पहाड़ों से ही नहरों के द्वारा निकाला जाये जिससे खेतों में लगातार पानी दिया जा सके।

0 नदियों से सीधी छोटी नहरे-कूले निकाली जाये ताकि वर्ष भर खेतों को पानी मिल सके। अनाज की जरूरते पूरी हो सके। राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में मात्र 7 प्रतिशत ही खेती की भूमि शेष है। इसलिये रोजगार के संघर्ष को सिर्फ बांध तक सीमित ना करके बांध पर थोड़े समय के रोजगार के बदले दूसरे सारे विकल्पों पर/अन्य संभावनाओं पर रोक लगाना पहाड़वासियों की सेहत के लिए गलत होगा।

विमल भाई
समन्वयक, माटू जनसंगठन
09891814707
पत्र व्यवहार का पता—
डी-334/10, गणेश नगर,
पाण्डव नगर कॉम्पलेक्स,
दिल्ली-110092
फोन-011-22485545
ईमेलः matuporg@gmail.com

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