जोहानेसबर्ग पृथ्‍वी सम्‍मेलन था दीर्घकालिक विकास के लिए

Submitted by Hindi on Sat, 07/30/2011 - 13:01
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चौथी दुनिया, 9 अप्रैल 2010

पर्यावरण बचाएंपर्यावरण बचाएंदक्षिण अफ्रीका के जोहानेसबर्ग में जो वैश्विक सम्मेलन (डब्ल्यूएसएसडी), 2002 में हुआ था, वह मूल रूप से दीर्घकालिक विकास पर केंद्रित था, हालांकि तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने उसका बहिष्कार किया था। इसीलिए उसके एजेंडे में ग्लोबल वार्मिंग का मुद्‌दा उतना अहम नहीं था। इससे भी बड़ी बात यह थी कि अनेक महत्वपूर्ण फैसले कहीं दूर लिए जा रहे थे। चीन और रूस, जो कि दुनिया के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े प्रदूषण फैलाने वाले देश हैं ने जलवायु परिवर्तन पर 1997 में हुए अंतर्राष्ट्रीय समझौते, क्योटो प्रोटोकॉल को मंजूरी देने की घोषणा कर दी। इन घोषणाओं की अहमियत को कम करके नहीं आंका जा सकता लेकिन इसके साथ ही ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम था। यदि जोहानेसबर्ग सम्मेलन की तुलना 1992 में रियो डी जेनेरियो सम्मेलन से करें तो पर्यावरण सुरक्षा के प्रति यह बेरुखी और भी सतह पर आ जाती है। रियो सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिंग के मुद्‌दे पर सदस्य राष्ट्रों के बीच अंतर्राष्ट्रीय सहमति बनी थी। गैर-परंपरागत ऊर्जा साधनों के इस्तेमाल को लेकर भी अमेरिका सहमत नहीं था और यही वजह थी कि सदस्य राष्ट्र इस बाबत भी कोई निश्चित लक्ष्य निर्धारित करने में नाकाम रहे। ब्राजील सरकार ने एक प्रस्ताव के माध्यम से साल 2010 तक विश्व भर में कुल ऊर्जा के इस्तेमाल का 10 प्रतिशत गैर-परंपरागत स्रोतों से होने का लक्ष्य रखा था और इसे इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंवायरोन्मेंटल लॉ (सीआईईएल) का भी समर्थन हासिल था।

विश्व भर में ऊर्जा के उत्पादन और उसके इस्तेमाल के लिहाज से डब्ल्यूएसएसडी के प्रस्तावों में कई अहम बातों की चर्चा है। ग्लोबल वॉर्मिंग भले ही सम्मेलन के एजेंडे में शामिल न हो लेकिन सदस्य राष्ट्रों के प्रतिनिधियों के दिमाग में यह बात जरूर थी। इसके द्वारा सुझाई गई योजना में उन कदमों पर अमल किया जाना भी शामिल था, जिनकी मदद से ऊर्जा संसाधनों की निरंतर उपलब्धता और उन तक पहुंच को सुनिश्चित किया जा सके। इसमें कुछ महत्वपूर्ण बातें शामिल की गई थीं। पहली यह कि ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों को प्रोत्साहन और कुल उर्जा खपत में उनके योगदान को बढ़ाना और दूसरी यह कि ऊर्जा संसाधनों के सही इस्तेमाल और उनके संरक्षण की तकनीकों का विकास और विकासशील देशों तक इन तकनीकों के सुलभ हस्तांतरण को बढ़ावा। इनके अलावा बाजार की विसंगतियों को दूर करना जिसमें टैक्स प्रणाली में सुधार और सब्सिडियों को समाप्त करना शामिल है, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों को अक्षय ऊर्जा से जुड़े तकनीकों के उपयोग के लिए सही वित्तीय माहौल तैयार करने हेतु प्रोत्साहित करना और समयबद्ध तरीके से क्योटो प्रोटोकॉल को मंजूरी देना भी शामिल किया गया। सम्मेलन के इन प्रस्तावों को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की इच्छा के रूप में देखा गया था। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण कानून के विकास की दिशा क्या हो, इस पर गंभीर चर्चाएं की गई। सदस्य राष्ट्र गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल में अपने लक्ष्य से भटकें नहीं, इसके देखरेख की जिम्मेदारी सीआईईएल की रही है।

अब हमें यह भी याद रखना चाहिए कि युनाइटेड नेशंस क्लाइमेट चेंज कन्फ्रेंस, 2009 वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर आयोजित आखिरी सम्मेलन है। इस सम्मेलन के माध्यम से पहली बार सभी प्रमुख राष्ट्रों के अलावा पर्यावरण सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्थाएं भी एक मंच पर आईं। हालांकि, तमाम उम्मीदों के विपरीत क्योटो प्रोटोकॉल के प्रस्तावों को सदस्य देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने की दिशा में यह सम्मेलन कुछ खास नहीं कर पाया। इसके परिणामस्वरूप हमें अमेरिका, चीन, ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच कोपेनहेगन समझौता देखने को मिला। इस समझौते की शर्तों को मानने के लिए सदस्य देश कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं और न ही इसे क्योटो प्रोटोकॉल के अगले चरण के रूप में देखा जा सकता है। गौरतलब है कि क्योटो प्रोटोकॉल की मौजूदा समय सीमा 2012 में समाप्त हो रही है। सम्मेलन में इस समझौते की गूंज सुनाई पड़ी लेकिन समझौते के गुप-चुप तरीके को लेकर भी सवाल खड़े किए गए। कई देशों ने यह भी माना कि इस करार के चलते कोपेनहेगन सम्मेलन ऐसे किसी समझौते तक पहुंचने में नाकाम रहा, जो सदस्य राष्ट्रों की वैधानिक जिम्मेदारियां तय करता और गरीब देशों के लिए खास तौर पर लाभकारी होता।

विश्व भर के देशों ने व्यापार से जुड़े अपने कानूनों में मनमाफिक ढंग से बदलाव किए हैं। ऐसे सभी कारक, जो व्यापारिक गतिविधियों को सीमित करने के लिए बनाए गए थे, या तो पूरी तरह खत्म कर दिए गए हैं या फिर उनकी प्रभावशीलता को कम कर दिया गया है। आर्थिक नीतियों में इन बदलावों से व्यापारिक गतिविधियों में तो तेजी आई ही है, इसने वैश्विक व्यापार के विस्तार में पहले से ज्यादा देशों की भागीदारी भी सुनिश्चित की है। यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित हर बातचीत में व्यापार की अधिक से अधिक चर्चा होने लगी है और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी इसकी भूमिका ने चिंताओं को बढ़ाया है। इनमें से कुछ चिंताएं हैं: मुक्त व्यापार के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के अध्ययन के लिए व्यापारिक अर्थशास्त्रियों द्वारा विकसित एक मॉडल के अनुरूप नॉर्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (नाफ्टा) के पर्यावरणीय प्रभावों की समीक्षा की गई। इस आधार पर व्यावसायिक उदारीकरण से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को तीन श्रेणियों में बांटा गया- संख्यात्मक, संरचनात्मक और तकनीकी। आम धारणा के मुताबिक व्यापार के विस्तार से आर्थिक गतिविधियों में इजाफा होता है और इससे ऊर्जा के इस्तेमाल में भी वृद्धि होती है। यदि बाकी चीजें अपने पुराने स्तर पर कायम रहें तो भी बढ़ी हुई आर्थिक गतिविधियों और ऊर्जा के ज्यादा इस्तेमाल से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में बढ़ोतरी होती है।

ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की मात्रा इस बात पर निर्भर है कि देश की अर्थव्यवस्था किस क्षेत्र में ज्यादा प्रगति कर रही है। यदि व्यापारिक विस्तार ऐसे क्षेत्रों में हो रहा हो जिनमें ऊर्जा की खपत कम होती है, तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की मात्रा भी कम होगी। यही वजह है कि आर्थिक गतिविधियों के विस्तार से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर पड़ने वाले असर के बारे में पहले से अंदाजा लगाना मुश्किल है। व्यापार के उदारीकरण से ऊर्जा संसाधनों का अधिकतम दोहन और अपेक्षित दोहन संभव है जिससे सेवाओं एवं वस्तुओं के उत्पादन में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की मात्रा में भी कमी आ सकती है। मुक्त व्यापार की हालत में पर्यावरण पर अच्छा असर डालने वाली वस्तुओं, उत्पादों और तकनीकों की कीमत में कमी आएगी और उनकी उपलब्धता भी बढ़ेगी। यह उन देशों के लिए खास तौर पर ज्यादा महत्वपूर्ण है जहां ऐसी तकनीकों एवं वस्तुओं का उत्पादन कम होता है या उनकी कीमत ज्यादा है। खुला बाजार होने से निर्यातकों को नए उत्पादों और जलवायु परिवर्तन से लड़ने वाले तकनीकों के विकास में भी मदद मिलती है। आर्थिक विस्तार से आय में होने वाली बढ़ोतरी समाज को अच्छे पर्यावरण की मांग के लिए भी प्रोत्साहित करता है और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की संभावना बनती है। दीर्घकालिक विकास की दिशा में सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण में होने वाला बदलाव ही है। इस चुनौती की गंभीरता का वास्तविक अहसास अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों से ही हो सकता है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ऐसा ही एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अनुशासन और इसे मुक्त व्यापार की दिशा में मोड़ने के लिए विचार-विमर्श के एक मंच की तरह भी काम करता है।

डब्ल्यूटीओ के स्थापना चार्टर में यह स्पष्ट किया गया है कि मुक्त व्यापार के साथ महत्वपूर्ण मानवीय पहलू और उद्देश्य जुड़े हैं जिनमें जीवन स्तर को ऊंचा उठाना, दीर्घकालिक विकास की अवधारणा को सुनिश्चित करते हुए वैश्विक संसाधनों का उचित इस्तेमाल और पर्यावरण की सुरक्षा एवं उसका संरक्षण शामिल है। बहुध्रुवीय व्यापार और पर्यावरण के मुद्दे पर दोहा में हुए सम्मेलन के माध्यम से डब्ल्यूटीओ ने चिरस्थायी विकास को सुनिश्चित करने की दिशा में अपने कदम और आगे बढ़ा दिए हैं। डब्ल्यूटीओ और यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) डब्ल्यूटीओ और यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज एक दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि पूरक हैं जो इसके नियमों से भी स्पष्ट होता है : यूएनएफसीसी की धारा 3.5 और क्योटो प्रोटोकॉल की धारा 2.3 में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिए अपनाए गए तरीके किसी भी हालत में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सीमित या प्रतिबंधित नहीं कर सकते और इन्हें इस तरह से लागू किया जाना चाहिए जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और संबंधित पक्षों के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं पर बुरा असर नहीं पड़े। साथ ही, डब्ल्यूटीओ के प्रावधानों में पर्यावरण सुरक्षा के नजरिए से व्यापारिक गतिविधियों पर कुछ शर्त लगाने की छूट भी दी गई है। इसके साथ-साथ, इस काम से जुड़ी संस्थाएं डब्ल्यूटीओ और बहुध्रुवीय पर्यावरण समझौतों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान और सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी प्रयासरत हैं। उदाहरण के लिए, डब्ल्यूटीओ और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की दिशा में कार्यरत संस्थाओं के बीच आपसी सहयोग पहले ही बढ़ रहा है, जैसे यूएनएफसीसी- डब्ल्यूटीओ की व्यापार एवं पर्यावरण पर होने वाली बैठकों में शामिल होता है और यूएनएफसीसी के सम्मेलनों में भी डब्ल्यूटीओ सचिवालय की भागीदारी होती है।

व्यापार में तकनीकी बाधाओं से संबंधित समझौते पर कमिटी ऑन टेक्निकल बैरियर्स टू ट्रेड (टीबीटी) जलवायु परिवर्तन से जुड़े तकनीकी मामले के दायरे में आते हैं, जो अन्य चीजों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अनावश्यक बाधाओं को दूर करने की दिशा में नियम कानून बनाता है। इस समझौते के अंतर्गत सदस्य राष्ट्रों के लिए व्यापार पर असर डालने वाली तकनीकी जानकारियों का आदान-प्रदान होना भी जरूरी है। टीबीटी कमिटी यह सुनिश्चित करती है कि जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिए उठाए गए कदम अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के विस्तार के मार्ग में अनावश्यक बाधाएं नहीं खड़ी करते। पर्यावरण से संबंधित जिन तकनीकी मुद्दों पर समिति में विचार-विमर्श हुआ है, वह मुख्य रूप से उत्पादों से संबंधित है, जैसे कारों के लिए ईंधन मानक, ऊर्जा संसाधनों के इस्तेमाल से बने उत्पादों का इको-फ्रेंडली होना, डीजल इंजन के लिए उत्सर्जन की सीमा क्या हो आदि। हाल के वषों में कई ऐसे मानक तय किए गए हैं जो ऊर्जा संसाधनों के सही इस्तेमाल और उत्सर्जन को नियंत्रित करने की दिशा में लाभदायक हो सकते हैं।
 

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