हवा में घुली मौत

Submitted by Hindi on Wed, 08/03/2011 - 11:02
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कुदरतनामा

निजी वाहनों को प्रोत्साहन देने के बजाए बस, रेल आदि आम यातायात के वाहनों को बढ़ावा देना चाहिए। वाहनों और उद्योगों की निकासी को नियंत्रित करने के लिए कड़े कानून होने चाहिए और उनका ईमानदारी से पालन होना चाहिए। अधिक साफ-सुथरे ईंधन अपनाने चाहिए।

कुछ जहरीले पदार्थों के असुरक्षित समझी जानेवाली मात्रा में और काफी समय तक हवा में विद्यमान रहने को वायु प्रदूषण कहते हैं। ये पदार्थ मनुष्य, अन्य जीव-जंतु, भवन, फसल, पेड़-पौधे और पर्यावरण को नुकसान कारक होते हैं। शहरी परिवेश में आम तौर पर पाए जाने वाले वायु प्रदूषकों में शामिल हैं सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, सीसा, धूल आदि। हर दिन हम लगभग 22,000 बार सांस लेकर हवा से 15-16 किलो ऑक्सीजन सोखते हैं। लेकिन इस जीवनदायिनी हवा में इन प्रदूषकों के भी घुले रहने से सांस के साथ हम उन्हें भी सोखते जा रहे हैं। ये जहरीले पदार्थ अब पानी, भोजन और त्वचा के जरिए भी शरीर में घुसने लगे हैं। वायु प्रदूषण का मुख्य कारण अनियंत्रित औद्योगिकीकरण और शहरों का फैलना है। उद्योगों के बेतहाशा बढ़ने से ऊर्जा की मांग भी बहुत बढ़ गई है। ऊर्जा निर्माण के दौरान वायु को प्रदूषित करने वाले तत्वों का उत्सर्जन होता है। हमारे देश में अधिकांश बिजली का निर्माण तापबिजली घरों में होता है जिनमें कोयला जलाया जाता है। कोयला जलाने पर सल्फर डाइऑक्साइड, राख तथा अनेक अन्य प्रदूषक तत्व हवा में पहुंचते हैं। स्वयं उद्योगों के अपने उत्सर्जनों में भी अनेक प्रकार के जहरीले तत्व होते हैं। औद्योगिकीकरण से जुड़ी है यातायात के साधनों का विस्तार। आज सभी शहरों में पेट्रोल और डीजल के वाहनों का भीड़-भड़ाका हो गया है। इन वाहनों के उत्सर्जन में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सीसा आदि अनेक खतरनाक पदार्थ होते हैं।

हमारे देश के अधिकांश वाहन पुराने और बिगड़े हुए हैं और उनसे बहुत अधिक धुंआ निकलता है। घरों में कोयला, गोबर, लकड़ी, आदि जलाने से और रिहायशी मोहल्लों में कचरा, टायर-ट्यूब आदि को जलाने से भी वायु प्रदूषण बढ़ता है। अनेक प्रकार के वायु प्रदूषक श्वसन तंत्र, हृदय आदि को हानि पहुंचाते हैं। सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, ओजोन और निलंबित पदार्थ फेफड़ों को कमजोर कर देते हैं और अनेक प्रकार की श्वसन संबंधी बीमारियों के लिए जमीन तैयार करते हैं। ओजोन आंख, नाक और गले में जलन, सिरदर्द आदि का कारण बनती है। वह हृदय एवं मस्तिष्क की गड़बड़ियों को भी जन्म देती है। वह पेड़-पौधों को भी नुकसान पहुँचाती है। ओजोन मुख्यतः वाहनों के उत्सर्जन में पाई जाती है। वह प्रकाश-रसायनिक (फोटोकेमिकल) स्मोग भी लाती है। वाहनों, चूल्हों आदि में ईंधन जलाने पर कार्बन मोनोऑक्साइड गैस निकलती हैं। यह एक अत्यंत जहरीली गैस होती है, जो मृत्यु तक का कारण बन सकती है। यह गैस हमारे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन नामक अंश को नाकाम कर देती है। हमारे फेफड़े इसी हीमोग्लोबिन की सहायता से हवा से ऑक्सीजन सोखते हैं। इस तरह कार्बन मोनोऑक्साइड अधिक होने पर हम आवश्यक मात्रा में ऑक्सीजन नहीं सोख पाते। इससे हमारे मस्तिष्क, हृदय आदि को नुकसान पहुंच सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।

आजकल के उद्योगों से तरह-तरह के विषैले रासायनिक उत्सर्जन होते हैं जो कैंसर आदि भयंकर बीमारियाँ ला सकते हैं। विदेशों में उद्योगों के उत्सर्जन पर कड़ा नियंत्रण होने से बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों को भारत जैसे विकासशील देशों में ले आई हैं। इन विकासशील देशों में प्रदूषण नियंत्रण कानून उतने सख्त नहीं होते या उतनी सख्ती से लागू नहीं किए जाते। इन कारखानों में सुरक्षा की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इनमें कम उन्नत प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल किया जाता है जो सस्ते तो होते हैं, परंतु संसाधन बहुत खाते हैं और प्रदूषण भी बहुत करते हैं। इन कारखानों की मशीनरी पुरानी होने, सुरक्षा की ओर ध्यान न दिए जाने या लापरवाही के कारण कई बार भयंकर दुर्घटनाएँ होती हैं जिसके दौरान भारी परिमाण में विषैले पदार्थ हवा में घुल जाते हैं। इस तरह की घटनाओं का सबसे अधिक ज्वलंत उदाहरण भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक कारखाने में हुआ विस्फोट है। इस दुर्घटना में एमआईसी नामक अत्यंत घातक गैस कारखाने से छूटी थी और हजारों लोगों को मौत की नींद सुला गई। इस तरह की अनेक दुर्घटनाएँ हमारे देश के औद्योगिक केंद्रों में आए दिन घटती रहती हैं। उनमें मरने वालों की संख्या भोपाल के स्तर तक नहीं पहुंची है लेकिन इससे वे कम घातक नहीं मानी जा सकतीं।

मानव स्वास्थ्य को पहुंचे नुकसान के अलावा भी वायु प्रदूषण के अनेक अन्य नकारात्मक पहलू होते हैं। नाइट्रोजन के ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड अम्ल वर्षा को जन्म देते हैं। अम्ल वर्षा मिट्टी, वन, झील-तालाब आदि के जीवतंत्र को नष्ट कर देती है और फसलों, कलाकृतियों (जैसे ताज महल), वनों, इमारतों, पुलों, मशीनों, वाहनों आदि पर बहुत बुरा असर छोड़ती है। वह रबड़ और नायलोन जैसे मजबूत पदार्थों को भी गला देती है। वायु प्रदूषण राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानता और एक देश का प्रदूषण दूसरे देश में कहर ढाता है। जब रूस के चेरनोबिल शहर में परमाणु बिजलीघर फटा था, तब उससे निकले रेडियोधर्मी प्रदूषक हवा के साथ बहकर यूरोप के अनेक देशों में फैल गए थे। लंदन के कारखानों का जहरीला धुंआ ब्रिटिश चैनल पार करके यूरोपीय देशों में अपना घातक प्रभाव डालता है। अमेरीका का वायु प्रदूषण कनाडा में विध्वंस लाता है। इस तरह वायु प्रदूषण अंतर्राष्ट्रीय तकरारों को भी जन्म दे सकता है। भारत के दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता आदि बड़े शहरों में वायु प्रदूषण गंभीर रूप ग्रहण करता जा रहा है। नागपुर के राष्ट्रीय पर्यावरणीय अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (निएरी) के अनुसार इन शहरों में सल्फर डाइऑक्साइड और निलंबित पदार्थों की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा से कहीं अधिक है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि वायु प्रदूषण फसलों को नुकसान पहुँचाकर उनकी उत्पादकता को कम करने लगा है।

वायु प्रदूषण ओजोन परत को नष्ट करता है और हरितगृह प्रभाव को बढ़ावा देता है। इससे जो भूमंडलीय पर्यावरणीय समस्याएं सामने आती हैं, उनसे समस्त मानवजाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। हरितगृह प्रभाव वायुमंडल में ऐसी गैसों के जमाव को कहते हैं जो सूर्य की गर्मी को पृथ्वी में आने तो देती हैं, परंतु पृथ्वी की गर्मी को अंतरिक्ष में निकलने नहीं देतीं। इससे पृथ्वी में सूर्य की गर्मी जमा होती जाती है और वायुमंडल गरम होने लगता है। इसके अनेक दुष्परिणाम हो सकते हैं। एक तो हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतों और ध्रुवों में मौजूद बर्फ की विशाल राशि पिघलने लगेगी, जिससे समुद्र की सतह ऊपर उठने लगेगी। तापमान बढ़ने से समुद्र का पानी फैल उठेगा, जिससे भी समुद्र की सतह ऊपर आ जाएगी। इससे मालदीव, फिलिपीन्स, मॉरीशस आदि विश्व के अनेक द्वीपीय देश और बंगलादेश, डेनमार्क आदि तटीय देश विश्व के मानचित्र से ही मिट सकते हैं। हरितगृह प्रभाव लाने वाले गैसों में मुख्य कार्बन डाइऑक्साइड है जो एक प्रमुख वायु प्रदूषक भी है। वह वाहनों, कारखानों और घरेलू चूल्हों में ईंधन जलाने से पैदा होता है।

वातानुकूलकों और फ्रिज आदि उपकरणों में सीएफसी नामक जो शीतलक गैस का उपयोग होता है, वह भी एक खतरनाक वायु प्रदूषक है। वह मनुष्य के स्वास्थ्य पर तो सीधा प्रभाव नहीं डालती पर वह अन्य दृष्टियों से घातक है। हरितगृह प्रभाव को बढ़ावा देने में सीएफसी कार्बन डाइऑक्साइड से कई सौ गुना कारगर है। इसलिए थोड़ी सी सीएफसी भी काफी नुकसान कर सकती है। यह गैस अत्यंत स्थायी बनावट की होती है और वह आसानी से विघटित नहीं होती। वायुमंडल में वह सालों तक मौजूद रहकर नुकसान करती रहती है। उसका दूसरा घातक पहलु है ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने में उसकी भूमिका। उच्च वायुमंडल में ओजोन के अणुओं से भरी एक पतली परत होती है जिसका पृथ्वी पर जीवन के कायम रहने की दृष्टि से काफी महत्व है। इस परत के ओजोन अणु सूर्य से आने वाली घातक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेते हैं और उन्हें पृथ्वी सतह तक पहुंचने नहीं देते। यदि ये किरण पृथ्वी तक पहुंचीं तो वे जीव-जंतुओं में कैंसर आदि बीमारियों को जन्म दे सकती हैं। सीएफसी में क्लोरीन, ब्रोमीन, फ्लोरीन आदि के अंश होते हैं जो ओजोन अणुओं को तोड़ देते हैं। ओजोन अणु के नष्ट होने से ओजोन परत कमजोर हो जाती है और सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी को पहुंचने लगती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण आयोग के ऊर्जा विषय पर गठित पैनेल ने 1992 में जेनेवा में हुए एक सम्मेलन में वायु प्रदूषण कम करने के अनेक उपाय सुझाए थे, जैसेः- शहरों में यातायात पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। निजी वाहनों को प्रोत्साहन देने के बजाए बस, रेल आदि आम यातायात के वाहनों को बढ़ावा देना चाहिए। वाहनों और उद्योगों की निकासी को नियंत्रित करने के लिए कड़े कानून होने चाहिए और उनका ईमानदारी से पालन होना चाहिए। अधिक साफ-सुथरे ईंधन अपनाने चाहिए। तापबिजलीघरों में निर्मित ऊष्मा को औद्योगिक प्रक्रियाओं में खपा लेना चाहिए (कोजेनेरेशन)। औद्योगिक एवं बिजली निर्माण इकाइयों को रिहायशी इलाकों से दूर स्थापित करना चाहिए। उद्योगों को शहरों से हटाने के लिए वित्तीय प्रलोभन देने चाहिए, प्रदूषण कम करने की प्रौद्योगिकी के विकास के लिए सरकार को शोध प्रयासों को समर्थन देना चाहिए। प्रदूषण कम करने की प्रौद्योगिकियाँ अपनाने के लिए सब्सिडी की व्यवस्था होनी चाहिए।

इसके अलावा कुछ पेड़-पौधे जैसे अर्जुन, नीम, जामुन, खजूर, बेर, अशोक, पीपल आदि प्रदूषकों को सोखने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। इन्हें सड़कों और उद्योगों के चारों ओर लगाना चाहिए। लखनऊ के राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान ने इस तरह के 50 पौधे पहचाने हैं। उन्हें सब बड़े पैमाने पर शहरों में लगाना चाहिए। वायु हमारी मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। उसे शुद्ध रखना हमारे कायमी अस्तित्व के लिए परम आवश्यक है। वायु प्रदूषण को नाथने के तरीके ढूंढ़ना और उन्हें अमल में लाना हम सबके लिए जीवन-मरण का विषय है। इसलिए वायु प्रदूषण कम करने के हर प्रयत्न हमें हर स्तर पर करने चाहिए।
 

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