ग्रीन हाउस की तकनीकी द्वारा सब्जियाँ और फूल उगायें

Submitted by Hindi on Thu, 08/04/2011 - 09:21
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आर्गेनिक भाग्योदय ब्लॉग

ग्रीन हाउसग्रीन हाउसकिसी भी जैविक क्रिया के लिए उचित पर्यावरण की आवश्यकता होती है। अगर पर्यावरण उचित नहीं है तो जैविक क्रिया कम दर से बढ़ेगी या पूरी तरह से रूक जायेगी। पादप या प्राणी जीवन भी इसी सिद्धान्त से नियंत्रित है। कृषि में फसलों के लिए उचित पर्यावरण प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है जिसमें फलस्वरूप उत्पादकता की उच्चतम सीमा प्राप्त हो सके। इसके लिए फसलों की उचित मौसम में बुआई करते हैं, सिंचाई और खाद का प्रबन्ध करते हैं। खरपतवार एवं बीमारियों को नियंत्रित करते हैं। तथा उचित समय पर फसल चक्र पूर्ण करते हैं। ऐसे में भी प्राकृतिक विपदाएं जैसे अतिवृष्टि या अनावृष्टि, ओला वृष्टि, कीट प्रकोप, आदि उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव बनाये रखती हैं। परिणामस्वरूप खुले खेतों में परम्परागत खेती से कभी-कभी ही अधिकतम उत्पादकता प्राप्त हो पाती है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती जा रही है और कृषि योग्य भूमि का आकार घटता जा रहा है वैसे-वैसे कृषि उत्पादन की क्षमता बढ़ाना आवश्यक हो गया है फिर इस बात की भी आवश्यकता है कि नागरिकों को उचित पोषण प्राप्त हो और उत्पादक को कम भूमि से अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त हो। फसलोत्पादन के लिए आवश्यक संसाधनों को एक निश्चित सीमा से अधिक बढ़ाना सम्भव नहीं है। ऐसे में कम से कम संसाधनों से अधिक से अधिक उत्पादन क्षमता का विकास आवश्यक हो गया है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है और लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या के लिए कृषि ही जीविकोपार्जन का स्रोत है। जैसे-जैसे औद्योगिकीकरण बढ़ रहा है और ग्रामीण युवक शिक्षित हो रहा है, वैसे-वैसे कृषि उत्पादन तकनीकियों के विकास की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। ऐसा न होने पर आशंका है कि आने वाले समय में कृषि उत्पादन के लिए समुचित मानव संसाधन जुटाना मुश्किल होगा। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों एवं पहाड़ी क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्रों में हो रहे युवा पलायन को रोकना अति आवश्यक है। इन सभी परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में ग्रीनहाउस तकनीकी का विकास भारत वर्ष के किसानों के लिए बहुत ही आवश्यक हो गया है। ग्रीन हाउस कांच से ढांचा इस्पात, एल्यूमीनियम या बांस का बनाया जा सकता है। निर्माण सामग्री चयन फसल और स्थान विशेष के अनुसार किया जाता आवश्यकता इस बात की है कि ग्रीनहाउस उपयोग से उत्पादक हो समुचित लाभ हो।

 

 

ग्रीन हाउस की उपयोगिता :


भारत वर्ष में ग्रीनहाउस की उपयोगिता निम्नलिखित है।
1. जिन क्षेत्रों में परम्परागत खेती नहीं की जा सकती, उन परिस्थितियों में फसलोत्पादन की संभावना बन जाती है।
2. फसलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता बढ़ जाती है।
3. किसी भी स्थान पर वर्ष पर्यन्त फसलोत्पादन संभव है।
4. किसी भी फसल को किसी भी स्थान पर वर्ष पर्यन्त उत्पादित किया जा सकता है।
5. बहुत कम क्षेत्र में फलोत्पादन करके पर्याप्त जीविकोपार्जन संभव है।
6. ग्रीन हाउस में उत्पादित बागवानी उत्पाद निर्यात के लिए सर्वथा उपयुक्त है।
7. जैव प्रौद्योगिकी द्वारा विकसित पौधों में कठोरीकरण के लिए ग्रीन हाउस एक लाभदायक सुविधा है।
8. फसलों में शुद्ध संकरी बीजों के उत्पादन के लिए ग्रीन हाउस आवश्यक है।
9. बीजों या संर्वधन तकनीकियों द्वारा उच्च कोटि की पौध तैयार करने के लिए ग्रीन हाउस आवश्यक है।

 

 

 

 

ग्रीन हाउस तकनीकी का विकास


ग्रीन हाउस तकनीकी का प्राथमिक विकास विश्व के ठंडे क्षेत्रों में लगभग दो शताब्दी पूर्व हुआ था। उन क्षेत्रों में अत्याधिक ठंड के कारण खुले खेतों में फसलोत्पादन कुछ महीनों के लिए संभव है। वहां सब्जियों, फलों और फूलों के उत्पादन को वर्षा पर्यन्त संभव बनाने के लिए कांच के घरों का उपयोग शुरू हुआ। 'ग्रीन हाउस प्रभाव' के कारण ठंडे मौसम में सूर्य के प्रकाश में इन कांच घरों में तापमान बढ़कर फसलोचित हो जाता है और फसलों से संबंधित जैविक क्रियाएं तेज गति से सम्पन्न होती हैं। इन कांच घरों में आवश्यकता अनुसार तापमान, आर्द्रता, प्रकाश, सिंचाई,पोषण, कार्बन डाइऑक्साइड गैस आदि के नियंत्रण का विकास होता गया और आज ग्रीन हाउस तकनीकी का स्वरूप अत्याधुनिक हो गया है। अब कई हैक्टेयर क्षेत्रफल में बने ग्रीनहाउस में फसलोत्पादन संबंधी क्रियाओं को कम्प्यूटर द्वारा नियंत्रित उपकरणों की सहायता से सम्पन्न कर, उत्पादकता की चरम सीमाओं की प्राप्ति संभव हो गई है। वरना एक हैक्टेयर क्षेत्रफल में वार्षिक 750 टन खीरा उत्पादन और 340 टन टमाटर उत्पादन कैसे संभव है। ग्रीन हाउस तकनीकी की उपयोगिता के कारण इसका प्रचलन अब विश्व के प्रत्येक भाग में हो रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्लास्टिक पदार्थ के विकास के फलस्वरूप ग्रीनहाउस तकनीकी में मूलभूत परिवर्तन हुआ है। अब विश्व में लगभग 90 प्रतिशत नये ग्रीनहाउस आवरण के लिए प्लास्टिक की पारदर्शी चादरों का उपयोग होता है। इसके फलस्वरूप ग्रीनहाउस के ढांचे कांच घरों की तुलना में बहुत हल्के और सस्ते हो गये हैं। प्लास्टिक से आवरणित ग्रीनहाउस पर्यावरण नियंत्रण फसलोत्पादन भी बेहतर संभव है।

 

 

 

 

ग्रीन हाउस प्रभाव


ग्रीन हाउस प्रभाव परदर्शी की सूर्य के प्रकाश से संबंधित गुणता पर आधारित है। प्रारम्भ में इस प्रभाव को कांच की गुणता से जोड़ा गया था। अब यह विदित है कि प्रत्येक परदर्शी पदार्थ किसी न किसी सीमा तक ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करने में सक्षम है। यह वही प्रभाव जिसके कारण बंद घर में जाड़े के मौसम में कांच की खिड़की से आते हुए सूर्य के प्रकाश में बैठना अच्छा लगता है अथवा सर्दी की ऋतु में भी सूर्य के प्रकाश में खिड़की बंद खिड़की वाली कार में तापमान का बढ़ जाना इसी ग्रीन हाउस प्रभाव का उदाहरण है। कांच या दूसरे पारदर्शी पदार्थ उष्मीय विकिरण के विभिन्न भागों के लिए अलग-अलग पारगमनांक दर्शित करते हैं। कांच की गुणता है कि यह सोर उर्जा के लगभग 80 प्रतिशत भाग को कांच घर में स्थित उपकरणों एवं सतहों के तापमान को बढ़ाती है। बढ़े हुए तापमान पर यह उपकरण और सतह उष्मीय विकिरण उत्पन्न करते हैं जो सुदूर लाल श्रेणी में आता है। इस सुदूर लाल श्रेणी के विकिरण को कांच बाहर नहीं जाने देता और इस प्रकार कांच में सौर उर्जा एकत्रित हो जाती है, जिससे तापमान भी बढ़ता है। यही प्रभाव प्लास्टिक की पारदर्शी चादरों वाले ग्रीनहाउस में भी पाया जाता हैं फलस्वरूप बिना किसी कृत्रिम उर्जा के ग्रीनहाउस प्राकृतिक सौर उर्जा द्वारा तापमान बढ़ जाता हैं यह ग्रीनहाउस प्रभाव शीतकाल में बेहतर फसल उत्पादकता के लिए उपयोगी है। ग्रीनहाउस की परिभाषा और उपयोगिता अब अधिक विस्तृत है। अब ग्रीनहाउस को संरक्षित खेती का पर्याय माना जाता है। जिसमें आवश्यकता अनुसार पर्यावरण नियंत्रण का वांछित कृषि कार्य किया जा सके। अतः सरलतम ग्रीनहाउस प्लास्टिक की चादरों से ढके ढांचे मात्र होते है जिनमें प्राकृतिक वातन की सुविधा हो ऐसे ग्रीनहाउस किसी भी स्थान पर कुछ महीने की उपयोगी होते हैं। वर्ष पर्यन्त उपयोग कि नए अति आवश्यक पर्यावरण नियंत्रण के उपकरण ग्रीनहाउस में समावेशित होते हैं। कृषि कार्य की आवश्यकता अनुसार ग्रीनहाउस के ढांचे और पर्यावरण तन्त्र को अत्याधुनिक बनाया जा सकता है।

ग्रीन हाउस तकनीकी द्वारा उगाई गई सब्जियांग्रीन हाउस तकनीकी द्वारा उगाई गई सब्जियांजैसा कि उपरोक्त जानकारी विदित है, ग्रीनहाउस का स्वरूप एवं इसकी कार्य प्रणाली का संबंध स्थान और अभीष्ट कृषि कार्यों से हैं। भारतवर्ष में मौसम और फसलों की बहुत विविधताएं हैं। अतः यह सम्भव नहीं है कि ग्रीनहाउस की कोई एक परिकल्पना सभी स्थितियों के लिए पर्याप्त होगी। हां कुछ सामान्य विचार हैं जिनको ध्यान में रखना लाभदायक है। फसलों का चुनाव आकार को ध्यान में रखते हुए आमतौर पर छोटे और कम आयतन के पौधों के लिए ग्रीनहाउस उपयुक्त है। बौनी प्रजाति के फल भी ग्रीनहाउस में उगाये जा सकते हैं। निम्नलिखित तालिका में उल्लेखित फसलों को ग्रीनहाउस में उगाया गया है। फसल का चुनाव ग्रीनहाउस की क्षमता, उत्पादक के अनुभव एवं ब्रिकी संबंधी कारकों के आधार पर होता है। फसलों की विस्तृत जानकारी तालिका-1 में दी गयी है।

तालिका-1 ग्रीन हाउस में उगाये जाने वाले फल, फूल एवं सब्जियां

 

 

 

सब्जियां

फूल

फल

टमाटर

गुलाब

स्ट्राबेरी

शिमला मिर्च

गुलदाउदी

अंगूर

खीरा

आर्किड्स

सिट्रस

पत्तागोभी

फॅर्न

आलू बुखारा

फूलगोभी

कारनेशन

आड़ू

ब्र्रोकोली

फ्रेशिया

केला

हरी प्याज

एन्थोरियम

पपीता

सेम

ग्लेडिओलस

खुमानी

मटर

लिली

 

चुकन्दर

टूयूलिप

 

मिर्च

डेजी

 

स्क्वैश

वैक्सफ्लावर

 

भिंडी

रसकस

 

शलगम

गनीगोजैन्घास

 

मूली

एल्सट्रोनेटिया

 

गाजर

जरबेरा

 

अदरक

बिगोनिया

 

कद्दू

 

 

लीकस

 

 

सेलेरी

 

 

एस्पैरेगस

 

 

स्वीटकॉर्न

 

 

खरबूजा

 

 

तरबूज

 

 

मशरूम

 

 

 

 

 

स्थापना सम्बन्धी आयाम


ग्रीन हाउस तकनीकी की सब्जियों का विकास ठंडे प्रदेशों में शुरू हुईग्रीन हाउस तकनीकी की सब्जियों का विकास ठंडे प्रदेशों में शुरू हुईअधिकतर ग्रीनहाउस अब पॉलीथीन या पी.वी.सी. की पराबैंगनी स्थिरीकृत पत्तियों के आवरण तथा इस्पात, एल्यूमीनियम, लकड़ी या बांस के ढांचे से बनते हैं। भारत में विलुप्त प्रायः वनों की स्थिति के कारण ढाचों के लिए लकड़ी का प्रयोग वांछनीय नहीं है लेकिन स्थित विशेष में लकड़ी और बांस का उपयोग वार्जित नहीं है। उदाहरण के लिए, देश में पूर्वोत्तर राज्यों में ऊँची गुणवत्ता के बांस आसानी से और कम कीमत पर उपलब्ध हैं। इन स्थानों पर बांस का उपयोग ग्रीनहाउस के ढांचे निर्माण में किया जा सकता है। एल्यूमीनियम में जंग नहीं लगती एवं इसके उपयोग से ढांचे का भार कम किया जा सकता है लेकिन भारतवर्ष में अभी ग्रीनहाउस के ढांचे में उपयुक्त एल्यूमीनियम मिश्रित धातु के हिस्से उपलब्ध नहीं है। अतः इस्पात का उपयोग अधिकतम है। जंग लगने को कम करने के लिए इस्पात को जस्तीकृत करना ठीक है। लकड़ी और बांस के ढांचे प्रायः 5-7 वर्ष तक आयु वाले होते हैं जबकि धातु के ढांचे की आयु 20-25 वर्ष होती है।

भारत वर्ष मे विद्युत महंगा है और हर समय उपलबध नहीं है। अतः नियंत्रित पर्यावरण वाले ग्रीनहाउस का प्रचालन कठिन ही नहीं अपितु महंगा हो जाता है या तो अनवरत विद्युत प्राप्ति के लिए जनरेटर की स्थापना आवश्यक है या ग्रीनहाउस परिकल्पना प्राकृतिक संवातन पर आधारित होनी चाहिए। ग्रीनहाउस की स्थापना ऐसे स्थान पर हो जहां वर्षा का पानी इकट्ठा न होता हो, जो सड़क के नजदीक हो, जहां समुचित धूप,अच्छा पानी और समुचित उर्जा उपलबध हो। भारतवर्ष में अधिकतर स्थानों पर ग्रीनहाउस पर समुचित और उर्जा का समावेश दिशामान पर निर्भर नहीं करता है लेकिन बहुविस्तरीय ग्रीनहाउस में परनाले की दिशा आमतौर पर उत्तर-दक्षिण होनी चाहिए। ग्रीनहाउस की परिकल्पना पर वायु वेग का प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। ग्रीनहाउस से लगभग 30 मीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में आंधी के प्रकोप को कम करने के लिए उंचे वृक्षों की कतार लगाना उपयोगी है। ग्रीनहाउस में पौधों की सिंचाई बूंद-सिंचाई विधि (ड्रिप) द्वारा की जाती है। उचित उत्पादकता और लाभ के लिए ग्रीनहाउस का सफल प्रबंधन अति आवश्यक है। इस प्रबंधन में न सिर्फ फसलों का उत्पादन अपितु कटाई उपरान्त समुचित उपचार एवं उत्पाद की बिक्री भी सम्मिलित है। उत्पाद की उचित बिक्री के अभाव में ग्रीन हाउस से लाभ बहुत कम हो सकता हैं।

 

 

 

 

ग्रीन हाउस निर्माण


अगर यह निश्चित हो गया है कि ग्रीनहाउस निर्माण एवं उसमें कृषि कार्य लाभदायक होने वाली है तो ग्रीनहाउस निर्माण तथा आवश्यक पर्यावरण नियंत्रण संबंधी उपकरणों की स्थापना का प्रबंध करना होगा। निमार्ण संबंधी जानकारी को यहां 4 मीटर x 20 मीटर के अर्ध बेलनाकार ढांचे की निर्माण विधि द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है। इस ग्रीनहाउस के ढांचे के लिए 15 मि.मी. व्यास (मध्यम श्रेणी) की जस्तीकृत नलिकाओं का उपयोग किया गया है ये नलिकाएं साधारण तौर पर 20 फुट (5.8 मीटर) लम्बी होती नींव 215 मि.मी. निम्न होता है। इन ग्रीन हाउस निर्माण प्रयुक्त सामग्री निम्नलिखित तालिका में दी गई है।

तालिका-2 जस्तीकृत आयरन पाइप संरचना 4x20 मीटर फर्श

 

 

 

सामग्री

मानदण्ड

मात्रा

जी.आई. पाइप

15 मि.मी. छिद्र श्रेणी ब

21

जी.आई. पाइप (6 मि. में)

25 मि.मी. छिद्र श्रेणी अ

30 मीटर

जी.आई. शीट (20 गेज)

90 से.मी. ग 240 से.मी.

4 शीट

एम.एस. फलैट

25 मि.मी.X 3 मिमी.

4 मी.(2.5 मि.ग्रा.)

नट बोल्ट संख्या (6 मि.मी.)

35 मि.मी.. लम्बाई

70

किनारे के फ्रेम के लिए

पार्शवच अवलंब 1 मि.मी. व्यास छड़

10 मी.

सीमेंट कंक्रीट मिश्रण

1:3:6 अनुपात

10 घन

पॉलीथीन चादर (800 गेज)

पराबैंगनी स्थिरीकृत (एक सतही)

160 वर्ग मी. (5.4 वर्ग मी./ कि.ग्रा.)

अन्य सामग्री

 

आवश्यकतानुसार

दोनों किनारे के फ्रेम

5 से.मी.X5 से.मी. लकड़ी

0.15 घन मी. लकड़ी (लगभग 5.25 घन फुट)


(वातावरण नियंत्रण के लिए प्रयुक्त होने वाले उपकरण स्थान विशेष की जलवायु और चयनित फसल के आधार पर)

ग्रीन हाउस निर्माण की सिलसिलेवार विभिन्न क्रियाओं का वर्धन निम्नलिखित है :
1. प्रस्तावित स्थल पर अधिक लम्बाई वाली ओट (जहां तक हो सके पूर्व-पश्चिम दिशा) में 4 मी. X 20 मी. के आयत को चिन्हित करना। इस आयात के दोनों विकर्ण बराबर होने चाहिए यह सुनिश्चित कर लें। यह आयत ही ग्रीनहाउस के फ्लोर प्लान का काम करेगा।
2. आयत के चारों कोनों पर चार बिन्दु चिन्हित करें। आयत की लम्बी भुजा पर चलते हुए एक कोने से शुरू करके एक-एक मीटर पर निशान लगाते हुए दूसरे कोने पर पहुंचे। इसी विधि का उपयोग आयत की दूसरी लम्बी भुजा पर करें।
3. बाल्टीनुमा बरमे और सब्बल से प्रत्येक चिन्हित स्थान पर 15 से.मी. व्यास के 75 से.मी. गहरे गड्ढे खोदें। इस तरह ग्रीन हाउस की समानान्तर भुजाओं पर कुल 34 गड्ढे तैयार हो जायेंगे।
4. चित्र में बताये अनुसार रस्से से जुडे हुये 20 मीटर लम्बाई के पालीग्रिप भागों को बनाइये। पूर्वनिर्मित पॉलीग्रिपन नलिकाओं को 6 मि.मी. व्यास में बोल्टों के आधार पाइप के साथ जोड़े। गड्ढे के बीच में लगाये गये अस्थायी सहारों पर पूरी असैम्बली को बिठाइये। इस स्थिति में इन्हें एक समान स्थिर उंचाई पर लम्बवत लटकाना चाहिए।
5. आधार पाइप के चारों ओर 1:3:6 में अनुपात का सीमेंट-कंक्रीट मिश्रण डालें जिससे नीचे का 15-20 से.मी. पाइप कंक्रीट से ढक जाये। संबल से कंक्रीट को अच्छी तरह दबायें तथा 2-3 दिन तक पक्का होने के लिए छोड़ दें।
6. कंक्रीट पक्का हो जाने पर उसके ऊपर जमीन की सतह तक मिट्टी भर दें तथा उसे अच्छी तरह दबा दें।
7. दोनों छोरों पर पूर्व निर्मित संरचना को जमाइये। इसके पैरों की स्थिति को चिन्हित करें। इन्हे बिठाने के लिए गड्ढे बनाएं। दोनों सरंचनाओं को लम्बवत रखकर स्थिर करें तथा मिट्टी डालकर दबायें।
8. पार्श्व/बगल को सहारे वाले सदस्य के मुद्रिका वाली ओर से समीपस्थ आधार पाइप पर रखें तथा दूसरी ओर से उसे छोरीय संरचना से बांध दें
9. सभी कमानों को आधार पाइप में रखें जिससे कमानों का सीधा भाग आधार पाइप के अन्दर चला जाए तथा पालीग्रीप नलिका को बैठने के लिए उपयोग किये गये बोल्ट पर स्थिर हो जाएं।
10. 15 मि.मी. व्यास के 6 मी. लम्बे चार पाइपों को बांधकर 20 मी. लम्बा रिज पाइप तैयार करें।
11. 20 मीटर लम्बे रिज पाइप को कमानों की रिज लाइन पर रखें। क्रास कनैक्टर्स का रिज लाइन पर इस तरह से उपयोग करें कि उसका आधा भाग कमान के एक तरफ और आधा भाग दूसरी तरफ हो। 6 मि. मी. व्यास के दो बोल्ट डालकर ग्रास कनैक्टर्स के दोनों सिरों को पास-पास लायें जिससे बोल्ट पर हो जाएं। पहले कुछ जोड़ों को नट की सहायता से कसें फिर इसी विधि को दोहरा कर सभी को रिज पाइप के साथ जोड़ दें। आडे़ तिरछे जोड़ को कसने से पहले यह देख लें कि इनके तथा कमान के बीच की दूरी एक मीटर है। इस तरह की पकड़ यंत्र संरचना रिज लाइन पाइप और कमान के बीच की पकड़ मजबूत करती है एवं उनको बिना फिसलन के एक दूसरे पर लंबवत बनाये रखती है।
12. पॉलीथीन की चादर को एक छोर से दूसरे छोर तक इस तरह फैलायें जिससे इसमें कोई सिकुड़न न हो तथा उसके किनारे ग्रीनहाउस संरचना से मिलते हों।
13. पॉलीथीन चादर को पालीग्रिप नलिका और समकोणिय संरचना के बीच में फंसायें तथा लोहे की कीलों की सहायता से उसे अच्छी तरह दबाकर कसें। इस तरह पॉलीथीन की चादर को दोनों तरफ वाली लम्बाई की पालीग्रिप में कस दें।
14. शेष बचे हुए दोनों छोरों पर पॉलीथीन चादर को लकड़ी के पटरों एवं कीलों की सहायता से छोरीय संरचना से जोड़ दिया जाता है। पॉलीथीन चादर को लकड़ी के पटरों और छोरीय संरचना के बीच कस दें।
15. छोरीय ढांचे के बचे हुए भाग को पॉलीथीन चादर से ढक दें। तथा इनको लकड़ी के पटरों और कीलों की सहायता से स्थिर कर यदि फाइबर गिलास या अन्य कोई पारदर्शी स्थायी सामग्री उपलब्ध हो, तो किनारों पर पॉलीथीन चादर प्रयोग की जा सकती है।
16. जैसा की अतिरिक्त निर्देशों में बताया गया है कि विभिन्न पर्तों को फुलाने (इन्फलुयेट) करने के लिए एक वायुप्रदूषण पंखे की स्थापना करें।
17. फसलों की आवश्यकतानुसार छोरीय ढांचे पर गर्म एवम्‌ ठंडा करने वाले उपकरणों की स्थापना की जाती है।

 

 

 

ग्रीन हाउस फसलोत्पादन


ग्रीन हाउस तकनीकी की सब्जियों के लिए कांच का घर होता हैग्रीन हाउस तकनीकी की सब्जियों के लिए कांच का घर होता हैग्रीन हाउस की स्थापना तथा उसमें वातावरण अनुकूलन के लिए धन खर्च होता है इसलिए ग्रीनहाउस में उगाई गई फसल तभी लाभदायक हो सकती है जबकि उससे अपेक्षाकृत अधिक कीमत प्राप्त हो सके। सामान्य रूप से ग्रीनहाउस में उत्पादित सब्जियों में ये मुख्य है टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च, सलाद, हरी प्याज, बंदगोभी, सेम, मटर, पालक, बैंगन, भिंडी, कद्दू, मूली आदि। फूलों में गुलाब कार्नेशन, जरबेरा, गुलदाउदी, बिगोनिया आदि मुख्य हैं। अच्छी गुणवत्ता युक्त स्ट्रबेरी भी ग्रीनहाउस में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। इनके अलावा तम्बाकू तथा औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ-साथ पौध उत्पादन के लिए भी ग्रीनहाउस का उपयोग सफलतापूर्वक किया जा रहा है। विभिन्न फसलों की उपज का ब्यौरा तालिका-3 में दर्शाया गया है।

तालिका-3 भारतवर्ष में ग्रीनहाउस में उत्पादित कुछ फसलों की उपज

 

 

 

सब्जी

उपज (टन/है.

फूल

उपज (लाख/ है.

टमाटर

150

गुलाब

15-20

शिमला मिर्च

95

गुलादाउदी

24-40

खीरा

180

जरबेरा

15-25

ब्रोकोली

15

कारनेशन

20-25

चप्पन कद्दू

35

 

 

 


ग्रीन हाउस के अन्दर फसलोत्पादन में खासकर सब्जी उत्पादन में प्रजाति या चयन एक महत्वपूर्ण कारक है इसलिए ग्रीनहाउस में अच्छी गुणवत्ता वाले अधिक उपज देने वाली संकर प्रजातियों का ही उपयोग करना चाहिए। सिंचाई के लिए बूंद-बूंद सिंचाई विधि का प्रयोग लाभप्रद होता है। ग्रीनहाउस के अन्दर सफाई अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि पुरानी पत्तियों आदि को न निकालने से रोग आक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। खीरा व टमाटर जैसी फसलों में प्रूनिंग व ट्रेनिंग की भी आवश्यकता होती है। वैसे तो अवांछित वृद्धि व पुरानी पत्तियों को निकालने के लिए प्रत्येक फसल में प्रूनिंग की आवश्यकता पड़ती है। ट्रेनिंग की भी विभिन्न पद्धतियों में उपयोग कर सकते हैं लेकिन वर्टिकल ट्रेनिंग विधि ज्यादा उपयोगी है। खासकर टमाटर, खीरा आदि जैसी फसलों के लिए। प्रूनिंग व ट्रेनिंग वजह से संवातन रहता है और कीट-व्याधि का प्रकोप भी कम होता है। कीट-व्याधि नियंत्रण के लिए समय पर कीटनाशक व फफूंदीनाशक दवाओं का छिड़काव करते रहना चाहिए। ग्रीनहाउस के अंदर एकलिंगाश्रयी पौधों के लिए पर परागण की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य हाथ से किया जाता हैं परागण के लिए मादा फूल में ऊपर नर फूल में परागण को छोड़ देते हैं इससे फल प्रतिशत भी बढ़ जाता है। यह कार्य प्रातः 8-10 बजे तक किया जाता है।

 

 

 

ग्रीन हाउस का रख रखाव


ग्रीन हाउस के रखरखाव के लिये निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।
1. ग्रीन हाउस आवरण की सफाई नियमित अन्तराल पर करते हैं। धूल आदि के कणों द्वारा प्रकाश की पारगम्यता कम हो जाती है, खासकर पॉली ग्रीनहाउस में इसलिए इनकी समय-समय पर धुलाई आवश्यक है।
2. पॉलीथीन आवरण को 3 साल के अन्तराल पर बदल देना चाहिए।
3. आवरण अगर कहीं फट गया हो तो उसकी मरम्मत करवाते रहना चाहिए।
4. ग्रीन हाउस में पम्प, पंखे इत्यादि की सर्विसिंग व देखभाल करनी चाहिए।
5. थर्मोस्टेट में कैलीब्रेशन की समय-समय पर जांच करते रहना चाहिए।
6. पानी की टंकी की सफाई भी करते रहना चाहिए।
7. ग्रीन हाउस के दरवाजे में बाहर एक आइसोलेशन कक्ष अवश्य बनवाना चाहिए जिसमें कि प्लास्टिक की पतली जाली का प्रयोग हो, जिससे कि कीटों आदि का आक्रमण न हो सके।
8. अगर विद्युत आपूर्ति न हो रही हो तो उस समय ग्रीनहाउस का दरवाजा खोल देना चाहिए।
9. कूलिंग पैड पर प्लास्टिक की जाली अवश्य लगानी चाहिए जिससे कि जिस वक्त पैड न चल रहा हो उस समय उसके द्वारा वगैरह ग्रीनहाउस में अंदर न आ सकें।
10. जिस समय ग्रीनहाउस का उपयोग बंद हो उस समय उसमें फ्यूमीगेशन (रसायनिक धुंआ) आदि द्वारा निर्जलीकृत कर लेना चाहिए। साथ ही साथ फसल लेने से पूर्व कार्बनिक खाद का भी प्रयोग लाभप्रद है।

 

 

 

 

ग्रीन हाउस में फसलोत्पादन का अर्थिक विश्लेषण


एक 500 वर्ग मीटर में ग्रीनहाउस में बेमौसम सब्जी उत्पादन का विश्लेषण इस उदाहरण में किया जाता है। इस ग्रीनहाउस के निर्माण में लगभग 1.0 लाख रुपये की लागत का अनुमान है। वर्ष पर्यन्त उपयोग के लिए इस ग्रीनहाउस में गर्मियों में छाया करने के लिए छाया करने वाले जाल को लगाने तथा ग्रीनहाउस में फुहारीकरण के लिए उपकरण लगाने में रुपये 30,000 (तीस हजार रुपये मात्र) का अतिरिक्त व्यय आयेगा। इस तरह कुल लागत एक लाख तीस हजार रूपये आती है। ग्रीनहाउस में आवरण और छाया करने वाले जाल की आयु तीन वर्ष है। बाकी ढांचा इस्पात का होने के कारण 20 वर्ष आयु है लागत की लगभग 10 प्रतिशत व्यय प्रत्येक रखरखाव एवं बीमा में खर्च अनुमान है। बीज, खाद, बिजली, कीटनाशक, इत्यादि पर सालाना 20,000 रूपये आ सकता इस ग्रीनहाउस काम करने लिए वार्षिक वेतन 18,000 आता उधार ली गई पूंजी 15 ब्याज देय इन सभी परिकल्पनाओं को ध्यान रखते हुए, कुल 60,000 आने अगर कृषि कार्य से 120 वर्ग मीटर आय हो रही तो पूरे पा रहे हैं।

अगर वर्ष में दो फसलें ली जा रहीं हैं, पहली शिमला मिर्च की तथा दूसरी खीरे की तो लगभग 8 कि.ग्रा. शिमला मिर्च एवम्‌ 12.कि.ग्रा. खीरा प्रति वर्ग मीटर पैदा हो सकता है। शिमला मिर्च को 10 रू/कि. ग्रा. एवम्‌ खीरे को रू.8/कि. ग्रा. की दर से बेचने में वार्षिक आय रूपये 176/वर्ग मी. हो सकती है।उपरोक्त उदाहरण से यह स्पष्ट है कि 500 वर्गमीटर क्षेत्रफल में ग्रीनहाउस से 28,000 रूपये शुद्ध लाभ कमाया जा सकता है। अगर ग्रीनहाउस में प्रयुक्त श्रम भी स्वयं का हो तो वार्षिक आमदनी 46,000 रुपये हो जायेगी। बेहतर प्रबन्धन से ग्रीनहाउस फसलोत्पादन से लाभ की दर काफी बढ़ाई जा सकती है।

 

 

 

 

स्वरोजगार की संभावनायें


ग्रीन हाउस तकनीकी से उगाई गई फल और फूलग्रीन हाउस तकनीकी से उगाई गई फल और फूलग्रीनहाउस तकनीकी द्वारा फसलोत्पादन एवं दूसरे कृषि कार्यों को बहुत लाभदायक तरीके से सम्पन्न किया जा सकता है। इसमें शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार की व्यापक संभावनायें हैं। कोई भी युवक या युवती ग्रीनहाउस निर्माण या उनमें रखरखाव या उपयोग संबंधी कार्यों को अपनाकर जीविकोपार्जन कर सकते हैं। जैसाकि पहले सिद्ध किया जा चुका है, सिर्फ 1000 वर्ग मी. भूमि से ग्रीनहाउस तकनीकी का उपयोग करके एक परिवार के लिए समुचित आय प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार ग्रीनहाउस निर्माण या रखरखाव की गतिविधियों से भी काफी आय प्राप्त की जा सकती हैं। तीनों ही स्थितियों में प्रशिक्षण की आवश्यकता है और ऐसे प्रशिक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में प्राप्त किये जा सकते हैं। भारत सरकार ने नवमी पंचवर्षीय योजना में एक ग्रीनहाउस निर्माण के लिए रुपये 40,000/- (चालीस हजार रूपये) तक के अनुदान का प्रावधान किया है।

 

 

 

 

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