ऋतु पूर्वानुमान

Submitted by Hindi on Thu, 08/04/2011 - 12:51
ऋतु पूर्वानुमान ऋतु का पूर्वानुमान करना ऋतुविज्ञान का महत्वपूर्ण उपयोग है। प्राचीन काल से ही मनुष्य ऋतु और जलवायु की अनेक घटनाओं से प्रभावित होता रहा है और फलत: ऋतु का पूर्वानुमान करने का प्रयत्न करता रहा है। उदाहरणत: किसान आकाश की ओर देखकर ही अपने उपयोग के लिए आगामी ऋतु के बारे में अनुमान कर लेता है। केवल स्थानीय ऋतु के प्रेक्षण पर अवलंबित इस प्रकार की भविष्यवाणी का उपयोग बहुत सीमित होता है। तो भी इस प्रकार की भविष्यवाणियों के आधार पर ऋतु संबंधी अनेक कहावतें प्रचलित हो गई हैं, यद्यपि वे अधिकतर ठीक नहीं उतरतीं।

वर्तमान वैज्ञानिक उपायों में ऋतु का पूर्वानुमान करने के नियम इस बात पर निर्भर हैं कि ऋतु एक प्रदेश से चलकर दूसरे प्रदेश में पहुँचती है और अधिकतर एक ही स्थान पर सीमित नहीं रहती। इस मुख्य बात की खोज प्रथमत: बेंजामिन फ्रैंकलिन ने सन्‌ 1743 में की थी जब उन्होंने यह देखा था कि एक तूफान, जिसका अनुभव उन्होंने फ़िलाडेल्फ़िया में किया था, दूसरे दिन बोस्टन पहुँच गया था। इसी प्रकार की घटना संसार के दूसरे भागों की ऋतुओं में भी देखी गई है।

ऋतु विषयक पूर्वानुमान ऋतु के मानचित्रों के आधार पर किया जाता है। इन मानचित्रों पर भिन्न भिन्न स्थानों से तार, बेतार अथवा टेलिप्रिंटर द्वारा प्राप्त सूचनाएँप्रेक्षण द्वारा प्राप्त विभिन्न स्थानों की वायु का ताप, दाब, वेग दिशा आदिअंकित की जाती हैं। इस प्रकार के ऋतु संबंधी चित्रण को संक्षिप्त चित्र (सिनॉष्टिक चार्ट) कहते हैं। ये चित्र ऋतुवैज्ञानिक के पूर्वानुमान के मुख्य आधार हैं। ऋतुचित्रों के आधार पर पूर्वानुमान करने के लिए कुछ आनुभविक नियम बना लिए गए थे जो अनेक वर्षों तक काम में लाए जाते रहे, किंतु प्रथम विश्वयुद्ध के समय से वायुमंडल संबंधी मूल समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन आरंभ हुआ और ऐसी परिकल्पनाएँ बनाने का प्रयत्न आरंभ हुआ जिनसे सैद्धांतिक ऋतुविज्ञान में और ऋतु विषयक पूर्वानुमान की आनुभविक रीतियों में सीधा संबंध स्थापित हो सके। यह उन्नति अधिकतर नॉर्वे के ऋतुवैज्ञानिकों के प्रयत्नों द्वारा हुई। मुख्यत: श्री विलहैल्म और श्री योकब ब्येर्कनेज़ को इसका श्रेय प्राप्त है। इन विशेषज्ञों ने ध्रुवीय सीमाग्र सिद्धांत (पोलर फ्रंट थ्योरी) का विकास किया जिसपर ऋतु विषयक पूर्वानुमान करने के आधुनिक नियम मुख्यत: निर्भर हैं।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ऋतु पूर्वानुमान-विज्ञान को फिर प्रोत्साहन मिला, क्योंकि युद्ध की योजनाओं के निर्माण और उनके संचालन में वायुमंडल विज्ञान के उपयोग की बहुत आवश्यकता प्रतीत हुई। इस काल में ऋतु विषयक पूर्वानुमान की कला में भी अधिक उन्नति हुई और पृथ्वी से बहुत ऊपर की वायु के वेग, दिशा, दाब, ताप और आर्द्रता आदि का ज्ञान प्राप्त करने के लिए नवीन साधनों का भी विकास हुआ। दूर-दूर के देशों में बहुत सी वेधशालाएँ खोली गई जहाँ वायुमंडल में नियत ऊँचाइयों पर ताप, दाब तथा आर्द्रता आदि जानने के लिए रेडियो के यंत्र रेडियो सॉण्ड उपयोग में लाए जाने लगे। ये रेडियो यंत्र हाइड्रोजन गैस से भरे हुए गुब्बारों द्वारा ऊपर हवा में उड़ाए जाते हैं और जैसे-जैसे यंत्र हवा में ऊपर जाता है, ऊपरी हवा के ताप, दाब और आर्द्रता के परिवर्तनों के अनुसार अपने आप रेडियो संकेत भेजता जाता है और ये संकेत पृथ्वी पर स्थित यंत्रों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं। इस प्रकार 20 किलोमीटर की ऊँचाई तक विभिन्न स्तरों की वायु के ताप, दाब तथा आर्द्रता के और उनमें होनेवाले परिवर्तनों के लेखाचित्र बना लिए जाते हैं। रेडियो यंत्र के अतिरिक्त एक नवीन आधुनिक साधन राडार यंत्र है जिसके प्रयोग से ऋतु विषयक पूर्वानुमान में पूरी सहायता मिलती है। इन सब साधनों से ऋतुवैज्ञानिक को समस्त वायुमंडल की अवस्था का और विभिन्न स्थानों में पवनवेगों का एक पूर्ण चित्र मिल जाता है जो ऋतु का पूर्वानुमान करने में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।

1. ऋतुचित्र- नियत समयों पर प्रति दिन ऋतु वेधशालाओं में और समुद्री जहाजों पर वायु के ताप, दाब, वेग, दिशा आदि के प्रेक्षण अंकित किए जाते हैं। इनमें से कुछ का प्रेक्षण तो केवल आँखों से ही किया जाता है, जैसे बादलों का रूप, दृश्यता (विज़िबिलिटी) और कुछ प्रेक्षण यंत्रों द्वारा किए जाते हैं, जैसे वायु की दाब, वेग और दिशा, ताप, वर्षा की मात्रा आदि। इन प्रेक्षणों में भेजा जाता है। वहाँ पहुँचने पर एक समयविशेष के इन समस्त प्रेक्षणों को ऋतुचित्रों पर नियमित रूप से अंकित किया जाता है। इसी भाँति के प्रेक्षण समुद्री जहाजों पर भी किए जाते हैं। भारतवर्ष में जो ऋतु संबंधी मानचित्र साधारणत: तैयार किए जाते हैं वे निम्नलिखित हैं :

(1) भूतल समदाबरेखीय चित्र (सफ्रेस आइसोबारिक चार्ट)- इसकी टॉप चार्ट भी कहते हैं। इस नक्शे में प्राय: समस्त भूतलीय प्रेक्षण अंकित कर दिए जाते हैं।

(2) वायुदाब और ताप के अंतर के चित्र- इन चित्रों में यह दिखाया जाता है कि चुने हुए समयविशेष पर वायुदाब और ताप में इनके सामान्य मानों से कितना अंतर है। इन चित्रों से ऋतु की असामान्यताओं की अच्छी सूचना प्राप्त हो जाती है। इन सबमें से वायुदाब में सामान्य से जो अंतर होता है उसका अधिकतम महत्व पाया गया है। आर्द्रता के चित्र ऋतु की घटनाओं के अनुमान के लिए लाभदायक होते हैं। उदाहरणत: कोहरा तथा धुंध के निर्माण की संभाव्यता के लिए आर्द्रता का प्रेक्षण अत्यंत आवश्यक है। तापविचरण के चित्रों से, विशेषकर न्यूनतम-ताप-विचरण-चित्रों से, शीत ऋतु में पश्चिती अवदाब क्षेत्र के आने का अनुमान होता है। इन नक्शों से सूखी ऋतु में केंद्रीय तथा दक्षिणी भारतवर्ष के भागों की उच्चस्तरीय वायु में आर्द्र वायु की धाराओं की चाल का भी ज्ञान होता है।

(3) परिवर्तनचित्र- इन चित्रों में पिछले 24 घंटों में वायु की दाब, ताप, वेग आदि में हुए परिवर्तन दिखाए जाते हैं। इनसे ऋतु के विकास के ढंग का पता चलता है।

(4) ऊपरी वायुओं के चित्र- भारतवर्ष में ये चित्र समुद्रतल से 0.2, 0.5; 1, 1.5, 2, 3, 4 और 6 किलोमीटर की ऊँचाइयों के लिए बनाए जाते हैं। बादलों की मापित तथा अनुमानित ऊँचाइयाँ ज्ञात रहती हैं। 1, 2 और 3 किलोमीटर के चित्रों पर नीचे बादलों के बहाव की दिशा अंकित की जाती है। मध्यम बादलों की दिशा 4 किलोमीटरवाले चित्र पर और इसी प्रकार 6 किलोमीटरवाले चित्र पर उच्च बादलों की दिशाएँ अंकित की जाती हैं। ऋतु विषयक पूर्वानुमान करने के लिए 1 से 6 किलोमीटर तक की ऊपरी वायुएँ बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुई हैं।

(5) सुप्रवाही रेखाएँ तथा विक्षेपमार्ग (स्ट्रीमलाइन तथा ट्रैजैक्टरी)- वायुमंउल के उष्मीय ढाँचे संबंधी दैनिक आँकड़ों के अभाव या कमी के कारण, ऊपरी वायु की अवस्थाओं का पता, हाइड्रोजन गैस से भरे वातसूचक गुब्बारों द्वारा (जिनको पाइलट बैलून कहते हैं) पवन के वेग एवं दिशा आदि को नापकर, लगाया जाता है। नक्शों पर वायु की सुप्रवाही रेखाएँ खींच ली जाती हैं और यदि संदेह हुआ तो विक्षेपमार्ग भी खींच लिए जाते हैं। जो सुप्रवाही रेखाएँ चित्रों पर समुद्र की ओर से आती हैं, वे आर्द्र समझी जा सकती हैं और जो रेखाएँ स्थल की ओर से आती हैं, वे सूखी।

समुद्रतल के ऋतुचित्रों का विश्लेषण विस्तृत वायुधाराओं और उनकी विकृतियों को अंकित करके लिया जाता है। इस प्रकार वायुमंडल की घटनाओं का स्थूल चित्र मिल जाता है और इससे एक ही दृष्टि में वायुमंडल में होनेवाली ऋतुसंबंधी प्रक्रियाओं का पता चल जाता है। ऐसा विश्लेषण वायु-संहति-विश्लेषण (एयर मास अनैलिसिस) कहलाता है। इस रीति से विश्लेषण करने पर ऋतुचित्रों पर विस्तीर्ण क्षेत्र पाए जाते हैं जो ज्ञात वायुसंहतियों से विशेषत: प्रभावित होते हैं। दो भिन्न वायुसंहतियों के बीच की सीमा को सीमाग्र (फ्रंट) कहते हैं और इन्हीं सीमाओं पर मुख्यत: आँधी पानी के क्षेत्र पाए जाते हैं। विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण चरण यह है कि ऋतुचित्रों पर समदाब रेखाएँ खींची जाती हैं। समदाब रेखाएँ उन स्थानों में से जाती है जहाँ पर वायु की दाब बराबर रहती है। समदाब रेखाओं के अतिरिक्त इन नक्शों पर वायुसंहतियाँ और भिन्न प्रकार की वायुओं के मिलने के सीमाग्र भी दिए जाते हैं।

ऊपर बताए हुए ऋतुचित्र से ऋतुविशेषज्ञ को वायुमंडल के ढाँचे का त्रिविस्तारी (थ्र-डाइमेंशनल) चित्र मिल जाता है। भारतीय ऋतु चित्र का एक उदाहरण चित्र 1 में दिया हुआ है। विश्लेषण समाप्त होने पर विशेषज्ञ ऋतु विषयक पूर्वानुमान तैयार करता है।

2. वायुदाब संहतियों के भेद- वायुदाब संहतियों के मुख्य भेद निम्नलिखित हैं:

ऋतु (क) अवदाब (डिप्रेशन) तथा चक्रवात (साइक्लोन);
(ख) प्रतिचक्रवात (ऐंटिसाइक्लोन) तथा उसके सहकारी क्षेत्र;
(ग) दाबस्फान तथा दाबकटक (वेज और रिज) जो अधिक वायुदाब के लंबे क्षेत्र होते हैं और प्रतिचक्रवातों के केंद्रों से प्रारंभ होते हैं;
(घ) घाटी (कोल) जो दो चक्रवातों तथा दो प्रतिचक्रवातों के बीच के क्षेत्र होते हैं।
ऊपर बताए हुए वायुदाब क्षेत्रों के मानचित्र चित्र 2, 3, 4 तथा 5 में दिखाए गए हैं।

3. पश्चिमी वायुविक्षोभ- सरदी की ऋतु में निम्न दाब की लहरें उत्तर भारत में पश्चिम से पूर्व की ओर चलती हैं। इन निम्न दाब की लहरों का संबंध भूमध्यसागर (मेडिटरेनियन सी) में और कभी-कभी अटलांटिक महासागर में स्थित अवदाबों से भी पाया गया है। ये पश्चिमी वायुविक्षोभ भारत में भूमध्यसागर से ईरान और पाकिस्तान होते हुए आते हैं। नवंबर महीने में यह विक्षोभ भारत के उत्तरीय सीमांत पर कभी-कभी वर्षा करते हैं और दिसंबर के मध्य से पंजाब मे जोर पकड़ना आरंभ करते हैं। सामान्यत: जनवरी से मार्च तक के महीनों में एक से तीन तक सक्रिय विक्षोभ प्रति मास पंजाब और उत्तर प्रदेश में आते हैं। जैसे जैसे शीतकाल बढ़ता जात है, ये विक्षोभ प्राय: उत्तर-पश्चिम भारत की पहाड़ियों और मैदानों में, असम के उत्तर-पूर्व कोनों मे तथा उत्तरी बर्मा और कभी कभी उत्तर भारत के विस्तृत भाग में, वर्षा करते हैं। फरवरी तथा मार्च महीनों में कभी कभी मेकरान किनारे से गौण अवदाब की लहरें भी पूर्व की ओर चलती हैं और मूल अवदाब की उत्तरी लहरों के साथ साथ केंद्रीय भारत में वर्षा करती हैं और उड़ीसा तथा बंगाल प्रदेश में आँधी पानी उत्पन्न करती हैं। पश्चिमी विक्षोभ के निकट आने के निम्नलिखित लक्षण हैं: वायुदाब का कम हो जाना (कभी-कभी दाब बहुत ही कम हो जाती है), ताप का बढ़ना, तथा बादलों का घिर आना।

बादलों की जाति स्थानीय स्थलरचना पर निर्भर रहती हैं, परंतु वह प्राय: संक्रमण-पक्षाभ (ट्रैनज़िशनसिर्रस), पक्षाभस्तरी (सिर्रो-स्ट्रेटस), मध्यस्तरी (ऐल्टोस्ट्रेटस), मध्यकपासी (ऐल्टो-क्युमुलस) और बाद में संभवत: बूँदाबाँदी के साथ स्तरित कपासी (स्ट्रेटो-क्युमुलस), कपासी (क्युमुलस) और कई स्थानों पर कपासीवर्षुक (क्युमुलो-निंबस) होती है। बरसनेवाले बादल वर्षुक (निंबस) कहलाते हैं।

पवन की दिशा का परिवर्तन इस प्रकार होता है : जब इराक, मेकरान और तटवर्ती सिंध प्रदेशों में पवन की सामान्य दिशा पश्चिम और उत्तर-पश्चिम होती है, तो यह दिशा 1.5 किलो मीटर की ऊँचाई तक उत्तर-उत्तर-पूर्व से पूर्व-उत्तर-पूर्व और 2 से 3 किलोमीटर की ऊँचाई पर पूर्व-दक्षिण-पूर्व से दक्षिण-दक्षिण-पूर्व और इससे अधिक ऊँचाई पर दक्षिण से दक्षिण-पश्चिम हो जाती है। ज्योंही विक्षोभ आगे बढ़ जाता है, पवन की दिशा नीचे के वायुमंडल में शीघ्र ही उत्तर-पश्चिम या पश्चिम हो जाती है।

4. बंगाल प्रदेश को कालबैसाखी- बंगाल प्रदेश में (मुख्यत: दक्षिण और दक्षिण-पूर्व भागों में) प्रति वर्ष मार्च से मई तक के महीनों में आँधी-पानी प्राय: आता है जो कभी-कभी तो बहुत ही भयानक होता है और जान माल को बहुत हानि पहुँचाता है ऐसे आँधीपानी को कालबैसाखी कहते हैं। कालबैसाखी प्राय: सदा उत्तर-पश्चिम दिशा से आते हैं, इसलिए इनको अंग्रेजी भाषा में नारवेस्टर अर्थात्‌ उत्तर-पश्चिमी पवन कहते हैं। गर्मी के महीनों में गंगा नदी के मैदान के ऊपर वायु का निम्नदाब क्षेत्र होता है जिसके फलस्वरूप दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिण-पूर्व दिशाओं से आर्द्र पवन दक्षिण बंगाल के निम्नदाब क्षेत्र की ओर चलने लगता है। इस आर्द्र पवन के ऊपर पश्चिमी तथा उत्तर-पश्चिमी सूखा पवन रहता है। जैसे जैसे ग्रीष्म ऋतु निकट आती जाती है, आर्द्र पवनधारा की गहराई पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ती जाती है। ऋतु के पूर्णत: उष्ण हो जाने पर इस आर्द्र पवनधारा की गहराई दक्षिण बंगाल के पूर्वी जिलों में 2 से 2.5 किलोमीटर तक रहती है। आर्द्र और सूखी वायुसंहतियों के बीच एक समतापीय (आइसोथर्मल) क्षेत्र या उत्क्रमण (इनवर्शन) होता है। अब यह प्रश्न उठता है कि कालबैसाखी किस प्रकार बनती है। यह देखा गया है कि उत्क्रमण के नीचे कालबैसाखी में पर्याप्त गुप्त अस्थिरता (लेटेंट इन्स्टेबिलिटी) होती है। इसलिए जब कभी किसी उपर्युक्त विक्षोभी (ट्रिगर) घटना के कारण उत्क्रमण नष्ट हो जाता है तो निचली आर्द्र वायु के ऊपर उठने से अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त हो जाती है। यह विक्षोभी घटना निम्नलिखित कारणों से उत्पन्न होती है :

(1) आतपन (इनसोलेशन) से।
(2) बंगाल की खाड़ी से विक्षोभ अथवा चक्रवाती तूफान के कारण आर्द्र पवनों के आगमन से।
(3) पश्चिमी विक्षोभ के शीतल सीमाग्र के पूर्व की ओर जाने से।
(4) ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी से पवनधारा के कारण वायु के जमाव से।
(5) आँधीपानी में से शीतल वायु के भिन्न भिन्न दिशाओं में बहने से।

5. भारतीय समुद्रों में निम्नदाब क्षेत्र तथा चक्रवाती तूफान- अवदाब वायुमंडल का वह भाग होती है जिसमें वायु की दाब चारों ओर के भागों से कम होती हैं। इस प्रकार अवदाब के क्षेत्र को परिवेष्टित करनेवाल समदाब रेखाएँ लगभग गोल या अंडाकार होती हैं। अवदाबों का विस्तार बहुत अधिक होता है। इनकी गहराई 100 मील से 2,000 मील तक की हो सकती है। जिस अवदाब में वायुदाब बाहरी भाग की अपेक्षा केंद्र के समीप बहुत कम होती है, वह गरही अवदाब कहलाती है। जिस अवदाब में वायुदाब केंद्र के समीप कम तो होती है परंतु आसपास के भागों की अपेक्षा अधिक कम नहीं होती, वह उथली अवदाब कहलाती है। अवदाब में ऋतु अस्थिर रहती है और विभिन्न दाबों के गतिवेग भिन्न भिन्न होते हैं। यह वेग कदापि नियत नहीं रहता। कोई कोई अवदाब 600 से 700 मील प्रति दिन के वेग से चलती है और कोई कोई स्थिर भी रहती है और इस ऋतु में जो परिवर्तन होते हैं वे केवल अवदाब में होनेवाले परिवर्तनों के कारण ही होते हैं। भारतीय ऋतुविज्ञान विभाग में प्रचलित विधि के अनुसार अवदाब शब्द का प्रयोग केवल उन चक्रवाती परिवहनों (साइक्लोनिक सर्क्युलेशंस) के लिए किया जाता है जिसमें ब्यूफोर्ट संकेतन प्रणाली के अनुसार पवनवेग 7 या कम बल का होता है। जब पवनवेग का बल 8 हो जाता है तब अवदाब चक्रवाती तूफान बन जाती है। यदि पवन वेग का बल 10 हो जाए और साथ ही कभी कभी प्रभंजन के झोंके (हरीकेन स्कवाल) भी हों तो चक्रवाती तूफान को प्रचंड कहा जाता है। साधारणत: अवदाब भारतीय समुद्रों के उन भागों में बनता है जहाँ उत्तर-पूर्वी एवं उत्तर-पश्चिमी सूखा स्थलीय पवन दक्षिण से आनेवाले आर्द्र पवन से मिलता है। जनवरी और फरवरी महीनों में वर्षण के क्षेत्र भूमध्यरेखा के दक्षिण में होते हैं और ये क्षेत्र धीरे-धीरे उत्तर की ओर चलते जाते हैं तथा मई महीने के दूसरे या तीसरे सप्ताह तक बंगाल की खाड़ी के मध्य में पहुँच जाते हैं। इनकी गति तब तक उत्तर की ओर ही बनी रहती है जब तक दक्षिण-पश्चिम पावस गंगाघाटी पर छा नहीं जाता और अवदाब बंगाल की खाड़ी में बनने नहीं लगती। जैसे-जैसे पावस पीछे हटने लगता है, पार्थक्यरेखा फिर से दक्षिण-पूर्व की ओर चलने लगती है और अक्टूबर महीने में बंगाल की खाड़ी के केंद्रीय भाग में और दिसंबर महीने में भूमध्यरेखा के पास उत्तर में आ जाती है। अरब सागर में पार्थक्यरेखा इतनी स्पष्ट नहीं होती और दक्षिण-पश्चिम पावसकाल में प्राय: कोई भी अवदाब या चक्रवाती तूफान नहीं बनते, परंतु कभी-कभी बंगाल की खाड़ी को अवशिष्ट अवदाब उत्तरी-पूरब सागर पर प्रभाव डालती है। अरब सागर में चक्रवादी तूफान मई और जून के आरंभ में और अक्टूबर-नवंबर में बनते हैं।

6. ऋतु पूर्वानुमान- इस छोटे से लेख में ऋतुचित्रों द्वारा पूर्वानुमान करने की रीति का पूरा ब्योरा देना संभव नहीं है। अत: यहाँ केवल उन साधनों की रूपरेखा बताई गयी जिसे भविष्यवक्ता प्रयुक्त करता है।

ऋतु चित्रों से पूर्वानुमान करने में तीन समस्याएँ उपस्थित होती हैं :
(1) भविष्यवक्ता के लिए यह जानना आवश्यक है कि ऋतुचित्र पर अंकित वायु-दाब-क्षेत्र किस दिशा की ओर चलेंगे।
(2) पूर्वानुमान के परासकाल में वायु-दाब-क्षेत्रों की परिस्थिति में क्या क्या परिवर्तन होंगे।
(3) स्थल संबंधी रूपरेखा का ऋतु पर क्या प्रभाव हो सकता है।

वायु-दाब-क्षेत्रों की गति की दिशा जानने का एक नियम यह है कि मान लिया जाता है कि दिशा तथा वेग वे ही जारी रहेंगे जो थोड़ी देर पहले प्रेक्षण द्वारा ज्ञात किए गए थे। परंतु इस नियम का उपयोग समुद्र के तटवर्ती स्थलों पर विशेष सावधानी से करना चाहिए। भविष्यवक्ता को वायु-दाब-क्षेत्रों और उनमें होते हुए परिवर्तनों को जानने के लिए सबसे महत्वपूर्ण सहायता वायुदाबी प्रवृत्ति की सूचना से मिलती है जो भविष्यवक्ता को विभिन्न वेधशालाओं से प्राप्त होती है। वायुदाबी प्रवृत्ति यह बताती है कि वायुदाब में पिछले तीन घंटों में क्या परिवर्तन हुआ है और उसके लक्षणों से यह भी ज्ञात होता है कि परिवर्तन इस काल में एक समान ही होता रहा है या नहीं। उदाहरणत: क्या वायुदाब पहले घटकर फिर बढ़ा है? इस बात का सुझाव सर्वप्रथम स्वीडन देश के ऋतुवैज्ञानिक डाक्टर निल्स एकहोल्म ने दिया था कि एक ऐसा चित्र भी खींचा जाए जिसमें पूर्ववर्ती प्रेक्षण के पश्चात्‌ नियत समय तक के वायु दाब-परिवर्तन अथवा समदाब-परिवर्तन (आइसैलोबारिक) रेखाएँ (जो घटते और बढ़ते वायुदाब-क्षेत्रों को परिवेष्टित करती हैं) अंकित रहें। ये क्षेत्र सम-दाब-परिवर्तनीय चित्र पर बहुत ही स्पष्ट पाए गए हैं। यह भी देखा गया है कि समदाब परिवर्तन संबंधी वायुसंहतियाँ साधारण वायु-दाब-संहतियों की अपेक्षा अधिक नियमित रूप से चलती हैं और दीर्घ काल तक एक ही पथ पर चलती रहती हैं। परंतु यह कह देना आवश्यक हैं कि भारतवर्ष में ऋतु संबंधी वायु-दाब-परिवर्तनों का मान प्राय: स्वल्प होता है और इस कारण दैनिक परिवर्तनों की अनियमिताओं से उनके दब जाने की संभावना रहती है। इसलिए वायुदाबी प्रवृत्ति की दैनिक सूचना से ऋतुचित्र के विश्लेषण में भारत में कोई मुख्य सहायता नहीं मिल पाती। परंतु अत्यंत विक्षुब्ध ऋतु में कभी-कभी वायुदाबी प्रवृत्ति से अच्छी सहायता मिलती है। उदाहरणत:, वायुदावी प्रवृत्ति से तूफान या अवदाबों की गति की दिशा का अनुमान हो जाता है, क्योंकि अत्यंत विक्षुब्ध ऋतु में वायु दाब-परिवर्तनों का परिणाम इतना अधिक होता है कि उसपर दैनिक परिवर्तनों की अनियमितताओं का प्रभाव नहीं पड़ता।

मौसम का पूर्वानुमान करने की समस्या को सफल रूप से हल करने की एक उत्तम विधि नारवेजियन विधि के नाम से प्रख्यात है। इसके अनुसार ऋतु ध्रुवीय तथा भूमध्यरेखीय वायुओं के बीच में सांतरता (डिसकोटिनाइटी) के पृष्ठ की उपस्थिति पर अधिकतर आधारित मानी जाती है। इस प्रकार की सांतरता की रेखा प्रेक्षण द्वारा वायुमंडल में सचमुच पाई जाती है।

वायुयानों के लिए ऋतु विषयक पूर्वानुमान- विमानचालन के विस्तार के साथ-साथ पृथ्वीतल से अधिक ऊँचाई तक के लिए ऋतु संबंधी पूर्वानुमान की माँग बढ़ गई है। वायुयान संबंधी ऋतु पूर्वानुमान में बादलों की ऊँचाई, दृश्यता, वायुक्षोभ (टर्ब्युलेंस), वायुयान पर बर्फ जमने की संभावना, पवन के वेग तथा दिशा, बादलों की महत्तम ऊँचाई और पृथ्वीतल पर वायु के झोंकों के विषय में सूचना होती है। वायुयान संबंधी पूर्वानुमान और साधारण दैनिक पूर्वानुमान का आधार सूचनाएँ दी जाती हैं जैसे मौसमी वेधशालाओं से प्राप्त अंतिम क्षण तक की ऋतु की सूचना।

मध्यपरास तथा दीर्घपरास पूर्वानुमान- पूर्वानुमान के काल का परास प्राय: 24 से लेकर 36 घंटों तक से अधिक नहीं होता। उसके बाद 36 या 48 घंटों की ऋतु के बारे में केवल रूपरेखा ही दी जा सकती है। इससे अधिक समय तक के लिए पूर्वानुमान देने के संबंध में बहुत कुछ कार्य हो रहा है, परंतु अभी तक इस कार्य में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हुई है। इस कार्य पर परिश्रम जारी है और ध्येय यह है कि ऐसी रीतियों का विकास हो सके जिनकी सहायता से अगले पाँच से 10 दिन तक की ऋतु का ठीक-ठीक पूर्वानुमान करना संभव हो सके।

सांख्यिकीय ऋतु पूर्वामान- सांख्यिकीय (स्टैटिस्टिकल) विधियों द्वारा ऋतु विषयक पूर्वानुमान करने का कार्य भारत में पिछले अनेक वर्षों से प्रचलित है और इस क्षेत्र में इस देश में पर्याप्त सफलता मिली है। इस विधि का आधार यह है कि भारत की पावसवर्षा पर संसार के कुछ अन्य देशों की ऋतु संबंधी घटनाओं का प्रभाव पड़ता है। उदाहरणत:, दक्षिण-अमरीका में अप्रैल और मई महीनों के पवन के वेग तथा दिशा का, दक्षिण रोडेशिया में अक्टूबर से अप्रैल में हुई वर्षा की मात्रा का, पश्चिमी हिमालय पर्वत पर मार्च और अप्रैल में हिमपात की मात्रा का पावसवर्षा पर बहुत प्रभाव पाया गया है। संसार के इन सब भागों से ऋतु संबंधी न्यास एकत्रित करके सह-संबंध-गुणांक (कोरिलेशन कोइफ़िशेंट) निकाले गए हैं, जिनके आधार पर ऋतु संबंधी पूर्वानुमान किया जाता है। ध्येय यह है कि इस प्रकार का पूर्वानुमान 80 प्रतिशत ठीक हो।

Hindi Title


विकिपीडिया से (Meaning from Wikipedia)




अन्य स्रोतों से




संदर्भ
1 -

2 -

बाहरी कड़ियाँ
1 -
2 -
3 -

Disqus Comment