सब्सीडी का अनोखा खेल

Submitted by Hindi on Tue, 08/09/2011 - 12:48
Source
भारतीय पक्ष, 09 अगस्त 2011

वित्त मंत्री ने मन बनाया है कि कृषि सब्सीडी को लाभार्थी को सीधे नगद के रूप में दे दिया जाये। वित्त मंत्री के इस मन्तव्य का स्वागत किया जाना चाहिये। सरकार द्वारा डीजल, यूरिया, खाद्यान्न आदि पर सब्सीडी दी जा रही है। आम आदमी समझता है कि उसे राहत मिल रही है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता है। सब्सीडी में दी गई रकम को वसूल करने के लिये सरकार जनता पर टैक्स लगाती है। ज्ञात हो कि यह भार अन्ततः जनता पर ही पड़ता है। अंतर मात्र इतना होता है कि यह भार टैक्स अदा करने वाले पर पड़ता है जबकि सब्सीडी हासिल करने वाले को राहत मिलती है। विषय जनता के एक वर्ग से रकम को वसूलकर दूसरे वर्ग को देने का है। तमाम अधययन बताते हैं कि इन सब्सीडी का बड़ा हिस्सा देश के संभ्रांत वर्ग को पहुंचता है। सब्सीडी आम जनता से रकम वसूलकर संभ्रांत वर्ग को पहुंचाने का माध्यम है।

इस प्रक्रिया में कई समस्यायें सामने आयी हैं। कम्पनियों द्वारा उत्पादन लागत बढ़ाकर दर्ज कराई जाने के संकेत मिल रहे हैं। मान लीजिये, यूरिया की वास्तविक उत्पादन लागत 9 रुपये प्रति किलो है और कम्पनी 2 रुपये की सब्सीडी पाने की हकदार है। परन्तु कम्पनी खातों में हेरा-फेरी करके उत्पादन लागत 10 रुपये की बताती है और सरकार से 3 रुपये की सब्सीडी हथिया लेती है। दूसरी समस्या यह है कि सब्सीडी की अधिकाधिक रकम कृषि कम्पनियों एवं बड़े किसानों द्वारा पकड़ ली जाती है। इंडियन इंस्टीट्यूट, अहमदाबाद द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि बड़े किसानों के पास 18 प्रतिशत कृषि भूमि है परन्तु वे 48 प्रतिशत फर्टिलाइजर की खपत करते हैं। यानि जो सब्सीडी छोटे किसान के लिये दी जा रही है, उसका मुख्य लाभ बड़े किसान उठा रहे हैं। खाद्य सब्सीडी का वितरण बीपीएल कार्ड के आधार पर किया जाता है। परन्तु इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 52 प्रतिशत खेत मजदूर एवं 60 प्रतिशत अनुसूचित जातियों को बीपीएल कार्ड नहीं मिले थे। इसी प्रकार की समस्यायें रसोई गैस, कैरोसीन और डीजल पर दी जा रही सब्सीडी में पाई गयी है। अतः वित्ता मंत्री ने मन बनाया है कि इन सब्सीडी को लाभार्थी को सीधे नगद के रूप में दे दिया जाये।

वित्त मंत्री के इस मन्तव्य का स्वागत किया जाना चाहिये। गरीब के नाम पर उच्चवर्ग और कम्पनियों को पोषित करना उचित नहीं है। हमारे धर्म ग्रन्थों में गरीब को नगद देने की व्यवस्था है। ‘अर्थशास्त्र’ में कौटिल्य कहते हैं कि राज्य को अमीरों से टैक्स वसूल करके गरीबों की मदद करनी चाहिये। इस्लाम में सरकारी राजस्व का उपयोग गरीब, विधवा एवं विकलांगों के लिये करने की व्यवस्था जकात के नाम से है।

सब्सीडी के नगद वितरण के विरोध में कई तर्क दिये जा रहे हैं। पहला तर्क है कि नगद सब्सीडी को लाभार्थी तक पहुंचाना उतना ही कठिन होगा जितना कि फर्टिलाइजर या खाद्यान्न सब्सीडी को पहुंचाना। रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अन्तर्गत लाभार्थी को पेमेन्ट कई राज्यों में उनके बैंक के खातों के माध्यम ये किया जा रहा है। फिर भी झूठे नाम से खोले गये खातों से रकम का रिसाव हो रहा है। यह समस्या सही है। परन्तु देखना चाहिये कि रिसाव कम कैसे किया जाये? पानी की टंकी से कुछ पानी तो हवा में उड़कर समाप्त होता ही है। उसकी चिन्ता करने के स्थान पर सामने दिख रहे लीकेज को रोकने का जतन करना चाहिये। नगद सब्सीडी में रिसाव कम होने की सम्भावना है। बैंक खाते की खोजबीन करना तुलना में आसान है। सरकार द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को विशेष पहचान नम्बर आवंटित किया जा रहा है, जिसमें फिंगर प्रिंट एवं आंख के चित्र शामिल होंगे। इनमें गड़बड़ी करना कठिन होगा।

दूसरा तर्क है कि देश की खाद्य सुरक्षा पर संकट आ सकता है। वर्तमान में किसान को प्रमुख फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य उपलब्ध है। इस मूल्य से आशान्वित होकर किसान गेहूं और चावल जैसी फसलों का अधिकाधिक उत्पादन कर रहे हैं। फूड कार्पोरेशन द्वारा खरीदे गये इस खाद्यान्न को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से वितरित किया जा रहा है। लाभार्थी को नगद सब्सीडी देने के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा किसानों से खरीद नहीं की जायेगी तथा समर्थन मूल्य पालिसी समाप्त हो जायेगी। किसान को उचित मूल्य की गारन्टी नहीं मिलेगी और खाद्यान्न उत्पादन गिर सकता है। यह समस्या सच्ची है। परन्तु इसके दूसरे विकल्प उपलब्घ हैं। सुझाव है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पालिसी को जारी रखा जाये। फूड कार्पोरेशन को ‘फूड ट्रेडिंग कार्पोरेशन’ में बदल दिया जाये। समर्थन मूल्य के अन्तर्गत खाद्यान्न को खुले बाजार में बेचा जाये। खाद्यान्न का उत्पादन अधिक होने पर फूड कार्पोरेशन उसे खरीद कर भंडारण करे। जब उत्पादन कम हो तो भंडार की बिक्री करके माल उपलब्ध करा दे। इस प्रकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली समाप्त करने के बावजूद समर्थन मूल्य को जारी रखा जा सकता है।

नगद सब्सीडी के विरुद्ध तीसरा तर्क जनता को सुदिशा देने का है। सोच है कि जनता अज्ञानी एवं मूर्ख होती है। वह स्वयं सही निर्णय नहीं ले पाती है। जैसे साठ के दशक में किसान रासायनिक फर्टिलाइजर का उपयोग कम ही कर रहे थे यद्यपि इनका उपयोग लाभप्रद था। इसलिये लाभप्रद वस्तुओं को कृत्रिम रूप से सस्ता बनाकर जनता को उसका उपयोग करने के लिये प्ररित करना चाहिये। इस आधार पर फर्टिलाइजर सब्सीडी देना प्रारम्भ किया गया था। सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराने का भी यही आधार है। मेरे आकलन में यह तर्क सही नहीं है। यदि जनता को मूर्ख माना जाये तो लोकतंत्र का आधार ही खिसक जाता है। अनेक अध्ययन बताते हैं कि किसान मूल्यों के आधार पर फसलों का चयन बखूबी करते हैं। यदि फर्टिलाइजर वास्तव में लाभप्रद है तो जनता उसे बिना सब्सीडी के भी अपना लेगी।

वास्तव में नगद सब्सीडी का और अधिक विस्तार करने की जरूरत है। सरकारी शिक्षा, स्वास्थ एवं जन कल्याण तंत्र को समाप्त करके इस रकम को भी नगद वितरित कर देना चाहिये। लोग बाजार से अपनी मन पसंद की शिक्षा खरीद लेंगे। साथ-साथ नगद वितरण को बीपीएल के झंझट से मुक्त कर देना चाहिये। बीपीएल मात्र को सब्सीडी देने से जनता में गरीब बने रहने की मनोवृत्ति बनती है। गरीब को चिन्हित करने के विवाद भी उत्पन्न होते हैं। सुझाव है कि जन कल्याण खर्च एवं सब्सीडी की रकम को सम्पूर्ण देश की जनता में वितरित कर देना चाहिये।

वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009-2010 में सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने 406 हजार करोड़ रुपये खर्च किये। इसमें स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवायें सम्मिलित हैं। इनमें रिसर्च आदि को छोड़कर शेष कल्याणकारी योजनाओं को समाप्त कर दें तो 300 हजार करोड़ की रकम बच सकती है। इसके अतिरिक्त 150 हजार करोड़ विभिन्न सब्सीडी तथा 50 हजार करोड़ रोजगार गारंटी में खर्च किये जा रहे हैं। इन तमाम योजनाओं को समाप्त करें तो 500 हजार करोड़ प्रति वर्ष उपलब्ध हो सकते हैं। इसे देश के सम्पूर्ण 20 करोड़ परिवारों में 24,000 रुपये प्रति वर्ष की दर से वितरित किया जा सकता है। बल्कि अमीरों पर 2,400 रुपये प्रति वर्ष का अतिरिक्त टैक्स लगाया जा सकता है। चूंकि उन्हें इतनी रकम नगद सब्सीडी के रूप में वापस मिलेगी। ऐसा करने से देश के हर परिवार को जीवन यापन करने की न्यूनतम सुविधायें उपलब्ध हो जायेंगी और देश को जन कल्याण के नाम पर पोषित हो रहे सरकारी कर्मचारियों की वेलफेयर माफिया से निजात मिल जायेगी।
 

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