कोप 15 : कोपेनहेगन के कोपभाजन का शिकार कौन होगा?

Submitted by admin on Tue, 12/08/2009 - 09:50
वेब/संगठन
कोपेनहेगन के समुद्र तट पर स्थापित एक कलाकृतिकोपेनहेगन के समुद्र तट पर स्थापित एक कलाकृतिकोपेनहेगन में दुनियाभर के लगभग सभी देश इकट्ठा हो रहे हैं. हमारे अखबार हमें बता रहे हैं कि कोपेनहेगन में कुछ देशों को कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है. अखबारों की सदिच्छा और इच्छा अपनी जगह लेकिन कोपेनहेगन में वे देश शेष देशों के कोपभाजन बनेंगे जिन्हें सचमुच बनना चाहिए, ऐसा लगता नहीं है. दुनिया में पर्यावरण के पहले के सम्मेलनों में अगर कभी कुछ ऐसा हुआ होता तो हमें उम्मीद भी बंधती कि दादा देश कोपभाजन का शिकार होंगे और दुनिया का दर्शन बदल जाएगा.

लेकिन ऐसा है नहीं. दुनिया के दादा देशों का स्वभाव ऐसा है कि वे अपने कोपभाजन का शिकार शेष विश्व को बनाते हैं. बिना किसी शक के आज हम इस तरह की कार्यशैली के लिए अमेरिका को अगुआ मान सकते हैं. चीन नया नया इस जमात में शामिल हो रहा है और भारत भी दरवाजे पर दस्तक देने के लिए आतुर है. ये सारे देश मिलजुलकर पर्यावरण की चिंता करने के लिए कोपेनहेगन में इकट्ठा हो रहे हैं. लेकिन इस इकट्ठा होने का क्या वास्तव में कोई अर्थ है?

पर्यावरण की बात करते समय जिस एक विषय पर बिल्कुल ही बात नहीं हो रही है वह है- पर्यावरण का दर्शन. पर्यावरण का दर्शन अर्थात मनुष्य के जीवन का दर्शन. विज्ञान के प्रभाव में धीरे धीरे मनुष्य ने पर्यावरण के दर्शन से अपना जीवन दर्शन अलग कर लिया है और विज्ञान के साथ मिलकर जीवन का अनोखा दर्शन विकसित कर लिया है. या तो हम समझना नहीं चाहते या वाकई हमें समझ में नहीं आता कि वर्तमान पर्यावरण की समस्या का मूल कारण इसके विज्ञानमय दर्शन में ही निहित है. जैसा कि आज हो रहा है सारी बहस सिर्फ विज्ञान पर आकर सिमट गयी है. क्या इससे कोई रास्ता निकलेगा? हमें, आपको और उनको भी यह समझना होगा कि विज्ञानमय दर्शन और औद्योगीकरण की यूरोपीय अवधारणा इस समस्या के मूल में है. आज जिसे विकास कहा जा रहा है वह समस्या के मूल में है. कुछ समय पहले पश्चिम ने ही नारा दिया था कि बिना विनाश के विकास. लेकिन जल्द ही उनको लगा कि विनाश न करने की बात करके भी विकास के दौरान विनाश को रोक पाना मुश्किल है. तो फिर उन्होंने नारा दिया है सतत विकास. मैं कहता हूं, विकास को सस्टेनेबल बनाने की बजाय दिमाग को सस्टेनेबल बनाओ. दस-पचास साल की योजना बनाने की बजाय हजार साल की योजना बनाओ क्योंकि हजार साल बाद भी धरती पर हमारी संताने तो रहेंगी ही. अगर उनके लिए आप धरती को सुरक्षित छोड़ना चाहते हैं तो अपने दर्शन में बदलाव करना ही होगा.इस अर्थ को समझने के लिए दुनिया में पर्यावरण पर चल रही बहस के विषय बिन्दु देखना होगा. आज दुनिया में तीन तरह से पर्यावरण पर बात हो रही है. सबसे पहले पर्यावरण के नाम पर विज्ञान पर बहस हो रही है. दुनिया में जहां कहीं भी पर्यावरण की समस्या है वहां विज्ञान पर व्यापक बहस भी साथ में ही मौजूद है. आज जिसे क्लाइमेट चेंज कहा जा रहा है उस क्लाइमेट चेंज की बहस में भी सर्वाधिक बहस विज्ञान पर ही है. विज्ञान ने औद्योगीकरण को जो टेक्नालाजी दी है उसने विकासवादी व्यक्ति को औंधे मुंह गिरा दिया है. इसलिए चर्चा का सबसे अहम बिन्दु यही है कि इस टेक्नालाजी को कैसे पटखनी दी जाए. जिन्होने इस तकनीकि को आकार दिया वे कह रहे हैं इसे ग्रीन कर दिया जाए. ग्रीन टेक्नालाजी से औद्योगीकरण का शैतान देवदूत में परिवर्तित हो जाएगा और इक्कीसवीं सदी में पर्यावरण की समस्त समस्याओं का निदान हो जाएगा.

निदान के लिए जिस समाधान को सुझाया जा रहा है उसे दुनिया के कुछ विकसित देश माने और विकसित होते देश उस पर चलने का वादा करें इसके लिए दूसरे क्रम में राजनीतिक सक्रियता है. पर्यावरण की राजनीति में यह तय किया जा रहा है कि कौन सा प्लेयर क्या करेगा. इस राजनीति में कार्बन रूपी ब्रह्मास्र चलाया जा रहा है. अभी चीन और उसके बाद भारत ने कहा है कि वह कार्बन उत्सर्जन को कम करेगें. इसे चीन और भारत की सदिच्छा मानना चाहिए कि वे भी दुनिया के पर्यावरण को लेकर उतने ही चिंतित नजर आ रहे हैं जितने अमेरिका या यूरोप के देश. लेकिन इस सदिच्छा के संदर्भ उतने व्यापक और गहरे नहीं है जितने कि होने चाहिए. कार्बन उत्सर्जन की बहस के बीच विकास को बलिदान करने की तथाकथित तैयारी एक तरह से दुनिया के दादा देशों पर किया जा रहा अहसान नजर आता है जो दुर्भाग्य से उनसे सरोकार नहीं रखता है जिनसे रखना चाहिए. पर्यावरण के नाम पर जो राजनीति हो रही है उसका भी आदि अंत विज्ञान के इर्द गिर्द सिमटा हुआ है. इसलिए इस तरह की राजनीति से पर्यावरण बचाने में कोई मदद मिलेगी, निर्णय कर पाना मुश्किल है.

पर्यावरण की बात करते समय जिस एक विषय पर बिल्कुल ही बात नहीं हो रही है वह है- पर्यावरण का दर्शन. पर्यावरण का दर्शन अर्थात मनुष्य के जीवन का दर्शन. विज्ञान के प्रभाव में धीरे धीरे मनुष्य ने पर्यावरण के दर्शन से अपना जीवन दर्शन अलग कर लिया है और विज्ञान के साथ मिलकर जीवन का अनोखा दर्शन विकसित कर लिया है. या तो हम समझना नहीं चाहते या वाकई हमें समझ में नहीं आता कि वर्तमान पर्यावरण की समस्या का मूल कारण इसके विज्ञानमय दर्शन में ही निहित है. जैसा कि आज हो रहा है सारी बहस सिर्फ विज्ञान पर आकर सिमट गयी है. क्या इससे कोई रास्ता निकलेगा? हमें, आपको और उनको भी यह समझना होगा कि विज्ञानमय दर्शन और औद्योगीकरण की यूरोपीय अवधारणा इस समस्या के मूल में है. आज जिसे विकास कहा जा रहा है वह समस्या के मूल में है. कुछ समय पहले पश्चिम ने ही नारा दिया था कि बिना विनाश के विकास. लेकिन जल्द ही उनको लगा कि विनाश न करने की बात करके भी विकास के दौरान विनाश को रोक पाना मुश्किल है. तो फिर उन्होंने नारा दिया है सतत विकास. मैं कहता हूं, विकास को सस्टेनेबल बनाने की बजाय दिमाग को सस्टेनेबल बनाओ. दस-पचास साल की योजना बनाने की बजाय हजार साल की योजना बनाओ क्योंकि हजार साल बाद भी धरती पर हमारी संताने तो रहेंगी ही. अगर उनके लिए आप धरती को सुरक्षित छोड़ना चाहते हैं तो अपने दर्शन में बदलाव करना ही होगा.

लेकिन जब दर्शन में बदलाव की बात होती है तो कोई इस पर बात नहीं करना चाहता. कोपेनहेगन में भी यही होगा. विज्ञान पर राजनीति होगी और सब लोग विदा हो जाएंगे. उर्जा के जिन विकल्पों को साफ सुथरा बताया जा रहा है उस पर आगे बढ़ने की बात होगी जिसमें परमाणु तकनीकि से बिजली पैदा करने की वकालत होगी. विज्ञान की समस्या को विज्ञान के समाधान से समझने समझाने की कोशिश होगी. इसलिए कोपेनहेगन के कोपभाजन का शिकार वे तो कतई नहीं होंगे जो इसके विनाश के लिए जिम्मेदार हैं. यह थोड़ा असहज है लेकिन सच्चाई यही है कि कोपेनहेगन के कोपभाजन का शिकार एक बार फिर पर्यावरण ही बनाया जाएगा लेकिन ऐसा होगा पर्यावरण बचाने के नाम पर.

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अनुपम मिश्रबहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सीएसई की स्थापना में अनुपम मिश्र का बहुत योगदान रहा है. इसी तरह नर्मदा पर सबसे पहली आवाज अनुपम मिश्र ने ही उठायी थी.

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