जनस्वास्थ्य इंजीनियरी

Submitted by Hindi on Thu, 08/11/2011 - 17:45
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इसके अंतर्गत मुख्यत: जलप्रबंध तथा जनस्वास्थ्य, दो विषय, आते हैं।

जलप्रबंध


जनस्वास्थ्य और जल  देश में जनस्वास्थ्य ठीक रखने के लिए यह परम आवश्यक है कि प्रत्येक समुदाय और व्यक्ति को यथेष्ट और स्वच्छ पीने का पानी मिले। जनस्वास्थ्य को कोई खतरा न रहे इसलिए घरों के द्रवीय तथा ठोस, दूषित मल दूर ठिकाने लगाने के लिए भी जल ही काम आता है।

यदि जलप्रबंध विश्वसनीय तथा मात्रा में पर्याप्त, विकृतिजनक तथा हानिकारक तत्वों से रहित और उपभोक्ताओं को दिन रात नल पर ठीक वेग से सुलभ हो, तो उसे निरापद और संतोषजनक समझा जाता है।

भारत सरकार की पर्यावरण स्वास्थ्यविज्ञान समिति (1949) के अनुसार सुरक्षित जन-जल-प्रबंध का लक्ष्य यह होना चाहिए कि ऐसे जल का प्रबंध किया जाए जो

1. रोगप्रसार के भय से रहित, मन को भानेवाला और रसोई बनाने तथा कपड़े धोने के उपयुक्त हो।
2. स्थापन काल से लेकर कम से कम एक पीढ़ी (30 वर्ष) तक सारे घरेलू और सार्वजनिक उपयोग के लिए पर्याप्त हो।
3. स्थानीय परिस्थितियों में उपभोक्ताओं को न्यूनतम शारीरिक कष्ट से सुलभ हो। कुएँ या नल के बंबे की दूरी का प्रश्न भी इसी में आ जाता है।
4. दिन के 95 प्रतिशत समय में उपलब्ध हो। पर्याप्तता, जलवितरण का समय तथा सह्यकाल के लिए विभंग भी इसी में आ जाते हैं।इनके अतिरिक्त पेय और अपेय जल का प्रबंध पास-पास करना जनजीवन के लिए भयावह और अनुचित है और जलवितरण यथासंभव बीच बीच में रुकनेवाला नहीं होना चाहिए।

खेद की बात है कि भारत की अधिकांश सामुदायिक जलप्रबंध व्यवस्था में इन आवश्यकताओं का ध्यान नहीं रखा गया है। भारत में पेय तथा औद्योगिक जल के मानक अबतक निश्चित नहीं हो सके हैं। इंडियन कौंसिल ऑव मेडिकल रिसर्च (आयुर्विज्ञान अनुसंधान की भारतीय परिषद्) ने पेय जल का मानक निर्धारित करने के लिए एक समिति नियुक्त की थी। समिति ने विश्वस्थास्थ्य संगठन का मानक लगभग स्वीकार कर लिया है।

जल के गुण 


उपभोक्ता को विमल, रंगहीन, आपत्तिजनक स्वाद तथा गंध रहित, आवश्यक रासायनिक पदार्थयुक्त, मृदु और अत्यंत स्वाथ्यकारी गुण का जल मिलना चाहिए ताकि वह निरापद रूप से उसे पी सके (पेय जल का अंतरराष्ट्रीय मानक, विश्वस्वास्थ्य संगठन, जेनेवा, 1958 द्वारा स्वीकृत)।

प्राकृतिक स्रोत से उपलब्ध सब जलों में उपर्युक्त गुण नहीं होते। प्राकृतिक जल दूषित तथा आपत्तिजनक अशुद्धियों से युक्त होता है। प्राकृतिक जल को भौतिक, रासायनिक तथा जीवाणु विज्ञानीय विधियों से शोधित किया जाता है। शोधित होने के बाद ही जल पेय हो पाता है।

परिमाण 


किसी व्यक्ति की जल की घरेलू दैनिक आवश्यकता की मात्रा उसकी स्वच्छताप्रियता तथा स्थानीय जलवायु और कुछ अन्य बातों पर निर्भर है। वह इसपर भी निर्भर है कि उसके घर के तरल और ठोस मलों के संग्रह और निकास के क्या साधन हैं। एक लाख से कम आबादीवाले कस्बों में जहाँ मल की निकासी के लिए जलसंवाहन विधि प्रयुक्त होती है, प्रति दिन प्रति व्यक्ति को कम स कम 25 गैलन जल मिलना चाहिए। अच्छा हो यदि इसे बढ़ाकर 30 गैलन प्रति व्यक्ति प्रति दिन कर दिया जाए। बड़े नगरों में, जहाँ मल निकासी जलसंवाहन विधि से की जाती है, वहाँ प्रति व्यक्ति प्रति दिन के इस औसत को कार्यान्वित करना बहुधा नागरिक प्रशासन की आर्थिक सीमाओं के बाहर की बात होती है। उदाहरण के लिए, मद्रास की वर्तमान जलवितरण व्यवस्था संतोषजनक नहीं है, किंतु यदि 120 मील दूर से नदियों का पानी लाया जाए तो जनता उसकी लागत का भार भी वहन नहीं कर पाएगी।

जलप्राप्ति 


जल भूमिपृष्ठ तथा भूमिगत स्त्रोतां से लिया जा सकता है। भूमिपृष्ठजल झील, तालाब, नदी नालों से लिया जा सकता है, यदि वे बारहमासी हों और उनका न्यूनतम प्रवाह नगर की माँग पूरी करने के लिए पर्याप्त हो। यदि ये बारहमासी न हों, तो वर्षाकाल में बहनेवाले जल को उपयुक्त स्थलों में बाँध बनाकर इकट्ठा किया जाता है। बाँध का स्थल, या बारहमासी नदियों, झीलों और तालाबों से जल लेने का स्थान निश्चित करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। यह पानी निकालने का स्थान गाँव या नगर की अपेक्षा ऊँचाई पर होना चाहिए, जिससे जल दूषित न हो सके। यह स्थान औद्योगिक केंद्रों से दूर होना चाहिए, जिससे औद्योगिक मल जल को दूषित न कर सके। ऐसा करने से जलनिर्मलीकरण यंत्र पर भार कम पड़ता है।

भूमिपृष्ठीय जल 


संग्राही जलाशय में जलसंग्रह इतना होना चाहिए कि लगातार तीन वर्षों तक वर्षा न होने पर भी जनता की जल की माँग पूरी हो सके। संग्रह के लिए प्राप्य जल का परिमाण नदियों के आवाहक्षेत्र तथा उस क्षेत्र की वर्षा पर निर्भर है। भारत के विभिन्न भागों में 2  से 200  तक की वर्षा होती है।

जलाशयों में जल का बहुत बड़ा भाग वाष्पीकरण द्वारा उड़ जाता है। इस कमी को पूरी करने की व्यवस्था होनी चाहिए। क्षेत्र की जलवायु के अनुसार जलाशय के औसत क्षेत्रफल पर 5 से 15 फुट तक अतिरिक्त जल इकट्ठा करने से यह कमी पूरी होती है। वाष्पीकरण से बहुत बड़ी जलराशि खो जाती है।

कुछ देशों में वाष्पीकरण द्वारा जलहानि के नियंत्रण का सक्रिय प्रयास चल रहा है। आस्ट्रेलिया सन्‌ 1952 से ही प्रयत्नशील है। सेटाइल ऐलकोहल तथा हेक्साडेकोनल इस प्रयोजन के लिये प्रयुक्त हो रहे हैं। इस रासायनिक पदार्थ को पानी पर फैलाने की विधि भारत में निकाली गई है और प्रयोग चल रहे हैं।

नदियों के रेतीले तल में बहुत सा जल रिसकर एकत्र हो जाता है, जो रिसना बंद होने पर रेत में बना रहता है। नदियों के तल में 'अंत:सरण सुरंग' (infiltration galleries) तथा संभरण कूपों की व्यवस्था करके यह भूमिगत जल काम में लाया जा सकता है।

भूजल 


भूजल की प्राप्ति भूवैज्ञानिक अवस्थाओं पर निर्भर है। भारत में सभी जगह भूजल नहीं है। पश्चिमी बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार और गुजरात के कुछ हिस्सों में ही भूजल पर्याप्त मात्रा में है। यह जल गहरे कुओं से निकाला जाता है, जो 100 से 1,000 फुट की गहराई तक खोदे जाते हैं। इन कुओं से 500 से 40,000 गैलन तक जल प्रति घंटे निकलता है।

भूजल में घुले हुए लवण तथा अशुद्धियाँ होती हैं। वितरण के पूर्व जल को इनसे रहित करना आवश्यक है।

कुछ देशों में समुद्रजल को पेय बनाने के प्रयत्न चल रहे हैं। अभी तक समुद्रजल को पेय बनाने की कोई सस्ती विधि नहीं विकसित हो सकी है। संभव है, भविष्य में कोई ऐसी विधि निकल आए।

घरों में जल का अपव्यय 


घरों में जल के अपव्यय के दो कारण हैं : (1) वितरित जल की माप व्यवस्था का अभाव तथा (2) विरामी जल-वितरण, अर्थात्‌ जल का लगातार न प्राप्त होना। यह आवश्यक है कि सारे जलवितरण पर जलमापी लगाए जाएँ, पर भारत में अनेक स्थानीय शासन जलमापी लगाना नहीं चाहते।

विरामी जलवितरण व्यवस्था में जल कुछ काल सबेरे और कुछ काल शाम को वितरित किया जाता है। फलत: लोग सबेरे जितना हो सकता है पानी भर लेते हैं और शाम को पानी चालू होने पर सबेरे का पानी फेंक कर फिर भर लेते हैं, जिसके कारण बहुत बड़े परिमाण में जल का अपव्यय होता है।

जल निर्मलीकरण 


भूपृष्ठ जल के संदूषित होने का भय सर्वदा ही रहता है, अत: वितरित करने के पूर्व उसे साफ कर लेना आवश्यक है। भूपृष्ठीय जल को सुरक्षित रखने के लिये इसका उचित शोधन पहला कर्तव्य है। नदियों के जल का गुण बदलता रहता है और अधिकतर झीलों और तालाबों के जल से कम संतोषजनक होता है। गंदे क्षेत्रों में से होकर बहनेवाला जल मलमूत्र और औद्योगिक मलों से बहुत दूषित हो जाता है।

जल में निम्नलिखित अपद्रव्य रह सकते हैं, जिनको जल का वितरण करने से पूर्व दूर करना चाहिए। 1. निलंबित ठोस (गंदलापन और तलछट), 2. घुले हुए ठोस, 3. घुली हुई गैसें, 4. रंग तथा कार्बनिक पदार्थ, 5. स्वाद तथा गंध और 6. अणुजीव।

अपद्रव्य कैसे और कितने हैं, जल का किस कार्य के लिए उपयोग किया जाएगा, कौन कौन से और कितने अपद्रव्य सहन हो सकते हैं, इन बातों पर जल का निर्मलीकरण निर्भर करता है।

जल का भौतिक निर्मलीकरण 


भूपृष्ठीय जल में थोड़ा गँदलापन होता है, जो सतह की धुलाई से आई धूल के निलंबन से हो जाता है। जल का गँदलापन रासायनि उपचार के बाद, या पहले ही, उसे बड़े जलागारों में भरकर, या अवक्षेपण कुंडों अथवा नियार जलागारों में से निकालकर या छानकर, या दोनों विधियों को मिलाकर, कम किया जा सकता है। किंतु इन उपायों से गँदलापन पूर्णतया दूर नहीं होता। इसके लिय रासायनिक विधियों का सहारा लेना पड़ता है।

प्राकृतिक जल में प्राय: लवण घुले होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। लवण की बहुतायत से कब्जियत होने का डर रहता है। मैग्नीशियम तथा केल्सियम युक्त जल जठरांत्रीय रोग उत्पन्न करता है। फ्लुओराइड युक्त जल के सेवन से दाँत, हड्डी, जोड़ तथा केंद्रीय और परिधीय तंत्रिकातंत्र के रोग हो जाते हैं।

रासायनिक शोधन 


असंयुक्त कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस युक्त जल क्षारक होता है। जल का क्षारक गुण गैस की मात्रा पर निर्भर है। जल में यह गैस नैसर्गिक, या ऐल्यूमिना सल्फेट पर पानी की क्रिया से, उत्पन्न होती है। इस गैस के प्रभाव से लोहे तथा इस्पात के पाइपों और अन्य सतहों पर लाली छा जाती है, जिसे रक्त जलप्लेग कहा जाता है। इसे दूर करने का उपाय जलवितरण के पूर्व उसमें मिली कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को कम करना है। इसके लिए वातन, या चूने के रासायनिक संयोग, या दोनों विधियों का प्रयोग करना पड़ सकता है। सोडा राख भी प्रयुक्त हो सकती है। वतन द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड हवा में निकल जाता है। पर चूने की क्रिया से वह चूने के साथ क्रिया कर कैल्सियम कार्बोनेट या कैल्सियम बाइकार्बोनेट बनाता है, जो क्षारक न होने पर भी जल को कठोर बना देता है।

साधारणतया विलीन कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के बाइकार्बोनेट, या सल्फेट, या क्लोराइड के कारण जल कठोर होता है। कठोर जल न घरेलू काम के योग्य होता है न उद्योग के। कठोर जल में साबुन अधिक खर्च होता है। कठोरता का उपचार उसके प्रकार और उसकी मात्रा पर निर्भर है। बाइकार्बोनेट की कठोरता चूने की क्रिया से दूर होती है। चूने की क्रिया से बाइकार्बोनेट विघटित होकर कैल्सियम कार्बोनेट तथा मैग्नीशियम कार्बोनेट का तलछट बन जाता है। यदि कठोरता सल्फेट तथा बाइकार्बोनेट दोनों के कारण है, तो जल का उपचार चूना तथा सोडा राख से किया जाता है, जिससे कैल्सिमय कार्बोनेट तथा मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड नीचे बैठ जाते हैं।

चूना तथा सोडा राख उपचार के साथ जल मृदुकरण की जिओलाइट विधि भी प्रयुक्त होती है। इस विधि में गँदलेपन से मुक्त जल प्राकृतिक, या कृत्रिम जिओलाइट, के संपर्क में लाया जाता है। कैल्सियम और मैग्नीशियम का स्थान जिओलाइट का सोडियम ले लेता है। इस प्रकार जल मृदु हो जाता है। जिओलाइट की तहों में जल तब तक छाना जाता है जब तक सोडियम पूरा निकल नहीं जाता। इसके बाद जिओलाइट की तह से जल निकाल दिया जाता है तथा वह नमक के सांद्र विलयन से पुनर्जनित की जाती है। क्षार का विनिमय होता है। जिओलाइट में मिले हुए कैल्सियम तथा मैग्नीशियम को नमक के विलयन का सेडियम प्रतिस्थापित कर देता है। जिओलाइट अपनी पूर्वावस्था में आ जाता है। इसमें से द्रव पुन: निकालकर उसे साफ पानी से धोया जाता है, ताकि पुनरुजीवक नमक विलयन लेश मात्र भी न रह जाए। इस प्रकार जिओलाइट पुन: काम के लिए तैयार हो जाता है। लिओलाइट विधि से कठोरता पूर्णतय समाप्त की जा सकती है, किंतु यह विधि सार्वजनिक जलप्रबंधों में अभी काम में नहीं लाई जाती।

संश्लिष्ट रेज़िन भी जल की कठोरता को दूर करने में प्रयुक्त होते हैं। संश्लिष्ट फिनॉल तथा टैनिन्‌ से निर्मित रेज़िन आयन विनिमय द्वारा कठोर जल से कैल्सियम तथा मैग्नीशियम को पृथक्‌ कर देते हैं। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल या नमक के विलयन से रेज़िन का पुनर्जनित किया जाता है।

धनायन रेज़िन भारत में बनता है और ऋणायन आयात करना पड़ता है। नैशनल केमिकल लेबॉरेटरी, पूना, ने धनायन रेज़िन पेटेंट कराकर इस दिशा में नेतृत्व किया है। अब प्रश्न केवल रेज़िन को जनसाधारण के लिए सुलभ करने का है, ताकि प्रत्येक खाने कुएँ का पानी मृदु बनाया जा सके।

पृष्ठजल में नाइट्रेट की मात्रा अपेक्षया कम होती हे, किंतु भूगर्भ जल में प्रति लिटर ये सैकड़ों मिलीग्राम तक हो सकते हैं। इनसे बच्चों और वयस्कों को कोई हानि नहीं होती, किंतु प्रयोग से निश्चित हो चुका है कि प्रति लिटर 80 मिलीग्राम से अधिक नाइट्रेट की मात्रा उन बच्चों के लिए विष का काम करती है जिन्हें माता का दूध उपलब्ध नहीं हो पाता।

फ्लुओराइड भी रासायनिक पदार्थ है, जो पानी में घुला होता है। महामारी-विज्ञान संबंधी प्रयोग से सिद्ध हुआ है कि प्रति दस लाख भाग जल में 1.5 अंश से अधिक फ्लुओराइड बचपन में दाँतों की बनावट और सड़न की प्रतिरोधशक्ति पर कुप्रभाव डालता है।

जल से फ्लुओराइड निकालने की कई विधियाँ हैं, किंतु इनमें से कोई भी सस्ती नहीं है। भारत में अनेक स्थानों पर कुएँ के पानी में काफी फ्लुओराइड पाए गए हैं। लोग इन कुओं का पानी पीकर फ्लुओराइड के कुप्रभावों के शिकार होते हैं। इस क्षेत्र में अनुसंधान जारी है।

लकड़ी के बुरादे से विशेष विधि द्वारा प्रस्तुत कोयले से पीने के पानी से फ्लुओराइड को हटाया जा सकता है। कोयले से फ्लुओराइड दूर करने की विधि सरल, सस्ती और कारगर होती है। साथ ही यह विधि भारत के गाँवों की परिस्थितियों के अनुकूल भी है। धान मात्रा अध्ययन से ज्ञात होता है कि शोधित जल की लागत (6.00 अंश प्रति दस लाख भाग से घटाकर 1.5 अंश प्रति दस लाख भाग तक यदि फ्लुओराइड कम की जाती है) प्रति सहस्र गैलन 30 और 40 नए पैसे के बीच होगी।

लोहे की उपस्थिति 


यदि जल में लोहे की मात्रा सहनसीमा से अधिक हो तो यह आपत्तिजनक है। यह लोह भूपृष्ठ जल में हवा के संपर्क से ऑक्सीकृत होकर लाल तलछट के रूप में रहता है। ऐसा पानी नल के सामान पर दाग उत्पन्न करता है और पीने में अरुचिकर होता है। वातन और छनाई से लोहे की मात्रा को कम किया जा सकता है। कहीं-कहीं छानने के पूर्व चूने से पानी का उपचार किया जाता है। जब जल में मैग्नीशियम घुला होता है, तब तलछट लाल रंग का न होकर काला होता है। मैंगनीज को दूर करने की विधि लोहे को दूर करने की विधि जैसी ही है। मैंगनीज़ के लिए चूना और लोहा विधि काम में लाई जाती है, अर्थात्‌ चूना और फेरस सल्फेट का प्रयोग छनाई से पहले ऐल्यूमिना सल्फेट के साथ, या उसके अभाव में भी, किया जाता है।

स्वाद और गंध 


जल में स्वाद और गंध (1) प्राकृतिक कारणों से, (2) औद्योगिक-गंदगी और मलमूत्र तथा (3) जलीय वनस्पति, जैसे काई और प्रोटोजोआ की वृद्धि, आदि से होती हैं।

विषाक्त जल 


प्राकृतिक जल में भयंकर तथा दीर्घकालिक राग उत्पन्न करनेवाले पदार्थ बहुधा नहीं होते। जीवाणु संग्राम में जल को ऐसा संदूषित किया जा सकता है कि उसके सेवन से मृत्यु हो सकती है। ऐसे जल में बहुत विषैला सायनायड विष रहता है, जिससे बचना संभव नहीं है।

भारत के जलकल इंजीनियर की दूसरी समस्या है, जलागार या नदियों के मुहाने पर काई की असीम वृद्धि। काई पानी को अरुचिकर बनाती और छनाई में बाधा डालती है, जिसके कारण फिल्टर की पुन: धुलाई आवश्यक हो जाती है। समस्या तब और भी जटिल हो जाती है, जब जलागार के पानी के घटने से काई का प्राकृतिक क्षय और सड़न शुरू हो जाती है। विविध काइयों का कुप्रभाव निम्नलिखित एक या एक से अधिक विधियों के प्रयोग से, दूर किया जा सकता है: (1) साधारण और उच्च दाबीय वातन, (2) अधिक्लोरीनीकरण (breakpoint chlorination), (3) पूर्व और पश्चक्लोरीनीकरण (4) तूतिया (कापर सल्फेट) के उपचार, (5) चूना का अति उपचार (6) दानेदार सक्रियकृत कार्बन, (7) ओजोनीकरण, और (8) अति क्लोरीनीकरण (superchlorination)।

गुरुत्व ढंग के तेज बालू फिल्टर युक्त आधुनिक जल उपचार संयंत्र का गंदलापन दूर करने का अनुक्रम इस प्रकार है:

(अ) पूर्व निथारन टंकी (Pre-sedimentation tank)।
(ब) दमक मिश्रण रसायनकक्ष (Flash mixing chemical house)।
(स) समाक्षेपक (Flocculator)।
(द) निर्मलकारी (Clarifier)।
(इ) फिल्टर
(ई) रोगाणुनाशन (Disinfection)।

पूर्व निथारन कुंड 


इसकी कार्यक्षमता 4 घंटे से 24 घंटे तक की होती है, जो उपचार किए जानेवाले जल के गँदलेपन पर निर्भर है। इसका उद्देश्य 200 छेदवाली जाती में से भी निकल जानेवाले रेतकणों को दूर करना होता है ओर ये रेतकण बहुत जगह घेरते हैं। सिल्ट की मात्रा अधिक हाने पर उससे भी अधिक निष्कासन को लक्ष्य बनाना पड़ता है। पूर्व निथारन कुंड में ही ठोस पदार्थों का निष्कासन निर्मलकारी समाक्षेपक में अपक्षेपक (Co-agulant) की मात्रा कम करने में सहायक होता है।

बहुधा निलंबित ठोस पदार्थों के शीघ्र निष्कासन के लिए पूर्व तलछटीकरण कुंड में अपक्षेपक मिलाना पड़ता है। पूर्व तलछटीकरण कुंड या निर्मलकारी समाक्षेपक में प्रवेश से पूर्व काई बहुल अपरिष्कृत जल का क्लोरीनीकरण लाभदायक होता है।

समाक्षेपण 


आजकल क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर बाधक मिश्रण टंकी (Horizontally or vertically Baffled Mixing Tanks) की अपेक्षा यांत्रिक समाक्षेपण की ओर रुझान अधिक है। अच्छे समाक्षेपक से अपक्षेपक की खपत 50 प्रतिशत तक कम हा सती है। समाक्षेपण टक्कर तथा आसंजन (adhesion) से प्रभावित होता है। टक्कर भौतिक बलों तथा आसंजन रासायनिक ये वैद्युतिक बलां पर आश्रित है।

आकार, अंतराल, गति और व्यवस्था की दृष्टि से समाक्षेपक पैडलों का अभिकल्प अत्यंत महत्व का है। पैडल ऐस हो कि गुंफ (floc) को पानी स बुहार कर निलंबित हल्के कणों को पकड़ पकड़कर बड़ा तथा भारी पिंड बना डाले। अभिकल्प में सुडौल गुच्छे के एक भाग को प्रभावक प्रांत में लौटाकर बेसिन में प्रवेश करते हुए ताजे पानी की असंख्य कणिकाओं के लिये केंद्रक (Nucleus) बनाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।

ऐल्यूनिनियम सल्फेट, फेरस सल्फेट, चूना और फेरिक क्लोराइड नामक रासायनिक पदार्थों का अधिकतर प्रयोग किया जाता है। भारत में जल-उपचार-संयत्रों में फिटकरी अपक्षेपक के रूप में बहुतायत से प्रयुक्त होती है। अपक्षेपक की मात्रा निर्धारित करने के लिए प्रति दिन 'जार परीक्षण' (Jar test) किया जाता है।

रासायनिक अपद्रव्य (धनायन और ऋणायन), पी एच मान मिश्रण, समाक्षेपण गुंफ निर्माण को प्रभावित करते हैं। यद्यपि सर्वोत्तम पी-एच मान ताप के साथ बदलता है पर गुंफनिर्माण की दर ताप से प्रभावित नहीं होती।

रासायनिक पदार्थ विलयन या शुष्क रूप में डाले जाते हैं। भारत में विलयन संभरण और विदेशों में शुष्क संभरण चलता है। संभव है उपयुक्त गुणों से युक्त आर्द्रता-अग्राही (Non-hygroscopic) फिटकरी सुलभ हो तब भारत में भी शुष्क संभरण होने लगेगा।

दमक मिश्रण द्वारा रासायनिक पदार्थ ताजे पानी में जल्द से जल्द भली भाँति मिलाया जाता है। इसके लिए प्रवाह की धारिता से अधिक धारितावाले तीव्र गतिवाले प्रेरक मिश्रक (High speed Impeller mixers) प्रयुक्त होते हैं। मिश्रण एक सा और तीव्र होना चाहिए ताकि रासायनिक पदार्थों के सर्वोत्तम उपभोग (optimum consumption) द्वारा उपचार उत्तम हो।

पृथक्‌ समाक्षेपक या निर्मलकारी समाक्षेपक कुंड युक्त निथार कुंड  इसके अभिकल्प में मुख्य कारक हैं (क) परिवाह वेग, (ख) अवरोध काल, (ग) उद्रोध वेग, (घ) प्रवेश और निकास व्यवस्था, (ङ) अवमल संग्राहक अवकाश और (च) कुंड का आकार।

परिवाह वेग गँदलेपन पर निर्भर है और फुट से लेकर 5 फुट प्रति घंटा तक होता है। अवरोध काल दो से तीन घंटे तक होता है, लेकिन ठीक अभिकल्प से 1 से घंटे तक घटाया जा सकता है। उद्रोधवेग प्रति धंटे प्रति फुट लंबाई में 140 से 180 घन फुट तक से अधिक नहीं होता। प्रवेश और निकास ऐसा हो कि लघु परिपथ की संभावना न रहे। प्रवेश पर वेग 0.2 फुट प्रति सेकंड से कम हो ताकि गुंफ टूट न जाए। अवमल संग्रह अवकाश (sludge storage volume) उन कुंडों के लिए जिनकी सफाई हाथ से की जाती है, आवश्यक है। जिन कुंडों का अवमल कीच यंत्र से निकाला जाता हे, उनमें अवमल के लिए अतिरिक्त अवकाश नहीं रखा जाता। कुंड गोलाकार या आयताकार होते हैं।

उच्च दरवाला निर्मलकारी समाक्षेपक लोकप्रिय हो रहा है। अपक्षेपक, मृदुकारक या अन्य रासायनिक पदार्थ से उचारित जल का टंकी के तल में जाकर जहाँ गुंफ इकट्ठा होता है, पुन: गुंफ या पतले अवमल में से ऊपर उठकर छलक पड़ना, इस कुंड की विशेषता है। अवमल की परत में से होकर उठते समय भारी गुंफ तल में गुरुत्व के कारण बैठ जाता है और शेष गुंफ को छानकर और अवमल परत की अन्य भौतिक, और रासायनिक क्रियाओं से निकाल लिया जाता है। बहुत से संयंत्रों के ऊपर उठते हुए जल के क्रमिक मंदन (gradual deceleration) द्वारा अवमल निष्कासन प्रेरित किया जाता है। अवमल के एक भाग के सतत स्वचालित निकास द्वारा अवमल परत को वांछित गहराई तथा संधानता पर रखा जाता है। अवरोध काल को एक घंटे से कम रख्ते हुए गँदलेपन के लिए 10 फुट प्रति घंटे तथा कठोरता निष्कासन के लिए 15 फुट प्रति घंटे की परिवाह दर (overflow rate) से टंकियाँ चलाई जा सकती है।

निस्यंदन (फिल्ट्रेशन) 


भारत में नगर जलप्रबंध के लिए मंद बालू के निस्पंदक (फिल्टर) और तीव्र बालू के निस्यंदक प्रयुक्त होते हैं।

तीव्र बालू निस्यंदन 


भारत में यह विधि दिनोदिन अधिक लोकप्रिय होती जा रही है। पहले दिनों में जल के पूर्वानुकूलन (preconditioning) पर, अर्थात्‌ उसके निस्यंदकों पर आने से पहले, कम ध्यान दिया जाता था और छानने पर अधिक। अब छानने से पहले गँदलापन तथा दूषित जल का गँदलापन और जीवाणुओं को दूर करने के लिए पानी का रासायनिक उपचार आवश्यक समझा जाता है। तेज बालू निस्यंदन की क्षमता छानने के वेग और छनित (filtrate) की कोटि पर निर्भर है। अब यह मान लिया गया है और वास्तविक व्यवहार से सिद्ध हो गया है कि छाने हुए की कोटि का ्ह्रास किए बिना भारत में निस्यंदकों के अभिकल्प में स्वीकृत 80 गैलन प्रति वर्ग फुट प्रति घंटे की दर बढ़ाकर 120 गैलन प्रति वर्ग फुट प्रति घंटे करना संभव है। बेलिस (Baylis) ने सिद्ध किया है कि शिकागो (अमरीका) के लिये 200 से 400 फुट प्रति वर्ग फुट प्रति घंटे की छानने की दर निरापर, संतोषजनक और आर्थिक दृष्टि स लाभप्रद है। वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली, की राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में केंद्रीय जनस्वास्थ्य इंजीनियरी अनुसंधान संस्था के के दिल्ली के क्षेत्रीय केंद्र में किए गए प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है कि छनित जल की कोटि पर बुना प्रभाव डाले बिना ही छानने की दर 150 गैलन प्रति वर्ग फुट प्रति घंटे तक बढ़ाई जा सकती है।

दूषित जल से काई के निकास के लिए आजकल सूक्ष्म छनाई (micro straining) पर बहुत ध्यान दिया गया है। ताजे जल के पथ में पट पर एक पतली परत बनती है और उसकी वैसी ही क्रिया होती है जैसी मंद बालू निस्यंद की। श्युट्सडेक (Schmutzdecke) की सूक्ष्म छनाई इसी क्रिया पर आधारित है। सूक्ष्म छनाई 9 इंच से कम शीर्ष (head) पर ही काम करती है।

भूजल का उपचार 


भूजल का प्रबंध स्थान पर ही करना चाहिए और दूषण से सुरक्षित होना चाहिए। आवाह क्षेत्र में उपयुक्त जलनिकासी होनी चाहिए। उसमें बाढ़ न आती हो और वह सुरंग, मलनाली इत्यादि से दूर होना चाहिए। शैल और स्थल रूपरेखा तथा भौमिकीय रचना का ध्यान आवश्यक है। घृणित, विषाक्त और हानिकार अवशिष्ट द्रव निकालनेवाले औद्योगिक कारखानों से भूजल दूर रहना चाहिए।

जल प्रबंध का स्थल चुनते समय निम्नलिखित विशेषताओं का ध्यान रखना चाहिए:
1. भूजल की घटनाविधि  क्या जल जलस्तर के निकट के क्षेत्र से या उत्स्रोती क्षेत्र से प्राप्त होता है?
2. जल जिस स्वतंत्रता से कुएँ की ओर बह सकता है उसके विचार से भूमिरचना का ढंग या संरध्रंता समांगता, पदार्थों के आकार, स्तरीकरण, शैल विलयप्रणाली, भ्रंश इत्यादि भूमि के लक्षण और भौमिक रचना के विचार से जो भूजल को प्रभावित करते हैं।
3. जल के स्रोत की दृष्टि से भूमि की सतह और जलस्तर की ढाल का कोण और दिशा।
4. संदूषण स्त्रोत से दूरी और संदूषण को परिरुद्ध करने और उसे कुएँ के निकट धरती में समाने से रोकने के लिए संरचनात्मक लक्षण (structural features)।
5. संभावित अथवा प्रयुक्त पंप क्रिया का वेग।

भमिगत स्रोत से उपलब्ध जल में, निलंबित गंदली की कमी या अभाव होने पर भी घुले हुए लवण हो सकते हैं, जिनकी संशोधन विधि बताई जा चुकी है। ताजे या रासायनिक रीति से उपचरित पानी के विकृति जनक या परजीवी जीवाणुओं के नाश के लिए क्लोरीन या उसके यौगिक सबसे अधिक प्रभावकारी हैं। कुछ संयंत्रों में ओजोन भी प्रयुक्त होता है।

क्लोरीन पानी तें विरंजन चूर्ण या गैस के रूप में प्रयुक्त हो सकता है। क्लोराइड के विलयन के विद्युद्विश्लेषण से प्राप्त क्लोरीन प्रयुक्त हो सकता है। क्लोरीन की जीवाणुनाशी क्षमता उसके मिलाने की विधि पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वह पानी के गुण और संपर्ककाल पर निर्भर करती है। क्लोरीन की मात्रा, ताप, संपर्ककाल, इच्छित परिणाम तथा अन्य कारकों पर निर्भर है। भारत में क्लोरीन को मात्रा का ऐसा नियमन किया जाता है कि संवितरण प्रणाली के अंतिम सिरे पर अवशिष्ट क्लोरीन 0.1 से 0.2 अंश प्रति दस लाख भाग रहे। संपर्ककाल 20 से 30 मिनट तक का होता है। द्रव क्लोरीन सबसे प्रभावी रोगाणुनाशक है, अत: वही अधिक उपयोग में लाया जाता है। यदि पानी में कार्बनिक अंश अधिक हो, तो उसका अधिक्लोरीनीकरण (breakpoint chlorination) किया जाता है।

मल और मल निपटारा


मल उपचार (Sewage Treatment)  मल में 99.85 प्रतिशत पानी और 0.15 प्रतिशत अपद्रव्य रहते हैं। अपद्रव्यों में 40 निलंबित और कोलायडीय पदार्थ और लगभग 60 विलेय पदार्थ रहते हैं।

मलशोधन का ढंग शोधन के अंतिम उत्पाद, 'निस्राव' (effuent), का कैसे निपटारा होता है इसपर निर्भर करता है। यह निस्राव लोककंटक न बने या जलधारा को दूषित न करे जिससे जनता के स्वास्थ्य पर संकट पड़ सके, इसका ध्यान रखा जाता है। साधारणतया शोधन के दो ढंग प्रचलित हैं, प्राथमिक और द्वितीयक। प्राथमिक शोधन में द्रव मल से आसानी से निथरनेवाले ठोस अंश को यंत्रों से दूर किया जाता है। इसमें चालना, कचरे या कंकर को दूर करना और कोलायडीय कणों को सामान्य रीति से निथरने देना, या रसायनकों को डालकर अवक्षिप्त करना है। द्वितीय शोधन का कार्य है ऑक्सीजन की उपस्थिति में कोलायडीय और विलेय कार्बनिक पदार्थों को जीवरासायनिक कारकों द्वारा स्थायी रूप में परिणत करना। द्वितीय शोधन में ये क्रियाएँ होती हैं : (1) बड़ी जलराशि में विसर्जन द्वारा तनूकरण, (2) भूमि सिंचाई, (3) कई प्रकार के टपकनेवाले फिल्टरों  खले, बंद या तीव्रगामी  का प्रयोग, जिनमें बारबार परिचालन किया जा सके तथा (4) यांत्रिक प्रक्षोभन या विसरित वायु के समावेशन से सक्रियकृत अवमल विधि।

प्रारंभिक शोधनकुंड के तल में बैठे हुए ठोस 'कच्चा अवमल' कहे जाते हैं और द्वितीय शोधनकुडं के तल में बैठे ठोस सक्रियकृत अवमल या ह्यूमस कहलाते हैं। कच्चे अवमल में जलांश 80-99 प्रतिशत होता है। मल अवमल अत्यंत अप्रिय और अस्थायी होता है। इसका उपचार और निपटारा वैसा ही कठिन है, जैसा स्वयं मल का होता है। वह कृषि में उपयोगी तो है, क्योंकि मंदगति से नाइट्रोजन उन्मुक्त करने का साधन है, पर इसकी भौतिक दशा और उच्च जलांश कृषि में इसकी उपयोगिता को सीमित कर देते हैं।

चिथड़े, धातु, कूड़ा, बेंत, ईटं आदि पदार्थ चालन से निकल जाते हैं। इनका संयत्र में प्रवेश पाना ठीक नहीं, क्योंकि ये यंत्र के चलते पुर्जों जैसे जंजीर, दाँतेदार चक्रों, पहियों, दंडों आदि से उलझकर भारत गड़बड़ी उत्पन्न कर सकते हैं। फिर वे संयत्र में व्यर्थ ही स्थान घेरते हैं। एक बार संयंत्र में प्रविष्ट होने पर इन्हें निकालना सरल नहीं होता। इसके लिए अत्यावश्यक शोधनयंत्रों को बंद करना या उनका पानी अस्थायी तौर पर निकालना पड़ता है।

छलनी 


इसके (क) मोटी छलनी (coarse screen) या रैक, (ख) छड़ छलनी, अथवा (ग) बारीक तोड़नेवाले उपकरण (comminutor devices) आदि विभिन्न रूप हो सकते हैं।

मोटी छलनी चौकोर या गोल छड़ों को नाली में समान दूरी पर लगाकर बनाई जाती है। खुली जगह से 4 इंच तक होती है और छड़ें ऊर्ध्वाधर से 45 से 60 तक के कोण पर झुके हुए क्षैतिज मंच पर समाप्त होती हैं। पंजे द्वारा रैकं से पदार्थ हटाए जाते हैं।

छड़वाली छलनी हाथ से भी चलाई जाती है और यंत्र से भी। ये छलनियाँ लगभग सभी संयंत्रों में काम में लाई जाती हैं। हाथ छलनी में छड़ें बराबर दूरी पर लगाई जाती हैं, जिससे एक रैक बन जाता है। रैक की ढाल क्षितिज तज से प्राय: 60 नत होती है। वह एक मंच पर समाप्त होती है। छानन (screenings) को जल से रहित करने के लिए उसपर पंजा मारा जाता है। छड़ों के बीच की जगह साधारण तौर पर 1 से इंच तक होती है। यंत्र द्वारा छलनी के छड़ ऊर्ध्वाधर, या उससे बहुत ही छोटे कोण पर, लगे होते हैं। चलते पंजे छानन को उठाकर मंच पर बाल्टियों में य ठेले पर डाल देते हैं। इन छलनियों को, लगातार या रुक रुककर, चलाया जाता है। बारीक तोड़नेवाले उपकरणों को विभंजक (shredder or communitor) कहा जाता है। इनका आकर झिरीदार ढील सा होता हे, जो मलपथ में घूमता रहता है। ज्यों ज्यों ढोल काटनेवाली धारों स लगकर घूमता है, उसकी झिर्रियों में प्रविष्ट होनेवाले पदार्थों के टुकड़े-टुकड़े होते रहते हैं। कुछ कलों में एक स्थिर ढोल होता है, जिसके काटनेवाले फलक झिरीदार सतहों से लगकर घूमते हैं। कुछ में चलते-फिरते फलक होते हैं, जो छलनी पर इकट्ठा किए हुए पदार्थ काटते हैं। इसे प्राय: लगातार चलाया जाता है।

छड़ छलनी की छानन सीधे ट्रक या टीनों में निवर्तन के लिए भर दी जाती है। कभी-कभी उन्हें कलों से जलोत्सारक धरातल (drained floor) पर डाला जाता हे, जहाँ उनका पानी निकालकर उन्हें अंतिम निपटारे के स्थल पर ले जाया जाता है।छलनी पर जमी हुई छानन की बड़ी राशियों की शीघ्र ही निपटारे के कार्यस्थलों से हटाया जाता है, जिससे कोई उत्पात न पैदा हो। उनसे सड़ी दुर्गंध निकलती है जो संयत्र के आस पास बहुत बुरी लगती है। उन्हें या तो तीन फुट गहरी नालियों में दबाकर उनसे पीछा छुड़ाया जाता है, या उन्हें घर के कूड़े के साथ मिलाकर खाद बनाया जाता है, या उन्हें जलाया जाता है। पिछली विधि अपनाने से पूर्व उसका पानी निकाल दिया जाता है, ताकि उसका भार और आयतन कम हो जाय।

कंकरी का निकालना (Grit removal)  बालू, धूल, पत्थर, राख, जला कोयला और अन्य अकार्बनिक पदार्थों से कंकरी (grit) बनती है। ये पदार्थ घरेलू नलों से मलनाली में प्रविष्ट होते हैं। कच्चे मल में कंकरी निलंबित अवस्था में रहती है, क्योंकि मल नाली का वेग उसे नीचे बैठने नहीं देता। मलनाली को ऐसा बनाया जाता है कि उसमें मल ऐसे वेग से बहे कि नाली स्वयं स्वच्छ हो जाए। यह वेग से फुट प्रति सेकंड होता है और यह मलवाहक नाली के आकार पर निर्भर है। नल मलनाली ऐसी बनाई जाती है कि आधी भरी हुई रहे और अंडाकार मल नाली तीन चौथाई भरी हुई।

भारत की मलनालियों का डिजाइन (अभिकल्प) पृथक्‌ प्रणाली पर किया जाता है, अर्थात्‌ विष्ठा, स्नान आदि का पानी अलग मलनाली में जाए। वर्षा का पानी बहने के लिए अलग नालियों की व्यवस्था होती है। जब मल और वर्षाजल एक ही नाली में डाले जाते हैं, तब उस व्यवस्था को सम्मिलित प्रणाली कहते हैं। यह प्रणाली यूरोप और अमरीका में पहले प्रचलित थी, किंतु अब अधिकतर देशों में पृथक्‌ प्रणाली का प्रयोग किया जा रहा है।

कंकरी को नीचे बैठ जाने के लिये कंकरी कुंड में प्रवाह का वेग घटाकर 1 फुट प्रति सेकंड कर लिया जाता है। कंकरी निकालने की सुविधाएँ विभिन्न आकार प्रकार की होती हैं। कुछ को हाथ से साफ किया जाता है। कुछ में मशीन से चलनेवाला 'कंकरी निष्कासन यंत्र' होता है। दो य अधिक समांतर सँकरीऔर कम गहरी नालियाँ या वर्गाकार या गोल कुंड निकालने और अलग करने के लिए बनाए जाते हैं। कुछ का कार्य केवल गुरुत्व पर निर्भर रहता है और कुछ में पृथक्करण और निष्कासन की सहायता के लिए वायु का प्रेरकों का उपयोग होता है। कुछ में कंकरी निकालते समय धोई भी जाती है, कुछ में सिर्फ निकाली जाती है : लेकिन वेग और बैठने के समय में नियंत्रण का उपाय सभी में आवश्यक है।

छोटे संयत्रों में हाथ से स्वच्छ किए जानेवाले कोष्ठों का प्रयोग होता है। इनमें दो समांतर लंबी नालियाँ होती हैं, जिनमें प्रवाह वेग के संभावित परास के लिए ऐसी वेग नियंत्रण युक्तियाँ लगी होती हैं जिनसे कि एक फुट प्रति सेकंड का अचर वेग रहे। चूँकि भारत के अधिकतर नगरों मे विरामी जलप्रबंध है, घरों का अधिकांश पानी सवेरे शाम ढाई तीन घंटों में मलनाली में जा पहुँचता है। इसलिए इस उच्चतम भार के समय में मलनाली में प्रवाह औसत से कहीं अधिक होता है। यह औसत प्रवाह का से 3 गुना होता है। उच्चतम भार की माँग के अनुसार ही जलवितरण प्रणाली को भी डिजाइन किया जाता है।

वेगनियंत्रण के लिए युक्तियाँ हैं, पार्शल नालिका (Parshal flumes), परवलय नालिका और समानुपाती बंध। बहुत से संस्थापनों का तल कंकरी के संग्रह के लिए प्रवाहरेखा के नीचे हाँपर (नाँद) के आकार का होता है। प्राय: नाँदों के तल में नलिका का जल निकालने के लिए मोरी होती है, ताकि कंकरी सरलता से निकाली जा सके। कंकरी हाथ बाल्टी, कुदाल या फावड़े के प्रयोग से पहियागाड़ियों में लादकर ले जाई जाती है।

यंत्रचालित कुंड प्राय: वहीं बनाए जाते हैं, जहाँ (क) प्रवाह अपेक्षाकृत अधिक होता है, (ख) कंकरी बड़ी राशि में संभावित होती है या (ग) कुंड भूमि सतह से इतना नीचे रहता है कि हाथ से निकालना संभव नहीं होता। मलप्रवाह की दर अधिक परिवर्ती होने पर वेगनियंत्रण और निरोधकाल में आवश्यक ढिलाई के लिए दो या अधिक कुंड प्राय: बनाए जाते हैं, बहुत से कुंड होने से काम बराबर जारी रह सकता है, अन्यथा एक ही कुंड होने पर मरम्मत इत्यादि के लिए काम रोक देना पड़ता है।

कंकरी का लगातार निवारण ऐसे साधन से होता है, जो उसे खुरच या ढकेलकर किसी वाहक में छोड़ दे या टीन, संग्रह खत्ती या ट्रक में भर दे। मलजल में बहती हुई कंकरी घुलती जाती है और कंकरी से कुछ कार्बनिक पदार्थ हटते रहते हैं। दूसरी यांत्रिक विधियों में जब कंकरी पंपिंग या वाहक द्वारा बैठा दी जाती है तब प्रेरक या दबी वायु द्वारा कार्बनिक पदार्थ निलंबित कर दिए जाते हैं।

भारतीय मलजल में यूरोपीय मलजय की अपेक्षा कंकरी अधिक होती है। कंकरी बहुत बारीक भी होती है। यह बात कंकरी कुंड के अभिकल्प तथा उपचारण कुंड (digestion tank) के मल अवमल के उपचारण की क्षमता को प्रभावित करती है। यह अकार्बनिक पदार्थ उपचारण कुंड में 'गैस' देने से कोई सहायता नहीं देता। भारतीय मलजल के लिए उपयुक्त कंकरी कुंड का ठीक डिजाइन अभी तक नहीं बना है।

ककंरी कुंड की सुरक्षा के लिए उसकी देखभाल में सावधानी का पालन आवश्यक है। मलजल की विषैली तथा विस्फोटक गैसें कंकरी कुंड में हवा से मिलकर विषैली अवस्था या विस्फोटक वातावरण उत्पन्न कर सकती हैं। यदि कुंड वायुमंडल की ओर पूर्णतया खुला न हो तो निम्नलिखित सावधानियों का पालन आवश्यक है:

1. सब समय यथेष्ट संवातन की सुविधा,
2. कुंड के चारों ओर के क्षेत्र को विस्फोटक क्षेत्र जैसी सुरक्षा, तथा
3. विषैला क्षेत्र मानकर उपयुक्त सावधानियों का पालन।

प्रारंभिक शोधन निथारन 


मलजल की ताजगी या सांद्रता और कणों के घनत्व, आकार तथा रूप, जैसे दानेदार या गुंफमय, निथारन को प्रभावित करते हैं। गुंफमय कण (कार्बनिक द्रव्यगुंफ, अपक्षेपक या जीववैज्ञानिक वृद्धिजनित) निथारते समय आकार, रूप और आपेक्षिक घनत्व के परिवर्तन के साथ ही गुच्छ बनाते हैं। कणों की अपेक्षा गुच्छ शीघ्रता से बैठते हैं। कनी और गुंफ पदार्थ का वही अंश निथरता है, जो शांत अवस्थाओं में उचित समय में निथरता है। यह समय साधारणतया ऐच्छिक रूप से एक घंटा माना जाता है। न निथरनेवाले ठोस इतने छोटे होते हैं कि इन अवस्थाओं में भी नहीं निथरते। सांद्र मलजल तनु मलजल की अपेक्षा शीघ्र निथरता है। मलजल सांद्रता की माप उसकी 'जीवरसायनी ऑक्सीजन माँग' (जी.ऑ.मा., B.O.D.) है। 25 से 30 गैलन प्रति दिन प्रति व्यक्ति जलवितरण हो तो भारतीय मलजल की यह जी.ऑ.मा. लगभग 250 है। गर्मी के दिनों में यह माँग 400 तक बढ़ जाती है। दूसरी ओर अतिकालिक मलजल, जिस उपचार बिंदु पर पहुँचने में छह से लेकर आठ घंटे तक या अधिक समय लगा हो, अपेक्षाकृत धीमी गति से निथरता है। इसके कारण हैं, जैव अध:पतन द्वारा कणों के आकार को घटना और उनका गैस द्वारा प्लावन। भारी कण हल्के कणों की अपेक्षा शीघ्र बैठते हैं। जिन कणों के तलीय क्षेत्र भार की दृष्टि से अधिक हैं, वे देर में बैठते हैं और टेढ़-मेढ़े कण घर्षण की अधिकता के कारण सुडौल कणों की अपेक्षा धीरे धीरे बैठते हैं।

तलछटीकरण या निथारन तालाबों में बैठने योग्य ठोस कणों के निथारन काल का 'निरोधकाल' कहते हैं। दीर्घ निरोधकाल निष्कासन में सहायक नहीं होता, बल्कि हानिकारक ही हा सकता है, क्योंकि गरम जलवायु में मल के पूतिदूषित होने की संभावना रहती है। भारतीय संयंत्रों में निरोधकाल साधारणतया घंटे का होता है।

समानवेग से बैठते हुए दानेदार कणों की निवारण दर प्राय: पूर्णत: कुंड के सतही क्षेत्र पर निर्भर करती है। विविध गति से बैठते हुए गुंफमय कणों की निवारण दर तालाब के सतही क्षेत्र और उसकी गहराई पर निर्भर करती है। सीधे सादे निथारन तालाब का सतहभार 900, 1,200 गैलन प्रति दिन प्रति वर्ग फुट और 8 10 फुट गहराई साधारण बात है। प्रवेशिका का अभिकल्प ऐसा किया जाता है कि वेग घटे और द्रोणी की आड़ी काट में सर्वत्र उपयुक्त द्वार बाधिका, या अन्य उपाय द्वारा, प्रवाह समान रूप से वितरित होता रहे। निर्गम 'पोत द्वार' (port) या उद्रोध (weir) के आकार के होते हैं। ये समुचित क्षेत्रफल या लंबाई के होते हैं, ताकि तालाब के निर्गम द्वार पर वेग इतना कम हो कि तल में बैठी सामग्री बह न जाए। निर्गम उद्रोध के आगे प्राय: गतिरोधक (baffles) बना दिए जाते हैं ताकि बहते हुए ठोस और ग्रीज अर्थात्‌ वसा, मोम, मुक्त वसीय अम्ल, खनिज तेल और अन्य अवसय पदार्थ निकलने न पाएँ। शांत स्थिति में कुछ ग्रीज अवपंक साथ बैठता है और कुछ ऊपर तैर जाता है, जिसे काछने के समुचित उपकरण से हटा दिया जाता है। ग्रीज को अधिकाधिक तैराने के लिए हवा अंदर फूँकी जाती है।

निथारन टंकी का आकार गोल, आयत या वर्ग होता है। आयताकार टंकी में मल एक छोर से दूसरे छोर तक बहता है और अवमल प्रवेशिका के सिरे से खुरचने के यंत्रों द्वारा निकाला जाता है। गोलाकार या वर्गाकार टंकी में मल मध्य में प्रविष्ट होकर अरीय रूप से परिमा तक फैलता है ओर अवमल ढकेला जाकर, या अन्य किसी प्रकार से, मध्य में चला जाता है। कुछ गोल तालाबों में मल बाहरी कोर से स्पर्शरेखा बनाता हुआ भीतर प्रवेश कर बहता है। गोल टंकियों को अक्सर 'निर्मलकारी' कहते हैं। ऐसी टंकियों में प्रवाह का मध्य में एक संभरण कूप में प्रविष्ट किया जाता है, जिससे प्रवेशिका वेगों का क्षय होता है। संभरण कूप से मल तेजी से टंकी के बाहरी किनारे पर उद्रोघ और उत्प्रवाह नाली तक चला जाता है। टंकी के मध्य में लगे हुए एक चालन यंत्र या तालाब की दीवार पर लगे एक कर्षण यंत्र की भुजाओं से निथरे ठोसों को खींचकर एक नाँद में डाल दिया जाता है। बहता हुआ पदार्थ अवमल संग्राहक में लगे हुए एक फलक द्वारा खीचकर उतार लिया जाता है।

आयताकार टंकियाँ आजकल प्रयोग में नहीं लाई जातीं। जहाँ इनका उपयोग हा रहा है, वहाँ व अकेली इकाइयों या श्रेणी में होती हैं। टंकी की लंबाई चौड़ाई की कई गुना होती है। वाहक रस्से के समांतर तारों पर चढ़े काष्ठसोपानों, या टंकी की दीवार पर लगाई पटरी पर चलनेवाली गाड़ी पर आरोपित एकतल खुरचनी (single bottom scraper) द्वारा इकट्ठा हुआ अवमल एक सिरे पर लगी नांद में डाल दिया जाता है। जंजीर तथा सोपान निमज्जित दाँतेदार पहियों, दंडों और बेयरिंगों पर मोटर से चलते हैं।

जब लंबी दूरी की यात्रा के कारण मल पूतिदूषित या अतिकालिक अवस्था में शोधन स्थान पर पहुँचता है, तब उसे 'प्रिय' (sweet) बनाने के लिए किसी अलग संरचना में वायुविसरण द्वारा पूर्व-वायुमिश्रित या यांत्रिक वायुमिश्रित किया जाता है। यह क्रिया निथारन में सहायक होती है।

रासायनिक शोधन भारत में कहीं भी नहीं होता। इसका एकमात्र कारण रासायनिक पदार्थों की महँगाई है। इससे देखभाल का व्यय बहुत बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त रासायनिक पदार्थों को अभी तक आयात करना पड़ रहा है।

तनूकरण द्वारा निपटारा 


यदि निपटारे के लिए ऐसी अवस्थाएँ मौजूद हों तो कच्चे या अंशत: शोषित मल का निपटारा नदी, झील या समुद्र में उसे विसर्जित करके किया जाता है। मल के अप्रिय पदार्थों के ऑक्सीकरण और उपचारण करने की क्षमता प्राकृतिक जलराशि में प्राय: सीमित होती है, इसलिए प्राकृतिक जलराशि में एक या कई स्थानों पर उचित मलविसर्जन की एक सीमा होती है। किसी प्राकृतिक जलराशि के दूषित पदार्थों के ऑक्सीकरण की क्षमता उसके आरक्षित ऑक्सीजन और उसकी पुनर्ग्रहण की क्षमता पर निर्भर है। तनूकरण के लिए उपयुक्त अवस्थाओं का विचर कते समय ऑक्सीजन संतुलन के संवहन की दिशा और ऐसे संवहन की सीमा का ध्यान आवश्यक है। जीवरसायनी प्रक्रिया के लिए ऑक्सीकरण वायुमंडल से निम्न स्रोतों से प्राप्त होता है : (क) सतह पर ऑक्सीजन अवशोषण, (ख) भँवर और तरंग द्वारा वायु अधिधारण (air occlusion), (ग) ऑक्सीजन या वर्षा से नवसंतृप्त जल (freshly saturated) के सम्मिश्रण से तथा (6) हरे जलीय पौधों से निकली ऑक्सीजन से।जब मल या दूषित जल किसी प्राकृतिक जलराशि में विसर्जित किया जाता है, तब उसका आत्मशोधन काल (period of self purification) विविध कारकों पर निर्भर करता है, जैसे

(1) पीनेवाले जल के गुणधर्म, (2) विसर्जन स्थल पर जल के परिमाण, (3) वेग और पुनर्वायुमिश्रण तथा (4) विसर्जित मल के प्रकार और परिमाण पर। मत्स्यजीवन की संभावित क्षति का विचार रखना भी परमावश्यक है।

जहाँ विसर्जन समुद्र में होता है वहाँ जल के ऑक्सीजन भंडार ओर उसकी ऑक्सीजन-पुनर्ग्रहण-क्षमता के अतिरिक्त अधोलिखित स्थानीय अवस्थाएँ भी विचारणीय हैं:

(1) तनूकारक जल का परिमाण और उसका गुण धर्म, (2) विसर्जित मल को गहरे जल या मुख्य धारा की ओर ले जाने के लिए प्राप्त धाराएँ, (3) विसर्जन स्थल पर जल की गहराई, (4) प्रचलित पवन की दिशा तथा (5) पानेवाली ज्वार जलराशि (tidal water) का आकार।

उत्तम व्यासारण (dispersion) के लिये तनूकारक जल का मल से पूर्ण मिश्रण आवश्यक है। कुछ नगरों में इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कई विसर्जन स्थल रखे जाते हैं।

कच्चे मल को ज्वार जल में विसर्जित करने की प्राचीन प्रथा अब तेजी से लुप्त हो रही है। यह सिद्ध हो चुका है कि तनूकारक जल का कार्यभार घटाने के लिए विसर्जन के पूर्व मल का प्रारंभिक शोधन आवश्यक है।

बंबई के मल का बहुत बड़ा भाग केवल छानने और कंकरी निकालने के बाद अन्य शोधन के बिना ही अरब सागर में विसर्जित किया जा रहा है। विसर्जन स्थल पर उपयुक्त परिस्थितियों के अभाव में मल के विसर्जन से विसर्जन स्थान के आसपास बहुत अपदूषण हो रहा है, यद्यपि निकासी मलनाली (outface sewer) तट से 2,000 फुट आगे तक समुद्र में प्रवेश करती है। विसर्जन पर लघु ज्वार काल में जल की गहराई केवल 6 फुट रहती है, जब कि कच्चे मल के संतोषजनक व्यासारण के लिए कम स कम 50 फुट की गहराई आवश्यक है। बंबई का मल जिस गहर्रा में विसर्जित किया जाता है वह इंग्लैंड और अन्य विदेशों में बहुत उथला समझा जाता है। विसर्जन मल को दूर वास्तविक समुद्र में ले जाने के लिए ज्वारीय धाराओं का वेग 0.7 मील प्रति घंटे से अधिक नहीं है, जब कि इष्टतम वेग तीन से पाँच मील तक प्रति घंटा है। इसके अतिरिक्त धाराएँ तट के लंबवत्‌ न होकर समांतर हैं, जिससे विसर्जित मल मुख्य धारा की ओर न जाकर ज्वार के साथ आगे पीछे होता रहता है और निकास-मल-नाली द्वारा, जो रोधिका (groyne) का काम करती हैं, तट की ओर ही बढ़ता है। तटाग्र (foreshore) का आकार भी ऐसा नहीं है कि वह मल को समुद्रजल की विशाल राशि में शीघ्रता से फैला दे, बल्कि इसके विपरीत वह प्रवाहहीन अवस्था (stagnant conditions) बना देता है। उपर्युक्त कारणों से ऑक्सीजन का संतुलन संतोषजनक नहीं है और विसर्जन स्थल पर पर्याप्त दूरी तक समुद्रजल ऑक्सीजन से रिक्त रहता है। अत: अब समुद्र में मल विसर्जन के पूर्व उसके प्रारंभिक शोधन के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। इस स्थल पर और मल न गिराकर अनेक नए विसर्जन स्थान बनाए जा रहे हैं, जिसमें प्रारंभिक या द्वितीयक शोधन के पश्चात्‌ मल समुद्र में विसर्जित होता है।

भारत के समुद्रतटवर्ती नगरों में ही तनूकरण की निपटारे की विधि का लाभ उठाया जा सकता है। मद्रास के मल का बड़ा भाग समुद्र में विसर्जित किया जा रहा है और वहाँ भी अनुपयुक्त परिस्थितियों के कारण अपदूषण उत्पन्न कर रहा है। अब वहाँ मल का उपयोग उसे भूमि पर फैलाकर किया जा रहा है और यही विधि लाभपूर्ण और संतोषजनक पाई गई है।

बड़ी नदियों में भी मलविसर्जन संभव नहीं है, क्योंकि गर्मी के मौसम में इन नदियों में प्रवाह बहुत घट जाता है और तनूकरण के उपयुक्त नहीं रह जाता।

मल की फार्मभूमि पर प्रयुक्ति 


मलनिर्यात की अधिक प्रचलित विधि जो भारत के सभी मुख्य अंतर्देशीय नगरों में अपनाई गई है, मल की भूमि पर प्रयुक्ति है। इनी गिनी नगरपालिकाओं में ही मल का इस प्रकार उपयोग किया जाता है। मल का भूमिशोधन नगरपालिकाओं ने आर्थिक दृष्टि से अपनाया है न कि जनस्वास्थ्य की रक्षा की दृष्टि से। उसके निर्यास और शोधन मल फार्मों पर भूमिपट्टों के किरायों के बड़े राजस्व, मलनिस्त्राव के शुल्क और कृषि उत्पादनों के विक्रय से कुछ नगरपालिकाओं ने अपनी आमदनी बढ़ाई है, किंतु अब मल फार्म के अधिकारी आर्थिक दृष्टिकोण त्यागकर जनता के स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान रखने लगे हैं।

भारत भर में अब लगभग 65 मलफार्म हैं। भारत के प्राचीनतम मलफार्म अहमदाबाद और पूना में क्रमश: सन्‌ 1896 और 1918 में चालू हुए। मदुराई का मलफार्म बहुत बाद में स्थापित होने पर भी वैज्ञानिक सिद्धांतों पर कार्य करने के कारण विशेष सफल रहा है।

मलफार्म के संपर्क और सान्निध्य से प्रभावित वातावरण में लोकस्वास्थ्य का विस्तृत अध्ययन किया गया है। वर्षों तक मलजल द्वारा सींची गई भक्ष्य फसलों (पकाकर या बिना पकाए खाई जानेवाली) से सेवन से किसी प्रकार की महामारी फैलने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। किंतु फिर भी लोकस्वास्थ्य की दृष्टि से यह प्रयोग निरापद नहीं है, क्योंकि मल में रोगजनक जीवाणु होते हैं, जो कृषिजन्य खाद्यों में पहुँचकर संक्रामक सिद्ध हो सकते हैं। मल कृषि से उत्पन्न तरकारियों के धोवन में उच्च बी.कोली (B.Coli) गणन पाए गए हैं, अतएव ऐसे पदार्थ सर्वथा निरापद नहीं समझे जाने चाहिए।

मल के जीवाण्वेतर (non-bacterial) रोगजनक अंशों से संभावित संकटों का भी अध्ययन हुआ है। मदुराई और अहमदाबाद के मलफार्मों में मुख्यतया अंकुषकृषि (Ankylostoma) और गोल कृमि (Ascaris) का संक्रमण सामान्यतया अधिक रहा और प्रजीवाणु पुटी (Protozoon systs, Endamoeba histolytica) के कारण संक्रमण विरल रहा।

मलजनित अस्वस्थता के कारणों और उसके उपचार के संबंध में भी अध्ययन हो चुका है। कुछ फार्मों की धरती पर भारी निलंबित ठोस पदार्थों से युक्त कच्चे मल की सिंचाई या अधिक खुराक का हानिकारक प्रभाव पड़ा है। अहमदाबाद की मिट्टी की अयोग्यता का कारण लगातार और अधिक मात्रा में मलजल देने से आंतर्भौमि जलस्तर की वृद्धि के फलस्वरूप उत्पन्न जलाक्रांत अवस्था (Water logged condition) है। जयपुर में निचली भूमि में कच्चे मल के प्रयोग से आंतर्भौम जलस्तर बहुत ऊपर उठ गया है। प्राकृतिक विलेय लवण सतह पर आकर वाष्पीकरण द्वारा सफेद पपड़ी के रूप में जम गए हैं। वहाँ मलजनित अयोग्यता का कारण् मिट्टी की उच्च लवणता है। मलजनित कारणों से अयोग्य हुई मिट्टी के उद्धार के लिए सूर्यप्रकाश मिलना आवश्यक है। गहराई तक हल चलना और लंबा अवकाश मिलना भी अपेक्षित है। इसके अतिरिक्त चूने का प्रयोग भी लाभदायक है।

मदुराई और कलकत्ता में मत्स्यपालन मलफार्म (Piscicultural Sewage Farming) में मलनिस्त्राव काम आता है। कलकत्ता में नगर के समीप ही कच्चा मल तनूकरण के पश्चात्‌ करीब 10,000 एकड़ मत्स्यक्षेत्र को उर्वर बनाता है। इन तालाबों से प्रति दिन 10-12 टन मत्स्य कलकत्ते के बाजारों में आते हैं। क्षेत्र केवल मल्स्योत्पादन के लिए आरक्षित है। मदुराई में फार्म का अंत:सुत (pescolated) और अंशत: शोधित निस्राव गहरी निस्राव नाली में एकत्र होता है। मलनिस्त्राव मत्स्यजीवन की वृद्धि के लिए संतोषजनक है। वर्तमान क्षेत्रफल एकड़ है और उसमें टीलापिया मछली पैदा होती है।

ऑक्सीकरण ताल या स्थिरीकरण ताल 


मलशोधन के लिए इन तालों की उपयोगिता खास तौर पर छोटे समुदायों में इनकी प्रारंभिक और आवर्ती लागत के कारण बढ़ रही है। अपशिष्ट स्थिरीकरण ताल में द्रव जैव अपशिष्ट द्रव्य को जीवविज्ञानीय, रासायनिक और भौतिक विधियों से शुद्ध करते हैं। इसे आत्मशोधन (Self purification) कहते हैं। स्थिरीकरण प्रक्रिया जीवाणु और काई के बीच लाभप्रद उभय परस्पर क्रिया (Interaction) है। अपशिष्ट में उपस्थित जैव द्रव्य जीवाणु द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड, ऐगोनिया और पोषक तत्वों में विघटित हो जाते हैं। ये उच्च ऊर्जा के साथ मिलकर शैवालीय प्रकाश संश्लेषण (Algal Photosynthesis) की मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं जिससे वातापेक्षी तंत्र (aerobic system) को ऑक्सीजन प्राप्त होता है। शैवाल के अभाव में वायुमंडल से ऑक्सीजन लेना पड़ेगा। शैवालीय प्रकाश संश्लेषण स्थिरीकरण प्रक्रिया के लिए आवश्यक है।

ताल 3-5 फुट गहरा होता है। जल के उच्चतम स्तर और तटस्तर में दो से तीन फुट तक शून्य भाग (free board) रहना चाहिए। चार पाँच फुट की गहराई ताल के ताप को एक समान रखने में सहायक होती है क्योंकि ऐसे तालों का ताप वायुमंडल के ताप के अनुसार ही होता है।

ताल का उपयोग कच्चे या निथरे (Sedimented Sewage) दोनों प्रकार के मलों के शोधन के लिए हो सकता है। कच्चा मल स्थिरीकरण ताल में प्रवेशिका तट-रेखा से कुछ हटकर होना चाहिए ताकि हवा बैठते हुए मल के ठोस पदार्थों को विसरित कर सके। निर्गम द्वार ऐसे बनाए जाएँ कि उनके चलने में अधिकाधिक लचीलापन रहे।

ताल का वांछित क्षेत्रफल भिन्न भिन्न होता है। इस संबंध में और अनुसंधान आवश्यक है। संयुक्त राज्य अमरीका के दक्षिणार्धं में प्रति एक हजार मनुष्य के लिये एक एकड़ ठीक समझा जाता है। यह बराबर है 70 पाउंड प्रति एकड़ प्रति दिन जीवरासायनिक ऑक्सीजन की माँग के। यह सूचना मिली है कि ताल द्वारा जीवरासायनिक ऑक्सीजन का निकास 60 से लेकर 90 प्रतिशत है। अनेक शैवालीय कोशिकाओं के कारण ताल निस्राव, मलजल निस्त्राव के समान अनेक जैव पदार्थों से युक्त हो सकता है। शैवालीय कोशिकाएँ अत्यधिक स्थिर और विकृतिजनक दृष्टि से महत्वहीन होती हैं। मत्स्य और अन्य जंगली जीवों के लिए शैवाल जीवित आहार है।

अवमल (Sludge) 


ऑक्सीकरण तालों के तल में अवमल नहीं इकट्ठा होता। ऐसा लगता है कि अवमल समस्या उठेगी ही नहीं। अबतक दुर्गंध और मच्छर-मक्खी का संकट भी उत्पन्न नहीं हुआ है।

अब तक के परिणाम अस्थाई हैं और अल्पकालिक अध्ययन के फल हैं। गंभीर अध्ययन तो नागपुर मलफार्म में इस प्रयोजन के लिए बने विशाल भांडेवाडी ऑक्सीकरण तालों के चालू होने पर होगा।

ऑक्सीकरण ताल का भविष्य बड़ा उज्जवल है, क्योंकि (1) इनके बनवाने और देखभाल में खर्च कम पड़ता है (2) द्वितीय शोधन की अन्य विधियों के समान इनमें कुशल पर्यवेक्षण की आवश्कता नहीं होती (3) कच्चा मल प्रारंभिक शोधन के बिना ही उपचारित किया जा सकता है और (4) अन्य के लिए नहीं तो केवल पशुओं के लिए ही शैवाल का खाद्य बनाने से आमदनी होने की संभावना है।

निस्संदेह लघु समुदायों के लिए स्वास्थ्यकर विधि से मल शोधन की यह आदर्श और सबसे कम खर्चीली विधि है। निस्राव का पानी जलमार्गों में विसर्जन करना चाहिए जहाँ यथेष्ट तनूकरण उपलब्ध होता है या उसका प्रयोग फसलों की सिंचाई में करना चाहिए। निस्राव में शैवाल फसलों की उपज के लिए अच्छा पोषक तत्व है। इसके लिये वैज्ञानिक विधि पर और प्रयोग करना आवश्यक है।

द्वितीय शोधन (Secondary treatment) 


रिसती हुई फिल्टर विधि और सक्रियकृत अवमल विधि मल में सड़नेवाले पदार्थों का ऑक्सीकरण वैसे ही करती हैं जैसे भूमि शोधन में भूमि की सतही परतें।भूमि शोधन का सबसे बड़ा दोष यह है कि उसमें भूमि के विशाल क्षेत्रों की आवश्यकता पड़ती है। यहाँ इतनी भूमि उपलब्ध नहीं होती वहाँ द्वितीय शोधन से काम चलाया जाता है, क्योंकि इसमें स्थान कम लगता है।

टपकन फिल्टर का कार्य यह है कि वह निथारने से निकले सूक्ष्म निलंबित ठोसों को निरापद पदार्थों में बदल देता है। टपकन फिल्टर में खुदरा पदार्थों की एक तह होती है। इसमें रिक्त स्थानों का अनुपात अधिक होता है और कणों के सतही क्षेत्रफल भी अधिक होते हैं। निथरा मल तह की सतह पर फैलता जाता है। यह तह में से टपक कर या रिस कर निकलता है और तल की संग्राही नालियों में निकाल दिया जाता है। विशेष प्रकार से बनी टंकियों में, जिन्हें ह्यूमस टंकी कहते हैं, निथरने के बाद निस्राव या तो किसी बड़ी जलराशि में विसर्जित कर दिया जाता है या फसलों की सिंचाई के लिये प्रयुक्त होता है।

फिल्टर साधारणतया चार से छ: फुट तक गहरा होता है। कभी कभी छ: फुट से अधिक गहरे फिल्टरों का भी उपयोग किया जाता है। ऐसा दावा किया गया है कि फिल्टर की गहराई फिल्टर माध्यम के आकार और मल की सांद्रता पर निर्भर करती है। फिल्टर का माध्यम कठोर पत्थर, खंगर (clinker) कोक, कोयला या धातुमैल (slag), जो भी उपलब्ध हो, हो सकता है। माध्यम का परीक्षण इन बातों के लिये होना चाहिए : (1) आभासी आपेक्षिक गुरुत्व, (2) अधिशोषण (Adsorption), (3) घिसाई की प्रति शतता, (4) कड़ापन या दृढ़ता और (5) समांगता। फिल्टर के माध्यम अपेक्षतया आकार में एक समान होने चाहिए और सूक्ष्म कणों से रहित होने चाहिए। सूक्ष्म कण निर्दिष्ट आकारों के बीच के स्थान को भर देते हैं, पदार्थ ऐसा होना चाहिए कि वह माध्यम को तोड़फोड़कर सूक्ष्म कणों में परिणत न कर सके।

फिल्टर के माध्यम (पत्थर आदि) पर जीवाणु और अन्य जैव पदार्थों की एक श्लिषीय (Gelatinous) झिल्ली को लेप चढ़ जाता है। मल के जटिल कार्बनिक पदार्थ (निलंबित, कोलायडीय या घुले हुए) आंसजन या अवशोषण द्वारा जीवांड की जीवित झिल्ली में फँस जाते हैं। ऑक्सीजन की उपस्थिति में जीवाणु अभिक्रिया से कार्बनिक पदार्थ एक अधिक स्थाई पदार्थ में बदल जाते हैं। शीघ्र ही ऑक्सीकृत होनेवाले कार्बनिक पदार्थ और जैव पदार्थों में संख्या संतुलन हो जाता है। ऑक्सीकरण विधि और उससे होनेवाले उपचार में होने वाली क्रियाओं को कई प्रकार से स्पष्ट किया गया है। यह तो निश्चित है कि उपचार का संबंध जीवाणु और अन्य जैव पदार्थों से है और उनकी स्वस्थता इस विधि के लिए अनिवार्य है।

जीवांडपटल की वृद्धि और विस्तार माध्यम के आकार के अनुसार होता है। सूक्ष्माकार कणों का सतही क्षेत्र अधिक होता है, जो कि व्यास का प्रतिलोमानुपाती है। रिक्त स्थान की बहुलता के लिए पत्थर के खुरदरे कण अच्छे माने जाते हैं। साधारणतया माध्यम के कणों का आकार इंच से इंच तक होता है।

फिल्टर वृत्ताकार या आयताकार हो सकते हैं। भिन्न भिन्न प्रकार के फिल्टरों में बैठे हुए मल को फिल्टर की सतह पर वितरण करने की प्रक्रिया अलग अलग है।

फिल्टरों की असुविधाएँ 


इसकी मुख्य कठिनाइयाँ कालांतर में रोधन, साइकोडा मक्खी का होना और हवाई अपदूषण की प्रवृत्ति हैं। रोधन या तो फिल्टर पदार्थ के टूटने से या भार की दर में वृद्धि से होता है। फिल्टर पर डालने से पहले मल को क्लोरिन से पूर्व उपचारित कर फिल्टर की सतह को गोदनी या हैरों से तोड़ कर या सतह पर हौज से पानी डालकर अतिभार का दोष दूर किया जा सकता है। साइकोडा मक्खी का नियंत्रण निम्नलिखित विधियों से किया जाता है : (क) मक्खी के मौसम में 10 से 14 दिन तक फिल्टर के माध्यम के ऊपर तक फिल्टर को पानी से भरने से, (ख) प्रयुक्त मल में मक्खी के मौसम में प्रतिसप्ताह इतने क्लोरिन का प्रयोग हो कि मल के अवशिष्ट अंश में प्रति दस लाख पर 3.5 अंश क्लोरिन रहे। (ग) प्रौढ़ मक्खियों को आराम करते समय ''ब्लो टार्च'' (blow torch) द्वारा मारकर और (छ) कभी-कभी पाईथ्रोम (Pyrethrum) के निष्कर्ष का फुहार देकर (एक गैलन मिट्टी के तेल में से पाउंड तक पाईथ्रोम निष्कर्ष मिलाया जाता है)।

1930 ई. के पूर्व अनेक अन्वेषकों के अनुभव के आधार पर निम्न भार के टपकन फिल्टर अभिकल्पित हुए, जिन्हें ''निम्नदर टपकन फिल्टर'' या ''रूढ़'' (conventional) फिल्टर कहते थे। निम्न भार फिल्टर का मुख्य दोष यह था कि इनके लिए 'बृहत्‌ फिल्टर संस्थापन' की आवश्यकता पड़ती थी, जिन्हें बनाने में बहुत पूँजी लगती थी और संयंत्र स्थापना के लिए भूमि के विशाल क्षेत्रों पर अधिकार करना पड़ता था। अन्वेषणों के फलस्वयप 'जीवाणुनिस्यंदन' (biofiltration) की विधि (पुन: परिचालन सहित उच्चदर टपकन फिल्टर) निकली।

बढ़ती हुई धारिता के लिए टपकन फिल्टर पर परिवाह को पुन: परिचालित करने की पहली विधि हेरी जेंक्स द्वारा निकाली हुई 'जीवाणुनिस्यंदन' है। फिल्टर माध्यम पर कार्बनिक भार अत्यधिक बढ़ा और निम्नदर फिल्टर से द्रव प्रेरित भार कई गुना बढ़ गया।

जीवाणु निस्यंदन विधि (पुन: परिचालन सहित उच्चदर टपकन निस्यंदक) में प्रारंभिक उपचार, निस्यंदन, द्वितीय निर्मलीकरण और पुन: परिचालन की सुविधा रहती है। यह इस प्रकार अभिकल्पित हो सकता है कि निस्राव की जी रसायनिक ऑक्सीजन मांग उतनी ही हो, जितनी निम्नदर टपकन फिल्टर या सक्रियकृत अवमल संयंत्र में रहती है। कई अनुक्रम (flowsheet) जैसे एक पदी, द्विपदी इत्यादि प्रयुक्त होते हैं। इन सब अनुक्रमों में पुन: परिचालन के सिद्धांतानुसार जो जीवाणुनिस्यंदन का हृत्केंद्र (Heart centre) है, फिल्टर निस्राव का फिल्टर तह में लौटना आवश्यक है और इस प्रकार मल का फिल्टर में बार बार आना और उचित जीवाणुओं से निस्राव (effluent) का अन्त:क्रामित होना (inoculation) आवश्यक हो जाता है। हेरी जेंक्स का दावा है कि जीवाणुनिस्यदन विधि में निम्नदर टपकन फिल्टर और सक्रियकृत अवमल विधि के लाभ तो हैं, पर उनका कोई दोष इनमें नहीं है। इस विधि का सारे संसार में प्रयोग इस बात का प्रमाण है कि यह विधि सस्ती और मल एवं औद्योगिक अवशेषों के उपचार की उत्तम विधि है।

जीवाणुनिस्यंदन विधि से मल और औद्योगिक अवशेष उपचारक अनेक संयंत्र भारत में बने हैं और वे संतोषजनक ढंग स कार्य कर रहे हैं। कई अन्य संयंत्र बन रहे हैं, जिनमें औखला, दिल्ली जेल, उत्तर दिल्ली, बंबई के चेंबूर, दादर और थाना, डालमियानगर रोहतास, असम के पांडु, जमशेदपुर के टेल्को, भोपाल, दुर्गापुर, कलैकुंड वायु क्षेत्र, रूरकेला, पिलानी, वाराणसी (वनारस हिंदू विश्वविद्यालय) तथा पूना के हिंदुस्तान ऐंटीवायोटिक उल्लेखनीय है।

शोधन संयंत्रों के अपने अपने काम के ज्ञान से प्रकट है कि भारत की जलवायु और अन्य परिस्थितियों में जीवाणु निस्यंदन सफल है। कुछ प्राचीन अनुभवी लेखकों का यह तर्क न्यायसंगत सिद्ध हुआ है कि उष्ण और उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु में पुन: परिचालन सहित उच्चदर टपकन निस्यंदक सफल होगा।

सक्रियकृत अवमल विधि 

यदि कच्चे या बैठे हुए मल को किसी टंकी में भरकर उसमें वायु मिश्रित किया जाए तो उसमें अल्प अम्लता उत्पन्न होती है और उसकी अवांछित गंध और घूसकर रंग दूर होकर वह हल्के भूरे रंग का हो जाता है। जब इस प्रकार वायुमिश्रित मल को सिलिंडर में निथरने दिया जाता है तब उसके तल में हल्के भूरे रंग का गुंफ बैठ जाता है और ऊपर साफ पानी रह जाता है। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर ज्ञात होता है कि यह भूरा गुंफ लाखों जीवाणुओं और अन्य अतिसूक्ष्म जीवणु से संकुल होता है। इस भूरे गुंफ को सक्रियकृत अवमल कहा है। वाय मिश्रण से बना यह सक्रियकृत अवमल मलशोधन के काम में आता है। इस विधि को सक्रियकृत अवमल कहते हैं।

प्रारंभिक संयंत्रों में टंकियों के तल में संरध्र प्लेटों से संपीड़ित वायु फूँककर प्रक्षोभन प्राप्त किया जाता था। पर यह विधि महँगी पड़ती है। अत: प्रक्षोभन प्राप्त करने के लिए कई यांत्रिक युक्तियाँ निकाली गई हैं।

सक्रियकृत अवमल के जीवाणुओं तथा अन्य अतिसूक्ष्मजीवों के ठोस मल के साथ अंतमिश्रण का परिणाम यह होता है कि मल और अवमल का मिश्रण ऐसी स्थिति में आ जाता है कि ठोस अपेक्षाकृत शीघ्र नीचे बैठ जाते हैं। जीवाणुकृत सक्रिय अवमल और मल का अनुपात लगभग 1:5 है। इसे 'वापसी अवमल अनुपात' कहते हैं। मल में अवमल का योग नियंत्रित करके इस वापसी अवमल की मात्रा ठीक रखी जाती है। टंकियों में वायु मिश्रण की क्रिया ठीक रहने के लिए वापसी अवमल की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए। साथ ही वायुमिश्रण टंकियों में मल इतनी देर तक रुका रहना चाहिए कि प्रक्षोभन पर्याप्त हो सके और मल का शोधन पूर्णतया हो जाए। रुका रहने का समय वायुमिश्रण युक्तियों, मल की सांद्रता और शोधन की मात्रा पर निर्भर करता है और यह समय 3 से लेकर 30 घंटे तक का होता है। वायुमिश्रण टंकियों में वापसी अवमल 30 से 35 प्रतिशत होता है।

वायुमिश्रण टंकी की सापेक्ष परिमाप और गहराई प्रयुक्त वायुमिश्रण विधि और इच्छित शोधन मात्रा द्वारा शासित होती हैं। गहराई जितनी अधिक होगी वायु को उतनी ही अधिक दाब पर संपीडित होना चाहिए। टंकियों की औसत गहराई 10 से लेकर 16 फुट तक होती है।

जिस पद्धति में मल और अवमल का प्रक्षोभन संपीडित वायु से होता है, वह 'विसरित वायु पद्धति' कहलाती है और जिसमें यांत्रिक विधि से प्रक्षोभन होता है, उसे 'यांत्रिक प्रक्षोभन' कहते हैं। विसरित वायु पद्धति में (क) मेंड ओर नाली कोटि टंकी या (ख) सर्पिल प्रवाह कोटि की टंकी द्वारा वायुविसरण होता है। वायु की इच्छित दाब दोनों टंकियों में प्लेटों के ऊपर मल के स्थैतिक वर्चस (static head) से कुछ ही अधिक होते हैं। टंकी की गहराई प्राय: 12 से लेकर 15 फुट तक होता है। वायु की दाब 6 से लेकर 7 पाउंड तक साथ ही विसरण से हानि होती है। औसत दाब प्रति वर्ग इंच में आठ से दस पाउंड तक बदलता है।

प्रति गैलन शोधित मल में प्रयुक्त वायु अनेक कारकों का निर्भर करती है, जैसे मल का प्रकार और उसकी सांद्रता, वायुमिश्रण टंकी में प्रवेश के पूर्व हुए शोधन की कोटि आदि। प्रति गैलन अवमल के शोधन में डेढ़ से दो घन फुट वायु लगती है।

यांत्रिक प्रक्षोभन (Mechanical agitation)  की मुख्य विधियाँ निम्नलिखित हैं:
(1) हावर्थ पैडल या शेफील्ड वायुमिश्रण पद्धति, (2) हार्टले पैडल या बर्मिघम जीव संकरण पद्धति, (3) सिंप्लेक्स वायुमिश्रक, (4) लिंक बेल्ट वायुमिश्रक और (5) केसनर ब्राश वायुमिश्रण पद्धति।

भारत के कुछ संयंत्रों में सिंप्लेक्स वायुमिश्रक कार्य कर रहा है। इसमें एक स्थिर सिलिंडर या ऊपर खींचने की नली होती है, जिसके ऊपरी सिरे पर परिक्रामी चकती होती है। चकती पर पंख (vanes) ऐसे लगे होते हैं कि टंकी की सतह के आरपार मल की धारा उनपर आकर आड़े बल पड़े। जब फैलाया जा रहा मल कुंड की सतह पर जा मिलता है, तब हवा के अनेक बुलबुले उठते हैं, जिसके फलस्वरूप मल में अधोमुखी वृत्ति या गति उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार वायुमिश्रण पद्धति में रोककाल क्या हो, यह निथरे मल के गुण और उसकी सांद्रता पर निर्भर है। यह काल आठ से लेकर 12 घंटे तक का होता है इस युक्ति में अभी हाल ही में सुधार हुआ है। अब इस विधि में उच्च तीव्रता शंकु (high intensity cones) का प्रयोग हो रहा है और इनसे थोड़ी शक्ति द्वारा अच्छा वायुमिश्रण हो रहा है। मैनचेस्टर में तो यह भी देखा गया है कि इन शंकुओं के प्रयोग से थोड़ी-सी ऊर्जा व्यय करके ही ऐसा अच्छा निस्राव प्राप्त हो जाता है जैसा विसरित वायु संयंत्र से प्राप्त होता है।

भारत में बड़े या मझोले आकार के संयंत्रों में विसरित वायुयंत्र अभी नहीं लगाए गए हैं। उनकी स्थापना और देखभाल दोनों ही अधिक खर्चीली है। तदनंतर उसका कुशलतापूर्वक पर्यवेक्षण करते रहना आवश्यक है। फिर यह विधि बड़ी सुग्राही है। यह टपकन फिल्टर के समान झटकेवाले भार सहन नहीं कर सकती।

भारत के नगरों में सक्रियकृत अवमल विधि का बड़े पैमाने पर उपयोग होने की बहुत संभावना नहीं है, क्योंकि अधिकतर नगरों में प्रारंभिक उपचार के बाद मल मलफार्मों में कृषि के लिए प्रयुक्त होता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में मल निर्यास (पूति कुंड) 


उपनगर क्षेत्रों में, जहाँ घर दूर दूर होते हैं, घरेलू मल को जन-स्वास्थ्य-संकट या अपदूषण उत्पन्न किए बिना निर्यास की सर्वसाधरण विधि आंतभौम प्रस्राव-निर्यास-क्षेत्र (Underground Seepage disposal field) से युक्त पूतिकुंड (Septic tank) का उपयोग है। सरध्रं मिट्टीवाले क्षेत्र के लिए तो यह अत्यंत संतोषजनक विधि है। किंतु मृणमय या अरध्रं मिट्टीवाले क्षेत्रों में या जहाँ घर सटे हुए होते हैं, आतंभौम प्रस्राव निर्यास क्षेत्र बेकार हो जाता है और लोकस्वास्थ्य-संकट पैदा कर देता है।

पूतिकुंड से आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित कार्य करे : (क) निथारन द्वारा जहाँ तक हो सके अधिक से अधिक मल का निलंबित ठोस निकाल दे, (ख) बैठे हुए अवमल के अपघटन द्वारा घने अपघटित अवमल का आयतन घटा दे और (ग) सफल सफाइयों के बीच इकट्ठा हुई अवमल और मली (scum) का संग्रह करे अर्थात्‌ उसका बाहर निकलना रोके।

भारत में क्लेमाशा और टेंप्ल के पहले पहल के अध्ययनों से ज्ञात हुआ कि प्रति व्यक्ति 5 से लेकर 10 गैलन प्रति दिन तक के मल के आधार पर कुंड की कुल धारिता ठीक होगी। अब से लेकर 3 घनफुट प्रति व्यक्ति तक के हिसाब से कुंड की धारिता का निर्णय किया जाता है। धारिता निश्चित करते समय अवमल और मली के संचय का ध्यान नहीं रखा जाता। इसी प्रकार कुंड की न्यूनतम धारिता तय करने के लिए भी कोई न्यूनतम मानक नहीं रखा गया है। प्राय: सभी पाश्चात्य देशों में 400 गैलन या 64 घन फुट निम्नतम धारिता रखने के नियम बनाए गए हैं।

मद्रास राज्य के 32 से अधिक पूतिकुंडों के अध्ययन से सिद्ध हुआ है कि उन कुंडों में जिनके कार्यकाल 12 और 18 तथा 20 मास हैं, प्रति व्यक्ति वार्षिक अवमल और मली संचय लगभग क्रमश: 0.388 और 0.457 घन फुट है। इसी प्रकार कलकत्ता के 200 से अधिक पूतिकुंडों के पाँच वर्षों के अध्ययन से प्रकट है कि कुंड में अवमल संचय प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 0.6 घन फुट से अधिक नहीं है।

आकार, माप, तरतीब और कक्षाओं की संख्या की दृष्टि से पूतिकुंडों की डिजाइन में बहुत भेद रहता है। 3 से लेकर 4 फुट तक की गहराई पर्याप्त पाई गई है। चौड़ाई और लंबाई का अनुपात 1:3 से लेकर 1:6 तक होता है।

पूतिकुंड का निस्राव खुली नाली द्वारा किसी नदी नाले में विसर्जित नहीं किया जा सकता। निस्राव का द्वितीय शोधन आवश्यक है। इतना होने पर भी यदि प्राकृतिक नदी नाले में सालमर तनूकरण के लिए पर्याप्त जल नहीं रहता तो निस्राव का विसर्जन हानिकर हो सकता है।

अत: निस्राव का निपटारा या तो आंतभौंम हो सकता है या भूमि के ऊपर। आंतभौंम निपटारे की दो विधियाँ हैं: (1) सोख गड्ढा और (2) अवशोषण खाई। इनका लक्ष्य होता है, सतह के नीचे रिसना या मिट्टी में चूना। भारत में रोड़ों या ईटं के टुकड़ों से भरे सोख गड्ढ़े बहुत काम आ रहे हैं। पश्चिमी देशों में अवशोषण खाई सोख गड्ढों से अच्छी मानी जाती है। जहाँ आंतभौम जलस्तर बहुत नीचा होता है, वहाँ सोख गड्ढें उपयुक्त होते हैं, क्योंकि उनसे रिसन हो सकता है। इससे भूजल का संदूषण भी नहीं होता।

अवशोषण खाइयाँ अपेक्षाकृत सँकरी और उथली होती हैं। इनमें चीनी मिट्टी के खुले जोड़वाले नल बिछाए जाते हैं, जो मामूली ढाल पर बजरी या पत्थर में दबाए जाते हैं। खाई की लंबाई प्राय: 75 फुट से अधिक नहीं होती। खाइयाँ तिरछी रखी जाती हैं। इसके बीच की दूरी कम से कम 6 फुट होती है। निस्राव वितरणकक्ष से खाइयों के जाल में प्रविष्ट किया जाता है।

यह देखा गया है कि यदि अवशोषण खाइयों पर वृक्ष की छाया न पड़े और वहाँ उपयुक्त पौधे लगाए जाँए तो वे और प्रभावकारी हो जाती हैं। किसी स्थानविशेष के लिए पूतिकुंड निस्राव का द्वितीय शेधन निश्चय करने के पूर्व सरल रिसनपरीक्षण द्वारा स्थानीय मिट्टी के रिसन गुण की जाँच कर लेना आवश्यक है। अवशोषण युक्ति का अभिकल्प पूतिकुंड के आकार से अधिक दैनिक मल के परिमाण पर निर्भर है। अत: दैनिक प्रवाह का ठीक अंदाजा लगाना आवश्यक है।

पूतिकुंड ऐसे स्थान पर होना चाहिए कि वह किसी ऐसे जलधारी भूमिस्तर में प्रवेश न करने पाए, जिससे कुओं में पानी आता है या विदीर्ण शैल में बेधन न हो जहाँ से मल के चूने का परिवाह से घरेलू जल का स्रोत ही संदूषित हो जाए।

पूतिकुंड की नियत अवधियों पर सफाई आवश्यक है। लेकिन अधिकांश स्थलों में उनकी नियमित सफाई नहीं होती जिससे इनसे निकलनेवाले निस्राव में निलंबित ठोस की पर्याप्त मात्रा रह जाती है।

एक बात ध्यान देने योग्य है कि लघु संस्थान के रूप में भी पूतिकुंड मल निपटारे की उपयुक्त विधि नहीं है। इसका संस्थापन वहीं सह्य है जहाँ शोधन की कोई और विधि नहीं अपनाई जा सकती। समस्या का सबसे अच्छा समाधान यह है कि मलनाली की व्यवस्था की जाए। किंतु प्राय: यह केवल आर्थिक कारणों से ही नहीं हो पाता।

अवमल का निपटारा 


अवमल निपटारे की समस्या सदैव ही रहती है और यद्यपि अवमल के शोधन और निपटारे की बहुत सी विधियाँ प्रचलित हैं, फिर भी इस महत्वपूर्ण और तात्कालिक समस्या का अभी तक ठीक ठीक समाधन नहीं हो पाया है। विदेशों में तो यह समस्या अंतिम निस्राव विसर्जन (final effluent discharges) के नियंत्रण हेतु कठोर मानक (stringent standard) के आरोपण के कारण बराबर अधिक गंभीर होती जा रही है, क्योंकि उससे मलशेधन स्थानों पर अवमल के शेधन और निपटारे के लिए अधिक ठोसों को रोकना पड़ता है। यद्यपि बहुत से व्यक्ति और अधिकारी अवमल के शोधन और निपटारे की सुधरी विधियों की व्यवस्था आवश्यक समझते हैं, फिर भी ऐसा काई समाधान नहीं दिखाई पड़ता जिससे उचित खर्च और बिना अपदूषण उत्पन्न किए ही अवमल का ठीक निपटारा हो सके। ये समस्याएँ अभी और खोज की आवश्यकता रखती हैं।

प्रारंभिक अवमल में 92 से लेकर 97 प्रतिशत तक जलांश होता है। यह मल के स्वरूप और निथार कुंड के प्रकार पर निर्भर है। शोधन की जैव स्थितियों के बाद अंतिम निथार टंकी में उत्पन्न द्वितीय अवमल में जलांश प्राय: प्रारंभिक अवमल से बहुत अधिक होता है। फिल्टर निस्त्राव से प्राप्त ह्यूमस अवमल में जलांश 95 प्रतिशत से अधिक होता है। सक्रियकृत वेशी अवमल में जलांश 98 से 99.5 प्रतिशत तक होता है।

घरेलू मल से उत्पन्न अवमल के अतिरिक्त अन्य अवमल का स्वरूप बहुत बदलता रहता है। इसका कारण औद्योगिक कचरे से उत्पादित अवमलों में बहुत विविधता और इन अपशिष्टों का किसी समुदाय विशेष मल प्रवाह और मलशोधन विधियों पर प्रभाव है।

अत: मलशोधन स्थान में उत्पादित अवमल का परिमाण निम्नलिखित बातों पर निर्भर है।

1. मल में उपस्थित व्यापार निस्राव (Trade effluent) के स्वरूप और कोटि का उसका अभाव।
Hindi Title

जनस्वास्थ्य इंजीनियरी


विकिपीडिया से (Meaning from Wikipedia)




अन्य स्रोतों से




संदर्भ
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