जलीय शक्ति पारेषण

Submitted by Hindi on Fri, 08/12/2011 - 12:56
Printer Friendly, PDF & Email
जलीय शक्ति पारेषण (Hydraulic Power Transmission) यंत्रों के व्यावहारिक क्षेत्र में उन्हें संचालित करने के लिये यांत्रिक प्रयुक्तियाँ, विद्युत्‌ संपीडित हवा और संपीडित द्रव ही मुख्य माध्यम हुआ करते हैं, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में उपर्युक्त माध्यमों में से संपीडित द्रव द्वारा विशेष प्रकार के यंत्रों का संचालन करना अधिक सुविधाजनक और लाभप्रद होत है। द्रवों में खनिज तेल और जल ही मुख्य हैं। यदि यंत्र छोटा है और द्रव का संपीडन उसी यंत्र में करके उसी में काम लेना है तब तो खनिज तेल ही उत्तम रहता है, जैसे खराद मशीनों आदि में, लेकिन जहाँ बहुत अधिक मात्रा में द्रव का प्रयोग करना पड़े, यंत्र बहुत बड़ा हो और जहाँ संपीडक यंत्र कार्यकर्तायंत्र से कुछ अधिक दूरी, या बहुत दूरी, पर स्थित हो तो तेल का प्रयोग बहुत मँहगा पड़ता है। अत: वहाँ जल को ही माध्यम बनाया जाता है।

द्रवों को शक्तिपारेषण का माध्यम बनाने की समस्या को दो दृष्टिकोणों से देखा जाता है : (1) जब द्रवचालित यंत्र को बहुत ही मंद गति से चलाना अभीष्ट हो, यंत्र के अभीष्ट कार्य के लिये बहुत अधिक शक्ति की आवश्यकता हो तथा यंत्र की चाल पर बहुत सही सही नियंत्रण करना हो, जैसे रेल के इंजनों के चक्कों और टायर खरादने के यंत्रों में, हाई स्पीड स्टील के औजार बनाने के यंत्रों में, चाँप आदि का परीक्षण और कमानियों का लचीलापन जाँचने के यंत्रों में, तथा (2) जहँ ठहर ठहरकर, कुछ क्षणों के लिये ही अधिक शक्ति लगानी हो, जैसे ब्रामा प्रेसों, संधानीय यंत्रों, बरतन बनाने और ठप्पा लगाने के यंत्रों, रिवेट लगाने के प्रेसों, उत्थापक यंत्र, क्रेन और जहाज लंगर तथा पुल खींचने की चर्खियों आदि में किया जाता है।

कारखानों में जल को संपीडित करने के लिये इतस्ततोगामी पंपों का ही प्रयोग किया जाता है, जो शक्तिशाली इंजनों द्वारा चलाए जाते हैं। भारतीय कारखानों में तो अपना स्वतंत्र इंजन और पंप ही लगाने का रिवाज है, लेकिन पाश्चात्य देशों के बृहत्‌ औद्योगिक नगरों में केंद्रीय बिजलीघर के समान ही केंद्रीय जल संपीडनालय होते हैं, जो अपने शहर के विभिन्न कारखानों को, जो उसके स्थायी ग्राहक होते हैं, 700 से 1,600 पाउंड प्रति वर्ग इंच की दाब पर संपीडित जल, ढले हुए लोहे के मजबूत नलों द्वारा, यंत्रसंचालन के लिये पहुँचाते हैं। ये नल अकसर छह इंच भीतरी व्यास के हुआ करते हैं।

यदि दा (P) = संपीडित जल का कार्यकारी दाब, प्रति वर्ग इंच, पाउंड में; (D) = नल का भीतरी व्यास इंचों में; म (t) नल की दीवारों की मोटाई; च (d) = फ्लैंज के बोल्ट का व्यास; चा (d,) = फ्लैंज में बोल्ट के छेद का व्यास; ख (E) = परिधि पर फ्लैंज की मोटाई; ग (C) = बीच में से फ्लैंज की मोटाई; क (A) = फ्लैंज की परिधि का व्यास हो तो। संपीडित जल का बहाव विभिन्न स्थानों पर नियंत्रित करने के लिये वाल्बों का प्रयोग किया जाता है, जिनके प्रत्येक अंग को बड़ा मजबूत बनाना होता है। जल संपीडनालयों में नदी के पानी को हौजों में भरकर, निथारकर और उचित विधियों से छानकर ही संपीडित किया जाता है, जिससे प्रयोगकर्ताओं के यंत्र कचरा जमने के कारण खराब न हों।

जलीय पारेषण में शक्ति की हानि (loss)- नलों के माध्यम से शक्ति का पारेषण करते समय हानि का मुख्य कारण जल और नल के संपर्कतल पर होनेवाले घर्षण है। जल की श्यानता (viscosity) के कारण होनेवाली हानि अत्यंत स्वल्प होने के कारण नगण्य समझी जाती है। द्रवगतिकी के सिद्धांतानुसार किसी दी हुई दाब पर शक्तिपारेषण, प्रति सेकंड नल में से बहनेवाले पानी के आयतन के अनुलोमत: परिणमित होता है, अत: घर्षण भी उसके वेग के अनुपात से ही बढ़ता है; लेकिन ज्यों ज्यों दाब बढ़ाई जाती है, नल की दीवार की मोटाई भी बढ़ानी पड़ती है। इस कारण नल बहुत भारी हो जाते है और उनके लगाने में तनिक सी त्रुटि हो जाने पर पानी के क्षरण का भय भी बढ़ जाता है क्षरण आरंभ हो जाने पर उसे रोकना कठिन हो जाता है। अत: व्यवहार में पानी की दाब 1,600 पाउंड प्रति वर्ग इंच से अधिक बढ़ाना उपयोगी नहीं समझा जाता। अधिक शक्ति पारेषण के लिये नल का व्यास भी बढ़ाया जा सकता है, लेकिन उसकी सीमा है, क्योंकि नल की कीमत, बैठने का खर्चा और क्षरण रोकने का प्रबंध भी अधिक खर्चीला हो जाता है। अत: छह इंच से अधिक व्यास बढ़ाने के बदले, नलों की दो या अधिक समांतर कतारें लगा दी जाती हैं।

छह इंच व्यास के नल के द्वारा 140 अश्वशक्ति भली भाँति पारेषित की जा सकती है और इसके द्वारा एक मील की दूरी पर अधिक से अधिक 10 पाउंड प्रति वर्ग इंच दाब की हानि होती है। इस उद्देश्य से पंप की दाब लगभग 100 पाउंड प्रति वर्ग इंच रखनी होती है, जिससे नल में पानी का वेग तीन से पाँच फुट प्रति सेकंड तक रहता है। प्रोफेसर अनविन के मतानुसार यदि किसी नल में उच्च दाब के पानी का वेग तीन फुट प्रति सेकंड हो तो एक मील की दूरी में 107/व(107/D) पाउंड प्रति वर्ग इंच शक्ति का हानि हो जाती है। इस सूत्र में व (D) नल का व्यास इंचों में है।

शक्तिपारेषण- पंप और जलीय शक्ति संग्राहकयुक्त स्थिर संयंत्रों में शक्तिपारेषण का अनुमान निम्नलिखित सूत्र द्वारा लगाया जा सकता है:

पारेषित अश्वशक्ति =
Êजिसमें, व (D) = नल का भीतरी व्यास इंचों में;
दा (P) = पानी की दाब प्रति वर्ग इंच पाउंडों में;
तथा प्र (v) = वेग प्रति सेकंड फुटों में।

जलीय शक्तिसंचायक- जलीय शक्तिपारेषण के उद्देश्य से लगाए जानेवाले इतस्ततोगामी पंपों की रचना ही ऐसी होती है कि उसके कारण, यदि सीधा उन्हीं से उच्च दाब पर पानी लिया जाय तो, पानी दाब में निरंतर घटाबढ़ी होने के कारण जलशक्तिचालित यंत्र को निरंतर एक सी दाब नहीं मिल सकती। निम्न कोटि की दाबों के लिये तो, एक जलसंचायक हौज किसी ऊँचे स्थान पर बनाकर काम चलाया जा सकता है, लेकिन 100 फुट की ऊँचाई पर हौज रखने पर भी 43.3 पाउंड प्रति वर्ग इंच की दाब ही प्राप्त हो सकती है, जो यंत्रों के लिये बेकार है। अत: मुख्य पंप और जलशक्तिपारेषक मुख्य नल के बीच में द्रवशक्ति संचायक यंत्र (Hydraulic Accumulator) लगाना होता है। आधुनिक रूप में इनका आविष्यकार सर डब्लू. जी. आर्मस्ट्रांग ने किया था। इसके प्रधान अवयवों में ढले हुए इस्पात का एक लंब सिलिंडर जमीन पर ऊर्ध्वाधर लगा दिया जाता है। इसके भीतर बोझे से लदा हुआ एक बेलन पानी की दाब से ऊपर नीचे सरकता रहता है। नल में बहनेवाले पानी को जितना दाबयुक्त बनाना अभीष्ट होता है उसी के हिसाब से बेलन पर बोझा लादा जाता है। भारी दाब पहुँचानेवाले संचायकों के बेलन के ऊपर लटकता हुअ, लोहे की मजबूत चादरों का बना, एक वलयाकार ढोल कस दिया जाता है, जिसके खोखले भाग में चित्र 3. में दिखाए अनुसार अकसर रद्दी लोहा या लोहे के टुकड़े भर दिए जाते हैं, बेलन के पेंदे के पास दो नल लगाए जाते हैं, जिनमें से एक तो पंप से आता है और दूसरा संचालक से यंत्रों को जाता है। जब तक यंत्रों में दाबयुक्त पानी का प्रयोग होता रहता है, इन नलों में से पंप का पानी यंत्रों में सीधा जाकर उन्हें संचालित करता है, और ज्योंही उन यंत्रों में पानी की आवश्यकता कम हो जाती है, फालतू पानी संचायक के सिलिंडर में भरने लगता है। इससे भार सहित बेलन ऊँचा उठने लगता है, और जब बेलन अपनी सबसे ऊँची हद पर पहुँच जाता है, तब वहाँ एक लीवर से टकराकर उसे चला देता है जिससे संबंधित अन्य लीवर भी चलकर पंप को बंद कर देते हैं।

क. संपीडित जल का प्रवेश नल, पंप से, ख. संपीडित जल का निष्कासन नल, यंत्र को, ग. गर्डरों द्वारा बने संचायक के खंभे, घ. संचायक का बेलन, च, संचायक का सिलिंडर, छ. रद्दी लोहे आदि के रूप में भरा हुआ भार, ज. वलयाकार हौज में लगी हुई लोहे की तानें, झ. सिलिंडर के मुँह पर लगा ग्लैंड और पैकिंग, ट. बेलन की टोपी (नीचे तथा ऊपर की स्थितियों में), ठ. बेलन की उच्चतम स्थिति का नियंत्रक लीवर, ङ नियंत्रक लीवर का आलंब, ढ. नियंत्रक लीवरों का ऊर्ध्वाधर संयोजक दंड, त. बेलन की निम्नस्थिति नियंत्रक लीवर का आलंब तथा थ. नियंत्रक लीवर का तान दंड, पंप से संयुक्त।

जब यंत्रों में दाबयुक्त पानी का फिर से प्रयोग आरंभ होता है, तब सर्वप्रथम संचायक के सिलिंडर में भरा पानी खर्च होने लगता है, जिससे भार सहित बेलन नीचे उतरने लगता है, और जिस लीवर के दबने से पंप बंद हुआ था वह ढीला पड़ कर छूट जाता है। इससे पंप फिर स्वत: चालू हो जाता है।

जिन कारखानों में जलशक्तिचालित यंत्रों द्वारा प्रेस अथवा रिवेट मशीनें चलाई जाती हैं, वहाँ छोटा सा संचायक और लगा दिया जाता है, जैसा 4. में दिखाया गया है। इसका बेलन पोला होता है, जिसे जमीन पर दृढ़ता से लगा दिया जाता है और सिलिंडर पर भार लादकर, बेलन पर उलटकर लगा दिया जाता है। बेलन का पोल से संबंध मिलाते हुए, नीचे की तरफ पंप से आने और यंत्रों को जानेवाले दो नल भी लगे रहते हैं। बेलन के पोल से सिलिंडर का संबंध ऊपर की तरफ से होता है। इस प्रकार के यंत्र को व्यासांतरीय संचायक कहते हैं, जिसमें थोड़े भार से ही अधिक दाब प्राप्त हो सकती है। संचायक यंत्रों का मुख्य प्रयोजन जल की दाब शक्ति का वर्धन्‌, संग्रह और नियमन करना है। यह संग्रह विद्युत्‌ संचायक घट में विद्युत्‌ शक्ति के संग्रह जैसा नहीं होता, बल्कि बहुत कुछ इंजन के गतिपाल चक्र के सदृश होता है, क्योंकि इसके सिलिंडर में दाबयुक्त जल को संग्रह करने की जगह बहुत थोड़ी होती है। इन यंत्रों की कार्यक्षमता 98% तक होती है।

जलशक्ति संचायकों में भार सहित बेलन के ऊँचा उठने पर जो स्थितिज ऊर्जा बेलन में समाहित होती है, उसी के बराबर संचायक की ऊर्जा-संग्रहण-क्षमता समझी जाती है, जिसमें से लगभग 2% ऊर्जा घर्षण आदि में नष्ट हो जाती है।

यदि बेलन का स्ट्रोक (Stroke) ल (S) फुट और बोझ सहित उसका समग्र भार भ (W) पाउंड हो, तो सबसे ऊँची स्थिति में उसकी ऊर्जा ल भ (S W) फुट पाउंड होगी। यदि पानी की दाब दा (P) पाउंड प्रति वर्ग इंच, और बेलन की गोलाई के परिच्छेद का क्षेत्रफल क्ष वर्ग इंच हो तो ऊर्जा द क्ष ल फुट पाउंड होगी।

क. संपीडित जल का प्रवेश नल, पंप से, ख. संपीडित जल का निष्कासन नल, यंत्र को, ग. व्यासांतरी बेलन, घ. संचायक सिलिंडर, च. ढले लोहे के वलयाकार भार, छ. संचायक के बेलन की ऊपर की तरफ स्थिर रखनेवाला ब्रैकेट तथा ज. संचायक के बेलन को नीचे की तरफ स्थिर रखनेवाला बुनियादी ब्रैकेट।

अत: भार भ =
जिसमें व (D) बेलन का व्यास इंचों में माना गया है। प्राय: बेलन का व्यास 18 से 20 इंच और स्ट्रोक 20 से 23 फुट तक होती है। जिन जलीय शक्ति संयंत्रों में दो संचायक एक साथ लगाए जाते हैं, उनमें से एक पर लगभग 20 पाउंड प्रति वर्ग इंच भार, दूसरे अधिक रखा जाता है, जिससे जब हल्का संचायक अपनी सर्वोच्च स्थिति पर पहुँच जाय तब दूसरा उठना आरंभ करे।

नलों में तरगों द्वारा शक्तियापारेषण  उपर्युक्त प्रणाली के अनुसार जब दाबयुक्त पानी एक बार यंत्र में काम कर चुकता है, तब वह रद्दी नाली में बहा दिया जाता है, परंतु इस विधि के अनुसार तेल अथवा पानी एक बंद परिपथ (closed circuit) में कैद रहता है, जिसके एक छोर पर तो पंप रहता है और दूसरे छोर पर यंत्र। इतस्ततोगामी पंप को चालू करने पर उसकी चाल के अनुसार बारी बारी से उस द्रव पर दबाव और ढिलाव पड़ता है, जो चालित यंत्र को भी प्रभावित करता है। जी.कांर्स्टैटिनेस्को (G. Constantinesco) ने चट्टान छेदने के बरमे के लिये इस सिद्धांत का प्रयोग किया था, लेकिन अनेक प्रकार की प्राविधिक कठिनाइयों के कारण इसका प्रचार न हो सका।

Hindi Title


विकिपीडिया से (Meaning from Wikipedia)




अन्य स्रोतों से




संदर्भ
1 -

2 -

बाहरी कड़ियाँ
1 -
2 -
3 -

Comments

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

7 + 9 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.