हिमालय को बचाने की अंतर्राष्ट्रीय पहल

Submitted by Hindi on Tue, 08/16/2011 - 11:03
Source
चौथी दुनिया, 10 अगस्त 2011

हिमालय अब संकट मेंहिमालय अब संकट मेंजलवायु परिवर्तन और प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ का जैव विविधता पर नकारात्मक असर पड़ा है। इंसान अपने फायदे के लिए एक तरफ जहां जंगलों का सफाया कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ उसने प्राकृतिक संपदा की लूटखसोट मचा रखी है, बगैर इस बात का ख्याल किए हुए कि इस पर अन्य जीवों का भी समान अधिकार है। बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप ने पर्वतीय क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र को भी गड़बड़ कर दिया है, जिससे यहां पाए जाने वाले कई जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं या होने के कगार पर हैं। पहाड़ों पर हो रही पेड़ों की अवैध कटान एवं खनन कार्यों ने इस क्षेत्र को अंदर से खोखला कर दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण हर साल बढ़ती गर्मी से ग्लेशियरों का पिघलना लगातार जारी है। ऐसे में पहाड़ों पर रहने वालों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। हिमालय जहां हमारे लिए पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, वहीं इसे जड़ी-बूटियों की उपलब्धता के लिए भी जाना जाता है।

संस्कृत के शब्द हिम (बर्फ) और आलय (घर) से मिलकर बने हिमालय को पुराणों में देव स्थान के नाम से भी पुकारा गया है। हजारों वर्षों से यह ऋषि-मुनियों की भूमि रही है। धर्मग्रंथों में कई जगह हिमालय की विशेषता का उल्लेख मिलता है। 12 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले हिमालय में 15 हजार से ज्यादा ग्लेशियर मौजूद हैं। भारत और नेपाल के लोगों की प्यास बुझाने और कृषि कार्यों के लिए पानी की अधिकांश आपूर्ति इसी से निकलने वाली नदियां करती रही हैं। वहीं पन बिजली उत्पादन के लिए भी यह हमारा प्रमुख स्रोत रहा है लेकिन विकास के नाम पर इंसानों द्वारा नासमझी में किए जा रहे कार्यों और इसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया है।

वैश्वीकरण के बढ़ते असर से पर्वतीय क्षेत्रों की आबादी के समक्ष खाद्य सुरक्षा का खतरा पैदा हो गया है। वहीं पर्यटन और आधुनिक तकनीक ने इन क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों को भी प्रभावित किया है। वास्तव में हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के अपार भंडार हैं। जम्मू-कश्मीर से उत्तराखंड होते हुए उत्तर पूर्व तक फैला हिमालय अपने अंदर विविधताएं समेटे हुए है, जिन्हें विकास के नाम पर नष्ट किया जा रहा है। हालांकि इस संबंध में अब कई अहम कदम उठाए जा रहे हैं। भू-वैज्ञानिकों द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों के प्रति व्यक्त की जा रही चिंताएं सार्थक साबित हो रही हैं और इस दिशा में प्रयास शुरू हो चुके हैं। पिछले दिनों पर्यटन नगरी नैनीताल में भूगोल वेत्ताओं के अंतर्राष्ट्रीय संगठन आईजीयू की संगोष्ठी को इसी संदर्भ में एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। कुमांऊ विश्वविद्यालय में आयोजित इस संगोष्ठी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात भू-वैज्ञानिक प्रो। मार्टिन प्राइस समेत देश एवं विदेश के तकरीबन दो सौ से अधिक भूगोलविदों ने हिस्सा लिया और खतरे में पड़े पारिस्थितिक तंत्र, जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की। प्रो। मार्टिन ने इस बात पर जोर दिया कि पर्वतीय क्षेत्रों के पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए वैज्ञानिक आधार पर योजनाएं बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि विकास के नाम पर हो रहे प्राकृतिक दोहन को अगर वक्त रहते नहीं रोका गया तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ सकता है।

आईजीयू कमीशन के महासचिव प्रो. वाल्टर लिमग्रूवर ने कहा, पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की अपार संभावनाएं मौजूद हैं, जिनके उपयोग के लिए उचित तकनीक की आवश्यकता है, ताकि बिना नुकसान पहुंचाए उनका भरपूर उपयोग किया जा सके और इसके लिए सरकार को जल्द से जल्द पहल करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विशेष नियोजन के माध्यम से ही पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोका जा सकता है। भूगर्भ विज्ञानी प्रो. खडग सिंह वल्दिया के अनुसार, पर्वतीय क्षेत्रों में जमीन के अंदर सबसे ज्यादा हलचल रहती है, जिससे भूकंप की आशंका बनी रहती है। शिवालिक की पहाड़ियों से लेकर हिमालय तक के क्षेत्र की जमीन के नीचे कई फाल्ट मौजूद हैं। भारतीय प्लेट तिब्बत से शुरू होने वाली एशियन प्लेट में हर साल पांच सेंटीमीटर समाहित हो रही है, जिसके कारण हिमालय साल में औसतन 18 से 20 मिमी ऊंचा हो रहा है। इस हलचल का असर उत्तराखंड के भूभाग पर भी पड़ता है और यह अपनी सतह से 3 से 5 मिमी ऊपर उठ रहा है। ऐसे में विकास का मॉडल बनाते वक्त इन बातों को नजरअंदाज करना महंगा साबित हो सकता है।

जैविक विकास में पहाड़ों का अहम योगदान रहा है। विश्व का 24 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ों से घिरा है, जिस पर कुल आबादी का 12 प्रतिशत हिस्सा सामाजिक और आर्थिक रूप से निर्भर है। यह निर्भरता केवल जनजातीय समुदायों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विकास की अंधी दौड़ में शामिल आम इंसान भी उतने ही निर्भर हैं। यह समझना जरूरी है कि जैव विविधता अमूल्य है, उसे बचाने के ठोस प्रयास करने होंगे। यह कार्य किसी एक व्यक्ति, संगठन अथवा सरकार द्वारा नहीं, बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति और प्रयासों से संभव है। समय की मांग है कि हम विकास की रूपरेखा को तैयार करते वक्त टिकाऊ विकास के मॉडल को अपनाएं, ताकि आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित भविष्य का निर्माण हो सके। इसके लिए विकसित देशों को पहल करने की आवश्यकता है।
 

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