प्राणिविज्ञान (Zoology)

Submitted by Hindi on Mon, 08/22/2011 - 12:23
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प्राणिविज्ञान (Zoology) विज्ञान की एक शाखा है, जिसमें प्राणियों या जंतुओं का अध्ययन होता है। मनुष्य भी एक प्राणी है। प्राणी की परिभाषा कई प्रकार से की गई है। कुछ लोग प्राणी ऐसे जीव को कहते हैं जो कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का सृजन तो नहीं करता, पर जीवनयापन के लिए इन पर निर्भर करता है। इन पदार्थों को प्राणी बाह्य स्त्रोत से ही प्राप्त करता है। इनके सृजन करने वाले पादप जाति के पदार्थ होते हैं, जो अकार्बनिक स्त्रोतों से प्राप्त पदार्थों से इनका सृजन करते हैं। कुछ लोग प्राणी उन जीवों को कहते हैं जिनमें गमनशीलता होती है। ये दोनों ही परिभाषाएँ सब प्राणियों पर लागू नहीं होतीं। पादप जाति के कुछ कवक और जीवाणु ऐसे हैं, जो अपना भोजन बाह्य स्त्रोतों से प्राप्त पदार्थों से इनका सृजन करते हैं। कुछ लोग प्राणी उन जीवों को कहते हैं जिनमें गमनशीलता होती है। ये दोनों ही परिभाषाएँ सब प्राणियों पर लागू नहीं होतीं। पादप जाति के कुछ कवक और जीवाणु ऐसे हैं, जो अपना भोजन बाह्य स्त्रोतों से प्राप्त करते हैं। कुछ ऐसे प्राणी भी हैं, जो स्टार्च का सृजन स्वयं करते हैं। अत: प्राणी और पादप में विभेद करना कुछ दशाओं में बड़ा कठिन हो जाता है। यही कारण है कि प्राणिविज्ञान और पादपविज्ञान का अध्ययन एक समय विज्ञान की एक ही शाखा में साथ साथ किया जाता था और उसका नाम जैविकी या जीव विज्ञान (Biology) दिया गया है। पर आज ये दोनों शाखाएँ इतनी विकसित हो गई हैं कि इनका सम्यक्‌ अध्ययन एक साथ करना संभव नहीं है। अत: आजकल प्राणिविज्ञान एवं पादपविज्ञान का अध्ययन अलग अलग ही किया जाता है।

प्राणिविज्ञान का अध्ययन मनुष्य के लिए बड़े महत्व का है। मनुष्य के चारों ओर नाना प्रकार के जंतु रहते हैं। वह उन्हें देखता है और उसे उनसे बराबर काम पड़ता है। कुछ जंतु मनुष्य के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं। अनेक जंतु मनुष्य के आहार होते हैं। जंतुओं से हमें दूध प्राप्त होता है। कुछ जंतु ऊन प्रदान करते हैं, जिनसे बहुमूल्य ऊनी वस्त्र तैयार होते हैं। जंतुओं से ही रेशम, मधु, लाख आदि बड़ी उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। जंतुओं से ही अधिकांश खेतों की जुताई होती है। बैल, घोड़े, खच्चर तथा गदहे इत्यादि परिवहन का काम करते हैं। कुछ जंतु मनुष्य के शत्रु भी हैं और ये मनुष्य को कष्ट पहुँचाते, फसल नष्ट करते, पीड़ा देते और कभी कभी मार भी डालते हैं। अत: प्राणिविज्ञान का अध्ययन हमारे लिए महत्व रखता है।

बौद्धिक विकास के कारण मनुष्य अन्य प्राणियों से भिन्न होता है, पर शारीरिक बनावट और शारीरिक प्रणाली में अन्य कुछ प्राणियों से बड़ी समानता रखता है। इन कुछ प्राणियों की इद्रियाँ और कार्यप्रणाली मनुष्य की इंद्रियाँ और कार्यप्रणाली से बहुत मिलती जुलती है। इससे अनेक नई ओषधियों के प्रभाव का अध्ययन करने में इन प्राणियों से लाभ उठाया गया है और अनेक नई नई ओषधियों के आविष्कार में सहायता मिली है।

प्राणियों का अध्ययन बहुत प्राचीन काल से होता आ रहा है। इसका प्रमाण वे प्राचीन गुफाएँ हैं जिनकी पत्थर की दीवारों पर पशुओं की आकृतियाँ आज भी पाई जाती हैं। यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने ईसा के 300 वर्ष पूर्व जंतुओं पर एक पुस्तक लिखी थी। गैलेना (Galena) एक दूसरे रोमन वैद्य थे, जिन्होंने दूसरी शताब्दी में पशुओं की अनेक विशेषताओं का बड़ी स्पष्टता से वर्णन किया है। यूनान और रोम के अन्य कई ग्रंथकारों ने प्रकृतिविज्ञान पर पुस्तकें लिखीं हैं, जिनमें जंतुओं का उल्लेख है। बाद में लगभग हजार वर्ष तक प्राणिविज्ञान भुला दिया गया था। 16वीं सदी में लोगों का ध्यान फिर इस विज्ञान की ओर आकर्षित हुआ। उस समय चिकित्सा विद्यालयों के अध्यापकों का ध्यान इस ओर विशेष रूप से गया और वे इसके अध्ययन में प्रवृत्त हुए। 17वीं तथा 18वीं शताब्दी में इस विज्ञान की विशेष प्रगति हुई। सूक्ष्मदर्शी के आविष्कार के बाद इसका अध्ययन बहुत व्यापक हो गया। आधुनिक प्राणिविज्ञान की प्राय: इसी समय नींव पड़ी और जंतुओं के नामकरण और आकारिकी की ओर विशेष रूप से ध्यान दिया गया। लिनियस ने 'दि सिस्टम ऑव नेचर' (1735 ई.) नामक पुस्तक में पहले पहल जंतुओं के नामकरण का वर्णन किया है। उस समय तक ज्ञात जंतुओं की संख्या बहुत अधिक हो गई थी और उनका वर्गीकरण आवश्यक हो गया था। प्राणिविज्ञान का विस्तार आज बहुत बढ़ गया है। सम्यक्‌ अध्ययन के लिए इसे कई शाखाओं में विभाजित करना आवश्यक हो गया है। ऐसे अंतर्विभागों में आकारिकी (Morphology), सूक्ष्मऊतकविज्ञान (Histology), कोशिकाविज्ञान (Cystology), भ्रूणविज्ञान (Embryology), जीवाश्मविज्ञान (Palaeontology), विकृतिविज्ञान (Pathology), वर्गीकरणविज्ञान (Taxology), आनुवांशिकविज्ञान (Genetics), जीवविकास (Evolution), पारिस्थितिकी (Ecology) तथा मनोविज्ञान (Psychology) अधिक महत्व के हैं।

आकारिकी - जंतु भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं। उनके बाह्य लक्षण, शरीर का आकार, विस्तार, वर्ण, त्वचा, बाल, पर, आँख, कान, पैर तथा अन्य अंग भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं। अत: शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि जंतुओं के बाह्य लक्षणों का ज्ञान साधारण बात है। उनकी आंतरिक बनावट से ही कुछ विशेष तथ्य की बातें मालूम हो सकती हैं। अत: उनकी बनावट के अध्ययन पर विशेष ध्यान दिया गया। जंतुओं का चाकुओं और अन्य औजारों से चीरफाड़ कर, काट छाँटकर, अध्ययन शुरू हुआ और सूक्ष्मदर्शी के आविष्कार और प्रयोग से अनेक बातें मालूम हुईं, जिनसे उनके विभाजन में बड़ी सहायता मिलती है। जंतु कोशिकाओं से बने हैं। सब जंतुओं की कोशिकाएँ एक सी नहीं होतीं। ऊतकों से ही जंतुओं के सब अंग उदर, वृक्क आदि बनते हैं। ऊतक भी एक से नहीं होते। कुछ जंतु एक कोशिका से बने हैं, इन्हें एककोशिकीय या प्रोटोजोआ (Protozoa) कहते हैं। इनकी संख्या अपेक्षया थोड़ी है। अधिक जंतु अनेक कोशिकाओं से बने हैं। इन्हें बहुकोशिकीय या मेटाज़ोआ (Metazoa) कहते हैं। इनकी संख्या बहुत बड़ी है। इन जंतुओं की आकारिकी के अध्ययन से पता लगता है कि सब जंतुओं के प्रतिरूप सीमित किस्म के ही हाते हैं, यद्यपि बाह्यदृष्टि से देखने में यह बहुत भिन्न मालूम पड़ते हैं। अधिकांश जंतु रीढ़वाले या कशेरुकी (verterbate) हैं और अपेक्षया कुछ थोड़े से ही अकशेरुकी या अपृष्ठवंशी (invertebrate) हैं।

सूक्ष्मऊतकविज्ञान - इसके अध्ययन के लिए विभिन्न जंतुओं के ऊतकों को महीन काटकर, उसी रूप में अथवा रंजकों से अभिरंजित कर, सूक्ष्मदर्शी से निरीक्षण कते हैं। रंजक के उपयोग से कोशिकाएँ अधिक स्पष्ट हो जाती हैं पर उससे कोशिकाओं की कोई क्षति नहीं होती। कोशिकाओं को बहुत महीन काटने के लिए (1/1000 मिमी. की मोटाई तक) यंत्र बने हैं, जिन्हें माइक्रोटोम कहते हैं। ऐसे अध्ययन से ऊतकों को सामान्यत: निम्नलिखित चार प्रकार में विभक्त किया गया है : 1. उपकलाऊतक (Epithelial tissue), 2. तंत्रिका ऊतक (Nervous tissue) 3. योजीऊतक (Connective tissue) तथा 4. पेशीऊतक (Muscular tissue)।

कोशिकाविज्ञान - इसके अंतर्गत जंतुओं की कोशिकाओं का अध्ययन होता है। इनकी कोशिकाओं में जीवद्रव्य (protoplasm) रहता है। कुछ कोशिकाएँ एककोशिकीय होती हैं और कुछ बहुकोशिकीय। जीवद्रव्य सरल पदार्थ नहीं हैं। इनमें बड़ी सूक्ष्म बनावट के अनेक पदार्थ मिले रहते हैं। कोशिकाओं का आनुवंशिकी से बड़ा घनिष्ठ संबंध है। कोशिकाएँ भिन्न भिन्न आकार और विस्तार की होती हैं। सामान्य कोशिका के दो भाग होते हैं: एक केंद्रक होता है और दूसरा उसको घेरे हुए कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) होता है।

भ्रूणविज्ञान - जब शुक्राणुकोशिका से संयोजन कर अंडकोशिका उद्दीप्त होती है तब उसका भ्रूणविकास प्रारंभ हो जाता है। इससे एक विशिष्ट लक्षण प्रकट होता है। इस प्रक्रिया का जब प्राणिविज्ञानियों ने अनेक जंतुओं में अध्ययन किया, तब उन्हें पता लगा कि सभी जंतुओं में इस प्रक्रिया में बहुत सदृश्य पाया जाता है। अंडों का पहले विदलन होता है। इससे नई कोशिकाएँ गेंदों में बँट जाती हैं। इसके बाद एक द्विस्तरी पदार्थ गैस्ट्रुला (gastrula) बनता है। इसके बाद एक बाह्य उपकला और एक अंतर उपकला (epithelium) बनती है। किसी किसी दशा में एक ठोस पिंड, अंतर्जनस्तर (entoderm), भी बनता है। अंतर्जनस्तर की उत्पत्ति भिन्न भिन्न प्रकार की हाती है। अधिकांश दशा में उत्पत्ति अंतर्वलन (invagilation) द्वारा, अथवा बाह्य उपकला के भीतर मुड़ने के कारण होती है। हैकेल (Haekel) तथा कुछ अन्य प्राणिविज्ञानियों का मत है कि प्राथमिक रीति अंतर्वलन की रीति है। यदि अन्य कोई रीति है तो वह गौण रीति है और प्राथमिक रीति से ही निकलती हैं। गैस्ट्रुला अवस्था के स्थापित होने के बाद, बाह्य त्वचा (ectoderm) और अंतर्जनस्तर के बीच ऊतक बनते हैं, जिसे मध्य जनस्तर कहते हैं। जंतुओं में मध्य जनस्तर कई प्रकार के पाए गए हैं। पर जो बड़े महत्व का समझा जाता है वह है आंत्रगुहा (enterocoele), जिसमें अंतर्जनस्तर से कोटरिका (pocket) के ढकेलने से मध्यजनस्तर बनता है। बाह्य चर्म, अंतर्जनस्तर और मध्य जनस्तर को जनस्तर (germlayer) कहते हैं। इसी स्तर से प्रौढ़ जंतुओं के ऊतक और अन्य अंग बनते हैं। एक पर एक तह के बनने और स्थानांतरण द्वारा यह कार्य होता है (देखें भ्रूण विज्ञान)।

जीवश्मविज्ञान - अनेक जंतु ऐसे हैं जो एक समय इस पृथ्वी पर विद्यमान थे। पर वे अब कहीं-कहीं पाए जाते हैं। इनके जीवाश्म पृथ्वीस्तरों या चट्टानों में पाए जाते हैं। इनसे संबंधित बातों के अध्ययन को जीवाश्मविज्ञान कहते हैं। अध्ययन से पता लगता है कि ये जंतु किस युग में, कितने लाखों या करोड़ों वर्ष पूर्व विद्यमान थे और वर्तमान युग के कौन-कौन जंतु उनसे संबंधित कहे जा सकते हैं। उच्च प्राणियों के विकास में कौन-कौन अवस्थाएँ हुईं, इनका पता भी जीवाश्म के अध्ययन से बहुत कुछ लगता है। यह विज्ञान भौतिकी से बहुत घनिष्ट संबंध रखता है (देखें फॉसिलविज्ञान)।

आनुवांशिक विज्ञान - विज्ञान की इस शाखा क संबंध प्राणियों की अनुवांशिकता, विभिन्नता, परिवर्धन और विकास से है। प्राणियों में समानता और विभिन्नता का अध्ययन इसी के अंतर्गत होता है। पिता और संतान के गुणों में कैसा संबंध है, प्रौढ़ों के विशिष्ट गुण अंडों में कैसे विद्यमान रहते हैं, अंडों के परिवर्धन के साथ साथ प्रौढ़ो में उनके गुणों का कैसे विकास होता है, इनका अध्ययन, निरीक्षण, प्रायोगिक प्रजनन, औतिकीय और प्रायोगिक आकारिकी से होता है। जंतुओं से प्राप्त परिणामों का उपयोग मानव-सुजनन-विज्ञान (eugenics) में भी हुआ है।

विकास - इसके अंतर्गत विभिन्न जंतुओं का विकास होकर आधुनिक रूप कैसे प्राप्त हुआ है, इसका अध्ययन होता है।

पारिस्थितिकी - प्राणी कैसे वातावरण में रहते हैं, कैसा वातावरण उनके अनुकूल होता है और कैसा वातावरण प्रतिकूल, इसका अध्ययन पारिस्थितिकी में होता है। वातावरण के कारक भौतिक हो सते हैं अथवा रासायनिक। ताप, प्रकाश, आर्द्रता तथा समुद्री जंतुओं के संबंध में समुद्रजल में लवण की मात्रा, जल की गहराई और जल का दबाव इत्यादि विभिन्न कारक हैं, जिनका अध्ययन इसके अंतर्गत आता है। पृथ्वीतल के विभिन्न भागों पर जंतु कैसे फैले हुए हैं, इसका भी अध्ययन इसके अंतर्गत होता है।

जंतुरोग विज्ञान - इसके अंतर्गत जंतुओं के रोगों का अध्ययन होता है। मानव हित के लिए यह जानना आवश्यक होता है कि जिन जंतुओं को हम खाते अथवा जिनसे हम दूध, मक्खन, अंडा आदि प्राप्त करते हैं, वे स्वस्थ हैं या नहीं। पशुओं की अस्वस्थता का प्रभाव मानवशरीर पर भी पड़ सकता है। उससे बचने के लिए जंतुओं के रोगों का अध्ययन बड़ा महत्व रखता है। रोगों से अनेक जंतु मर भी जाते हैं, जिससे आर्थिक दृष्टि से बहुत बड़ी क्षति होती है।

मनोविज्ञान - जंतुओं का मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, उनमें कितनी समझ है, सिखाने से वे कहाँ तक सीख सकते हैं, इनका मानव तथा अन्य जंतुओं के प्रति कैसा व्यवहार होता है, इत्यादि का अध्ययन मनोविज्ञान के अंतर्गत होता है। उपर्युक्त बातों के अध्ययन से मनुष्य को बहुत लाभ हो सकता है। कुत्ते के प्रशिक्षण से चोरों, डाकुओं या हत्यारों का पकड़ना आज बहुत कुछ सुलभ हो गया है। प्रशिक्षण से ही हाथी जंगलों में लकड़ियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है और सवारी का काम देता है।

वर्गीकरण - प्राणियों की सख्या बहुत अधिक हो गई है। अब तक इनके दो लाख वंशों और 10 लाख जातियों का पता लगा है। प्राणियों के अध्ययन के लिए प्राणियों का वर्गीकरण बहुत आवश्यक हो गया है। वर्गीकरण कठिन कार्य है। विभिन्न प्राणिविज्ञानी वर्गीकरण में एकमत नहीं हैं। विभिन्न ग्रंथकारों ने विभिन्न प्रकार से जंतुओं का वर्गीकरण किया है। कुछ प्राणी ऐसे हैं जिनको किसी एक वर्ग में रखना भी कठिन होता है, क्योंकि इनके कुछ गुण एक वर्ग के जंतुओं से मिलते हैं तो कुछ गुण दूसरे वर्ग के जंतुओं से। साधारणतया सभी वैज्ञानिक सहमत हैं कि जंतुओं का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से होना चाहिए जिसमें छोटे समूह से प्रारंभ करके क्रमश: बड़े-बड़े समूह दिए हैं : 1. जाति (species), 2. वंश (genus), 3. कुल (family), 4. गण (order), 5. वर्ग (class) तथा 6. संघ या फाइलम (phyllum)। इन विभाजनों के भी अंतर्विभाग हैं जिन्हें उप (sub), अव या अध: (infra) और अधि (super) जोड़कर बनाते हैं।

जाति - जंतुओं का वर्गीकरण विभिन्न प्रकार के जंतुओं को अलग अलग करके शुरू करते हैं। हम देखते हैं कि गाय समस्त संसार में प्राय: एक सी होती है ओर वह घोड़े या भैंस से भिन्न होती है। अत: हम गाय को एक जाति में रखते हैं, घोड़े और भैंस को अलग-अलग दूसरी जातियों में। गाय की जाति घोड़े और भैंस की जातियों से भिन्न है। कुछ जातियों की उपजातियाँ भी हैं। कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनका एक दूसरे से विभेद करना कठिन होता है।

वंश - कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनकी आकारिकी में बहुत सादृश्य है, पर बाह्य आकार में विभिन्नता देखी जाती है। इस प्रकार की कई जातियाँ हो सकती हैं जिनके बाह्य रूप में अंतर होने पर भी आकारिकी में सादृश्य हो। ऐसी विभिन्न जातियों को एक वंश के अंतर्गत रखने के लिए उनमें कितनी समानता और कितनी विभिन्नता रखनी चाहिए, इसका निर्णय वैज्ञानिकों पर निर्भर करता है और बहुधा कुछ जातियाँ एक वंश से दूसरे वंश में बदलती हुई पाई जाती हैं। पहले ऐसा होना सामान्य बात थी, पर अब इसमें बहुत कुछ स्थिरता आ गई है।

कुल - कुछ ऐसे वंश है जिनके प्राणियों में समानता देखी जाती है। ऐसे विभिन्न वंशवाले जंतुओं को एक स्थान पर एक कुल के अंतर्गत रखते हैं।

गण - एक ही किस्म की बनावट तथा सामान्य गुणवाले विभिन्न कुलों के जंतुओं को एक साथ रखने की आवश्यकता पड़ सकती है। इन्हें जिस वर्ग में रखते हैं उसे 'गण' कहते हैं। कई कुल मिलकर गण बनते हैं पर कुछ प्राणिविद् कुल और गण को पर्यायवाची शब्द मानते हैं। प्राणिविद् जंतुओं में ऐसा विभेद करने के लिए उनमें विशेष अंतर नहीं पाते, यद्यपि पादपविज्ञान में ऐसा अंतर स्पष्ट रूप से देखा जाता है।

वर्ग - जंतुओं के उस समूह को कहते हैं, जिसका पद गण और संघ के बीच का होता है।

संघ - जंतुजगत्‌ का प्रारंभिक विभाजन संघ है। प्रत्येक संघ के प्राणियों की संरचना विशिष्ट होती है जिसके कारण प्रत्येक संघ के प्राणी एक दूसरे से भिन्न होते हैं। जंतुजगत्‌ के प्राणियों का विभाजन दो उपजगतों में हुआ है। जो जंतु केवल एक कोशिका के बने हैं उन्हें प्रोटोजोआ (Protozoa) कहते हैं। यह उपजगत्‌ अपेक्षया बहुत छोटा है। जिस जगत्‌ में सबसे अधिक संख्या में जंतु आते हैं उसे मेटाजोआ (Metazco) कहते हैं। ये बहुकोशिकाओं के बने होते हैं।

जंतुओं का नामकरण - विभिन्न देशों और विभिन्न भाषाओं में जंतुओं के नाम भिन्न भिन्न होते हैं। इससे इनके अध्ययन में कठिनता होती है। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से नामों में एरूपता लाना अत्यावश्यक है। नामों में एकरूपता लाने का सर्वप्रथम प्रयास लिनीयस (Linnaeus) ने किया। उन्होंने सब जंतुओं को लैटिन नाम दिया। इस नामकरण के अनुसार जंतुओं के नाम दो शब्दों से बने होते हैं। इस प्रणाली को 'द्विपद प्रणाली' (Binomial System) कहते हैं। इसके अनुसार जंतुओं का पहला नाम वंशिक नाम वंशिक नाम होता है और दूसरा उसका विशिष्ट नाम। वंशिक नाम अंग्रेजी के कैपिटल अक्षर से और दूसरा नाम छोटे अक्षर से लिख जाता है। इससे विभिन्न देशों में विभिन्न नामों से जो अव्यवस्था अव्यवस्था होती थी, वह दूर हो गई और इस प्रकार नामों में एकरूपता आ गई। ये वैज्ञानिक नाम आज बड़े महत्व के हैं और इनसे विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों को जंतुओं के अध्ययन में बड़ी सहायता मिली है।

प्रोटोजोआ संघ - प्राय: सब ही प्रोटोज़ोआ बहुत छोटे जंतु होते हैं और साधारणतया सूक्ष्मदर्शी के सहारे ही देखे जाते हैं। पर कुछ प्रोटोज़ोआ विकसित होकर निवह (colony) बनते हैं, तब इन्हें केवल आँखों से देखा जा सकता है। प्रोटोज़ोआ के ऐसे निवह गंदे पानी में देखे जा सकते हैं। इनमें कुछ कशाभिका (flagellum) द्वारा, कुछ पक्ष्माभिका (cilia) द्वारा तथा कुछ अन्य साधनों से तैरते हुए पाए जाते हैं। अधिकांश प्रोटोज़ोआ परजीवी होते हैं तथा बड़े बड़े जीवों पर आश्रित हाते हैं। ये अनेक रोगों, जैसे मलेरिया, निद्रारोग इत्यादि के कारण होते हैं। इस संघ के अंतर्गत निम्नलिखित वर्ग आते हैं :

वर्ग - 1. फ्लैजेलेटा (Flagellata), वर्ग - 2. राइजॉपोडा (Rhizopoda), वर्ग - 3. सिलिएटा (Ciliata), वर्ग - 4. टेलोस्पोरिडा (Telosporidia), वर्ग - 5. नाइडास्पोरिडिया (Cnidasporidia) तथा वर्ग - 6. ऐक्निडोस्पोरिडिया (Acnidosporidia)।

पॉरिफेरा (Porifera) संघ - इस संघ में स्पंजी जंतु आते हैं। ये एक स्थान पर बढ़ते हैं और अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं। इनका शरीर वस्तुत: कोशों का बना होता है, जिनके पाश्र्‌व में अनेक छोटे छोटे छिद्र (pores) होते हैं। इन छिद्रों से पानी जाता है, इन्हीं से इन्हें भोजन मिलता है। इनमें भोजन के लिए कोई मुख या इंद्रियाँ नहीं होतीं। अनेक छोटी छोटी, कड़ी कंटिकाओं (spicules) के कारण इनका शरीर कड़ा होता है। इन्हीं से इनका पंजर बनता है, जैसा हम स्पंज में देखते हैं। इनकी कोशिकाएँ ऊतकों से बनी होती हैं।

सिलेंटरेटा (Coelenterata) संघ - इसके अंतर्गत प्रवाल (मूँगा), जेली फिश, आनमोनि (anemones) आदि सरल जंतु आते हैं। इनका शरीर सामान्य कोशिकाओं के सघन स्तरों के बने होते हैं जो एक दूसरे से भिन्न होते हैं। यही बनावट अन्य उच्चतर जंतुओं की बनावट का आधार है। आंतरिक भाग पाचक क्षेत्र है। सिलेंटरेटा में एक ही सूराख होता है, जो मुख और गुदा दोनों का कार्य करता है। इसके अतिरिक्त अन्य तीसरा स्तर नहीं होता, जैसा अधिक परिवर्धित जंतुओं में पाया जाता है। सिलेंटरेटा अक्रिय होते हैं और यद्यपि ये सक्रिय रूप से तैरते नहीं हैं, बहते रहते हैं। इनके विभिन्न अंग इनके मुख के चारों ओर वृत्ताकार व्यवस्थित रहते हैं। एक समय इसी के अंतर्गत टिनॉफोरा (Ctenophora) भी रखे जाते थे, पर अब अनेक प्राणिविदों ने इन्हें एक अलग संघ में रखा है।

प्लैटीहेल्मिंथीज़ संघ (Platyhelminthes) - इसके अंतर्गत चपटे कृमि (flat worms) सदृश अनेक कृमि आते हैं। इनके शरीर की बनावट अधिक विकसित पाई जाती है। ऐसे चपटे कृमि कुछ तो तालाबों और सरिताओं में स्वतंत्र रूप से रहते पाए जाते हैं और कुछ, जैसे पर्णाभ कृमि (flukes), रुधिर पर्णाभ कृमि तथा फीताकृमि (tapeworm) परजीवी होते हैं। इनके शरीर की बनावट सममित होती है, अर्थात्‌ एक आधा दूसरे आधे भाग का दर्पणबिंब होता है। इनके शरीर में बाह्य और अंतर त्वचाओं के बीच एक तीसरा स्तर मध्यजनस्तर (mesoderm) होता है।

नेमाटोडा (Nematoda) संघ - इस संघ में छोटे छोटे गोलकृमि (round worm) आते हैं। ये कई प्रकार के परजीवी होते हैं। इनके अंतर्गत अंकुश कृमि (hook worm) और ट्राइकिना (trichina) आते हैं जो मनुष्यों और अन्य उच्च जंतुओं की आँत में बहुधा पाए जाते हैं। इनके शरीर में कुछ ऐसे प्रगतिशील लक्षण पाए जाते हैं, जो चपटे कृमि में नहीं होते। इनकी आहारनली (gut) में मुख और गुदा अलग अलग होते हैं। इसी के अंतर्गत गोर्डियेसी (Gordiacea) आते हैं।

नेमरटिनिया (Nemertinea) संघ - इसके अंतर्गत सरल कृमि सदृश समुद्री जंतु आते हैं। ये अपनी लंबी सदृश शुंडिका (proboscis) फैलाकर अपना भोजन पकड़ते हैं।

नेमाटोमॉर्फा (Nematomorpha) संघ - इस संघ के प्राणी रोमकृमि हैं। ये पतले होते हैं और पानी में रहते हैं।

रोटिफरा (Rotifera) संघ - इस संघ के प्राणी सूक्ष्म जंतु हैं, जो स्थिर ताजे पानी में रहते हैं। इनके सिर पर निकला हुआ एक वृत्त होता है, जिससे य चक्रधारी कृमि भी कहे जाते हैं। इन्हीं वृत्तों के सहारे ये तैरते हैं और आहार को मुख में डाल लेते हैं। ये सूक्ष्म पदार्थों और सूक्ष्म जंतुओं का भक्षण करते हैं। नर से बच्चे उत्पन्न करने में सहायता मिलती है, पर नर की सहायता के बिना भी मादा बच्चे उत्पन्न कर सकती है। शुष्कावस्था में ये अनेक वर्षों तक जीवित रह सकते हैं। पवन तथा पक्षियों द्वारा दूर दूर तक जा सकते हैं। एक समय इन जंतुओं को ट्रॉकेलमेंथीज़ (Trochelmenthes) संघ के अंतर्गत रखा जाता था। अब इनका अपना अलग संघ है।

पॉलिज़ोआ (Polyzoa) संघ - इसके अंतर्गत हरितजंतु आते हैं। ये छोटे समुद्री जीव हैं, जो समुद्रतल पर पादप सदृश निवह बनाकर रहते हैं। इनकी कुछ जातियाँ ताजे पानी में भी पाई जाती हैं।

ब्रैकियोपोडा (Brachiopoda) संघ - इस संघ के प्राणी ताजे पानी में रहनेवाले जंतु हैं, पर समुद्रतल पर भी पाए जाते हैं। ये कवचों से आच्छादित होते हैं। इनके कवच मोलस्क के कवच सदृश होते हैं। इनके पाँच प्रमुख गण होते हैं और उनकी रचनाओं में पर्याप्त अंतर देखा जाता है।

फोरोनिडी संघ (Phoronidea) - इस संघ के प्राणी समुद्री जंतु हैं, जा बहुत नहीं पाए जाते। ये नलाकार होते हैं।

किटॉग्नाथा (Chaetognatha) या वाणकृमि संघ - इस संघ के प्राणी पतले, पारदर्शक तथा बण के आकार के समुद्री जीव हैं।

ऐनेलिडा (Annelida) - इसके प्राणी खंडयुक्त कृमि हैं। इनमें कशेरुक नहीं होता, अन्यथा ये बहुत अधिक परिवर्धित जंतु हैं। सामान्य केंचुआ इसी वर्ग का जंतु है। समुद्र में इससे बहुत अधिक परिवर्धित जंतु पाए जाते हैं। जोंक भी इसी संघ का सदस्य है। इनकी विशेषता यह है कि इनका शरीर कई खंडो में विभाजित होता है। प्रत्येक खंड पर वलयश्रेणियाँ होती हैं। प्रत्येक खंड में शरीर की रचना उपस्थित रहती है। इन जंतुओं में मध्यजनस्तर नहीं होता। इनके शरीर में एक कोटर विकसित होता है, जिसमें अनेक महत्व के अंग स्थित होते हैं। इनके तंत्रिका तंत्र और रुधिरवाहनी तंत्र सुपरिवर्धित होते हैं, जो कशेरुकी जीवों और मानव से बहुत भिन्न होते हैं।

आ्थ्रार्पेोडा (Arthropoda) संघ - इसके अंतर्गत संधि पादवाले जंतु आते हैं। ये ऐनेलिडा या इसी प्रकार के अन्य जंतुआं से विकसित होकर बने हैं। ये ऐनेलिडा या इसी प्रकार के अन्य जंतुओं से विकसित होकर बने हैं। ये ऐनेलिडा संघ के जंतुओं से बहुत कुछ समानता रखते हैं। कड़े कवच सदृश इनकी त्वचा के कारण इनका शरीर कड़ा होता है। शरीर में अनेक संधियों का होना, इनकी विशेषता है। इस संघ के क्रस्टेशिया (Crustacea) वर्ग के जंतु पानी में रहते हैं। इसके अंतर्गत झींगा मछली (lobtster), चिंगट मछली (crayfish), केकड़ा आदि आते हैं। इस संघ के अरैकनिडा (Arachnida) वर्ग के जंतु प्रधानतया स्थलीय हैं। मकड़ी, बिच्छू, अश्वनालाकार केकड़े आदि इसके अंतर्गत आते हैं। मिरिऐपोडा (Myriapoda) वर्ग के अंतर्गत अनेक पैरवाले जंतु, जैसे गोजर, शतपदी अदि आते हैं। इंसेक्टा (Insecta) वर्ग के अंतर्गत तीन जोड़ा पैरवाले और सामान्यत: पंख वाले जंतु आते हैं। इनकी लगभग 6,00,000 जातियाँ मालूम हैं। जंतुओं में ये सबसे अधिक विकसित जंतु हैं।

मोलस्का (Mollusca) संघ - इस संघ के अधिकांश जंतु विभिन्न रूपों के समुद्री प्राणी होते हैं, पर कुछ ताजे पानी और स्थल पर भी पाए जाते हैं। इनका शरीर कोमल और प्राय: आकारहीन होता है। ये प्रवर (mantle) में बंद रहते हैं। साधारणतया स्त्राव द्वारा कड़े कवच का निर्माण करते हैं। कवच कई प्रकार के होते हैं। कवच के तीन स्तर होते हैं। पतला बाह्यस्तर कैलसियम कार्बोनेट का बना होता है और मध्यस्तर तथा सबसे निचलास्तर मुक्ता सीप का बना होता है।

ये स्क्विड (squid) और ऑक्टोपोडा से मिलते जुलते हैं पर उनसे कई लक्षणों में भिन्न होते हैं। इनमें खंडीभवन (segmentation) नहीं होता।

एकाइनोडर्माटा (Echinodermata) संघ - इस संघ के अंतर्गत अरीय बहि:कंकाल वाले जंतु आते हैं। तारामीन (starfish), समुद्री अर्चिन (sea-urchin), सैंड डॉलर्स (sanddollars) इसी के अंतर्गत आते हैं। ये मंद चालवाले होते हैं और साधारणतया समूह में रहते हैं। इनके डिंभ द्विपार्श्व सममित होते हैं, पर वयस्क त्रिज्यात: सममित (radially symmetrical) होते हैं। इनकी विशेषता यह है कि इनके शरीर में जल से भरी हुई नलियों की श्रेणियाँ रहती हैं, जिनसे अनेक पैर निकले रहते हैं। इन्हीं से इनमें गमनशीलता आती है। इनके परिवर्धन से पता लगता है कि ये कॉर्डेटा से न्यूनाधिक संबंधित हैं।

कॉर्डेटा (Chordata) संघ - इस संघ के अंतर्गत रीढ़वाले जंतु आते हैं। आद्य किस्म के कुछ जंतु भी इसके अंतर्गत आते हैं। इन सबकी रचना तथा आकृति प्रगतिशील किस्म की होती है। इनका विकास ऐनेलिडा और आ्थ्रार्पेोडा से भिन्न प्रकार से हुआ है। ये द्विपार्श्व सममित (bilaterally symmetical) होते हैं और अंशत: खंडों में विभाजित होते हैं। इन सबमें गिलछिद्र (gill slits), या कोष्ठ (pouch) होते हैं, जो जलीय जंतुओं में साँस लेने का कार्य करते हैं। पृष्ठ भाग पर पृष्ठरज्जु विकसित होते हैं। ऐनेलिड और आ्थ्राार्पेोडा में पृष्ठरज्जु अंदर रहते हैं। इस संघ के जंतुओं में एक लंबी नम्य शलाका (rod) होती है, जिसे पृष्ठरज्जु (notochord) कहते हैं। इसी से इनका शरीर तना हुआ रहता है। इस संघ के निम्नलिखित चार उपसंघ अधिक महत्व के हैं :

1. हेमिकॉर्डा (Hemichorda) - इस उपसंघ के प्राणी समुद्री जंतु हैं। इनके दो वर्ग हैं। देखने में ये ऐनेलिड जैसे लगते हैं, पर इनकी रचना ऐनेलिड जैसे लगते हैं, पर इनकी रचना ऐनेलिड से भिन्न होती हैं। इनमें कॉर्डेटा के सब लक्षण होते हैं, पर ये बहुत विकसित नहीं हैं। इनके शरीर के अग्र भाग में शुंड रहता है। इनके शरीर के अग्र भाग में शुंड रहता है, जिसके आधार पर कॉलर (collar) होते हैं।

2. यूरोकॉर्डा (Urochorda) - इस उपसंघ में कंचुक (tunicates) और समुद्री स्क्वर्स्ट (squirts) आते हैं। इनमें अनेक गिलछिद्र, तंत्रिकारज्जु और पृष्ठरज्जु होते हैं।

3. सेफैलोकॉर्डा (Cephalochorda) - इस उपसंघ के प्राणी छोटे पारभासक समुद्री जंतु हैं। देखने में मछली जैसे लगते हैं, पर इनकी रचना अधिक आद्य होती है। इनमें गिलछिद्र, तंत्रिकारज्जु तथा पृष्ठरज्जु, सब होते हैं। इनके उदाहरण ऐंफिआक्सस (Amphioxus) हैं।

4. वर्टिब्रेटा (Vertebrata) - इस उपसंघ के अंतर्गत रीढ़वाले जंतु आते हैं। इनमें पृष्ठरज्जु के स्थान में रीढ़ होती है। इनका पंजर अधिक विकसित होते है और इनके लक्षण (feature) अधिक विकसित होते हैं। इस उपसंघ के प्राणियों को सात वर्गों में विभक्त किया गया है:

(1) ऐग्नाथा (Agnatha) - इस वर्ग के अंतर्गत बिना जबड़ेवाले कशेरुकी आते हैं। लैंप्री (lamprey), कुहाकिनी मीन (hogfish, cyclostoma) इस वर्ग के प्राणी हैं।

(2) कांड्रिक्थीईज़ (Chondrichthyes) - इस वर्ग में उपास्थियुक्त मीन, हांगुर (shark), तनुका (skate) आदि आते हैं। इनमें जबड़े होते हैं, पर पंजर में हड्डी नहीं होती।

(3) ऑस्टिइक्थीईज़ (Osteichthyes) - इस वर्ग में हड्डीवाले विकसित मीन आते हैं। सामान्य भोजय मछलियाँ इसी वर्ग की होती हैं।

(4) ऐंफिबिया (Amphibia) - इस वर्ग के अंतर्गत मेढ़क, भेक (toad), सैलामैंडर (salamander) आदि आते हैं, जो जल और स्थल दोनों पर समान रूप से रहते हैं। इन कशेरुकियों के पैर विकसित होते हैं, जिससे ये स्थल पर भी चल सकते हैं।

(5) रेप्टिलिया (Reptilia) या सरीसृप वर्ग - इस वर्ग के अंतर्गत कछुआ, छिपकली, साँप और मगर आते हैं, जो स्थल पर अंडे देते हैं। इनके अंडे कवचित होते हैं।

(6) ऐवीज़ (Aves) या पक्षिवर्ग - इस वर्ग के अंतर्गत पक्षी आते हैं। ये लोग उड़नेवाले सरीसृपों के वंशज हैं।

(7) मैमैलिया (Mammalia) या स्तनी वर्ग - इस वर्ग के अंतर्गत मानव और मानव से मिलते जुलते अन्य प्राणी आते हैं। ये उष्ण रुधिरवाले, बड़े मष्तिष्कवाले जंतु हैं, जिनका शरीर वालों या समूर (fur) से ढँका रहता है। ये बच्चे जनते हैं और उनका लालन पालन करते हैं। इसी वर्ग के अंतर्गत एक गण प्राइमेटीज़ (primates), अर्थात्‌ नर-बानर-गण, है, जिसमें नर, बंदर, कपि, लीमर आदि रखे गए हैं। मानव को एक अलग कुल होमिनिडी (Hominidae) में भी रखते हैं। (फूलदेव सहाय वर्मा.)

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विकिपीडिया से (Meaning from Wikipedia)




अन्य स्रोतों से




संदर्भ
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बाहरी कड़ियाँ
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Comments

Submitted by Shraddha (not verified) on Sun, 12/17/2017 - 22:26

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Phylum is the most important chapter

Submitted by mohmmad arshad (not verified) on Mon, 12/18/2017 - 07:10

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plzzz sir about of botany subject

Submitted by Balkrishna saini (not verified) on Fri, 07/06/2018 - 18:02

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