मछलियों का प्रणय संसार

Submitted by Hindi on Tue, 08/23/2011 - 14:22
Source
देशबंधु, 5 अगस्त 2011

विभिन्न प्रकार की मछलियों के परस्पर संभोग से पैदा होने वाली पीढ़ी को जो रूप-रंग प्राप्त होता है, उससे यह संभावना बढ़ जाती है कि चाहे पर्यावरण सम्बंधी कैसी भी अवस्था आ जाए, मछलियों की कुछ किस्में तो बच ही जाएंगी। सो यह निष्कर्ष निकला कि अनिश्चित और परिवर्तनशील भविष्य के लिए लैंगिक प्रजनन एक प्राकृतिक आवश्यकता है और इस आवश्यकता के लिए संसार के हम सभी प्राणी आभारी हैं।

हम अहंकारी मनुष्यों का यह सोचना स्वाभाविक है कि प्रेम, प्रणय निवेदन और संभोग मनुष्य जाति में ही सृजनात्मक रूप से चरमोत्कर्ष पर पहुंचते हैं लेकिन ऐसा नहीं है। संसार के सागरों, झीलों और नदियों की मछलियों और अन्य जलीय जीवों की जोड़ा बनाने की प्रक्रिया अधिक विविधतापूर्ण, विलक्षण और रंगीन होती है। उदाहरण के रूप में ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ की चमकदार रंग-बिरंगी 'क्लीनर रास' (लेब्रॉउइड्स डिमिडिएटस) मछलियों का जीवन लीजिए। क्लीनर रास जाति की नर मछली दस सेंटीमीटर लंबी और झगड़ालू होती है। यह अपने इलाके की रक्षा बड़ी बहादुरी के साथ करती है। इस नर मछली का अपना 7-9 मादा मछलियों का हरम होता है। दूसरी नर मछलियों से वह उसकी पूरी रक्षा करती है। लेकिन उसका यह तरीका आसान नहीं होता क्योंकि अपने इलाके की पहरेदारी करने के अलावा उसे अपने हरम की मादा मछलियों पर भी नियंत्रण रखना पड़ता है। आमतौर पर मादा मछलियों में एक मछली रोबीली किस्म की होती है। उसका यह प्रयत्न रहता है कि हरम की दूसरी मादा मछलियाँ उसका प्रभुत्व स्वीकार करें इस मछली के प्रति नर मछली का व्यवहार विशेष रूप से आक्रामक रहता है क्योंकि उसे बराबर यह डर बना रहता है कि वह कहीं उसकी साम्राज्य को हड़प न ले और उस पर भी रोब न जमाने लगे।

नर मछली की मृत्यु के कुछ ही घंटों बाद रोबीली मादा मछली नर मछली की भूमिका अपनाना आरंभ कर देती है। वह हरम की स्वामिनी बन जाती है और नर मछली की रह व्यवहार करने लगती है। एक माह के भीतर ही उसका लिंग बदल जाता है और वह पूर्णत: नर बन जाती है। इस नर मछली की मृत्यु के बाद दूसरी रोबीली मादा मछली नर की भूमिका ग्रहण करती है और इस तरह यह सिलसिला जारी रहता है। लेब्रॉइड्स किस्म की मछलियों की प्रजनन प्रक्रिया विलक्षण-सी है, लेकिन अनगिनत पीढ़ियों से अपनी वंश परंपरा को चलाने में यह प्रक्रिया सफल रही है। अन्य सभी जीवों की तरह क्लीनर रास जाति की मछलियों की इस प्रजनन प्रक्रिया का विकास भी अनेक पर्यावरणीय प्रभावों और परिस्थितियों के अनुसार हुआ है। संभोग के लिए साथी की तलाश, बच्चों के लिए आहार जुटाने तथा परभक्षियों से अपनी रक्षा के प्रयास आदि की तकलीफें सभी जीवों की प्रजनन क्रिया को आकार-प्रकार प्रदान करती हैं। जलीय पर्यावरण की विशाल विविधता से ही मछलियों की प्रजनन प्रक्रिया के आकर्षक रूप विकसित हुए हैं।

सेरेनिडे मछलियां 2.75 मीटर तक लंबी और 300 किलो तक वजनी होती हैं। उनका लिंग आयु और आकार के अनुसार निर्धारित होता है। छोटी और अपेक्षाकृत कोमल किस्म की मछलियां मादा होती हैं, लेकिन 5-10 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वे नर बन जाती हैं। इस तरह इस समूह की मछलियों में आयु और आकार में सबसे बड़ी सभी मछलियां नर होती हैं। सभी मादाओं को नर अवस्था प्राप्त नहीं होती और इसलिए उन्हें बुढ़ापे की भी चिंता नहीं रहती। जिन मछलियों में नर और मादा दोनों प्रकार के लिंग होते है, उनमें सेरेनस सब्लीगेरियस सबसे अधिक तेजी से लिंग परिवर्तन करती है। यह मछली मेक्सिको की खाड़ी में पाई जाती है। कत्थई रंग की यह धारीदार मछली पड़ोसी को देखकर अपने आपको अंग्रेजी के ‘एस’ के आकार में मोड़ लेती है और फिर धीरे-धीरे अपने पंख फैलाती है। यह मछली नर होती है और जिसे देखकर यह शरीर को मोड़ती है, वह मादा होती है और उसी समय नर मछली शुक्राणु तथा मादा अंडे छोड़ती है। इस तरह उनका संभोग हो जाता है, लेकिन यह केवल प्रजनन प्रक्रिया की शुरूआत है। बाद में नर मछली शर्मीली माता की भूमिका अदा करती है और मादा मछली अपने को ‘एस’ की शक्ल में मोड़ लेती है। अब नर मछली अंडे देती है और मादा उन्हें प्रजननशील बनाती है।

इन छोटे जीवों की प्रजनन प्रक्रिया इसी तरह बराबर चलती रहती है। जब दो नर मछलियां मिलती हैं तो उनमें से एक मादा की भूमिका ग्रहण कर लेती है और एक बार संभोग करने के बाद वे भूमिका बदलकर फिर संभोग कर लेती हैं। दो मादा मछलियों के मिलने पर भी यह प्रक्रिया संपन्न होती है। इन जलचरों का जीवन काफी जटिल-सा लगता है। हालांकि नर अपने आक्रामक व्यवहार के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन कुछ जातियों में उसका जीवन रक्षात्मक होता है। अमेजन मौली (पोयसीलिया फारमोसा) मछलीघरों की छोटी मछली गप्पी से मिलती-जुलती किस्म की मछली होती है। वह नर मछली की मदद से होती है। वह नर मछली की मदद से बिना ही अपनी वंश परंपरा का निर्वाह कर लेती है। इस जाति की मछलियाँ केवल मादा होती हैं। लेकिन वे नर मछली के बिना बच्चे पैदा नहीं कर सकतीं। जोड़ा बनाने के दिनों के दौरान एक ही लिंग वाली ये मछलियां अपनी निकटतम जाति की अपेक्षाकृत अनुभवहीन और कम आक्रामक द्विलिंगी नर मछलियों को संभोग के लिए इस्तेमाल करती हैं (क्योंकि अधिक अनुभवी और आक्रामक नर मछलियां अपनी ही जाति की मादाओं के साथ संभोग करती हैं) लेकिन ये नर मछलियां केवल मादा मछलियों के अंडों के विकास में मदद करती हैं।

परिणामस्वरूप इनसे पैदा होने वाले बच्चों में नर मछलियों का रूप-रंग नहीं आता। आधे मन से किए गए संभोग के कारण पैदा होने वाले ये सभी बच्चे मादा होते हैं और एक जैसे होते हैं। कुछ ऐसी भी नर मछलियां हैं जो सभी प्रकार की मादाओं के साथ संभोग को तत्पर रहती हैं जो उनको अपने वश में रखे। गहरे और ठंडे सागरों की दुनिया में लोफियस अमेरिकेनसजाति की जवान नर मछलियां अपने गुजर-बसर के लिए मादाओं की तलाश में रहती हैं। अगर नर मछली अपने प्रयत्न में असफल रहती है तो मर जाती है। जब उसे मादा मछली मिल जाती है तो उसकी यह बराबर कोशिश रहती है कि जल की भूलभुलैया में वह उसके साथ से निकल न जाए। वह मादा के सिर, पेट और गिलछद को काट लेती है और इस तरह अपना जीवन आराम से काटने के लिए मादा को फंसाए रहती है। धीरे-धीरे यह नर मछली पूरी तरह जोंक बन जाती है। नर मछली मादा की रक्त प्रवाह प्रणाली से रक्त ग्रहण करती है और उसी से अपना पालन-पोषण करती है। नर मछली के अंडकोश बढ़ते रहते हैं और इसी के साथ उसकी कामुकता और उत्पादकता बढ़ती रहती है। एक स्थिति आती है जब उसका शरीर मात्र प्रजनन यंत्र बनकर रह जाता है।

उत्तरी अटलांटिक सागर में सवा मीटर लंबी मादा मछलियों को मात्र नौ सेंटीमीटर लंबे छोटे और दब्बू पतियों के साथ विचरण करते देखा गया है। लेकिन जलीय जीवों के सभी प्रेमियों की ऐसी दयनीय दशा नहीं होती। ऑक्टोपस को लीजिए। नर ऑक्टोपस अपनी प्रेमिका को अपनी बाजुओं से सहलाकर प्रणय निवेदन की पहल करता है। मादा कुंवारी कन्या की तरह शरमाती है और उस पर लाली-सी छा जाती है। मादा की ये प्रतिक्रियाएं संभोग के लिए उसकी तत्परता की द्योतक होती हैं। जब मादा नर को ग्रहण करने की स्थिति में आती है तो मादा के शरीर में अपने शुक्राणु छोड़ने के लिए नर ऑक्टोपस अपनी विशेष बांहों का उपयोग करता है। अपनी बांहों से वह मादा के शरीर को बांध लेता है और इस स्थिति में यह युगल पूरे एक दिन तक बना रहता है। हैडक जाति की मछलियों के प्रेमालाप में भी एक खास तरह का जोश पाया जाता है। प्रजनन के मौसम में नर मछलियां मादा मछलियों को आकर्षित करती हैं। एयर ब्लेडर की आवाज युद्ध के ढोल बजने की सी होती है। अगरमादा को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कई नर मछलियों में होड़ होती है तो सबसे अधिक देर तक और जोर से आवाज करने वाली नर मछली मादा का दिल जीत लेती है।

नर मछली पर मोहित होकर जब मादा उसके पास पहुंचती है तो नर अपनी आवाज को और तेज कर देती है और वह यह आवाज उस समय तक निकालती रहती है जब तक मारे थकान के उसकी आवाज गुनगुनाहट में नहीं बदल जाती। केवल हैडक मछलियां ही अपनी प्रेमिकाओं को प्रेम गीत गाकर नहीं लुभाती, ओपसेनस, गोबिडे, ब्लेनीडे, साइईनिडे, हिप्पोकेंपस और ट्रिकायसिस विटेटस मछलियां भी अपनी मादाओं को आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रकार की आवाजें निकालती हैं। जैसे चहचहाना, सीटी बजाना या ऊंचा शोर करना। एक साथ कई-कई युगलों द्वारा संभोग किए जाने के लिए वैज्ञानिक शब्द है सामूहिक संभोग। कैलिफोर्निया के समुद्री तटों पर पाई जाने वाली चांदी जैसी चमकदार लुरेसफस टेन्यूविस मछलियां का सामूहिक समागम देखने लायक होता है। मार्च से लेकर अगस्त के महीने तक हर पूर्णिमा और अमावस्या के दिन हजारों की संख्या में ये मछलियां समुद्र की लहरों पर सवार होकर किनारे पर आ जाती हैं और मिलकर संभोग करती हैं। मादा मछलियां अपनी पीठ को कमान की तरह मोड़कर तब तक गीली रेत में धंसती जाती हैं जब तक कि केवल उनका मुंह बाहर नहीं रह जाता। इसके बाद वे एक हजार से लेकर तीन हजार तक अंडे देती हैं।

नर मछलियां मस्त होकर मादाओं के चारों ओर चक्कर लगाकर नाचती हैं और अंडों का निषेचन करती हैं। इस प्रक्रिया को तीस सेकंड में संपन्न कर वे सभी दूसरी लहर पर सवार होकर समुद्र में वापस चली जाती हैं। जल जीवों के बीच संभोग के कारण कई समस्याएं सामने आती हैं। द्विलिंगी जीवों की मौजूदगी से स्वभावत: एक अजीब-सी स्थिति पैदा होती है। जब सिद्धांतत: नर मछली की सहायता के बिना प्रजनन संभव है तो नर मछलियों का विकास क्यों हुआ? इसका उत्तर है लैंगिंक प्रजनन से हासिल होने वाली विविधता। जिन जीवों का प्रजनन नर की सहायता के बिना हो जाता है, उनके बच्चे बिल्कुल अपनी मां पर जाते हैं और जहां नर और मादा के संभोग से बच्चे होते हैं, उन्हें मां और मां पर बाप दोनों के रूप-रंग, गुण प्राप्त होते हैं। विभिन्न प्रकार की मछलियों के परस्पर संभोग से पैदा होने वाली पीढ़ी को जो रूप-रंग प्राप्त होता है, उससे यह संभावना बढ़ जाती है कि चाहे पर्यावरण सम्बंधी कैसी भी अवस्था आ जाए, मछलियों की कुछ किस्में तो बच ही जाएंगी। सो यह निष्कर्ष निकला कि अनिश्चित और परिवर्तनशील भविष्य के लिए लैंगिक प्रजनन एक प्राकृतिक आवश्यकता है और इस आवश्यकता के लिए संसार के हम सभी प्राणी आभारी हैं।
 

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