पिघल रहे हैं हिमालय के ग्लेशियर

Submitted by Hindi on Mon, 08/29/2011 - 12:04
Source
पर्यावरण डाइजेस्ट, 26 जुलाई 2011

ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सियाचिन दुनिया का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। यह हिमालय और कारकोरम क्षेत्र (भारत-पाक सीमा) पर मौजूद है। इस ग्लेशियर की लंबाई 70 किलोमीटर है। यह 18,875 फीट (5,735 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है, जो इसी ग्लेशियर से गंगोत्री से गंगा और यमुनोत्री से यमुना का उद्गम होता है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान (इसरो) की रिपोर्ट 2011 में खुलासा हुआ है कि हिमालय के 75 फीसदी ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिघल रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1989 से 2004 के दौरान हिमालय के ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल 3.75 फीसदी तक घटा है। ग्लेशियर शब्द लैंटिन से उत्पन्न हुआ है। हिन्दी में इसका अर्थ हिमनद होता है। ग्लेशियरों का निर्माण सैकड़ों सालों तक बर्फ से जमने से होता है। ये अपने ही वजन से आगे बढ़ते है। इनके पिघलने से नदियां बनती हैं। दुनिया के 99 फीसदी ग्लेशियर ध्रुवीय क्षेत्र में पाए जाते हैं। ये ऊंचे पहाड़ों पर भी बर्फ जमा होने के कारण बन जाते हैं। ग्लेशियर की बर्फ दुनिया में सबसे बड़ा स्रोत है। इसरो ने 2011 में हिमालय के ग्लेशियरों का दूसरी बार अध्ययन किया है। इससे पहले इसरो ने 2010 में 1317 ग्लेशियरों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला था कि 1962 से 2010 तक हिमालय के 16 फीसदी ग्लेशियर पिघल चुके हैं। हालांकि संस्थान की रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी स्थिति खतरनाक स्तर पर नहीं पहुंची है।

इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून के विशेषज्ञों के अनुसार ग्लेशियर सिस्टम के प्रभावित होने की भविष्यवाणी करने से पहले काफी जटिल गणनाएं करनी होती हैं। बढ़ता हुआ वैश्विक तापमान ही ग्लेशियरों के पिघलने का एकमात्र कारण नहीं है। ग्लेशियरों के पिघलने के पीछे हिमपात, ग्लेशियर की स्थिति आदि भी ऐसे कारक है जो उनकी स्थिति का कारण बताते हैं। इंटरगवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेंट चेंज (आईपीसीसी) ने 2007 में जारी अपनी चौथी रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि यदि वैश्विक तापमान बढ़ने की आज की दर बनी रही तो 2035 तक हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे। पैनल को अपने शोध के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार भी मिला था। ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सियाचिन दुनिया का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। यह हिमालय और कारकोरम क्षेत्र (भारत-पाक सीमा) पर मौजूद है। इस ग्लेशियर की लंबाई 70 किलोमीटर है। यह 18,875 फीट (5,735 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है, जो इसी ग्लेशियर से गंगोत्री से गंगा और यमुनोत्री से यमुना का उद्गम होता है।

सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदान दुनिया के सबसे उपजाऊ क्षेत्र हैं। इन्हीं क्षेत्रों से भारत और पाकिस्तान ही नहीं विश्व के काफी बड़े हिस्से को खाद्यान्न मिलता है। जाहिर है पानी की कमी से बड़ा खाघान्न संकट खड़ा हो सकता है। हिमालय की नदियों पर बने पावर प्रोजेक्ट संकट में पड़ जाएंगे। गंगा और उसकी नदियों के आसपास भारत में करीब 40 करोड़ लोग रहते हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों से होकर ब्रह्मपुत्र गुजरती है। यहां आबादी का बड़ा हिस्सा ब्रह्मपुत्र के आसपास रहता है। बांग्लादेश की आबादी करीब 17 करोड़ है। गंगा और ब्रह्मपुत्र (दोनों नदियां बांग्लादेश में जाकर मिल जाती है और इनका नाम यहां पद्मा हो जाता है) यह बांगलादेश की प्रमुख नदी है। पाकिस्तान (आबादी करीब 17 करोड़) की पूरी अर्थव्यवस्था और जनजीवन सिंधु और उसकी सहायक नदियों झेलम, चिनाब, रावी, व्यास पर टिका हुआ है। पाकिस्तान के सबसे उपजाऊ क्षेत्र पंजाब और सिंध प्रांत इन्हीं हिमालय से निकलने वाले नदियों से पोषित होते हैं।
 

रोबट करेंगे चीन के जंगलो की रक्षा


चीन में जंगलों की देखरेख का कामकाज अब रोबोटों की एक फौज को सौंपने की तैयारी चल रही है। कैटरपिलर (इल्ली) के आकार के इन रोबोटों का ट्रीबोट नाम दिया गया है। यही ट्रीबोट पेड़ों पर चढ़कर ऊंचाई से जंगलों की निगरानी करेंगे। प्रो. सूयांगशेंग ने बताया कि इसे बनाने की प्रेरणा उन्हें प्रकृति से मिली। उन्होंने कहा मैं कैटरपिलर को हमेशा पेड़ों पर चढ़ते देखता था और इससे मुझे प्रेरणा मिली।
 

इस खबर के स्रोत का लिंक:
Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा