जामड़ : हर बंदू को सहेजने का प्रयास

Submitted by Hindi on Mon, 08/29/2011 - 12:44
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पर्यावरण डाइजेस्ट, 26 जुलाई 2011

सन् 1952 में स्वीकृत प्रथम पंचवर्षीय योजना की रणनीति में यह बात मुख्य रूप से थी कि टिकाऊ एवं स्थाई लाभ तभी सुनिश्चित किये जा सकते हैं जब समुदाय की भरपूर भागीदारी हो। पानी की समस्या समाज के हर वर्ग को प्रभावित करती है। इस तथ्य के प्रकाश में समाज के सभी वर्गों का अपेक्षित सहयोग इस अभियान में लेना होगा।

मध्यप्रदेश में जल संरक्षण और संवर्धन कार्यक्रम जन आंदोलन बने इस विचार को केन्द्र में रखकर पिछले वर्ष 10 अप्रैल 2010 को प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रतलाम जिले में जामड़ नदी के पुनरूत्थान के कार्य से प्रादेशिक जलाभिषेक अभियान की शुरुआत की थी। रतलाम जिले के आदिवासी अंचल में बहने वाली यह प्रमुख नदी है जो अंचल के ग्रामीणजनों एवं पशुओं को पानी देने के साथ ही सिंचाई में भी सहायक होती है। इसी नदी का पानी धोलावड़ जलाशय में पहुंचता है जहां से रतलाम शहर को वर्ष भर पेयजल उपलब्ध होता है। जामड़ नदी का पुनरुत्थान कार्य प्रारंभ किया गया है जिससे नदी में अधिक से अधिक समय तक पानी उपलब्ध रहे और जन, जंगल तथा कृषि को वर्ष भर जल मिलता रहे। इस योजना में प्रथम वर्ष 2010-11 में कुल 307 कार्यों पर शासकीय योजना से 112.40 लाख रुपए एवं जनसहयोग से 157.35 लाख रुपए कुल 269.75 लाख रुपए व्यय किये गए। योजना के द्वितीय वर्ष 2011-12 में 585 कार्यों पर 521.50 लाख रुपए खर्च किये जायेगें।

जामड़ नदी माही की सहायक नदी है। इसका उद्गम रतलाम के निकटवर्ती नेपाल ग्राम की पहाड़ियों से हुआ है। नदी के उद्गम स्थल के निकट ही स्थित ग्राम ईशरथुनी में नदी का प्रवाह एक सुन्दर झरने का निर्माण करता है। इस झरने के कारण ही इसे जामड़ नाम दिया गया है। भू-आकृतिक दृष्टि से देखे तो नदी का प्रवाह मूलत: बेसाल्ट आच्छादित चट्टानों के क्षेत्र से होता है जो जगह-जगह अपरदित एवं दरारयुक्त है। इन चट्टानों की पागम्यता अल्प से मध्यम श्रेणी की है। इन दिनों जामड़ में बरसात के बाद अक्टूबर तक ही पानी उपलब्ध रहता है। सर्दियों में ही पानी का प्रवाह सुख जाने का कारण नदी में अंत: सतह स्राव (सब सरफेस फ्लो) का समाप्त हो जाना है जो पहले नदी में उसके आसपास के क्षेत्रों से भू-जल रिसाव के रूप में वर्ष भर उपलब्ध होता था। नदी के जलग्रहण क्षेत्र में भू-जल स्तर में 1 से 3 मीटर की गिरावट दर्ज की गई है। जामड़ के सुखने से तटीय ग्रामों में विभिन्न प्रयोजन के लिए पानी की आपूर्ति की समस्या होने लगती है। जामड़ के पुनजीर्वित होने पर होने वाले लाभों में मुख्यत: भू-जल में 2-3 मीटर की वृद्धि, लगभग 1800 हेक्टेयर अतिरिक्त फसल क्षेत्र में वृद्धि, ग्रामीण पलायन में 20-30 प्रतिशत की कमी, नदी के तटीय क्षेत्र के 19 गाँवों के 4603 परिवार तथा उनके 22000 पशुओं को पीने का पानी तथा निस्तार की सुविधा में बढ़ोत्तरी के साथ ही कुल कृषि उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी।

जामड़ 27 किलोमीटर बहने वाली नदी है जो 9 ग्राम पंचायतों के 19 ग्राम से होकर गुजरती है। नदी के जलग्रहण क्षेत्रों में आने वाले ग्रामों की पानी की कुल आवश्यकता 3651.54 हेक्टेयर मीटर है। यहां वर्षा से उपलब्ध होने वाला पानी 8026 हेक्टेयर मीटर है। इस प्रकार 4374 हेक्टेयर मीटर सरप्लस वर्षा जल है जिसे रोका जा सकता है, इसी को ध्यान में रखकर योजना बनाई है। प्रदेश में अनेक शताब्दियों से बहती आई नदियों का पिछले कुछ दशकों में जमकर दोहन किया गया जिसके फलस्वरूप कई नदियों की जीवन धारा ही समाप्त हो गई। अब उन्हें फिर से सदानीरा बनाने के प्रयास चल रहे हैं। अगले तीन साल में प्रदेश की 55 नदियों को सदानीरा बनाया जाएगा। प्रदेश सरकार ने प्रदेश के सभी 50 जिलों की 55 नदियों के पुनर्जीवन की योजना बनाई है। इनमें धार जिले में 03, दतिया, जबलपुर व भोपाल जिले में 2-2 नदियों तथा बाकी सब जिलों में एक-एक नदी का चयन किया गया है। देश को आजादी मिलने के समय मध्यप्रदेश में जमीन के अंदर भूजल 15 फीट की गहराई पर मिल जाता था। जनसंख्या बढ़ने तथा खेती और उद्योगों के विस्तार के कारण जमीन के पानी का अत्यधिक दोहन प्रारंभ हुआ। इससे तेजी से हालात बिगड़े और कई नदियों का अस्तित्व संकट में आ गया। प्रदेश सरकार ने चयनित नदियों के 15-20 किलोमीटर के क्षेत्र में नदी उपचार कार्य करने का तय किया है। इनमें नदियों के जलागम क्षेत्र में कन्ट्ररट्रेंच, परकोलेशन टैंक, तालाब, मेढ़बंधान, मृदा बांध, स्टापडेम, पहाड़ पठार पर गली प्लग जैसी संरचना बनाई रही है, इसके अलावा पौधारोपण भी किया जा रहा है।

मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है। प्रदेश की लगभग 70 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित है। ऐसी स्थिति में असमय सूखा और मानसून की अनियमितता से न केवल फसल उत्पादन प्रभावित होती है, अपितु प्रदेश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। इन दिनों बढ़ते हुए जैविक दबाव के कारण अन्य प्रयोजनों हेतु भी संग्रहित किये गये सतही जल और भूजल आधारित उपयोग वाले क्षेत्रों में भी मानसून की अनियमितता का परिणाम दिखने लगा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रदेश में जल संरक्षण व संवर्धन और प्रबंधन का काम प्राथमिकता से हो। जल संरक्षण और प्रबंधन का दायित्व सरकार का तो है ही परन्तु समाज भी इस दायित्व का निर्वाह कर रहा है। प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए संवहनीय कृषि उत्पादन तथा अन्य प्रयोजनों हेतु पानी की समुचित उपलब्धता अति आवश्यक है। इस हेतु वर्ष 2006 से राज्य सरकार ने जल अभिषेक अभियान प्रारंभ किया था, जिसकी अवधारणा सरकार और समाज की साझेदारी पर आधारित है। जल अभिषेक अभियान के अन्तर्गत विगत् 4 वर्षों (वर्ष 2006-07 से वर्ष 2009-10 तक) में रुपए 5200 करोड़ की लागत से 10 लाख से अधिक जल सरंक्षण व संग्रहण संरचनाओं का निर्माण हुआ है। प्रदेश में जल अभिषेक अभियान के सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं।

विगत् वर्ष 2010-11 से जल अभिषेक अभियान के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए इसकी कार्यनीति में समाज के और अधिक जुड़ाव तथा स्थानीय भौगोलिक विशिष्टताओं के अनुरूप उपयुक्त जल संरक्षण कार्यों का चयन व सघन कार्यान्वयन को प्राथमिकता दी गई है। इस हेतु जरूरी कदम उठाये गये हैं। जल अभिषेक अभियान से समाज से और अधिक जुड़ाव के लिए ग्राम स्तर पर बुजुर्गों और युवाओं की पीढ़ी बीच पीढ़ी जल संवाद जैसी खुली चर्चाएं आयोजित की गई। इन चर्चाओं में बुजुर्गों ने आज की पीढ़ी को कम होती पानी की उपलब्धता से अवगत कराकर जल संरक्षण की आवश्यकता के प्रति चेताया। जल संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर नेतृत्व विकसित करने की कोशिशें भी सरकार कर रही है। ग्रामों में पंचायतों ने जल संरक्षण कार्यों को प्राथमिकता दी है। ऐसे सरपंच जिन्होंने जल अभिषेक अभियान हेतु उल्लेखनीय जल संरक्षण एवं भूजल संवर्धन कार्य करवाकर खेती, पेयजल एवं अन्य प्रयोजनों के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की उनको भागीरथ जल नायक कहा गया। नदियां भारतीय समाज की आस्था के केन्द्र के साथ-साथ स्थानीय समाज की आजीविका की पोषक भी रही हैं। नदियों के जलागम क्षेत्र में जल संरक्षण के कार्यों के निष्पादन से पानी के प्रवाह को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

इस अवधारणा पर जल अभिषेक अभियान के अन्तर्गत प्रत्येक जिले में सूखी नदियों को पुनर्जीवित करने का कार्य हाथ में लिया गया है जिससे न केवल क्षेत्र की जैव विविधता संरक्षित होगी, अपितु इन नदियों पर आधारित आजीविका को सुकून भरा जीवन जीने का सबंल भी मिलेगा। जल अभिषेक अभियान के अन्तर्गत पूर्व से मौजूद जल संरक्षण संरचनाओं के सुधार और प्रबंधन में स्थानीय समुदाय की सहभागिता बढ़ाने के भी प्रयास किये जा रहे है ताकि पानी की इस परम्परागत धरोहर का सतत उपयोग किया जा सके। जल संरक्षण के कार्यों में स्थानीय स्तर पर स्वामित्व बोध जागृत करने के लिए निजी खेतों पर जल संरक्षण कार्यों के कार्यान्वयन के लिए सामर्थ्यवान कृषकों को प्रोत्साहित भी किया जा रहा है। ऐसे कृषक जिन्होंने स्वयं के संसाधनों से निजी खेतों पर जल संरक्षण का कार्य किया, वे भागीरथ कृषक कहे गये। इस अभियान को जन आंदोलन बनाने की दिशा में कुछ जरूरी बातों पर विचार करना होगा। जलाभिषेक के मैदानी कार्यों में कई विभागों का सहयोग लिया जा रहा है जिसमें बेहतर समन्वय वाले जिलों में इसके परिणाम बेहतर आ रहे हैं। जल संरचनाओं का ज्यादातार कार्य मनरेगा के अन्तर्गत हो रहा है। मनरेगा की अपनी मर्यादा है इसलिए इन मर्यादाओं का पालन करते हुए काम करने की अपनी व्यवहारिक कठिनाईयां हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीणों के पास अपने अनुभव और विरासत में मिला ज्ञान है उसका इस कार्यक्रम में उपयोग होना चाहिए। इस महत्वाकांक्षी अभियान में युवा शक्ति का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। प्रदेश में राष्ट्रीय सेवा योजना, एन.सी.सी., भारत स्काउट गाईड और नेहरू युवा केन्द्र जैसे संगठन हैं जिनके पास बड़ी संख्या में संस्कारित युवा है इस युवा शक्ति का पूरा उपयोग इस अभियान में करना होगा। सन् 1952 में स्वीकृत प्रथम पंचवर्षीय योजना की रणनीति में यह बात मुख्य रूप से थी कि टिकाऊ एवं स्थाई लाभ तभी सुनिश्चित किये जा सकते हैं जब समुदाय की भरपूर भागीदारी हो। पानी की समस्या समाज के हर वर्ग को प्रभावित करती है। इस तथ्य के प्रकाश में समाज के सभी वर्गों का अपेक्षित सहयोग इस अभियान में लेना होगा।
 

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