सुगंध

Submitted by Hindi on Mon, 08/29/2011 - 12:50
सुगंध का ज्ञान मानव को बहुत प्राचीन काल से है। संसार के सभी प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। उस समय इसका घनिष्ठ संबंध अंगरागों से था जैसा आज भी है। धार्मिक कृत्यों में किसी-न-किसी रूप में इसका व्यवहार बहुत प्राचीन काल से होता आ रहा है। मिस्रवासी सुगंध का उपयोग तीन उद्देश्यों से करते थे, एक देवताओं पर चढ़ाने के लिए, दूसरे व्यक्तिगत व्यवहार के लिए और तीसरे शवों को सुरक्षित रखने के लिए। अनेक पादपों के पुष्पों, पत्तों, छालों, काष्ठों, जड़ों, कंदों, फलों, बीजों, गोंदों तथा रेजिनों में सुगंध होती है। सुगंध या तो गंध तेल के रूप में या अनेक ग्लाइकोसाइडों के रूप में होती रहती है। वैज्ञानिकों ने इनका विस्तृत अध्ययन किया है, उनकी प्रकृति का ठीक-ठीक पता लगाया है और प्रयोगशाला में उन्हें प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया है। प्राय: सभी प्राकृतिक सुगंधों की नकलें कर ली गई हैं और कुछ ऐसी भी सुगंधें तैयार हुई हैं। जो प्रकृति में नहीं पाई जातीं। अनुसंधान से पता लगा है कि ये सुगंध अम्ल, ऐल्कोहल, ऐस्टर, ऐल्डीहाइड, कीटोन, ईथर टरपीन और नाइट्रो आदि वर्ग के विशिष्ट कार्बनिक यौगिक होते हैं। आजकल जो सुगंधें बाजारों में प्राप्त होती हैं वे तीन प्रकार की होती हैं। एक प्राकृतिक, दूसरी अर्धप्राकृतिक या अर्धसंश्लिष्ट और तीसरी संश्लिष्ट। प्राकृतिक सुगंधों में वनस्पतियों से प्राप्त गंध तेलों के अतिरिक्त कुछ, जैसे ऐंबरग्रीस (ह्वेल मछली से), कस्तूरी (कस्तूरी मृग के कूपों से), मर्जारी कस्तूरी (मार्जार से) आदि जंतुओं से भी प्राप्त होती हैं।

पादपों से सुगंध प्राप्त करने की साधारणतया चार रीतियाँ काम में आती हैं: 1वाष्प द्वारा आसवन से, 2विलायकों द्वारा निष्कर्षण से, 3निचोड़ और 4एक विशिष्ट विधि से जिसे आनफ्लराज (Enflurage)कहते हैं। अंतिम विधि से ही भारत में नाना प्रकार के अतर तैयार होते हैं। गुलाब, बेला, जूही, चमेली, नारंगी, लवेंडर, कंदिल और बायोलेट आदि फूलों से, नारंगी और नींबू के छिलकों, सौंफ, धनियाँ, जीरा, मँगरैल, आजवाइन के बीजों से, खस और औरिस (orris)की जड़ों से, चंदन के काठ से, दालचीनी एवं तेजपात वृक्ष के छालों से, सिटोनेला, पामरोजा, जिरेनियल आदि घासों से (इन्हीं विधियों से) गंध तेल प्राप्त होते हैं। विलायक के रूप में पेट्रोलियम, ईथर, एल्कोहल, बेंजीन का साधारणतया व्यवहार होता है। अर्धसंश्लिष्ट सुगंधों में वैनिलिन, अल्फा-बीटा तथा मेथिल आयोनोन हैं। संश्लिष्ट सुगंधों में बेंजोइक एवं फैनिलऐसीटिक सदृश अम्ल, लिनेलूल टरमिनियोल सदृश ऐल्डीहाइड, ऐमिल सैलिसीलेट, बैंजील ऐसीटेड सदृश ऐस्टर, डाइफेनिल आक्साइड सदृश ईथर, आयोनोन कपूर सदृश कीटोन और 2: 4: 6: डाइनाइट्री टर्शीयरी ब्युटिल टोल्विन तथा नाइट्रोबैंजीन सदृश नाइट्रों यौगिक हैं।

व्यवहार में आने वाले सुगंध के तीन अंग होते हैं, एक गंध तेल, दूसरे स्थिरीकारक और तीसरे तनुकारक। गंध तेल तीव्र गंध वाले और कीमती होते हैं। ये जल्द उड़ भी जाते हैं। इनको जल्द उड़ने से बचाने के लिए स्थिरीकारकों का व्यवहार होता है। तनुकारकों से गंध की तीव्रता कम होकर अधिक आकर्षक भी हो जाती है और इसकी कीमत में बहुत कमी हो जाती है। स्थिरीकारकों का उद्देश्य की गंध को उड़ने से बचाने के अतिरिक्त कीमत का कम करना भी होता है। कुछ स्थिरीकारक गंधवाले भी होते हैं। सुगंध में साधारणतया गंध तेल और स्थिरीकारक 10 प्रतिशत और शेष 90 प्रतिशत तनुकारक रहते हैं।

स्थिरीकारकों के रूप में अनेक पदार्थों का व्यवहार होता है। इनमें कस्तूरी, कृत्रिम कस्तूरी, मस्क अब्रेट, गस्क कीटोन, मस्क टोल्विन, मस्का जाइलीन, ऐबरग्रीस, ओलियोरेजिन, रेजिन तेल, चंदन तेल, गोंद के आसुत उत्पाद, द्रव ऐंबरा लैबडेनम तेल, पिपरानल, कुमेरिन, बेंजाइल सिनमेंट, मेथाइल सिनिमेट, बेंजाइल आइसोयूजेनोल, बेंजोफीनोन, वैनिलिन, एथिलसिनेमेट, हाइड्राक्सी सिट्रोनेलोल, बैंजील सैलिसिलेट इत्यादि हैं। तनुकारकों में ऐथिल ऐल्कोहल, बेंजाइल ऐल्कोहल, एमिल बेंजोएट, बेंजाइल बेंजोएट, डाइएथिल थैलेट, डाइमेथाइल थैलेट और कुछ ग्लाइकोल रहते हैं।

कुछ सुगंध जल के रूप में भी व्यापक रूप से व्यवहृत होते हैं। ऐसे जलों में गुलाब के जल, केबड़े के जल, यू.डी. कोलन, और लवेंडर जल इत्यादि हैं।श् इनमें कुछ तो, जैसे गुलाबजल, सीधे फूलों से प्राप्तश् होते हैं और कुछ संश्लिष्ट सुगंधों से प्राप्त किए जाते हैं।

कुछ सुगंध केवल गंध के लिए इस्तेमाल होते हैं। कुछ साबुन, केश तेल, अंगराग सदृश पदार्थों को सुगंधित बनाने में प्रचुरता से प्रयुक्त होते हैं। कुछ सुगंध जैसे नींबू के और नारंगी के छिलके के तेल, स्वाद के लिए, कुछ सुगंध जैसे वैनिलिन, ऐजेलिका तेल तथा धनियाँ तेल गंध और स्वाद दोनों के लिए प्रयुक्त होते हैं। मलाई के बर्फ बनाने में वैनिलिन का विशेष स्थान है। पिपरमेंट का तेल स्वाद के साथ-साथ औषधियों में भी प्रयुक्त होता है, अनेक गंध तेल आज औषधियों के काम में आते हैं, पहले यहाँ उनके निष्कर्ष का ही व्यवहार होता है। कुछ सुगंध जीवाणु नाशक और कीट निष्कासक भी होते हैं तथा वे मच्छर, दंश और मक्खी सदृश कीटों को भगाने में सहायक सिद्ध हुए हैं। धूप, गुग्गुल, कपूर और लोबान सदृश सुगंधों का धर्मकृत्यों में विशेष स्थान हैं। (देखें, तेल वाष्पशील)। (लक्ष्मीशंकर शुक्ल)

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