सूक्ष्मदर्शिकी (Microscopy)

Submitted by Hindi on Mon, 08/29/2011 - 13:20
सूक्ष्मदर्शिकी (Microscopy) सूक्ष्मदर्शिकी भौतिकी का एक अभिन्न अंग है। आज सूक्ष्मदर्शी का उपयोग कायचिकित्सा (Medicine), जीवविज्ञान (Biology), शैलविज्ञान (Perology), मापविज्ञान (Metrology), क्रिस्टलविज्ञान (Crystallography) एवं धातुओं और प्लास्टिक की तलाकृति के अध्ययन में व्यापक रूप से ही हो रहा है। आज सूक्ष्मदर्शी का उपयोग वस्तुओं को देखने के लिए ही नहीं होता वरन्‌ द्रव्यों के कणों के मापने, गणना करने और तौलने के लिए भी इसका उपयोग हो रहा है।

मनुष्य की प्रवृत्ति सदा ही अधिक से अधिक जानने और देखने की रही है, इसी से वह प्रकृति के रहस्यों को अधिक से अधिक सुलझाना चाहता है। हमारी इंद्रियों की कार्य करने की क्षमता सीमित है और सही यही हाल हमारी आँख का भी है। इसकी भी अपना एक सीमा है। बहुत दूर की जो वस्तु खाली आँख से दिखाई नहीं पड़ती वह दूरदर्शी से देखा जा सकती है या बहुत निकट की वस्तु का विस्तृत विवरण सूक्ष्मदर्शी से अधिक स्पष्ट देखा जा सकता है। यहाँ सूक्ष्मदर्शी के क्षेत्र में 1865 ई. से अब तक जो प्रगति हुई है उसी का उल्लेख किया जा रहा है:

एकल उत्तल लेंस, जिसे साधारणत: आवर्धन लेंस कहते हैं, सरलतम सूक्ष्मदर्शी कहा जा सकता है। इसे जेबी सूक्ष्मदर्शी भी कहते हैं। सरल सूक्ष्मदर्शी एक निश्चित दूरी पर स्थित दो उत्तल लेंस के संयोजन से बना होता है। पदार्ध की तरफ लगे लेंस को अभिदृश्यक (Objective) लेंस, और आँख के पास लगे लेंस को अभिनेत्र लेंस (eye-lens) कहते हैं। ऐसे सूक्ष्मदर्शी का दृष्टिक्षेत्र (field of view) सीमित होता है। इसमें सुधार की आवश्यकता है। अभिनेत्र लेंस में एक लेंस जोड़ने से क्षेत्र बढ़ जाता है और गोलीय एवं वर्णीय वर्णविपथन (Chromatic aberration) से उत्पन्न दोष कम हो जाते हैं। ऐसे सूक्ष्मदर्शी को संयुक्त सूक्ष्मदर्शी या प्रकाश सूक्ष्मदर्शी या परंपरागत प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी कहते हैं।

यद्यपि प्रकाश के परावर्तन, अपवर्तन और रेखीय संचरण के नियम ग्रीक दार्शनिकों को ईसा से कुछ शताब्दियों पूर्व से ही ज्ञात थे पर आपतन (incidence) कोण और अपवर्तन कोण के ज्या के नियम का आविष्कार सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक नहीं हुआ था। हालैंड के स्नेल और फ्रांस के देकार्त (Descartes, 1551-1650 ई.) ने अलग-अलग इसका आविष्कार किया। 1000 ई. के लगभग अरब ज्योतिषविंद अल्हैजैन ने परावर्तन और अपवर्तन के नियमों को सूत्रबद्ध किया पर ये ज्या में नहीं थे, वरन्‌ लंब दूरी में थे। ऐसा कहा जाता है कि उसके पाकस एक बड़ा लेंस था। सूक्ष्मदर्शी का सूत्रपात यहीं से होता है। सूक्ष्मदर्शी निर्माण का श्रेय एक वनस्पतिज्ञ जेकारियोस जोनमिड्स (1600) को है। हाइगेंज (Higens) के अनुसार आविष्कार का श्रेय कॉर्नीलियस ड्रेबल (1608 ई.) को है।

ऐबे (Abbe) के समय तक सूक्ष्मदर्शी की परिस्थिति ऐसी ही रही। 1870 ई. में ऐबे ने सूक्ष्मदर्शी की सदृढ़ नींव डाली। उन्होंने सुप्रसिद्ध तैलनिमज्जन तकनीकी निकाली। इससे सर्वोत्कृष्ट वैषम्य (Contrast) और आवर्धन प्राप्त हुआ। पर जहाँ तक परासूक्ष्मकणों (ultramicroscopic particles) के अध्ययन का संबंध था, वैज्ञानिक अभी भी अपने को असहाय अनुभव कर रहे थे। 1873 ई. में ऐबे ने अनुभव किया कि सूक्ष्मदर्शी को चाहे कितनी ही पूर्णता प्रदान करने का प्रयत्न किया जाए किसी पदार्थ में उसके कणों की सूक्ष्मता को एक सीमा तक ही देखा जा सकता है। केवल आँखों से परमाणु या अणु को देखना असंभव है क्योंकि हमारे नेत्रों द्वारा सूक्ष्म वस्तुओं को देखने की एक सीमा है। यह सीमा उपकरण की अपूर्णता के कारण ही नहीं परंतु प्रकाश तरंगों (रंग) की प्रकृति के कारण भी है जिनके प्रति हमारी आँख संवेदनशील है। यदि हमें धातुओं को देखना है तो हमारे जैविकीविदों को एक ऐसे नए किस्म के नेत्रों का विकास करना होगा जो उन तरंगों को ग्रहण करें जो हमारे वर्तमान साधारण नेत्रों, या दृष्टितंत्रिका को सुग्राह्य होने वाली तरंगों की अपेक्षा हजारों गुना छोटी हैं।

वास्तव में किसी वस्तु में स्थित दो निकटवर्ती बिंदुओं को कभी भी अलग पहचाना नहीं जा सकता है यदि उस प्रकाश का तरंग दैर्ध्य जिसमें उन बिंदुओं का अवलोकन किया जाता है उन बिंदुओं के बीच की दूरी के दुगने से अधिक न हो। इस प्रकार से यह उनके बिलगाव को सीमित कर देता है। इसे विभेदन (resolution) की सीमा कहते हैं। गणित में इसे निम्नलिखित संबंध द्वारा व्यक्त किया जाता है।

जहाँ N.A. संख्यात्मक द्वारक है और N.A. = sin । यहाँ u वस्तु दूरी (Object space) का अपवर्तनांक है।  वह कोण है जो रिम किरण (rim-ray)प्रकाशिक अक्ष के साथ बनाती है। इस प्रकार दृष्टि विकिरण का विचार करने से अल्पतम विभेदन दूरी 3000 A(3.10-5 सेंमी) के लगभग होती है। सबसे छोटी पराबैगनी और अवरक्त किरणों के लिए यह सीमा क्रमश: 1500 Aऔर 3850 Aके लगभग होगी जहाँ 1 Aसेमी.।

गत चालीस वर्षों में सूक्ष्मदर्शिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। आइए हम अपने को 40 वर्ष पूर्व के सूक्ष्मदर्शिकीविद् के रूप में सोचें और उन सुधारों पर विचार करें जो हम उस समय करना चाहते थे। साधारणत: हम अपनी आशाओं को चार बातों पर केंद्रित करते हैं:

(1) उच्चतर आवर्धन प्राप्त करना,
(2) अधिकतम विभेदन क्षमता प्राप्त करना,
(3) अधिक क्रियात्मक दूरी प्राप्त करना तथा
(4) उत्तम वैषम्य या पर्याप्त दृश्यता प्राप्त करना।

अब हम विचार करेंगे कि गत चालीस वर्षों के विकास से इन महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की कितनी पूर्ति हुई। उपर्युक्त सुधार या कठिनाइयों का वस्तु की प्रकृति (अपारदर्शी या पारदर्शी), प्रदीप्ति के प्रकार (विकिरण) और फोटोग्राफी तकनीकी (फिल्म या प्लेट और प्रस्फुक के प्रकार के संदर्भ में विचार करना उचित होगा। उपर्युक्त आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मदर्शी अभिकल्पित किए गए जिनमें छोटे से छोटे तरंगदैर्ध्य के विकिरण का प्रयोग किया गया। हम देख चुके हैं कि लघुतम तरंगदैर्ध्य विकिरण का अर्थ है उच्चतर विभेदन क्षमता।

रंटजेन (Roentgen) ने सन्‌ 1895 में एक्स किरण का आविष्कार किया। परंतु सन्‌ 1912 तक एक्स किरण (X-ray) की तरंग प्रकृति का कोई पता नहीं था जब तक वान लाउए (Von Laue) ने उसे सिद्ध नहीं किया। अब यह आशा हुई कि एक्स-रे सूक्ष्मदर्शी बनाया जा सकता है। अत: उस समय यह विचार त्याग दिया गया।

कुछ वर्षों बाद 1923 ई. में द ब्रॉग्ली (De Broglie) ने इलेक्ट्रॉन की तरंग प्रकृति को निश्चित किया और न्यूयार्क में 1927 ई. में डेविसन (Davission) और जर्मर (Germer) ने तथा ऐबर्डीन में जी.पी. टामसन (G.P. Thomson) ने 1928 ई. में उसकी पुष्टि की। इलेक्ट्रॉन के किरण पुँज भी उपयुक्त विद्युत या चुंबकीय क्षेत्र द्वारा मोड़े जा सकते हैं। ऐसे सूक्ष्मदर्शी जिन्हें सफलतापूर्वक उपयोग में लाया जा सकता था 1947 ई. में नोल (Knovl), रस्क (Rusk) और ब्रुख (जर्मनी) ने प्रस्तुत किए। इस विकिरण का तरंगदैर्ध्य निम्नलिखित संबंध द्वारा व्यक्त किया जाता है।

यहाँ h प्लैंक का नियतांक है, m इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान और  वेग हैं। वेग वोल्टता का फलन है, जो इलेक्ट्रॉन किरणपुणज की त्वरित करने के लिए प्रयुक्त होता है। इस सूक्ष्मदर्शी से 10 Aतक विभेदन संभव था और इसकी आवर्धन क्षमता बहुत अधिक थी। इसके द्वारा 1.6.10-8 मिमी विस्तार की वस्तुएँ देखी जा सकती हैं। निस्संदेह यह बड़ी ठोस प्रगति है और इसके साथ-साथ अनेक नए आविष्कार जुड़े हुए हैं। आज इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शिकी की अपनी अनेक तकनीकियाँ हैं।

उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉन की भाँति लघुतरंगदैर्ध्य के साथ-साथ एक्स किरणों में वेधनक्षमता बहुत अधिक होती है और वे कम शीघ्रता से अवशोषित भी होती हैं। अत: छोटी अपारदर्शी वस्तुओं की आंतरिक संरचना ज्ञात करने में एक्स किरणें प्रयुक्त की जा सकती हैं। एरैनवेर्ख (Ehrenberg) ने 1947 ई. में पहला एक्स किरण या छाया सूक्ष्मदर्शी निकाला और 1948 ई. में किंक पैट्रिक (Kink Patrick) और बेजय (Baez) ने उसका सुधार किया। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की तरह यहाँ निर्वात की आवश्यकता नहीं होती। अच्छे प्रतिबिंब के लिए केवल सूक्ष्म छिद्र (Pin hole)की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ है कि इससे कम विकिरण प्रवेश करता है और इसीलिए उद्भासन बहुत बड़ा होता है। पीछे चित्र का बड़ा विस्तार करना पड़ता है जिसके लिए बहुत सूक्ष्म कणों का पायस आवश्यक होता है।

परावर्ती सूक्ष्मदर्शी- अब हम सामान्य दृश्य प्रकाश सूक्ष्मदर्शिकी की ओर देखें। इसके पूर्व कि हम उस दिशा में हुआ प्रगति पर विचार-विमर्श करे, हमें उन आकांक्षाओं पर ध्यान रखना होगा जो 40 वर्ष पूर्व सूक्ष्मदर्शिकीविदों की थी। एकमात्र उपकरण से सब आवश्यकताओं की साथ ही पूर्ति संभव न थी। विभेदन क्षमता में वृद्धि संख्यात्मक द्वारक (N.A.) के मान से सीमित हो जाती है जिसका मान 1.5 से अधिक नहीं हो सकता। प्रणाली की आवर्धन क्षमता की वृद्धि की भी एक सीमा होती है। यह प्रयुक्त लेसों की फोकस दूरियों का फलन (Function) है। आवर्धन फोकस दूरी का प्रतिलोम फलन है, अत: फोकस दूरी की कमी से आवर्धन बढ़ जाता है। पर साथ ही क्रियात्मक दूरी नष्ट हो जाती है।

ऐसे ही विचारों के कारण लेंस के स्थान में दर्पणों के उपयोग से परावर्ती सूक्ष्मदर्शी का निर्माण बर्च ने ब्रिस्टल में 1947 ई. में किया। सिद्धांतत: पराबैंगनी किरण तक विकिरण का उपयोग यहाँ संभव हो सका। इसका सांख्यिक द्वारक (N.A.) कम होता है पर अवर्णता (achromatism) और अधिक क्रियात्मक दूरी का इसमें लाभ होता है।

चूँकि क्वार्ट्ज़ 2000 Aतक विकिरण का अवशोषण नहीं करता इसलिए उस सूक्ष्मदर्शी से जिसमें क्वाटर्ज लेंसों का उपयोग होता है, कम से कम विभेदन दूरी 1,000 A(10-5m) प्राप्त होगी अत: इस प्रकार के विन्यास के साथ पराबैंगनी विकिरण के उपयोग से 'पराबैंगनी सूक्ष्मदर्शी' का निर्माण होता है।

यदि सामान्य प्रकाश सूक्ष्मदर्शी का उपयोग छोटी वस्तुओं द्वारा बिखरे विकिरण को एकत्र करने के लिए होता है तो इस प्रकार की व्यवस्था को परासूक्ष्मदर्शी (ultramicroscope) कहते हैं।

(1) आपतित प्रकाश को वस्तु तक सीधे पहुँचने से रोक दिया जाता है। यह बिखरित या विवर्तित (Scattered diffracted) प्रकाश द्वारा निर्मित प्रतिबिंब निमज्जित नहीं करता। इसे धुँधला पृष्ठाधार प्रदीप्ति कहते हैं।

(2) इस सूक्ष्मदर्शी से परासूक्ष्मदर्शी कणों के व्यास को आसानी से नापा जा सकता है।

(3) वस्तु के स्थान का अनुमान बिखरित विकिरण (किरणपुँज) की चमक पर निर्भर करता है।

(4) यदि प्रकाश स्रोत की चमक वैसी ही हो जैसी सूर्य के तल पर होती है तो साधारण अणु भी देखे जाते सकते हैं।

कला वैषम्य सूक्ष्मदर्शी में प्रकाशव्यवस्था प्रो. जेर्निक (1942 ई., जर्मनी) ने सूक्ष्मदर्शी में कला वैषम्य प्रदीप्ति का उपयोग किया। इस तकनीकी की कला वैषम्य सूक्ष्मदर्शिकी (Phase Contrast Microscopy) कहते थे। यह रंगहीन विशेषत: पारदर्शक पदार्थों की संरचना दिखाने की विधि है। विभिन्न संरचनाओं के कारण उनमें क्रमभंग देखा जाता है, जैसे मेढक के यकृत में। वैषम्य को सुधारने के लिए जैविकीविद रंजकों की सहायता लेते हैं। प्राय: वैषम्य वर्ण फिल्टर से ऐसा किया जाता है। ध्रुवित प्रकाश से कुछ ही किस्म के क्रिस्टलों का विश्लेषण किया जा सकता है पर कलावैषम्य से सब प्कार के क्रिस्टलों का अध्ययन किया जा सकता है। इस तकनीकी में अभिरंजन के रूप में कृत्रिम वर्णों का उपयोग नहीं होता। अभिरंजन में दोष यह बताया जाता है कि यद्यपि अभिरंजन जीवों का कोशिकाओं को नष्ट नहीं करता है, तथापि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह जीवों या कोशिकाओं को बिल्कुल प्रभावित नहीं करता। कला-वैषम्य-विधि का लाभ यह है कि प्रदीप्ति जो प्रत्येक सूक्ष्मदर्शी में आवश्यक है, जीव को देखने के लिए और कुछ करना नहीं पड़ता।

कला वैषम्य सूक्ष्मदर्शी में सूक्ष्मदर्शी सामान्य किस्म का ही रहता है। इसमें केवल यह नवीनता रहती है कि एक नवीन प्रकाशमय युक्ति जोड़ दी जाती है। प (P) एक काँच का प्लेट है जिसमें एक वलयाकार खाँचा (groove) है। प्लेट पर कैल्सियम फ्लुओराइड का पारदर्शक लेप चढ़ा रहता है। लेप की मोटाई एक सी रहती है। निर्वात में वाष्पन द्वारा लेप चढ़ाया जाता है। लेप की मोटाई ठीक इतनी रहती है कि खाँचा और प्लेट के अन्य भाग द्वारा पारित प्रकाश के बीच के समय का अंतर कंपन का चतुर्थांश (कला के 90परिवर्तन) रहे। द (D) पर्दा है जिसमें एक वलयाकार काट (Cut) होती है जिससे अभिदृश्यक में उतना प्रकाश पारित होता है जितना कलापट्ट के खाँचे में भरेगा। वस्तु द्वारा बिखरित और विवर्तित प्रकाश खाँचे द्वारा पारित नहीं होता और यह प्रकाश जब प्रतिबिंब पर पहुँचता है, तब वह स्रोत से सीधे पहुँचे प्रकाश से मिला हुआ नहीं होता है और व्यतिकरण चित्र (Interference Pattern) बनता है। अभिनेत्रक में यही प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है। वस्तु के विभिन्न अंग अपवर्तनांक के अनुसार प्रकाश में विभिन्न कलांतर प्रदर्शित करते हैं अत: अभिनेत्र में दिखाई पड़ने वाला प्रतिबिंब वस्तु का अपवर्तनांक चित्र होता है।

चित्र प्रकाश और इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की तुलनायह सूक्ष्मदर्शी 1952 ई. तक प्रयोग के लिए उपलब्ध हो गया। 1952 ई. में इस उपलब्धि के लिए प्रो. जेर्निक (Zerniack) को नोबेल पुरस्कार मिला। डाइसनश् (Dyson) ने 1951 ई. में इस समस्या को भिन्न रूप से सुलझाया जिसके फलस्वरूप उन्होंने व्यतिकरण सूक्ष्मदर्शी का निर्माण किया जिसमें परंपरागत कलावैषम्य सूक्ष्मदर्शी से कुछ श्रेष्ठता थी। इसमें वस्तु की काँच के दो अर्धरजतित पट्टों के मध्य में दबा दिया जाता है और उसे एक विशेष दर्पण प्रणाली से इस प्रकार देखा जाता है कि कुछ प्रकाश अभिनेत्रक में बिना वस्तु से पारित हुए सीधा चला जाए और शेष प्रकाश वस्तु से होकर जाए। इस प्रकार उत्पन्न व्यक्तिकरण फिंज वस्तु की अपवर्तनांक संरचना को व्यक्त कर देता है।

वस्तुत: दो प्रकार की यह प्रदीप्ति धुँधली पृष्ठभूमि और कलावैषम्य मानव के लिए एक बड़ा महत्व का साधन है। धुँधली पृष्ठभूमि प्रदीप्ति अत्यंत सूक्ष्म कणों को देखने में उपयोगी सिद्ध हुई है और कला वैषम्य प्रदीप्ति से प्रकाशीय घनत्व में न्यूनतम परिवर्तन जानने की तकनीकी की संभावना बढ़ गई है जिससे प्रतिबिंब की व्याख्या बड़ी आसानी से की जा सकती है।

हम देखते हैं कि चालीस वर्ष पूर्व के सूक्ष्मदर्शीविदों की अनेक आकांक्षाएँ पूरी हो गई हैं। इसका यहीं अंत नहीं है क्योंकि किसी शोध का अंत नहीं होता और यही बात सूक्ष्मदर्शिकी के लिए भी है और आवर्धन क्षमता के विभेदन क्षमता की ऊपर दी गई सीमा की वृद्धि के प्रयास अब भी हो रहे हैं। नए किस्म के काँच और प्लास्टिक के उपयोग से सूक्ष्मदर्शिकी की तकनीकी में और भी प्रगति होना अनिवार्य है।

इन सब सूक्ष्मदर्शियों से, जिनका वर्णन किया गया है, केवल विस्तार में ही विभेदन प्राप्त किया जा सकता है। सूक्ष्मदर्शिकी की और शाखा है जो बड़ी शानदार और रोचक है। यह प्रकाश विभेदन सूक्ष्मदर्शिकी है (टोलोनस्की, 1948)। इसके द्वारा गहराई में भी विभेदन मालूम किया जा सकता है। यह गहराई में विभेदन करने में उत्कृष्ट सिद्ध हुआ है। यह प्रकाशकीय और व्यक्तिकरणमापीय तकनीकी है जिसे प्रकाश कट (Light cut), प्रकाश प्रोफाइल (Light profile), बहुलित किरण पुँज (Multiple Beam)फिज़ो (Fizeau) फ्रंज (Fringes) और समान वर्णिक कोटि के फ्रंज के नाम से जाना जाता है। इन पृष्ठीय छानबीन की सुग्राह्य विधियों में आण्विक परिमाण तक सफलतापूर्वक विभेदन किया जा सकता है।

इन सूक्ष्मदर्शिकियों की कार्यकुशलता कभी भी संभव न होती यदि पृष्ठ पर धात्विक फिल्म को जमा कर अधिक परावर्तित बनाने की युक्ति न विकसित की गई होती।

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