स्कॉटलैंड

Submitted by Hindi on Mon, 08/29/2011 - 15:46
स्कॉटलैंड ग्रेट ब्रिटेन का उत्तरी भाग है। यह पहाड़ी देश है जिसका क्षेत्रफल 78,850 वर्ग किमी है। 80 प्रतिशत मनुष्य इस देश के नगरों में तथा शेष 20 प्रतिशत लोग गावों में निवास करते हैं।

भौगोलिक दृष्टि से स्कॉटलैंड को तीन प्राकृतिक भागों में विभाजित कर सकते हैं  1. उत्तरी पहाड़ी भाग, 2. दक्षिणी पठारी भाग तथा 3. मध्य की घाटी।

1. उत्तरी पहाड़ी भाग- क्रिस्टली चट्टानों से निर्मित यह पहाड़ी भाग दो बड़े निचले भागों द्वारा, ग्लीनमोर तथा मिंच की घाटियों द्वारा तीन भागों में विभाजित हो जाता है। ग्लीनमोर का पतला निचला भाग प्राचीन चट्टानी भागों के विभंजन (Fracture) से निर्मित हुआ है, इसमें अब भी भूचाल आते हैं। यह उत्तरी पश्चिमी पहाड़ी भाग को मध्य के पहाड़ी भागों से अलग करता है। मिंच धसान घाटी है जो 24 किमी की लंबाई तथा 48 किमी की चौड़ाई में, पतले चैनेल' के रूप में, स्कॉटलैंड के स्थलखंड को ह्व्रेाइड द्वीपसमूह से अलग करती है। पहाड़ी भाग की औसत ऊँचाई करीब 915 मी है यद्यपि कुछ चोटियाँ 1220 मी से ऊपर उठती हैं।

पहाड़ी भाग के पश्चिमी किनारे पर द्वीपों तथा प्रायद्वीपों की एक पतली कतार मिलती है। दक्षिण की ओर बूटे, अरान, मुल ऑव केटियर, जुरा और इसले; फिर द्वीपों की एक पंक्ति, स्लीट, इग, कोल, टिरि और स्केरी वोर राक, मिलती है। समुद्रतट के निकट इनर ह्व्रेााइड्स तथा मिंच के उस पार आउटर ह्व्रेााइड्स के द्वीप मिलते हैं। अंत में पेंटलैंड की खाड़ी के उस पार आर्केनी तथा शेटलैंड के द्वीप मिलते हैं। उत्तरी ह्व्रेाइड द्वीपसमूह आपस में इतने अधिक संबद्ध हैं कि उसे 'लाग आइलैंड' की संज्ञा दी जाती है।

इस क्षेत्र में स्थल तथा समुद्र एक दूसरे से इतने संलग्न तथा मिश्रित दीख पड़ते हैं कि 'ग्रीकी' के शब्दों में इस स्थल पर चट्टान, पानी तथा 'पीट' ही देखने को मिलते हैं। आर्केनी द्वीपसमूह में 28 बसे हुए तथा 29 'बेचिरागी' द्वीप सम्मिलित हैं।

परंतु पूर्वी भाग में न तो इतनी झीलें मिलती हैं और न ऐसी चट्टानी भूमि, बल्कि समुद्रतट पर कुछ चौड़े मैदान भी मिलते हैं। द्वीप भी नहीं मिलते। नदियाँ ज्वारमुहानें बनाती हैं।

आर्थिक रूपरेखा- इस पर्वतीय भाग में, ऊबड़ खाबड़ धरातल, मिट्टी के छिछले जमाव तथा समुद्र के धरातल से अधिक ऊँचाई के कारण खेती की सुविधा नहीं है। कृषि योग्य भूमि केवल नदियों की घाटी तथा समुद्रतट तक ही सीमित है। 275 मी की ऊँचाई कृषिक्षेत्रों की ऊपरी सीमा निर्धारित करती है। अधिकतर भाग की भूमि बेकार है। मिट्टी अधिकतर रेतीली, कंकरीली, पथरीली तथा छिद्रयुक्त होने के कारण कम उपजाऊ होती है। परंतु पूर्वी भाग में गर्मी की ऋतु में ताप पश्चिम की अपेक्षा अधिक होता है और उत्तर में रास तथा पश्चिम में क्लाइड की खाड़ी तक गेहूँ की खेती होती है। अवरडीनशिर में 488 मी की ऊँचाई तक जई की खेती होती है।

जई स्कॉटलैंड का मुख्य खाद्यान्न है। कृषिक्षेत्र के 20 प्रतिशत भाग में जई, 4-5 प्रतिशत भाग में आलू की तथा 4 प्रतिशत में जौ की खेती होती है।

यहाँ का मुख्य व्यवसाय पशुपालन है। पहाड़ी भाग में भेड़ पालने का व्यवसाय बहुत पुराना है। कुछ भागों में अधिक भेड़ें पाली जाती हैं और कुछ भाग में अधिक गाएँ पाली जाती हैं कुछ वर्ष पूर्व से पहाड़ी नदियों से विद्युत्‌ शक्ति पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। घासवाले क्षेत्रों में शिकार करने की भी प्रथा प्रचलित है। यहाँ का क्षेत्रफल स्कॉटलैंड के क्षेत्रफल का वाँ भाग है, पर जनसंख्या है। क्षेत्र का सबसे बड़ा नगर अवरडीन है।

स्कॉटलैंड का यह भाग सदैव अन्य भागों से पृथक्‌ रहा है। 18वीं शताब्दी तक 'हाईलैंडर' लोगों ने अपनी पोशाक, रीति रिवाज और लड़ाई झगड़े की प्रवृत्ति कायम रखी थी। वे लोग गैलिक भाषा बोलते थे। भेड़ पालने के तौर तरीकों में पीछे सुधार हुआ और रेलों तथा सड़कों के बनने से उनमें नया जीवन आया।

पूर्वी समुद्रतटीय मैदान में, जो मोरे की खाड़ी के निकट पड़ते हैं, और ही दृश्य देखने को मिलता है। कृषि तथा मछली पकड़ना यहाँ का मुख्य उद्यम है। इस उपजाऊ भाग में इस विभाग के लोग निवास करते हैं। वलाटर, गैनटाउन, डारनोच और इवरनेस मुख्य व्यापारी नगर हैं। मत्स्य व्यवसाय के कारण समुद्रतट पर छोटे छोटे मत्स्यनगर (fishing towns) बस गए हैं।

2. मध्य की घाटी- उत्तर के प्राचीन पहाड़ी भाग तथा दक्षिण के पठारी भाग के बीच दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की दिशा में फैला हुआ एक ऊँचा नीचा मैदान है। बीच बीच में नदियों के बड़े बड़े ज्वारमुहानों के घुस जाने के फलस्वरूप मैदान सँकरा हो गया है और उसका क्षेत्रफल पूरे स्कॉटलैंड के क्षेत्रफल का केवल एक चौथाई है। यह भूमिखंड, जो मध्य की घाटी के नाम से प्रसिद्ध है, यहाँ की अधिक उपजाऊ भूमि समुद्र से संबद्ध होने, आवागमन के साधनों की सुगमता तथा खनिज पदार्थों की उपलब्धि के कारण शताब्दियों से स्कॉटलैंड के आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन का मुख्य केंद्र रहा है। यहाँ पर स्कॉटलैंड के दो तिहाई लोग निवास करते हैं। ग्रेट ब्रिटेन का दूसरा बड़ा नगर ग्लासगो, इसी भाग में स्थिर है।

मध्य की घाटी धँसान की घाटी है जिसके उत्तर तथा दक्षिण की ओर भ्रंश (jault) की पक्तियाँ मिलती हैं। निचले भाग में डिवोनी तथा कार्बोनीफेरस युग की चट्टानें लाल लाल पत्थर, शेल, कोयला, मृत्तिका, और चूनापत्थर आदि मिलते हैं। घाटी का पूर्वी भाग अपनी उपजाऊ भूमि के लिए प्रसिद्ध है, यहाँ गेहूँ, जई, जौ, आल, क्लवर, लूसर्न, और सलगम की अच्छी उपज होती है। भेड़ तथा गोपालन आर्थिक दृष्टि से अच्छा उद्यम माना जाता है। बगीचों में फल उगाए जाते हैं।

कुछ नगर उपजाऊ मैदान में स्थित हैं और वहाँ कृषि मंडियाँ (Agricultural towns) हैं। कुछ नगर, जैसे स्टिरलिंग और पर्थ, अपनी भौगोलिक स्थितियों के कारण बड़े नगर हो गए हैं। फोर्थ नदी के ज्वारमुहाने पर खदानें मिलती हैं। इसके दक्षिणी तट पर लोथियन की कोयले की खदानें विस्तृत हैं जिसकी 46 तहों की कुल मोटाई 40 मी है। फिफीशिर तथा क्लाकयन कोयले की अन्य खदानें हैं। इसके फलस्वरूप यहाँ लोहे के कई कारखानें हैं। यहाँ लिनलिथगो तथा मिडलोथियन में खनिज तेल की प्रमुख खानें हैं।

टे के ज्वार मुहाने पर जूट, मोटे कपड़े तथा लिनेन (Linen) तैयार करने के उद्योग बहुत पहले से केंद्रित हैं। इन उद्योगों से संबंधित नगर समुद्रतट पर डंडी से फोर्थ तक बिखरे हुए हैं। कपड़े की सफाई तथा रंगाई पर्थ में होेती है परंतु जूट तथा लिनेन का मुख्य केंद्र डंडी है। प्रारंभ में यह मत्स्यकेंद्र था जहाँ ह्वेल पकड़ने का विशेष कार्य होता था। जहाजनिर्माण का भी कार्य यहाँ होता था, परंतु अब यह मुख्यतया लिनेन, सन (हेंप) तथा जूट का ही काम करता है। यहाँ के कारखाने बोरे, टाट तथा जूट के कपड़े तथा चद्दरें (sheets) तैयार करते हैं। सन्‌ 1880 तक डंडी के मुकाबिले में जूट के कारखाने स्थापित हो जाने से इसका एकाधिकार समाप्त हो गया। आसपास में फल उत्पन्न होने के कारण यहाँ जैम उद्योग स्थापित हो गया है। अत: बाहर से आयात होनेवाली वस्तुओं में चीनी की मात्रा अधिक रहती है। उद्योग धंधों के विकास के साथ जनसंख्या का विकास भी हुआ है।

स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबर्ग फोर्थ की खाड़ी पर उस ऐतिहासिक मार्ग पर स्थित है जो फर्थ, इस्टलिंग, डनफर्मलिन को संबद्ध करता है। नगर ज्वालामुखी पहाड़ियों पर स्थित है। प्रारंभ में नगर कैसिल राक तथा काल्टन हिल पर बसा था, धीरे धीरे पूर्व में आर्थर्स सीट, पश्चिम में कास्टरफिन हिल और दक्षिण में ब्लैकफोर्ड हिल तक नगर का विकास हो गया। 'राक' के पश्चिमी मार्ग में प्राचीन दुर्ग तथा पूर्वी भाग में होली रुड अबे तथा राजमहल स्थित हैं। अबे तथा दुर्ग को हाईस्ट्रीट तथा कैनन गेट मार्गों द्वारा संबद्ध किया गया है। नगर के इस भाग में मकान बहुत करीब करीब हैं तथा इमारतें कई तल्ले ऊँची उठती हैं। 18वीं शताब्दी में ग्रेट ब्रिटेन की आर्थिक उन्नति के साथ नगर के उत्तर की ओर एक नए नगर की स्थापना हुई जो प्राचीन भाग से एक लंबे खंड द्वारा अलग होता है। इस नए नगर में सड़कें चौड़ी, सीधी तथा इमारतें खुली हुई हैं। प्रिंसेज स्ट्रीट यहाँ का मुख्य जनपथ है जो खड्ड के समांतर जाती है। खड्ड में उसकी तलहटी तक सुंदर फूलों के बाग लगे हुए हैं। लीथ इस नगर का मुख्य बंदरगाह है।

मध्य की घाटी में पश्चिमी तट पर संसार का एक प्रसिद्ध औद्योगिक केंद्र ग्लास्गो स्थित है। यह अपेक्षाकृत नवविकसित नगर है (देखें गलास्गो)।

जहाज-निर्माण-उद्योग, जो क्लाइड के तट पर स्थापित हैं, सस्ते कोयले तथा लोहे की उपलब्धि के कारण केंद्रित तथा विकसित हो गए हैं। ग्लासगो से ग्रीनाक तक जलयानप्रांगण की दो कतारें पैट्रिक, क्लाइड बैंक, किल पैट्रिक, वाउलिंग और डनवर्टन आदि स्थलों पर मिलती हैं। जलयानप्रांगणों ने पोतनिर्माण संबंधी विशेष प्रकार के कार्य में विशेषता भी प्राप्त कर ली है  कहीं माल ढोनेवाली नावें तैयार होती हैं, कहीं, लाइनर्स, कहीं युद्धक जहाज, कही बड़े बड़े जहाज, कहीं जहाज संबंधी मशीनें आदि तैयार होती हैं। संसार के दो प्रसिद्ध जहाजों 'क्वीन मैरी' तथा 'क्वीन एलिजाबेथ' का निर्माण यहीं हुआ। सन्‌ 1871 ई. तक ग्रेट ब्रिटेन के 50 प्रतिशत जहाज (भार के रूप में) यहीं निर्मित होते थे। उसके पश्चात्‌ इसमें ह्रास हुआ और 1923 ई. में यह संख्या 28 प्रतिशत तक पहुँच गई।

कपड़े बुनने का काम लनार्कशिर, आयरशिर और रेनफ्रीशिर में अधिक विकसित हुआ है। वेसले कपड़ा की सिलाई के लिए संसार का सबसे बड़ा केंद्र है। किलमरनाक में पर्दे तथा फीते बनाने का कार्य होता है। डनवर्टन में रँगाई का काम होता है। लवार्कशिर में रेशमी कपड़े तैयार होते हैं।

इन सब उद्योगों के विकास के फलस्वरूप नगर का विस्तार नदी के दोनों किनारों पर बड़ी दूर तक चला गया है जिससे इसकी जनसंख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई।

इस विशाल नगर का प्रभाव आसपास के क्षेत्रों पर भी अधिक पड़ा है। इसके फलस्वरूप इसपर आश्रित अनेक औद्योगिक नगर स्थापित हो गए हैं। ग्लास्गो का प्रभाव फोर्थ तक विस्तृत है जहाँ ग्रग माउथ एक नदी पर स्थिति एक बंदरगाह है। क्लाइड नदी के निचले भाग में स्थित नगरों में जहाज बनाने का काम बहुत पहले से होता आया है।

3. दक्षिणी पठारी भाग- स्काटलैंड के तीसरे भाग के अंतर्गत एक पठारी भाग की पेटी पड़ती है जो मध्य की घाटी तथा साल्वे की खाड़ी के बीच विस्तृत है। यह भाग उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की दिशा में फैला हुआ है। ऐतिहासिक दृष्टि से इस भाग में इंग्लैंड तथा स्काटलैंड की राजनीतिक सीमा उत्तर से दक्षिण की ओर खिसकती रही है।

पठारी भाग की आधारशिला सिलूरियनयुग की शेल (Shale) हैं जिसमें अधिक मोड़ होने के फलस्वरूप एक चौड़े पठार का निर्माण हुआ है। इसका वर्तमान धरातल छोटे छोटे पेड़ों, झाड़ियों तथा घास के मैदानों से ढका हुआ है। पठारी भाग का कुछ स्थल 600 मी से अधिक ऊँचा है। बीच बीच में चौड़ी घाटियाँ मिलती हैं। पश्चिम की ओर एत्रन, निथ, डी और क्री नदियाँ उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व को पठार के ढाल के अनुसार बहती हैं और साल्वे की खाड़ी में गिरती हैं। पूर्व की ओर ट्वीड की बड़ी घाटी द्वारा इस पठारी भाग के दो भाग हो जाते हैं  लमरप्यूर और चेवियट की पहाड़ियाँ। लमरम्यूर का धरातल अधिक समतल है जहाँ के घास के मैदानों में भेड़ पालने का कार्य होता है। ट्वीड के दक्षिण चेवियट की पहाड़ी दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की दिशा में फैली हुई है। यह भाग प्राचीन शिस्ट (schist), लाल पत्थर, ग्रैनाइट और लावा आदि चट्टानों से निर्मित है। कुछ भाग घासों तथा झाड़ियों तथा पीट (Peat) से ढँका हुओ है परंतु पश्चिमी उत्तरी भाग में अधिक जंगल तथा हरियाली मिलती है। ट्वीड की घाटी की भूमि अधिक उपजाऊ है जहाँ पर इस भाग का अधिकांश जनसमूह निवास करता है।

दक्षिणी पठार का पश्चिमी भाग क्लाइड तथा सोलवे की खाड़ी के बीच प्रायद्वीप के रूप में है। यहाँ वर्षा की अधिकता और धूप की कमी के कारण खेती करने का कम अवसर है। अत: पशुपालन मुख्य धंधा है। मांस तथा दूध का उत्पादन अधिक होता है। 180 मी की ऊँचाई के ऊपर अधिकतर घास के मैदान ही मिलते हैं जहाँ भेड़ अधिक संख्या में चराई जाती हैं।

पठार का पूर्वी भाग जो उत्तर सागर के तट पर पड़ता है, नीचा उपजाऊ भाग है। यहाँ धूप अपेक्षाकृत अधिक होती है। यहाँ कृषियोग्य भूमि तथा चरागाह मिलते हैं, जहाँ गेहूँ, जई, जौ, आलू इत्यादि फसलें उगाई जाती हैं। ऊँचे भागों में भेड़ पालना मुख्य पेशा है। चेवियट की भेड़ें अपने ऊन के लिए जगत्‌प्रसिद्ध हैं।

इस उन्नत तथा धनी प्रदेश के लिए इंग्लैंड तथा स्कॉटलैंड में अक्सर युद्ध होता रहा है। अत: सभी मुख्य नगर कभी न कभी युद्धस्थल रह चुके हैं जहाँ पुराने किले के भग्नावशेष अब भी मिलते हैं। इसी भाग से होकर इंग्लैंड तथा स्कॉटलैंड के बीच के प्रमुख स्थलमार्ग, रेल तथा सड़कें जाते हैं। (उजागर सिंह)

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