हमारा फार्मूला चल गया तो सारी व्यवस्था बदल जाएगी

Submitted by Hindi on Wed, 08/31/2011 - 10:03
Source
फाल्गुन विश्व, 08 अप्रैल 2011

योगेश अनेजा से साक्षात्कार


योगेश अनेजा वलनी गाँव के रूपांतरण में भागीदार और साक्षी रहे हैं। वे हालाँकि खुद को उत्प्रेरक भी कहलाना पसंद नहीं करते, पर हमारी नज़र में बदलाव के मूल तत्त्व वे ही रहे हैं। अच्छा और प्रयोगशील समाज का निर्माण उनकी कल्पना है। वलनी में ऐसे समाज के पहले दौर के प्रयोग वे कर रहे हैं। गाँधी, तोलस्तोय उनकी प्रेरणा हैं। वे नागपुर में मूलतः ऑटो पार्ट्स का छोटा सा व्यवसाय करते हैं, पर समाजकर्मी उनका मुख्य काम है।

कोई 18 साल पहले की बात है। वाणिज्य से ताज़ा-ताज़ा ग्रेजुएट एक नौजवान नागपुर शहर के महल इलाके में एक जनसभा के बाहर अपनी कार के हुड पर बैठकर उस वक्ता को एकटक घूरे जा रहा था। 50-60 के बीच का धोती-कुर्ता पहने वह वक्ता गाँधी टोपी लगाए हुए सूचना के अधिकार और भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण दे रहा था। सभा ख़त्म हुई। अगला भाषण उमरेड तहसील के किसी गाँव में था। नौजवान उनके पीछे चल पड़ा और फिर उसका भाषण सुना। उसे भाषण में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस आदमी में थी। आख़िरकार आधी रात को सभा ख़त्म होने के बाद उसने उनको पकड़ ही लिया और अपनी कार में नागपुर ले आया। लेकिन, नौजवान का उद्देश्य पूरा ही नहीं हो पाया, क्योंकि उस बुजुर्ग ने उसे कहा कि वह घर लौट जाए और सबसे पहले अपने माता-पिता की सेवा करे। उससे वक्त बच जाए तो आस-पास नज़र डाले, कई काम ऐसे हैं, जो समाज के लिये वह कर सकता है। जरूरी नहीं कि ये काम करने के लिये वह उनके गाँव ही आएं। नौजवान आसमान से सीधे धरती पर आ गिरा, पर उसका सपना टूटा नहीं। सिर्फ दिशा नई मिल गई। वे बुजुर्ग थे अन्ना हजारे; और वह नौजवान था योगेश अनेजा।

योगेश मृदा सर्वेक्षण एवं संवर्धन संस्थान में मुख्य लेखा अधिकारी का बेटा था, जो उसे कभी-कभी बड़ी निराशा के भाव में बताते थे कि कैसे सरकार जनता के पैसे बर्बाद करके इस विभाग को पाल रही है और ये किसानों के लिये कोई काम नहीं करता। सिर्फ झूठी टेबल रिपोर्ट देकर कृषि वैज्ञानिक और अफसर पैसा बना रहे हैं। असली समस्याओं से उनका कभी वास्ता ही नहीं पड़ा है। यही वह बात थी, जो योगेश के दिलो-दिमाग में जमी रह गई और उसे अपनी आशा का केंद्र अन्ना हजारे नज़र आए। भागकर रालेगण सिद्धि पहुँच गए। फिर पिता के देहांत ने घर की जिम्मेदारियां सिर पर डाल दीं तो दो-तीन साल तक समाजकर्मी का भूत आस-पास फटका भी नहीं। अन्ना ने नई दृष्टि दी तो जैसे ही मोहलत मिली, योगेश अपने दोस्त योगेश वानखेड़े को लेकर उमरेड तहसील के आदर्श ग्राम सुरगाँव पहुँच गए। 'आदर्श' की हकीकत पल्ले पड़ी, तब समझ में आया कि आस-पास का ही कोई गाँव ढूँढा जाए। सो, वलनी जा पहुंचे। 1997 में वलनी में असली काम की शुरुआत हुई। एक समय ऐसा भी था कि वे सबकुछ छोड़-छाड़कर ग्रामवासी ही हो गए, पर अन्ना की कही आखिरी बात याद थी, ''जब तुम्हारा काम एक जगह पूरा हो जाए, तो उसे वहां के लोगों को सौंपकर आगे बढ़ जाना.'' योगेश भी अपने पहले काम के अंतिम पड़ाव पर हैं। उनके काम को उनकी ही जबानी सुनें तो आनंद आएगा। तो सुनिए :

 

 

- कैसे लगी इस काम की लगन?


- पिताजी (दिवंगत कश्मीरीलालजी अनेजा) कई बार किसानों की दुर्दशा के बारे में बताया करते थे। बस, पिताजी की बात दिमाग में रह गई। जब समझ में आया कि किसान ही हमारे देश का अन्नदाता है और उसकी ही हालत बुरी है तो दिल ने कहा कि कुछ करना पड़ेगा। अन्ना हजारे उस समय आदर्श थे, पर उनकी सीख ने एक बात समझा दी कि काम की शुरुआत आस-पास से ही होनी चाहिए। तब सरकारी तंत्र से कुछ नफरत हो गई थी। लगता था कि उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी गई है, वे उसे नहीं निभा रहे हैं। उसका अहसास भी उनको करवाना था।

 

 

 

 

- वलनी में जो कुछ हो रहा है, वह अद्भुत है। यह बात समझ में कैसे आई कि करना क्या है?


- ये सब बातें तो केशवजी और गांववालों से ही सीखी। गाँव वालों को सारे देशज और परंपरागत तरीके पता था। लेकिन उसे करने का साहस और पहल नहीं थी। पहल की तो साहस भी आ गया।

 

 

 

 

- कैसे किया ?


- ये बड़ा मजेदार किस्सा है। मैं और योगेश, जब 1997 में मई की तपती दोपहर में वलनी पहुंचे तो केशवजी और उनके साथियों-नत्थूजी फलके, तुलसीराम, मोहन डम्भारे गुरूजी, कमलाकर चौधरी आदि से मुलाकात हो गई। तालाब पर जाकर पता लगा कि वे तालाब पर मालगुजार के कब्जे को लेकर चिंता में है। तालाब की दुर्गति देखकर हमें भी गुस्सा आया। नया-नया जोश उफान मार रहा था। हमने कहा कल से तालाब खोदने का काम शुरू करते हैं। सबने हाँ कर दी। हमें लगा कि एक दिन काम करते देखेंगे तो बाकी गांववाले अगले दिन आ ही जाएंगे। अगले दिन मैंने पास के गाँव से एक दिन के 800 रुपये के हिसाब से ट्रैक्टर ट्राली तय कर दी और सातों आदमी लगे तालाब खोदने। शाम तक दो ट्राली मिट्टी खोद पाए। अगले दिन काम का वादा कर नागपुर रवाना हुए तो बदन बुखार से तप रहा था। हालत खराब थी। कभी ऐसा काम किया नहीं था। अगले दिन तालाब पर पहुंचे तो फिर हम दो को मिलाकर वही सात लोग। केशवजी ने बताया-कोई गाँव वाला आने को तैयार नहीं है। बड़ा झटका लगा। मेरी तो हालत नहीं थी काम करने की। मैं ट्रैक्टर वाले के पास गया। उसे उस दिन के भी 800 रुपये दिए और कहा कि तू मत आना। तेरा दिन खराब किया, उसके पैसे रख ले। वापस आने पर केशवजी से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि एकदम से बड़ा काम हाथ में ले लिया। पहले छोटे-छोटे काम करते हैं। उनसे पुछा कि पहले क्यों नहीं बताया तो जवाब मिला कि आप लोग जितने जोश में थे, उसकी लाज तो रखनी हीं थी। फिर गाँव का काम था। बहरहाल, अगले कुछ माह तक वृक्षारोपण, सड़क सुधार, साफ-सफाई जैसे काम करते रहे। ये बड़ी उल्लेखनीय बात थी कि जब गाँव पहुंचे तो पहचान ना होने के बावजूद केशव जी या गांववालों ने हमें भगाया नहीं। उलटे हमारी बचकानी हरकतों को समर्थन दिया। उनको सब तरीके मालूम थे। उन्होंने हमारी परीक्षा नहीं ली, हमें सिखाया। ये उनका बड़प्पन है।

 

 

 

 

- इतने साल बाद क्या लगता है?


- हम कुछ कर पाने में सफल हैं। इतने सारे फार्मूले बन गए हैं। हमारी चिंता हमेशा से किसान रहा और उसका भला हो रहा है। बस ये फार्मूले देश के सारे गरीब किसानो तक पहुँच जाएं और वे सफल हो जाएं।

 

 

 

 

- इस काम में काफी सोच-विचार लगा होगा?


- हमने सोचा कि ऐसे तरीके आजमाए जाएं, जो गरीब से गरीब किसान के बूते में हो। हमने उसकी नज़र से देखकर ही तरीके ढूंढे। अंधकार से भरी गुफा से बाहर निकलने का रास्ता खोजा। यह मेरा सौभाग्य हीं है कि हम इस प्रक्रिया के अंग हैं। मैं बड़ा आस्तिक हूँ और मानता हूँ कि ऊपरवाला हमसे ये काम करवा रहा है। हर मुसीबत के समय उसने समाधान भी दिखा दिया। यह भी है कि मैं किसी देवी-देवता को नहीं मानता। मेरे लिये तो किसान ही भगवान है। वह हमारा अन्नदाता है। हम उसी की पूजा करते हैं।

 

 

 

 

- क्या ये फार्मूले सफल हो पायेंगे?


- बस हमको करके दिखाना है। ये चिंगारी जंगल की आग की तरह फैलेगी। ये फार्मूले चल गए तो पूरी व्यवस्था बदल जाएगी।

 

 

 

 

- क्या सारी समस्याएं इन फार्मूलों से हल हो जाएंगी ?


- हमें वह फार्मूला अभी तक नहीं मिला,जिससे हम इस समस्या से बाहर निकल जाएं। हम कोई नया तरीका ईजाद करना चाहते हैं।

 

 

 

 

- क्या अहिंसक सत्याग्रह पर चलते हुए लगा नहीं कि आन्दोलन के उग्र या मौजूदा तरीके अपना लिये जाएँ?


- कई बार लगा कि बड़ा कष्ट है। आन्दोलन के आम तरीके अपना लिये जाएं। लेकिन, दिल से आवाज आती कि नहीं। हम सरकारी कर्मचारियों में काम करने और सरकारी अफसरों, कर्मचारियों में काम करने की भावना जगाना चाहते हैं, ताकि उस आम जनता, खासकर किसान, के काम हो जाएं जो बड़े कष्ट में है।

 

 

 

 

- यानी भ्रष्टाचार आपको बड़ा मुद्दा लगता है?


- नहीं, ये भ्रष्टाचार नहीं है। ये रास्ते का भटकाव है। हम सभी लोगों ने अपने सुख और शांति की खोज किसी दूसरी चीज में ही खोजनी शुरू कर दी है। हमारी नैतिक जिम्मेदारी और जवाबदेही की भावना आडम्बर में दब गई है। हम कोशिश कर रहे हैं कि वह भावना फिर उभर कर आए।

 

 

 

 

- इन सब चीजों से निपटते हुए कभी राजनीतिक दल बनाने का ख्याल नहीं आया?


- ख्याल आया, पर ये कि सारे राजनीतिक दल हमारा रास्ता अपना लें। हम जो काम कर रहे हैं, वे उसको अपना लेंगे तो सारी समस्या ही दूर हो जाएगी।

 

 

 

 

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