मैसूर

Submitted by Hindi on Thu, 09/01/2011 - 10:12
मैसूर 1. राज्य, स्थित: 180 250 से 310 150 उ.अ. तथा 740 100 से 780 350 पू. दे.। यह दक्षिणी भारत का एक राज्य है, जिसका पुनर्गठन सन्‌ 1956 में भाषा के आधर पर किया गया था। इसके परिणामस्वरूप कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को इसमें मिला दिया गया है। इसका क्षेत्रफल 74,210 वर्ग मील है। इसके उत्तर में महाराष्ट्र, पूर्व में आंध्र प्रदेश, दक्षिण में केरल और मद्रास एवं पश्चिम में गोआ एवं अरब सागर हैं।

धरातल एवं प्राकृतिक बनावट- मैसूर राज्य का धरातल ऊँचा नीचा एवं पठारी है। समुद्रतल से ऊँचाई लगभग 2,000 फुट है। प्राकृतिक बनावट के आधार पर इस दो भागों में विभक्त किया जा सकता है: (1) पश्चिम का तटीय मैदान और (2) दक्षिणी दकन प्रदेश। तटीय मैदान मालाबार तट का उत्तरी भाग है, जिसकी चौड़ाई बहुत कम है। इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ हैं, जिनसे छोट छोटी द्रुतगामिनी नदियाँ निकलकर अरबसागर में विलीन हो जाती हैं। पूर्वी भाग उच्च महाड़ी एवं पठारी प्रदेश है। मैसूर के मध्य में, उत्तर से दक्षिण, पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ है। इसके पूर्व में प्राचीन चट्टानों से निर्मित दकन का भाग है। उत्तर-पूर्व में कृष्णा, तुंगभद्रा एवं भीमा नदियों का समतल उच्च मैदान है।

जलवायु एवं प्राकृतिक वनस्पति- यहाँ का ताप साधरणतया ऊँचा रहता है। औसत ताप 270 सें. है। तापांतर आंतरिक भाग में अधिक रहता है। वर्षा पश्चिमी घाट के पश्चिम में अधिक (375 सेंमी. से अधिक) एवं पूर्व के वृष्टिछाया प्रदेश में कम (50 सेंमी. से कम) होती है। अधिकांश: वर्षा दक्षिण-पूर्वी मानसून से होती है। यहाँ की प्राकृतिक वनस्पति सदाबहार के जंगल हैं, जिनसे सागौन, चंदन, राज़बुड आदि की लकड़ी प्राप्त होती है। वनाच्छादित क्षेत्र 12,000 वर्ग मील है, जो संपूर्ण क्षेत्र का 17 प्रतिशत है।

कृषि- 53.5 प्रतिशतक्षेत्र में खेती होती है तथा 71.2% जनसंख्या कृषि कार्य में लगी हुई है। मुख्य उपजें धान, ज्वार, गेहूँ, दलहन मूँगफली, कपास आदि हैं। वागाती खेती में कहवा, चाय तथा रबर का उत्पादन होता है। पशुपालन भी महत्वपूर्ण है। मैसूर राज्य में लगभग 10 लाख रूपये के मूल्य की मछलियाँ प्रति एर्ष पकड़ी जाती हैं। तुंगभद्रा एवं घाटप्रभा आदि 14 बहुउद्देश्यीय सिंचाई योजनाएँ आ रही हैं।

खनिज पदार्थ- सोना हट्टी एवं कामत श्रेणियों में, बेंगलूरू एवं चिक्कमगलूरू में ऐस्वेस्टस तथा लोहा और मैंग्नीज, ताँबा, बॉक्साइट, गंधक आदि, अन्य क्षेत्रों में मिलते हैं। कोयला एवं खनिज तेल का अभाव है, जिसकी पूर्ति जल विद्युत से की जा रही है। यह अधिकांशत: शारावती, भद्रा एवं तुंगभद्रा जलविद्युत्‌ योजनाओं से प्राप्त होती है।

उद्योग- रेशमी वस्त्र, चमड़े, आभूषण, टोकरी, रस्सी, चंदन, हाथीदांत की वस्तुएँ आदि के कुटीर उद्योग तथा वस्त्र उद्योग श्रेंगलूरू मैसूर, बल्लारि आदि में, लोहे एवं इस्पात का उद्योग भद्रावती में, सीमेंट शाहाबाद एवं भद्रावती में, दियासलाई शिवमोगा में, ऊनी एवं रंशमी वस्त्र बेंगलूरू एवं मैंसूर में, कागज भद्रावती में तथा टेलीफोन, हवाई जहाज आदि, के उद्योग बैंगलूरू में हैं।

यातायात- सड़कों की लंबाई 43,600 कि. मी. एवं रेलमार्ग की लंबाई 2,687 किमी. है। बेंगलोर बड़ा जंकशन है तथा वायु यातायात का भी केंद्र है। मंगलूर तथा कारवार आदि प्रमुख बंदरगाह हैं।

जनसंख्या- इसकी जनसंख्या 2,34,86,772 (1961) है। जनसंख्या का घनत्व मैदान की ओर अधिक हैं। 7 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण है। एवं 1,000 में 254 ही शिक्षित हैं। बेंगलूरू, मैसूर, कोलार, हुब्ली, धारबाड़, मंगलूरू, बेलगाँव आदि मुख्य नगर हैं। बेंगलौर राज्य की राजधानी है।

दर्शनीय स्थान- जोग प्रपात, बेंगलॅरू में लाल बाग, रमन अनुसंधानशाला आदि, कावेरी प्रपात, श्री रंगपटनम में रंगनाथ स्वामी का मंदिर, मैसूर में वृंदावन बाग तथा अन्य कई स्थानों के मंदिर दर्शनीय हैं।

2. नगर: स्थिति 120190 उ. अ. एवं 760 380 पू. दे. है। मैसूर राज्य का एक प्रसिद्ध राज्य में इस नगर का जनसंख्या के दृष्टि से द्वितीयश् स्थान है। यह मैसूर जिले का शासन केद्र एवं दक्षिणी रेलमार्ग का प्रमुख स्टेशन है। नगर अति सुंदर एवं स्वच्छ है, जिसमें रंग बिरंगे पुष्पों से युक्त बाग बगीचों की भरमार है। चामुडी पहाड़ीश् पर स्थित होने के कारण प्राकृतिक छटा का आवास बना हुआ है। भूतपूर्व महाराजा का महल, विशाल चिड़ियाघर, नगर के समीप ही कृष्णाराजसागर बाँध, वृंदावन वाटिका, चामुंडी की पहाड़ी तथा सोमनाथपुर का मंदिर आदि दर्शनीय स्थान हैं। इन्हीं आकर्षणों के कारण इसे पर्यटकों का स्वर्ग कहते हैं। यहाँ पर सूती एवं रेशमी कपड़े, चंदन का साबुन, बटन, बेंत एवं अन्य कलात्मक वस्तुएँ भी तैयार की जाती हैं। यहाँ प्रसिद्ध मैसूर विश्वविद्यालय भी है।

मैसूर (इतिहास)- मैसूर का प्रामाणिक इतिहास भारत पर सिकंदर के आक्रमण (327 ई. पू.) के बाद से प्राप्त होता है। उस तूफान के पश्चात्‌ ही मैसूर के उत्तरी भाग पर सातवाहन वंश का अधिकार हुआ था, और यह अधिकार द्वितीय शती ईसवी तक चला। मैसूर के ये राजा सातकर्णी कहलाते थे। इसके बाद उत्तर कशचमी क्षेत्र पर कदंब वंश का और उतर पूर्वीश् भाग पर पल्लवों का शासन हुआ। कदंबों की राजधनी वनवासी में तथा पल्लवों की कांची में थी। इसी बीच उतर से इक्ष्वाकु वंश के सातवें राजा दुर्विनीत ने पल्लवों से कुछ क्षेत्र छीनकर अपने अधिकार में कर लिए। आठवें शासक श्रीपुरूष ने पल्लवों को हारकर 'परमनदि' की उपाधि धारण की, जो गंग वंश के परवर्ती शासकों की भी उपाधि कायम रही।

उत्तर पश्चिमी क्षेत्र पर पांचवी शती में चालुक्यों ने आक्रमण किया। छठी शती में चालुक्य नरेश पुलिकैशिन ने पल्लवों से वातादि (वादामी) छीन लिया ओर वहीं राजधानी स्थापित की। आठवीं शती के अंत में राष्ट्रकूट वंश के ध्रूव या धारावर्ष नामक राजा ने पल्लव नरेश से कर वसूल किया और गंग वंश के राजा को भी कैद कर लिया। बाद में गंग राजा मुक्त कर दिया गया: राचमल (लगभग 820 ई.) के बाद गंग वंश का प्रभाव पुन: बढ़ने लगा। सन्‌ 1004 में चोलवंशीय राजेंद्र चोल ने गंगों को हराकर दक्षिण तथा पूर्वी हिस्से पर अपना अधिकार कर लिया।

मैसूर के शेष भाग याने उत्तर तथा पशिचमी क्षेत्रश् पर पश्चिमी चालुक्यों का अधिकार रहा। इनमें विक्रमादित्य बहुत प्रसिद्ध था, जिसने 1076 से 1126 तक शासन किया। 1155 में चालुक्यों का स्थान कलचूरियों ने ले लिया। इनकी सत्ता 1153 तक ही कायम रही।

गंग वंश की समाप्ति पर पोयसल या होयसाल वंश का अधिकार स्थापित हो गया। ये अपने को यादव या चंद्रवंशी कहते थे। इनमें बिट्टिदेव अधिक प्रसिद्ध था जिसने 1104 से 1141 तक शासन किया। 1116 में तलकाद पर कब्जा करने के बाद उसने मैसूर से चोलों को निकाल बाहर किया। सन्‌ 1343 में इस वंश का प्रमुख समाप्त हो गया।

सन्‌ 1336 में तुंगभद्रा के पास विजयनगर नामक एक हिंदु राज्य उभरा। इसके संस्थापक हरिहर तथा बुक्क थे। इसके आठ राजाओं सिंहासन पर अधिकार कर लिया। उसकी मृत्यु के बाद उसके तीन पुत्रों, नरसिंह, कृष्णराय तथा अच्युतराय, ने बारी बारी से राजसता संभाली। सन्‌श् 1565 में बीजापुर, गोलकुंडा आदि मुसलिम राज्यों के सम्मिलित आक्रमण से तालीफोटा की लड़ाई में विजयनगर राज्य का अंत हो गया।

18वीं शती में मैसूर पर मुसलमान शासक हैदरअली की पताका फहराई। सन्‌ 1782 में उसकी मृत्यु के बाद 1799 तक उसका पुत्र टीपू सुल्तान शासक रहा। इन दोनों ने अंग्रेजों से अनेक लड़ाईयाँ लड़ी। श्रीरंगपट्टम्‌ के युद्ध में टीपू सुल्तान की मृत्यु हो गई। तत्पश्चात्‌ मैसूर के भाग्यनिर्णय का अधिकार अंग्रेजों ने अपने हाथ में ले लिया। किंतु राजनीतिक स्थिति निरंतर उलझीश् हुई बनी रही, इसलिये 1831 में हिंदु राजा को गद्दी से उतारकर वहाँ अंग्रेज कमिश्नर नियुक्त हुआ। 1881 में हिंदु राजा चामराजेंद्र गद्दी पर बैठे। 1894 में कलकते में इनका देहावसान हो गया। महारानी के संरक्षण में उनके बड़े पुत्र राजा बने और 1902 में शासन संबंधी पूरे अधिकार उन्हें सौंप दिए गए। भारत के स्वतंत्र होने पर मैसूर नाम काश् एक पृथक्‌ राज्य बना दिया गया जिसमें पास पास के भी कुछ क्षेत्र सम्मिलित कर दिए गए।

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