शहरीकरण का विस्फोट

Submitted by Hindi on Thu, 09/01/2011 - 10:29
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मीडिया फॉर राईट्स

113 शहरों द्वारा गंगा और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में हर रोज डेढ़ अरब लीटर अपशिष्ट गंदा पानी छोड़ा जाता है। ऐसे में बेतरतीब ढंगी शहरों का यह देश किसी भी ऐसी महामारी के चपेट में आ सकता है, जिसके लिये हम खुद जिम्मेदार होंगे। हम उस स्थिति में कभी नहीं आ सकेंगे जब शहरों द्वारा पैदा किये गये अरबों टन कचरे का उपचार करके उसे ठिकाने लगा सकें। यह कचरा पानी, जमीन, पेड़ और इंसानी स्वास्थ्य, सबको बीमार बना देगा।

डिण्डोरी जिले के हरिराम बैगा को एक बार बंगलुरू जाने का मौका मिल गया। हरिराम ने जब बंगलुरू के हवाई अड्डे की ओर जाने वाली चमचमाती और दूधिया रोशनी से नहाई हुई सड़क देखी तब उसने कहा कि, तो इसीलिए अपने गाँव के लोग शहर की ओर दौड़-दौड़कर आ रहे हैं। फिर इस बैगा आदिवासी ने कहा कि ऐसी सड़कों को इतनी बिजली यहां कैसे मिल जाती है, हमारे गाँव के घरों में तो एक बल्ब भी नहीं जल पाता? वास्तव में जब शहरीकरण एक जज्बा बनकर हमारी बहस में आता है तो विकास का सबसे बड़ा लक्ष्य यही बन जाता है कि इस देश को शहरों को देश बना दो! और एक आम इंसान जब शहर की कल्पना करता है तो उसके सामने चकाचौंध कर देने वाली बसाहट होती है, आधुनिकता का भव्य प्रदर्शन होता है। अभावों में रहकर जिंदगी के एक-एक हिस्से को जोड़कर संवरने की जद्दोजहद करने वाला गाँव में रहने वाला हरिराम यह मानने लगता है कि शहर यानी आसानी से उपलब्ध पानी, कदम-कदम पर इलाज और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की सुविधायें! परन्तु उन झुग्गी बस्तियों को देखकर वह दुविधा में पड़ गये कि वैसा उजाला और सुविधायें शहर की इस आधी आबादी को क्यों नही मिली! ऐसा भेदभाव तो गाँव में भी नही होता है। यदि वह युवा हुआ तो वह मानेगा कि शहर माने रोजगार के चारों तरफ बिखरे हुये अवसर। कुल मिलाकर शहरीकरण एक काल्पनिक दुनिया तो नहीं है न!
 

किस कीमत पर शहरीकरण!


आज जब हम इस विषय पर चर्चा करते हैं तो वह थोड़ी ही देर में बहस में तब्दील हो जाती है। हम या तो शहरीकरण के पक्ष में खड़े होते हैं या फिर इसी पूरी तरह से खिलाफत करते हैं। यह बहस जायज है। जायज इसलिये क्योंकि हम जानना चाहते हैं कि हमारे देश में जो शहरीकरण हो रहा है, कहीं वह गांवों की बदहाली और वहां सिमटती जा रही जिंदगी का परिणाम तो नहीं है! हमारे मन में यह भी ख्याल आता है कि कहीं इसके पीछे कोई आर्थिक राजनीति तो नहीं छिपी हुई है। हम आंकलन करना चाहते हैं कि बदहाली, बीमारी, बेरोजगारी और असुरक्षा जैसे सवालों के जवाब क्या बेतरतीब ढंग से हो रहे शहरीकरण में मिलने वाले हैं? पूरी दुनिया की तरह ही भारत में भी शहरीकरण को आधुनिक विकास से पैदा हुई सोच नहीं माना जा सकता है। आज की परिस्थितियों पर पहल करने से पहले हमें इसका ऐतिहासिक पहलू जान लेना बहुत जरूरी है। मानव सभ्यता के जब से प्रमाण मिलते हैं तभी से शहरों के निशान भी मिलते हैं। सुनियोजित और सुव्यवस्थित शहरीकरण की परम्परा भारत को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में दुनिया के दूसरे देशों से एक अलग पहचान दिलाती है।

दुनिया में पांच हजार साल पहले की हिंदू घाटी की सभ्यता में शहरी बसाहट की शुरूआत के प्रमाण भारत में ही देखें गये। इसके बाद मध्यकाल में भी सत्ता व्यवस्थाओं के उत्थान और पतन के फलस्वरूप शहरों की स्थापना की एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया सी नजर आती है। कई मर्तबा इसे एक सांस्कृतिक व्यवहार के साथ भी जोड़कर देखा जाता रहा है। परिभाषा के स्तर पर व्यापार, उद्योग, राज्य और सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था को चलाने के लिये शहरों के वजूद को अनिवार्य माना गया है। आधुनिक भारत में शहरीकरण का तेज दौर 18वीं सदी में तब देखा गया जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में आई। उसने व्यापार-उत्पादन के लिये बंदरगाहों का निर्माण किया और उन बंदरगाहों के आसपास शहर बसाये या उनका विकास किया। एक नजरिये से भारत की गांवों के संसाधनों को लूटकर ले जाने के लिये शहरों को जरिया बनाया गया।

इसके बाद हमारे लिये बीसवीं सदी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। 1901 से 2001 की अवधि में यहां कुल शहरों की संख्या 1827 से बढ़कर 5161 (वर्ष 2001 में) हो गई। शहर तो बढ़े परन्तु यह बात भी साफ तौर पर उभरकर आती है भारत में छोटे शहरों से ज्यादा बड़े शहरों का विकास हुआ है। वर्ष 1901 में एक लाख की जनसंख्या वाले केवल 24 शहर थे जो वर्ष 2001 में बढ़कर 393 हो गये जबकि 5 से 10 हजार की जनसंख्या वाले शहरों की संख्या 744 से बढ़कर महज 888 हो पाई। यानी संसाधन और विकास बड़े नगरों के आसपास केन्द्रित हुआ। बड़े शहरों में रहने वाली जनसंख्या का प्रतिशत 26 से बढ़कर अब 68 हो गया है और छोटे शहरों में आबादी का अनुपात कम हुआ है। शहरीकरण का यह परिदृश्य बताता है कि कहीं न कहीं गांवों की बदहाली ने इसके लिये उर्वरक का काम किया है। वर्ष 1921 में भारत में 685665 गाँव थे और गांधी जी कहते थे कि हमारा देश 7 लाख गणराज्यों का देश है और वर्ष 2001 की जनगणना बताती है कि अब महज 593731 गाँव ही देश में आबाद हैं। कहां गये ये 92 हजार गाँव मतलब यह है 28 गाँवों की कीमत पर एक शहर खड़ा हुआ। मौजूदा दशक में ही 7863 गाँव शहरों की सीमा में शामिल कर दिए गए। आज भारत के शहरों में लगभग 34 करोड़ लोग रहते हैं और यह संख्या अगले 20 वर्षों में बढ़कर 59 करोड़ हो जायेगी।

आज शहरी जीवन के 2 घंटे हर रोज ट्रैफिक के नाम होते हैं। वर्तमान स्थिति में भारत में एक किलोमीटर सड़क पर 170 वाहनों का घनत्व है, जो सड़कों पर जाम की स्थिति बनाता है। अगले 20 वर्षों में जाम का समय दो गुना हो जाने वाला है क्योंकि निजी परिवहन साधनों को भारत में ज्यादा विस्तार दिया गया। जिससे सार्वजनिक परिवहन सेवायें बेहद कमजोर हो गई। आज 70 प्रतिशत शहरी परिवहन निजी साधनों से होता है जिसे आधा करने की जरूरत है। कार्बन उत्सर्जन, दुर्घटनायें और तनाव भी यातायात की अव्यवस्था के बड़े परिणाम है।

बुनियादी जरूरतों का बुनियादी संकट


इस तथ्य को महज नकारात्मक कहकर हमें नकारना नहीं चाहिए कि देश-समाज ज्वालामुखी सरीखे विस्फोट की संभावना के मुहाने पर आ बैठा है। भारत के चार राज्यों (बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड) के 36 शहर हर रोज डेढ़ अरब लीटर अपशिष्ट मैला पानी बिना उपचार के गंगा के बेसिन में छोड़ते हैं। इतना ही नहीं भोपाल का 24 करोड़ लीटर मैला अपषिष्ट पानी खुला छोड़ दिया जाता है जो शहर की शान भोज तालाब में जाकर भी मिला है, तो इन्दौर का 12 करोड़ लीटर गंदा पानी खान और शिप्रा नदी से जा मिलता है। मध्यप्रदेश के बड़े शहर हर रोज 124.8 करोड़ लीटर मैला और गंदा पानी पैदा करते हैं परन्तु राज्य में ऐसे पानी को उपचार करने की क्षमता महज 18.6 करोड़ लीटर पानी की है। राजस्थान 138 करोड़ लीटर सीवेज उत्पादन के बदले केवल 5.4 करोड़ लीटर पानी का उपचार करने की क्षमता रखता है। छत्तीसगढ़ 35 करोड़ लीटर गंदा पानी पैदा करता है पर महज 6.9 करोड़ लीटर का उपचार करता है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मण्डल की शहरों में पानी की स्थिति पर जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 908 शहर हर रोज 3.80 अरब लीटर मैला पानी पैदा करते हैं और इसमें से 2.80 अरब लीटर मैला अपशिष्ट बिना उपचार के शेष गंदा पानी खुले मैदानों और नदियों (जैसे गंगा, नर्मदा, क्षिप्रा, चंबल आदि) में मिलने के लिये छोड़ दिया जाता है। 113 शहरों द्वारा गंगा और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में हर रोज डेढ़ अरब लीटर अपशिष्ट गंदा पानी छोड़ा जाता है। ऐसे में बेतरतीब ढंगी शहरों का यह देश किसी भी ऐसी महामारी के चपेट में आ सकता है, जिसके लिये हम खुद जिम्मेदार होंगे। हम उस स्थिति में कभी नहीं आ सकेंगे जब शहरों द्वारा पैदा किये गये अरबों टन कचरे का उपचार करके उसे ठिकाने लगा सकें। यह कचरा पानी, जमीन, पेड़ और इंसानी स्वास्थ्य, सबको बीमार बना देगा। प्रोफेसर सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक 25.7 प्रतिशत शहरी गरीबी की रेखा के नीचे हैं। ये एक व्यक्ति पर 19 रूपये प्रतिदिन से भी कम खर्च करके जीवनयापन करते हैं। आज जबकि शहरों में अपनी छत का सुख हासिल करना बुनियादी जरूरत है, इन परिवारों के लिए आवास का आधार मिलना एक दूर का ख्वाब है।

जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना के तहत झुग्गीवासियों और गरीब परिवारों को घर देने की प्रक्रिया जरूर शुरू की गई है पर इसमें एक व्यक्ति के खाते में महज 30 से 40 वर्गफिट की सतह ही आ रही है। भोपाल में इस योजना के अनुभव बताते हैं कि निर्माण तो पूरी तरह से गुणवत्ताहीन हैं और असुरक्षित भी। मौजूदा स्थिति में जबकि महज 2.7 प्रतिशत नगर पालिकायें ही 100 लीटर प्रतिव्यक्ति या उससे अधिक पानी उपलब्ध करा पा रही हैं और 28 प्रतिशत नगरीय क्षेत्र में जनता को 50 लीटर से कम पानी उपलब्ध है। यानी जकारिया समिति द्वारा तय मापदण्डों को लागू नहीं किया जा पा रहा है इसके एवज में पानी का निजीकरण कर दिया गया है जिससे शहरी गरीबों के लिये संकट गहरा रहा है। बात अब केवल पानी की खरीदी-बिक्री का ही नहीं है बल्कि पानी की तेजी से होती कमी के संदर्भ में पानी हासिल करने की है, जिसके बारे में शहरीकरण की नीतियाँ चुप हैं। वर्ष 2008 में भारत के शहरों में पानी के लिए 1738 झगड़े हुये जिनमें 19 लोग मारे गये, वर्ष 2009 में इनकी संख्या 1903 पहुंच गई।

वर्ष 2007 में 83 बिलियन लीटर पानी की जरूरत थी पर महज 56 बिलियन लीटर पानी की आपूर्ति हो पा रही थी यानि 27 बिलियन लीटर पानी की कमी थी। वर्ष 2030 में जरूरत होगी 189 बिलियन लीटर पानी की और उपलब्ध होगा केवल 95 बिलियन लीटर। यानी कमी 27 बिलियन लीटर से बढ़कर 96 बिलियन लीटर हो जायेगी। इसी तरह वर्ष 2007 में हर रोज 66 बिलियन लीटर गंदे पानी के उपचार की जरूरत के विरूद्ध केवल 13 बिलियन लीटर पानी का उपचार हो पा रहा था। वर्ष 2030 में हम 42 बिलियन लीटर पानी का उपचार करने की क्षमता रखेंगे पर गंदे पानी का उत्पादन 151 बिलियन लीटर हो जायेगा। हर साल अभी 51 मिलियन टन कचरा हर साल पैदा होता है, कचरे की यह पैदावार 2030 में बढ़कर 377 मिलियन टन हो जायेगी। यही कमी सड़क और रेल यातायात के मामले में भी जमकर बढ़ने वाली है। आवास व्यवस्था के बारे में उभरकर आये निष्कर्ष और ज्यादा गंभीर हैं। आज जरूरत 3 करोड़ घरों की है पर केवल 50 लाख घर ही बन पायेंगे। यह अंतर 2030 के शहरों में खूब बढ़ने वाला है। तब 5 करोड़ घर चाहिये होंगे और बन पायेंगे केवल 1.20 करोड़।

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