मरघट तक जिंदा है बाजार

Submitted by Hindi on Tue, 09/06/2011 - 11:37
Source
गांधि-मार्ग, सितंबर-अक्टूबर 2011

पिछले करीब सौ सालों के दौरान अपने चिर-परिचित घर में अपने परिवार जनों, मित्रों के बीच प्राण त्यागने वाले अमेरिकीयों की संख्या लगातार घटी है। परिजनों से दूर अस्पतालों, मोक्षगृहों, वृद्धाश्रमों में अजनबी डाक्टरों, नर्सों, परिचारकों के बीच प्राण त्यागने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

कुछ अपवाद हो सकते हैं। पर कुल मिलाकर हममें से ज्यादातर के जीवन में बाजार का प्रवेश बहुत भीतर तक हो गया है। जीते-जी बाजार से छुटकारा नहीं। ऐसा कहना अच्छा नहीं माना जाता फिर भी कहना पड़ेगा कि कुछ समाजों में तो अब मर कर भी बाजार से छुटकारा नहीं मिलेगा। मृतक न सही, मृतक का पूरा परिवार बाजार से घिरा रहता है। शोक की उस घड़ी में भी सौदे होते रहते हैं और परिवार को हर चीज के मुंह मांगे दाम चुकाने पड़ते हैं। ये खर्च इतने अनाप-शनाप बढ़ चले हैं कि अब जीवन बीमा की तरह मृत्यु-बीमा भी किया जाने लगा है! बात आरंभ करें - ‘द अमेरिकन वे ऑफ डेथ’ नाम एक खोजपूर्ण किताब से। कोई आधी सदी पहले विदुषी जेसिका मिटफोर्ड ने यह किताब लिखी थी। किताब लेखिका की एक सहेली के बयान से आरंभ होती है। उसने अपने एक संबंधी को दफनाने के लिए किसी कंपनी से संपर्क किया था। अंतिम संस्कार करने वाली उस कंपनी ने इस काम के लिए सात सौ डालर तय किए थे। अचानक कंपनी के किसी कर्मचारी ने फोन किया कि मृतक उस ताबूत में नहीं समा पाएगा। ताबूत थोड़ा छोटा पड़ रहा है। कंपनी का सुझाव था कि सौ डालर और देकर दूसरा ताबूत खरीदा जाए ताकि मृतात्मा आराम से सो सके। ”लेकिन महाशय, सौ डालर काफी ज्यादा हैं, मेरे पास तो इतना पैसा नहीं है,“ सहेली ने जब यह कहा तो उस कर्मचारी ने नए ताबूत के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दिए। सहेली तब भी टस से मस नहीं हुई तो अंत में झल्लाकर कर्मचारी ने कहा ”तो ठीक है, पुराना वाला ताबूत ही रखिए, लेकिन तब हमें मुर्दे के पैर काटने पड़ेंगे. . .“

कोई पचास साल पुराने इस बाजार में अब एकदम नए जमाने का बाजार पूरी तरह से उतर आया है। इस अमेरिकी महादेश में अंतिम-संस्कार का पूरा काम अब अनेक ऐसी ही व्यापारिक कंपनियों के नियंत्रण में है। शव उठाने से लेकर दफनाने की सामग्री बनाने, बेचने, कब्रिस्तान, कर्मकांड, शवदाह, अवशेष के निपटारे यानी देह की सभी अंतिम क्रियाएं ऐसी कंपनियां करती हैं। मामला यहीं पर खत्म नहीं होता। संस्कार के बाद किस दर्जे की शोक सभा करनी है- किस दर्जे की जगह पर करनी है, कितनों को बुलाना है- से लेकर पहली बरसी पर कितनों को खबर करनी है कि फलांजी स्वर्ग से आपको याद करते हैं, तक की सारी जिम्मेदारी अब कंपनियां उठाने तैयार हैं। बस हमें तो सिर्फ मरना भर है। बाकी काम कंपनी का।

लेकिन मुनाफे का गणित बैठाए बिना भला कोई व्यापार में यों उतरेगा? मरघट के व्यापार में कितना मुनाफा जायज मानें? दस प्रतिशत? पच्चीस प्रतिशत? जी नहीं, इस व्यापार में औसत मुनाफा पांच सौ प्रतिशत से भी ज्यादा है! यहां के ‘न्यूयार्क टाईम्स’ नामक एक प्रसिद्ध अखबार ने तीन सितंबर 2002 के अंक में इस विषय पर छपे एक लेख में कहा कि साल भर के दौरान अमेरिका के बीस लाख मृत शरीरों को ठिकाने लगाने के लिए चल पड़े मरघट व्यापार में कंपनियां जितनी रकम वसूलती हैं, वह अमेरिका के 45 लाख विद्यार्थियों की समूची विश्वविद्यालय पढ़ाई के खर्च से ज्यादा है।

कुछ कंपनियां इतनी बड़ी बन गई हैं कि देश तो छोडि़ए, दुनिया के अनेक स्टॉक बाजारों में उनके शेयरों की बोली लगती है। शेयर बाजार में अच्छे दाम के लिए कंपनी के ‘मुनाफे’ का अनुपात चढ़ना जरूरी है। और भला अंत्येष्टि व्यापार में मुनाफे का क्या अर्थ होगा? मरघट के व्यापारी और क्या चाहेंगे सिवाय इसके कि अधिक से अधिक लोग मरें ताकि व्यापार बढ़े, साथ में मुनाफा भी! अमेरिकी प्रशासन के अनुसार अंतिम संस्कार का खर्च जुटाना आज घर बनाने और कार खरीदने के बाद अमेरिकी नागरिक के जीवन का तीसरा बड़ा खर्च है। देश में सालाना औसतन बीस लाख लोग मरते हैं और मरघट-व्यापारियों का औसत मुनाफा तीस अरब डालर से ज्यादा है। इस प्रकार औसत अंतिम संस्कार का खर्च दस हजार डालर से ज्यादा बैठता है। खर्चीले लोगों के लिए तो यह कई गुना ज्यादा ठहरेगा। उनकी तो बात ही अभी छोड़ें।

कोई सौ बरस पहले तक ऐसा नहीं था। अमेरिकी जनमानस पर बाजार की जकड़ के साथ ज्यों-ज्यों अस्पतालों, मोक्ष-गृहों, वृद्धाश्रमों और अंत्येष्टि-व्यापार का फैलाव हुआ, मरण और मृत्यु सामाजिक न रह कर एकाकी, नितांत व्यक्तिगत घटना बनती गई। आज मरणशील व्यक्ति को अस्पतालों, मोक्ष-गृहों अथवा नर्सिंग होम में भेज देने का रिवाज है। आंकड़े के आधार पर कहा जा सकता है कि पिछले करीब सौ सालों के दौरान अपने चिर-परिचित घर में अपने परिवार जनों, मित्रों के बीच प्राण त्यागने वाले अमेरिकीयों की संख्या लगातार घटी है। परिजनों से दूर अस्पतालों, मोक्षगृहों, वृद्धाश्रमों में अजनबी डाक्टरों, नर्सों, परिचारकों के बीच प्राण त्यागने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

देह की सभी अंतिम क्रियाएं ऐसी कंपनियां करती हैं। मामला यहीं पर खत्म नहीं होता। संस्कार के बाद किस दर्जे की शोक सभा करनी है, किस दर्जे की जगह पर करनी है, कितनों को बुलाना है- से लेकर पहली बरसी पर कितनों को खबर करनी है कि फलांजी स्वर्ग से आपको याद करते हैं, तक की सारी जिम्मेदारी अब कंपनियां उठाने तैयार हैं। बस हमें तो सिर्फ मरना भर है। बाकी काम कंपनी का।

कमोबेश यही स्थिति मृतक के अंतिम संस्कार की भी है। इस संवेदनशील घटना को सौ साल पहले तक लोग पड़ोसियों, रिश्तेदारों, मित्रों की मदद से खुद ही संभाल लिया करते थे। अब यह काम कंपनियों के कारिंदे व कर्मचारी करते हैं। अंतिम संस्कार एक ऐसी क्रिया है, जिसमें दोस्त, मित्र, रिश्तेदार, पड़ोसी मृतक को आदर देने के भाव से सम्मिलित होते हैं। इससे सहयोग तो होता ही है, शोकाकुल परिजनों का शोक भी बंट जाता है। समाज ने असंख्य पीढि़यों के अनुभव के आधार पर नितांत निजी शोक को सार्वजनिक ढंग से बांट कर हल्का कर लेने की पद्धति विकसित की थी। लेकिन अब तो वह पिछड़े देशों की पुरानी बात हुई। नए, आधुनिक और विकसित अमेरिका में अंतिम संस्कार परिवार के हाथ से छीन कर बाजार के हाथों में सोंप दिया गया है। आज पूरा का पूरा व्यापार बन चुका है।

मृत्यु के बारे में यह रहस्यमय प्रश्न सदैव उठा है कि हम क्यों मरते हैं? हालांकि यह प्रश्न निर्णायक तरीके से अब भी हल नहीं हुआ है, पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि शरीर की कोशिकाओं में ही ‘आत्मघात’ की अनुवांशिकी रहती है। यानी कोशिकाओं की संरचना ही ऐसी है कि अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद वे स्वयमेव नष्ट हो जाती हैं। यह एक प्रकार की हाराकीरी है। अभी यह पता नहीं चल पाया है कि हमारी अनुवांशिकी में यह बात कहां से कैसे और क्यों घुस आई। लेकिन यह है इसलिए ही हम, हमारी देह अमर नहीं है और इसीलिए यह संसार चल रहा है! माटी का चोला अंततः माटी में मिल जाता है।

सन् 2050 तक अमेरिका में 65 से ज्यादा उम्र वाले नागरिकों की संख्या दस करोड़ से ज्यादा हो जाएगी और इस आयुवर्ग में मृत्यु दर 80 प्रतिशत यानी 8 करोड़ छू लेगी। मृत्यु व्यापार में लगी कंपनियां इसे अपना स्वर्णयुग मानकर अभी से इसके स्वागत की तैयारी में लग गई हैं!

नितांत घरेलू और उसी हद तक एकदम सार्वजनिक इस प्रसंग को व्यापार बनाने का काम इंग्लैंड में शुरू हुआ था। सन् 1675 में लंदन के एक व्यापारी ने इस बारे में पहला विज्ञापन तैयार किया था जो देखते-देखते खूब चल निकला। परिणामतः कुछ ही समय के भीतर अनेक नए उद्यमी मैदान में उतर आए। सन् 1689 में रसेल नाम के एक व्यापारी को राजघराने से संबंधित मृतकों के अंतिम संस्कार के प्रबंध का एकाधिकार मिला। अगले पांच-दस सालों के दौरान ताबूत बनाने वाले, शोक सभाएं आयोजित करने वाले, अंतिम संस्कार का सामान बेचने वाले व्यापारियों की अच्छी खासी फौज खड़ी हो गई। उसके बाद बर्फ बनाने के कारखाने लगे, शव लाने, ले जाने वाली घोड़ागाड़ी, कोचवान, कब्र खोदने वाले अनेक व्यापारी अस्तित्व में आते चले गए।

जब अंग्रेजों ने अमेरिका में अपना उपनिवेश बसाया तो उनके साथ यह व्यवस्था भी यहां आ पहुंची। अलबत्ता यहां नई बात यह हुई कि ‘अंडरटेकर’ अर्थात मुर्दे को नहलाने-धुलाने, कब्र तक पहुंचाने वाले लोगों ने चतुराई और व्यावहारिक दूरदर्शिता दिखाते हुए ‘लेपन’ क्रिया को भी अपने व्यापार में शामिल कर लिया।

इसके पीछे एक विशेष कारण था। अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान बहादुर सिपाही या अधिकारी का शव अपने पक्ष के उत्साहवर्धन के लिए गांव-गांव ले जाया जाता था। उसके लिए शव को कुछ समय तक सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई। इस काम में गृहयुद्ध के दोनों पक्ष काफी रकम अदा करने को उत्सुक रहते थे। इस काम मं् छिपे मुनाफे को देख सन् 1883 तक इस काम के लिए अनेक व्यापारी सक्रिय हो चुके थे। ताबूत बनाने वाले लोग भी अपना पूरा ध्यान लेपन यानी शव को कुछ दिन सुरक्षित रखने की कला पर लगाने लगे।

मृत्यु ने एक नए व्यापार को जिंदा कर दिया। मुनाफे की गुंजाइश भांप कर पिछली सदी के आरंभ में कई कंपनियां अंत्येष्टि के व्यापार में उतरने लगीं। ऐसी पहली बड़ी कंपनी का नाम थाः सर्विस कारपोरेशन इंटरनेशनल। अमेरिका और कनाडा के अंत्येष्टि व्यापार का करीब एक चैथाई हिस्सा आज भी इसी कंपनी के हाथ में है। इस देश में अंत्येष्टि केंद्रों की संख्या 23 हजार से कुछ ज्यादा है।

मृत्यु ने एक नए व्यापार को जिंदा कर दिया। मुनाफे की गुंजाइश भांप कर पिछली सदी के आरंभ में कई कंपनियां अंत्येष्टि के व्यापार में उतरने लगीं। ऐसी पहली बड़ी कंपनी का नाम थाः सर्विस कारपोरेशन इंटरनेशनल। अमेरिका और कनाडा के अंत्येष्टि व्यापार का करीब एक चैथाई हिस्सा आज भी इसी कंपनी के हाथ में है। इस देश में अंत्येष्टि केंद्रों की संख्या 23 हजार से कुछ ज्यादा है। इस हिसाब से देखें तो अमेरिका में पांच में एक अंत्येष्टि इसी कंपनी के हिस्से आती है। इस कंपनी का व्यापार अब अमेरिका से निकल कर पांचों महाद्वीपों में फैल गया है। पिछले साल इसका शुद्ध मुनाफा आठ अरब डालर से ज्यादा था। अब चीन में भी यह व्यापार तेजी से पैर जमा रहा है। उस देश में हर साल 70 लाख लोग मरते हैं। ऐसे में मृत्यु के व्यापारी के मुंह से लार टपकना अनिवार्य है। अंत्येष्टि व्यापार का बड़ा हिस्सा कब्रिस्तान-व्यापार होता है। इस देश में हर परिवार को शव दफनाने के लिए जमीन खरीदनी पड़ती है। कहीं-कहीं सार्वजनिक कब्रिस्तान भी हैं, पर उनकी उपलब्धता बेहद अपर्याप्त है। कब्रिस्तान वाली कंपनियों ने स्थानीय प्रशासनों से हजारों, लाखों एकड़ जमीन कौडि़यों के मोल खरीद रखी है। जैसे जिंदा रहते हुए मकानों के प्लाट कटते हैं, उसी तरह मरने पर कब्र के लिए प्लाट काट कर महंगे दाम पर लोगों को बेचे जाते हैं।मृत्यु पर किसी का जोर नहीं। इसलिए मरघट और अंत्येष्टि-व्यापार में हमेशा पौ-बारह रहने वाली है। खराब अर्थव्यवस्था में भी इन कंपनियों का मुनाफा कम नहीं हो सकता। सरकारी अनुमानों से पता चलता है कि सन् 2050 तक अमेरिका में 65 से ज्यादा उम्र वाले नागरिकों की संख्या दस करोड़ से ज्यादा हो जाएगी और इस आयुवर्ग में मृत्यु दर 80 प्रतिशत यानी 8 करोड़ छू लेगी। मृत्यु व्यापार में लगी कंपनियां इसे अपना स्वर्णयुग मानकर अभी से इसके स्वागत की तैयारी में लग गई हैं!

तब की तब से। आज की नई चलती चीज तो है- ग्रीन, प्राकृतिक अंत्येष्टि। सब जगह हर्बल, जड़ी-बूटी आ गई जिंदगी में तो मृत्यु में कैसे पीछे रहे यह सब। इसी तरह ‘जेंडर’ शब्द भी इस धंधे में चल निकला है। कई स्थानों पर सिर्फ पुरुषों या सिर्फ महिलाओं के मुर्दाघर हैं। यहां सभी कर्मचारी महिला हैं और उनका मुर्दाघर उन महिलाओं की सेवा के लिए खासतौर पर बनाया गया है, जो नहीं चाहती थीं कि मृत्यु के बाद उनके शव को कोई पुरुष हाथ लगाए।

कई मुर्दाघर पुलिस के वायरलैस संदेश सुनने वाले उपकरणों से लैस रहते हैं। कानून के अनुसार देश में कहीं भी मृत्यु होने पर तुरंत पुलिस को सूचना देनी होती है। मृत्यु की सूचना पाते ही पुलिस तंत्र अपने वायरलैस से क्षेत्रीय मुख्यालय को सूचना भेजता है। मुर्दाघर ऐसे वायरलैस संदेश पकड़ लेते हैं और तुरंत अपने हरकारे को मौत वाली जगह भेज देते हैं। अक्सर ये लोग पुलिस के वहां पहुंचने से पहले ही पहुंच जाते हैं।

यहां की अदालतों में कई बार ऐसे मुकदमें भी आए हैं, जिनमें अंत्येष्टि व्यापारियों ने एक-दूसरे पर एकाधिकार और अस्पतालों, डाक्टरों, नर्सों, मोक्षगृहों के अधिकारियों, कर्मचारियों को रिश्वत खिलाकर अपना व्यापार बढ़ाने के आरोप लगाए हैं। यह भी आरोप है कि अंत्येष्टि व्यापारी एम्बुलेंस कर्मचारियों की जेबें गर्म किए रहते हैं, जिससे उन्हें मृत्यु की सूचना तुरत-फुरत मिल जाए।

यहां की अदालतों में कई बार ऐसे मुकदमें भी आए हैं, जिनमें अंत्येष्टि व्यापारियों ने एक-दूसरे पर एकाधिकार और अस्पतालों, डाक्टरों, नर्सों, मोक्षगृहों के अधिकारियों, कर्मचारियों को रिश्वत खिलाकर अपना व्यापार बढ़ाने के आरोप लगाए हैं। यह भी आरोप है कि अंत्येष्टि व्यापारी एम्बुलेंस कर्मचारियों की जेबें गर्म किए रहते हैं, जिससे उन्हें मृत्यु की सूचना तुरत-फुरत मिल जाए। पैसे के लोभ में हमारी सहज संवेदनाएं कितने नीचे गिर सकती हैं, इसके कई उदाहरण यहां रोज मरघटों में दबाए, दफनाए जाते हैं। बाजार में दुकानों में जाकर हम, आप वस्तु की अच्छाई, बुराई, दाम आदि की तुलना कर लेते हैं। वस्तु मंहगी लगती है तो हमारे पास यह विकल्प भी है कि चलो अभी ही खरीदना जरूरी नहीं। पर मृत्यु के दुखद प्रसंग में यह सुविधा नहीं रहती। जो भी फैसला लेना है, तुरंत लेना है। मिट्टी को घर में रखा नहीं जा सकता। इसलिए मुर्दाघरों की निगाह मृतक के परिवार की जेब पर रहती है। इस देश में अधिकांश लोग अपने अंतिम संस्कार के लिए बीमा खरीद रखते हैं। मुर्दाघर संचालक यह जानने को उत्सुक रहते कि मृतक के पास बीमा था या नहीं? परंतु इसे सीधे-सीधे कैसे पूछे? वह कहेगा कि बिल क्या सीधे बीमा कंपनी को भेज देना है? इस प्रश्न के जवाब में पता चलेगा ही कि मृतक का बीमा था या नहीं। कुछ कंपनियां, नगरपालिकाएं भी अपने कर्मचारियों की मृत्यु पर अंतिम संस्कार का कुछ खर्च देती हैं। मुर्दाघर संचालक को पता चल गया है कि अंतिम संस्कार के लिए कोई निधि अलग रखी है। अब उसे खसोट लेना कठिन नहीं है।

यह पुस्तक ‘द अमेरिकन वे आफ डेथ’ सन् 1963 में प्रकाशित हुई थी। 1996 में लेखिका ने पुस्तक का परिवर्धित संस्करण ‘द अमेरिकन वे आफ डेथ-रीविजिटेड’ प्रकाशित किया। मूल पुस्तक के आमुख में उन्होंने पुस्तक का उद्देश्य अंतिम संस्कार व्यापार में मुनाफाखोरी का भंडाफोड़ करना बताया था। परिवर्धित संस्करण की भूमिका में उन्होंने कहा था कि सन् 1963 के बाद से इस व्यापार के हथकंडों में कोई बदलाव नहीं आया है। हां, सेवाओं के दाम जरूर बढ़ गए हैं।

अमेरिकी जनता ने पुस्तक और इस भंडाफोड़ का तहे दिल से स्वागत किया था। इसका प्रमाण है कि सन् 1963 में लोगों ने स्वयं संगठित होकर इसके विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन शुरू किया। नाम था ‘आडम्बरहीन अंत्येष्टि’। इस अभियान के शपथ पत्र पर देखते-देखते कोई सत्रह हजार लोगों ने हस्ताक्षर किए। साल भर में ऐसे लोगों की संख्या पंद्रह लाख पार कर चुकी थी।

व्यावसायिक अखबारों, रेडियो, टीवी व कुछ कट्टरपंथी राजनीतिक नेताओं ने पुस्तक और लेखिका के बारे में कई अफवाहें फैलाईं। उस समय अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा में कैलीफोर्निया का प्रतिनिधित्व करने वाले रिपब्लिकन जेम्स उट ने प्रतिनिधि सभा में दो पेज का अपना बयान पढ़ा ताकि पुस्तक व लेखिका के प्रति आलोचना, निंदा अमेरिका के संसदीय इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो जाए। उन्होंने कहा, ‘जेसिका मिटफोर्ड कम्युनिस्ट हैं और उसी कारण उसने हमारे धर्म की निंदा में यह किताब लिखी है। मैं मरते दम तक किसी कम्युनिस्ट देश की धरती पर कदम नहीं रखूंगा...।’ पर इस पुस्तक ने देश के प्रबुद्ध मानस को झकझोर दिया था। एक परिणाम यह हुआ कि अमेरिकी संसद को अनेक प्रचलित कानून रद्द करने पड़े, अनेक नए कानून बनाने पड़े। यह क्रम अभी भी चल रहा है। 1998 में लागू हुए एक कानून के तहत मुर्दाघर संचालकों के लिए गलत बयानी करना बंद हुआ।

अमेरिकी जनता ने पुस्तक और इस भंडाफोड़ का तहे दिल से स्वागत किया था। इसका प्रमाण है कि सन् 1963 में लोगों ने स्वयं संगठित होकर इसके विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन शुरू किया। नाम था ‘आडम्बरहीन अंत्येष्टि’। इस अभियान के शपथ पत्रा पर देखते-देखते कोई सत्राह हजार लोगों ने हस्ताक्षर किए। साल भर में ऐसे लोगों की संख्या पंद्रह लाख पार कर चुकी थी। उधर देश में दफन की जगह शव दाह की वसीयत करने वाले अमेरिकीयों का प्रतिशत भी बढ़ कर पचास पार कर गया। कुछ प्रांतों में अब यह साठ से भी ज्यादा और कुछ में पचहत्तर प्रतिशत तक हो चुका है।

संस्कार की पद्धति में बदलाव का असर बाजार पर पड़ेगा ही। इसलिए अब बाजार ने इससे निपटने के लिए एक नया मोर्चा खोल लिया है: पहले-पहल तो ईसाई व्यक्ति के लिए दाह संस्कार ‘निषिद्ध’ बताया गया। लेकिन लोगों की जिद पर उसे कुछ-कुछ स्वीकार किया जाने लगा, पर उसमें भी लेपन और अंतिम दर्शन जैसी बातें जोड़ कर। यह रणनीति बड़े सोच-विचार के बाद बनाई गई और लेखक ने अंत्येष्टि व्यापारियों के संगठन के अध्यक्ष के हवाले से कहा कि लोगों को अंतिम दर्शन आदि के लिए राजी करने के उपायों की सफलता 300 प्रतिशत बढ़ी। इसके बाद ग्राहक को ताबूत बेचने यानी शरीर को ताबूत में रखकर दाह के लिए बिजली की भट्ठी में डालने को राजी करने का उपाय भी हुआ। उसमें 600 प्रतिशत सफलता दर्ज की गई। इस तरह चलो ताबूतों की बिक्री तो जारी रही।

बात यहीं नहीं रुकती। शवदाह के बाद राख को रखने वाले बर्तन, राख को पानी या जंगल में विसर्जित करने के नाम पर ग्राहकों से और पैसा वसूला जाने लगा है। इन सबके बाद भी दाह संस्कार का चलन बढ़ रहा है और मृत्यु के दुखद प्रसंग में बाजार के बढ़ते प्रवेश पर थोड़ी रुकावट भी आ ही रही है।

इस विचित्र विषय को समेटते हुए इतना ही कहा ही जा सकता है कि परिजनों के अंतिम संस्कार में लालची कंपनियों के दखल से, मरघट में जिंदा हो चुके बाजार से अपना देश भारत अभी तक बचा हुआ है। पर बकरे की मां भला कब तक खैर मनाएगी?

लेखक अमेरिका में रहते हैं और गांधी-मार्ग व गांधी विचार के प्रचार-प्रसार के प्रति समर्पित हैं। यह आलेख जेसिका मिटफोर्ड की पुस्तक ‘द अमेरिकन वे ऑफ डेथ’, डाक्टर कीनिथ ईसरसन की पुस्तक ‘फ्राम डेथ टु डस्ट’ और लेखक की अपनी खोजबीन पर आधारित है।

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