पारा बनता आबो हवा का जहर

Submitted by Hindi on Tue, 09/06/2011 - 16:15
Source
वीर अर्जुन, 26 जुन 2011

आम आदमी के साथ एक समस्या यह भी है कि वह जीवनशैली में तमाम आधुनिक उपकरणों और उत्पादों का तो इस्तेमाल करना चाहता है लेकिन वह इनके इस्तेमाल के तरीके को लेकर कतई आधुनिक रवैया नहीं अपनाता जिस कारण जीवनशैली भले आधुनिक हो जाए लेकिन सोच का नजरिया वही पुरातनपंथी ही रहता है।

एक तरफ राजधानी दिल्ली हर गुजरते दिन के साथ वर्ल्ड क्लास शहर में तब्दील हो रही है। दूसरी तरफ यहां की आबो हवा लगातार सेहत के लिए खतरनाक होती जा रही है। दिल्ली की आबोहवा में अब नया संकट बढ़ते पारे का है। पारा यानी मरकरी न सिर्फ हमें बीमार कर रहा है बल्कि हमारे तंत्रिका तंत्र पर भी असर डाल रहा है। टॉक्सिक लिंक के एक अध्ययन के मुताबिक दिल्ली की आबोहवा में पारे की मात्रा खतरे के निशान से ज्यादा बढ़ गई है। दरअसल स्वास्थ्य सम्बंधी क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न उपकरणों में हर साल 26 टन से ज्यादा पारा या मरकरी इस्तेमाल होता है जिन विशेष उपकरणों व उत्पादों में यह इस्तेमाल होता है उसमें थर्मामीटर, बैटरी,स्फाइगमोमैनोमीटर, ट्यूबलाइट, बैरोमीटर, फ्लोरोसेंट लाइट और पेंट्स आदि हैं। इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह दिमाग को सुन्न कर देता है और सबसे पहले हमारी सोचने समझने की क्षमता पर प्रहार करता है।

सवाल है दिल्ली की आबो हवा में यह जहरीला पदार्थ आ कहां से रहा है और क्यों आ रहा है? दरअसल हमारी आधुनिक जीवनशैली में इस्तेमाल होने वाले तमाम उपकरण ऐसे हैं जिनमें पारे का इस्तेमाल होता है। चाहे फिर रोजमर्रा के तमाम इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली बैटरी हो या सोने के तमाम उत्पाद। गौरतलब है कि कम्प्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में सोने और चांदी का अच्छा खासा इस्तेमाल हो रहा है। इन धातुओं में भी मरकरी मौजूद होता है। इसके अलावा सीमेंट के उत्पादों और विभिन्न किस्म के मेडिकल डिसपोजल्स भी हवा में पारा की मौजूदगी का एक बड़ा कारण हैं।

लेकिन सबसे बड़ा कारण जिसके चलते दिल्ली वालों की सेहत पर खतरा मंडरा रहा है, वह है पारे का सही तरीके से संग्रहण नहीं करना। पारा की मौजूदगी वाले तमाम उत्पादों, उपकरणों का अगर सही तरीके से भंडारण न किया जाए तो इससे पारा रिसकर वातावरण में शामिल होता है। हालांकि दिल्ली में वर्ष 2010 में अस्पतालों को यह फरमान जारी किया गया कि जिन उपकरणों में पारे का प्रयोग होता है, उनका इस्तेमाल न करें और इस्तेमाल करें भी तो उसके संग्रहण को पुख्ता और खतरा मुक्त बनाएं। दिल्ली में जितना पारा हवा में मौजूद है उसमें 31… का उत्सर्जन थर्मामीटर द्वारा होता है। थर्मामीटर को अगर सही तरीके से रखा जाए तो इस तरह के खतरे से बचा जा सकता है, लेकिन लापरवाही के चलते ऐसा नहीं हो रहा।

सेहत के लिए खतरा बन चुके मरकरी की हवा में इस कदर मौजूदगी का एक बड़ा कारण सरकार का इस सम्बंध में ढुलमुल रवैया भी है। सरकार न तो इस सम्बंध में अपने नियमों को सख्त बना रही है और न ही उनके पालन को सुनिश्चित करवा रही है जिस कारण अस्पतालों फिर चाहे वह सरकारी हों या प्राइवेट। उन सबमें इसके स्टोरेज को लेकर लापरवाही का आलम बना रहता है। नतीजतन तमाम थर्मामीटर टूट जाते हैं और पारा हवा में फैला जाता है। जब पारा हवा में पहुंचता है तो यह मिथाइल मरकरी बन जाता है जो सामान्य मरकरी से भी ज्यादा खतरनाक होता है। आमतौर पर मरकरी के भंडारण हेतु राजधानी दिल्ली और देश के दूसरे शहरों में जो पारम्परिक तरीका इस्तेमाल होता है, वह गत्तों और प्लास्टिक के बक्से में इसका स्टोर किया जाना है। कई अस्पतालों में मरकरी को अधिक मात्रा में संग्रहीत करने के लिए कांच की बोतलों का इस्तेमाल होता है। इसकी वजह से भी यह तेजी से हवा में शामिल हो रहा है। मरकरी हमारी सेहत के लिए कई तरह से खतरनाक है। इससे कई तरह की बीमारियाँ पैदा हो रही हैं। लेकिन सबसे खास समस्या तंत्रिका तंत्र और किडनी को होती है। मोटर डिजीज का इससे खतरा बढ़ जाता है जिसके चलते हाथ पैर काम करना बंद कर देते हैं। दिल्ली में देश के कई दूसरे शहरों के मुकाबले किडनी के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। इसकी भी वजह आबो हवा में घुल रहा यही पारा है।

आम आदमी के साथ एक समस्या यह भी है कि वह जीवनशैली में तमाम आधुनिक उपकरणों और उत्पादों का तो इस्तेमाल करना चाहता है लेकिन वह इनके इस्तेमाल के तरीके को लेकर कतई आधुनिक रवैया नहीं अपनाता जिस कारण जीवनशैली भले आधुनिक हो जाए लेकिन सोच का नजरिया वही पुरातनपंथी ही रहता है। इससे सेहत पर जबरदस्त खतरे की स्थितियाँ बन जाती हैं। चूंकि आम आदमी रातों रात वैज्ञानिक नजरिये वाला नहीं हो सकता इसलिए सरकारों को चाहिए कि वह आम लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर निगाह रखे और उनको रोकने के लिए सख्ती का इस्तेमाल करे। अगर दिल्ली और उसी के काम में बंगलूरु व हैदराबाद के वातावरण में हाल के सालों में बढ़ रहे पारे की मात्रा को गम्भीर न समझा गया तो आने वाले समय में थर्मामीटर का पारा हमारा बुखार नहीं बताएगा बल्कि हमारे बुखार का कारण बनेगा।
 

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