सूरज हुआ मद्धम!

Submitted by Hindi on Wed, 09/07/2011 - 12:40
सूर्यसूर्य

क्या हो रहा है सूर्य को? क्या सौर गतिविधियाँ बंद हो रही है?


नयी जानकारियाँ इसी दिशा की ओर संकेत दे रही है कि सौर गतिविधियाँ हमेशा के लिए तो नहीं लेकिन अल्पकाल के लिए बंद हो रही हैं। वर्तमान मे सूर्य सौर गतिविधियाँ के चक्र के चरम(2013) मे पहुंच रहा है और हम सौर गतिविधियों मे वृद्धि देख रहे है, ज्यादा सौर धब्बे, ज्यादा सौर ज्वाला इत्यादि लेकिन यह सौर गतिविधियाँ सामान्य से कम है। इस बात के भी मजबूत संकेत मिले हैं कि सौर गतिविधियाँ का अगला चरम (2022 या पश्चात) और भी कमजोर होगा या यह चरम होगा ही नहीं।

ऐसा क्यों? सूर्य आयोनाइज्ड गैस अर्थात प्लाज्मा की एक विशालकाय गेंद है जिसका काफी जटिल चुंबकीय क्षेत्र है जो इस प्लाज्मा से प्रतिक्रिया करता है। इस चुंबकीय क्षेत्र का बल और गतिविधियाँ 11 वर्ष के चक्र मे चरम अवस्था और निम्न अवस्था प्राप्त करता है। जब यह चक्र अपने निम्न स्तर पर होता है, चुंबकीय क्षेत्र अपने निम्न पर होता है और हम कम सौर धब्बे या शून्य सौर धब्बे देखते है। इस समय अन्य सौर गतिविधियाँ भी अपने निम्न स्तर पर होती हैं। इसके पश्चात 5 वर्ष से कुछ ज्यादा काल मे चक्र अपने चरम पर होता है और सौर गतिविधियाँ अपने चरम पर होती है, हम ज्यादा सौर धब्बे, ज्यादा सौर ज्वाला देखते हैं।

वैज्ञानिक इस सौर चक्र का पिछली एक शताब्दी से निरीक्षण कर रहे हैं। यह जटिल प्रक्रिया है लेकिन तकनीक भी बेहतर होते गयी है, अब मानव को इन गतिविधियों का चक्र कुछ हद तक समझ मे आ गया है। हाल ही की जानकारियों के अनुसार सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र की हलचलें अब शांत हो रही है।

सौर ज्वाला की दो क्रमिक तस्वीरसौर ज्वाला की दो क्रमिक तस्वीरसूर्य पर एक पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली एक गैस की नदी है जो सतह के नीचे बहती है। इसे देखा नहीं जा सकता है लेकिन यह सतह के नीचे बहते हुये एक ध्वनि उत्पन्न करती है, जिससे इसकी उपस्थिति पता चलती है। यह नदी बनती और विलुप्त होते रहती है लेकिन सामान्यतः यह सूर्य के मध्य अक्षांशो पर बनती है और सौर चक्र के साथ सूर्य के विषुवत की ओर विस्थापित होते रहती है। इस नदी के ऊपर सौर धब्बों का निर्माण होता है। सौर धब्बों का अगला चक्र अगले कुछ वर्षों मे प्रारंभ होगा लेकिन इस नदी का निर्माण अब तक प्रारंभ हो जाना चाहिये। अब तक इस नदी के निर्माण के कोई संकेत नहीं मिले है, जिससे वैज्ञानिको को लग रहा है कि अगला सौर चक्र विलंब से प्रारंभ होगा।

वैज्ञानिको के अनुसार चुंबकीय सौर धब्बों की औसत क्षमता भी पिछले वर्षों मे कम हो रही है। सौर धब्बों का निर्माण सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र के सतह के उपर आ जाने से होता है। सामान्यतः सूर्य के आंतरिक भाग से उठने वाली गैस ठंडी होकर वापिस नीचे जाती है, लेकिन चुंबकीय क्षेत्र से प्रतिक्रिया करने के कारण यह ठंडी गैस नीचे नहीं जा पाती है। ठंडी गैस की चमक कम होती है, इसलिये इस ठंडी गैस के क्षेत्र को हम एक गहरे रंग के धब्बे के रूप मे देखते है। (ध्यान दे यह ठंडी गैस भी हजारों डिग्री सेल्सियस का तापमान लिए होती है।)

सौर धब्बे मूलभूत तरीके से चुंबकीय प्रक्रिया से निर्मित होते है, इसलिए चुंबकीय क्षेत्र की क्षमता मे कमी यह दर्शाती है अगला सौर चक्र विलंब से आयेगा या नहीं आयेगा।

सौर धब्बे का एक चित्रसौर धब्बे का एक चित्रसौर चक्र मे विलंब/कमजोर होने का तीसरा प्रमाण भी है। सूर्य का एक वातावरण है जिसे कोरोना (सौर प्रभा) कहते है जो कि अत्याधिक गर्म प्लाज्मा की एक पतली तह के रूप में है। कोरोना भी चुंबकिय क्षेत्र से प्रभावित होता है। हर सौर चक्र मे कोरोना की चुंबकिय गतिविधियाँ सूर्य के विषुवत पर निर्मित होती है तथा धीमे धीमे अगले कुछ वर्षों मे ध्रुवों की ओर बढ़ती है। कोरोना के चुंबकीय क्षेत्रों का ध्रुवों की ओर बढ़ना इस वर्ष (2010-2011) काफी कमजोर है। इसका अर्थ यह है कि 2013 का चरम, सही अर्थों मे चरम नहीं होगा। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अगले चक्र पर इसका क्या परिणाम होगा?

इन सब घटनाओं का पृथ्वी पर तथा मानवों पर क्या परिणाम होगा? यह कहना कठिन है! कुछ अर्थों मे यह एक अच्छी खबर है क्योंकि सूर्य की चरम की गतिविधियों से जो सौर ज्वालायें तथा सौर वायु प्रवाहित होती है उससे हमारे उपग्रह प्रवाहित होते है, विद्युत ग्रीड बंद हो जाती है। कमजोर चक्र मे यह सब नहीं होगा।

लेकिन सत्रहवीं सदी के अंत तथा अठारहवीं सदी के प्रारंभ मे यूरोप मे एक लघु हिमयुग आया था, उस समय भी सूर्य पर सौर धब्बों की संख्या मे कमी आ गयी थी। (उस समय सौर धब्बे की संख्या शुन्य तक जा पहुंची थी)। सौर धब्बो की संख्या और हिम युग के मध्य संबंध अभी तक साफ नहीं है क्योंकि उस समय उत्तर अमरीका मे भी जलवायु संबंधित परेशानियाँ थी लेकिन यूरोप के जैसे नहीं। यूरोप मे सर्दियों ने कहर बरपाया था लेकिन गर्मियों मे गर्मी भी कड़ाके की थी। उस समय इस विषम जलवायु के और भी कारक थे जैसे ज्वालामुखी विस्फोट तथा कमजोर जेट वायु धारायें। जेट वायु धारायें पृथ्वी के ऊपरी वातावरण मे ओजोन के निर्माण से बनती है, उस समय ओजोन का निर्माण कम हुआ था क्योंकि ओजोन सौर वायु के पृथ्वी के वातावरण से क्रिया करने से बनती है। सौर गतिविधियों मे कमी से सौर वायु कम मात्रा मे प्रवाहित हुई थी।

ध्यान दें कि यह सभी संकेत सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र पर लम्बे समय तक के प्रभाव के बारे में कुछ नहीं कह रहे हैं; यह 2013 में सौर गतिविधियों के चरम को कमजोर बता रहे है तथा अगले चरम मे विलंब दर्शा रहे हैं। उसके बाद क्या होगा कोई नहीं जानता है।

इस कमजोर सौर चक्र के द्वारा अगले लघु हिमयुग के आने की संभावना नहीं है लेकिन यह दर्शाता है कि कमजोर सौर गतिविधियों के गंभीर परिणाम हो सकते है, जिसका पुर्वानुमान लगाना कठिन है। यहाँ पर स्पष्ट कर दें कि, ‘वैश्विक जलवायु परिवर्तन(Global Climate Change)’ के लिए सूर्य या सौर गतिविधियाँ उत्तरदायी नहीं हैं। यह गतिविधियाँ वैश्विक जलवायु परिवर्तन को थोड़ी या ज्यादा मात्रा मे प्रभावित कर सकती हैं लेकिन इसके लिये पूर्णतः उत्तरदायी नहीं है। यदि ऐसा होता तो हम जलवायु तथा सौर गतिविधियों के मध्य हर दशक के लिए एक संबंध देखते लेकिन ऐसा नहीं है, जिसका अर्थ है कि, ‘वैश्विक जलवायु परिवर्तन(Global Climate Change)’ के लिए सूर्य उत्तरदायी नहीं है।

मुद्दा यह है कि सूर्य काफी जटिल है और हम हाल मे ही उसके बारे मे कोई पूर्वानुमान लगा पा रहे है। यह पूर्वानुमान भी सही हो जरूरी नहीं है लेकिन इस बार तीन भिन्न-भिन्न प्रमाण है जो संकेत दे रहे है कि सौर चक्र कमजोर है। आशा है कि यह सही हो, मेरी आशा इसलिए नहीं है कि हम एक कमजोर सौर चक्र देखेंगे। मेरी आशा इसलिए है कि हम अपने सबसे समीप के तारे को समझना प्रारंभ करेंगे। जब यह कर पायेंगे तब हम भविष्य में सूर्य के द्वारा की गयी किसी भी विनाशकारी गतिविधि के लिए तैयार रहेंगे!

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