टीपू सुल्तान का मीठा उपहार

Submitted by Hindi on Thu, 09/08/2011 - 16:11
Source
गांधी मार्ग, जुलाई-अगस्त 2011
बहुतों को पता होगा टीपू सुल्तान की तलवार का पूरा किस्सा युद्ध में वह कैसे चमकी, कैसे गुम हुई, चोरी-छिपे कैसे देश से बाहर चली गई और फिर कौन उस अनमोल तलवार का भारी मोल चुका कर उसे गर्व के साथ भारत वापस ले आए। पर बहुत ही कम लोगों को यह पता होगा कि टीपू सुल्तान की एक और धरोहर है जो कि बहुत मधुर है। ये वो आमों की किस्में हैं, जिन्हें टीपू सुल्तान कोई 200 बरस पहले किरगावल गांव में छोड़ गए थे। इस अद्भुत धरोहर का स्वाद चखा रही हैं अपर्णा पल्लवी।

धान के बढ़ते खेतों ने अमराइयों को उजाड़ा। धान बेच कर जो नया पैसा आया, उसने पुराने सुंदर घरों को गिराया। अब लोग पक्के मकान बनाने लगे। सो ईंट की मांग बढ़ी। नए ईंट भट्टे लगने लगे। बची खुची अमराइयां ईंट बनाने में कट गईं। यदि सैयद गनी के खेत में बच रहे दुर्लभ 116 आम वृक्षों को छोड़ दें तो आज किरगावल में सिवाय धान के खेतों के कहीं कुछ बचा ही नहीं है।

जरा कल्पना तो कीजिए ऐसे आम की जो दिखने में सेब जैसा हो या फिर जिसकी महक छोटे चकोतरे जैसी हो या लो ऐसा आम जो सिकुड़ता तो हो लेकिन सड़ता न हो। कर्नाटक के मंड्या जिले के एक किसान यदि इस तरह के अति विशिष्ट आमों का संरक्षण नहीं करते तो ये सब बस गाथा बन जाते। किरगावल गांव के सैयद गनी खान अपने आठ हेक्टेयर के खेतों में रची-बसी हरियाली की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “इन वृक्षों में टीपू सुल्तान के आम के वृक्ष भी हैं।” किरगावल में 18वीं शताब्दी के इस शासक का एक सैन्य केंद्र था। यहां लोगों में यह किस्सा खूब प्रचलित है कि जब टीपू सुल्तान ने अपनी इस सैन्य टुकड़ी को भंग किया तो उन्होंने गांव के भीतर और आसपास की जमीन अपने सैनिकों को दे दी थी। उस जमाने में किरगावल गांव इस पूरे क्षेत्र में अपने सबसे ज्यादा उम्दा आमों के लिए महकता था। बताया जाता है कि यहां आमों की 300 से 400 तरह की बेहतरीन किस्में उगाई जाती थीं।

150 वर्ष पूर्व कृष्णराज सागर बांध बनने के बाद इस इलाके की सारी परिस्थिति में परिवर्तन आना प्रारंभ हो गया। सिंचाई के कारण मोटे अनाजों का स्थान पहले धान ने ले लिया फिर आया नंबर आम के पेड़ों का। धान के बढ़ते खेतों ने अमराइयों को उजाड़ा। धान बेच कर जो नया पैसा आया, उसने पुराने सुंदर घरों को गिराया। अब लोग पक्के मकान बनाने लगे। सो ईंट की मांग बढ़ी। नए ईंट भट्टे लगने लगे। बची खुची अमराइयां ईंट बनाने में कट गईं। यदि सैयद गनी के खेत में बच रहे दुर्लभ 116 आम के वृक्षों को छोड़ दें तो आज किरगावल में सिवाय धान के खेतों के कहीं कुछ बचा ही नहीं है।

34 वर्षीय गनी बताते हैं कि यह जमीन मेरी दादी को विरासत में मिली थी। इस पर खड़ी यह अमराई आम की तरह-तरह की किस्मों से भरी पड़ी थी। वे इन पेड़ों को बचाना चाहती थीं। इनमें से अधिकांश पेड़ 100 से 200 वर्ष तक की उम्र के हैं। दस वर्ष पहले जब गनी के हाथ में यह अमराई आई तो उन्हें ठीक से पता तक नहीं था कि आम के इन दुर्लभ पेड़ों को कैसे संरक्षित किया जाए। परंतु उन्होंने निश्चय किया कि वे कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे। पास में ही खड़े कृषि विज्ञान केंद्र और थोड़ी-सी दूर पर बने कृषि विश्वविद्यालय में पूछताछ का कोई नतीजा नहीं निकला।

फिर सन् 2006 में गनी का संपर्क जैविक खेती करने वाली एक संस्था ‘सहज समृद्ध’ से हुआ। इसके माध्यम से उनकी भेंट कृषि वैज्ञानिक व लेखक देविंदर शर्मा से हुई। उन्होंने सलाह दी कि सबसे पहले तो वे अपनी इन नायाब किस्मों को नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेस, राष्ट्रीय पौध अनुवांशिक संसाधन केन्द्र में पंजीकृत करवा लें।

दो वर्षों के कठोर परिश्रम के बाद उनकी 116 किस्मों का पंजीयन देशज पौधों के रूप में हो गया। उन्होंने अपने खेतों को भी जैविक कृषि में परिवर्तित कर लिया। उनका कहना है कि इससे मेरे धान की खेती को मदद मिली और मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार आया। परंतु उनका मानना है कि इससे आमों की पैदावार में तो कोई बढ़ोत्तरी होती नजर नहीं आ रही है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि इस परिवर्तन से इन वृक्षों की उम्र तो निश्चित ही बढ़ जाएगी।

सहज समृद्ध संस्था की मदद से गनी अपने आम बैंगलुरु में बेचने लगे और कुछ ही समय में ये आम अत्यंत लोकप्रिय हो गए। सहज समृद्ध के जी. श्रीमथी कहते हैं कि हम गनी के आमों की मांग की आधी पूर्ति भी नहीं कर पाते। इनके आम की एक किस्म है ‘फरहा’ जो कि अपने स्वाद और गूदे में अलफांसो या हापुस के बराबर है। यह ग्राहकों में बहुत लोकप्रिय है।

दादी की मृत्यु के साथ ही अनेक आमों के स्थानीय नाम भी लुप्त हो गए हैं लेकिन गनी को अभी भी कुछ के नाम याद हैं। वे बताते हैं कि मौसम्बी की तरह की महक वाला आम ‘मौसम्बी’ ही कहलाता है। इसी तरह सेब की तरह दिखने वाला आम ‘सेब आम’ नहीं होगा तो भला और क्या होगा। कुछ अन्य किस्में हैं ‘मोती का आम’, ‘आटे का आम’ ‘मीठे मियां पसंद’ और ‘नन्हें मियां पसंद’। यहां एक किस्म ऐसी भी है जो कि धीरे-धीरे नरम होती है, आकार में थोड़ी सिकुड़ती भी है और पूरा पक जाने के बाद मानों थोड़ा ठहर जाती है। फिर तो उसे 15-20 दिन रखा जा सकता है। गनी अपने जिन पुराने आमों के नाम भूल गए, उन्हें उन्होंने अपने नए मित्रों के नाम से पुकारना शुरू कर दिया है। ये वे मित्र हैं जिन्होंने इन दुर्लभ आमों का पंजीयन करवाने में उनकी मदद की थी। एक आम ‘सहज समृद्ध’ के निदेशक जी. कृष्णा प्रसाद के नाम पर भी है।

गनी का कहना है अब बात फैल गई है। कई अन्य किसान भी मेरी किस्में विकसित करना चाहते हैं। बैंगलुरु के भारतीय उद्यानिकी शोध संस्थान ने भी इसके पौधों की मांग की है। शोध संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक एम.आर. दिनेश का कहना है कि ये किस्में हमारी बहुमूल्य विरासत हैं। हमने इनमें से चार का विश्लेषण किया और गनी द्वारा बताई गई विशेषताओं को उनमें पाया है। उदाहरण के लिए एक आम का स्वाद वास्तव में मीठे नींबू जैसा ही है। भारतीय उद्यानिकी शोध संस्थान की योजना है कि ऐसी और अधिक किस्मों पर विस्तार से काम किया जाए। ये तो हुई वैज्ञानिकों की बात। किसानों की राय? सभी किसानों की रुचि आम में नहीं है, वे आज भी धान को सर्वश्रेष्ठ फसल मानते हैं। पैसा जो मिलता है उससे। गनी उदास होकर कहते हैं, “मेरे गांव में अभी लोगों के खेतों में 15-20 पुराने पेड़ जिंदा हैं। परंतु उनकी ओर वैसा ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जैसा कि देना चाहिए था।”

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