यायावर बादल और विज्ञान का भ्रम

Submitted by Hindi on Fri, 09/09/2011 - 12:35
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

अपने खेतों के जरिए मैंने कर दिखलाया कि प्राकृतिक कृषि के जरिए भी उतनी ही पैदावार ली जा सकती है जितनी आधुनिक वैज्ञानिक विधियों की मदद से ली जाती है। यदि बिना सक्रिय काम किए खेती के नतीजे वैज्ञानिक कृषि के जैसे ही रहते हैं और श्रम तथा संसाधन पर भी निवेश नाम-मात्र का ही होता है, तो फिर वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी से आखिर क्या फायदा है?

आज सुबह-सुबह मैं नदी में संतरे के बक्सों को धो रहा हूं। जैसे ही मैं एक चपटी सी चट्टान पर झुकता हूं, इस शरद ऋतु में नदी की ठंडक महसूस करता हूं। शरद के नीले आसमान की पृष्ठभूमि में सूमाक वृक्ष की लाल पत्तियां निगाहों के सामने उभरती हैं। आकाश के सामने शाखाओं के झूलने से जो यह भव्य दृश्य अचानक दिखता है वह मुझे आत्मविभोर कर देता है। इस अकस्मात दृश्य में ही अनुभवों का एक पूरा संसार मौजूद है। बहते पानी के साथ समय का बहाव है, दाहिना किनारा है, बांया भी है, धूप भी है और छांव भी, लाल पत्तियां हैं तो नीला आसमान है। प्रकृति के इस मौन पवित्र किताब में सभी कुछ निहित है और मानव उसमें एक सोचने समझने वाले सरकंडे की तरह खड़ा है।

जैसे ही यह सवाल करता है कि प्रकृति क्या है? तो उसे यह भी पूछना चाहिए कि वह ‘क्या’ क्या है, तथा क्या है वह मानव भी जो पूछता है कि ‘क्या’ है? यानी वह इसके साथ ही प्रश्नों की एक अनंत दुनिया में प्रवेश कर जाता है।

उसे कौतुहल से किस चीज ने भर दिया है या उसे जो चीज चौंका गई है वह क्या है, इसकी स्पष्ट समझ पाने की कोशिश करते हुए, उसके सामने दो रास्ते संभव होते हैं। पहला तो यह कि वह खुद अपने भीतर, उस व्यक्ति के भीतर झांके जो यह सवाल पूछ रहा है कि, ‘प्रकृति क्या है?’

दूसरा रास्ता यह है कि वह मनुष्य से अलग प्रकृति की पड़ताल करें।

पहला रास्ता उसे दर्शन और धर्म की दुनिया में ले जाता है। बगैर सोचे-समझे देखने पर यह लगना अ-स्वाभाविक नहीं है कि, पानी ऊपर से नीचे की तरफ बह रहा है, लेकिन यदि उसे ऐसा नजर आता है कि, पानी स्थिर है और वहां बना पुल उसके पास से गुजर रहा है तो वह भी गलत नहीं होगा।

दूसरी तरफ, दूसरे रास्ते पर चलते हुए यदि इस दृश्य को हम टुकड़ों-टुकड़ों में प्रकृति के विभिन्न व्यापारों, यानी पानी की गति, लहरों, हवा तथा सफेद बादलों में बांट दे, तो वे सब परीक्षण की वस्तु बन, उन नये-नये सवालों में बदलते जाएंगे, जो हर दिशा में अनंतरूप से फैलते चले जाएंगे। यह रास्ता विज्ञान का है।पहले दुनिया बड़ी सहज हुआ करती थी। उपवनों से गुजरते हुए ओस की बूंदों से आप भीग गए हैं, इस बात की तरफ आप का सिर्फ ध्यान यों ही चला जाता था। मगर उस क्षण से ही, जब लोगों ने ओस की बूंद की वैज्ञानिक व्याख्या करने का उपक्रम शुरू किया, उन्होंने खुद को बुद्धि के बेइंतहा नर्क में झोंक दिया है।

पानी के अणु, ऑक्सीजन और हाईड्रोजन के परमाणु से बने हैं। पहले लोग सोचते थे कि पदार्थ का सबसे छोटा कण अणु होता है, बाद में उन्हें पता चला कि परमाणु के भीतर भी एक नाभि होती है और अब पता चला कि उस नाभि में भी कुछ और छोटे-छोटे हिस्से होते हैं। इन नाभिकीय कणों की भी सैकड़ों भिन्न-भिन्न किस्में होती हैं और कोई नहीं जानता कि, इस सूक्ष्म दुनिया की पड़ताल कहां जाकर रुकेगी।

कहा जाता है कि परमाणु के भीतर जिस तरह के इलेक्ट्रान अति तीव्र गति से घूमते हैं, वह ठीक वैसे ही है जैसे आकाशगंगा में धूमकेतुओं की होती है। परमाणु भौतिकविद् के लिए तो सूक्ष्म कण की दुनिया भी उतनी ही विस्तृत है जितना ही खुद ब्रहमाण्ड है। इसके बाद हमें यह भी बतलाया गया है कि, जिस आकाशगंगा में हम रहते हैं उसके अलावा भी असंख्य आकाशगंगाएं हैं। तो, खगोलशास्त्री के लिए तो हमारी अपनी पूरी आकाशगंगा भी आकार में बहुत ही छोटी हो जाती है।

सच बात तो यह है कि - वे लोग, जो सोचते हैं कि जल की एक बूंद बिल्कुल सहज सी चीज है या चट्टान अपनी जगह पर जमी हुई स्थिर चीज है तो, वे अज्ञानी, लेकिन सुखी मूर्ख हैं और वह वैज्ञानिक जो जानता है कि पानी की एक बूंद में पूरा विश्व निहित है, तथा जड़ नजर आने वाली चट्टान भी वास्तव में रॉकेटों की गति से चलने वाले मूल-कणों की सक्रिय दुनिया है, जरा होशियार किस्म का मूर्ख है। सहजभाव से देखें तो यह दुनिया वास्तविक और सुलभ है, लेकिन उसकी जटिलता के साथ उसे देखें तो वह भयावह ढंग से अमूर्त तथा दूर प्रतीत होगी।

अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा चांद से लाए गए पत्थरों को देखकर हर्षित हुए वैज्ञानिकों की जानकारी भी चांद के बारे में उतनी ही है, जितनी उन बच्चों की जो गाते हैं, ‘चंदामामा तुम्हारी उम्र कितनी है?’ निस्तब्ध सरोवर की पूर्णिमा में चंद्रमा का प्रतिबिम्ब देखते हुए कवि बाशो प्रकृति के चमत्कार को कुछ हद तक समझ पाया था। अपने अंतरिक्ष-जूतों से चांद की सतह को रौंदते हुए अंतरिक्ष विज्ञानियों ने मात्र यही किया है, उन्होंने लाखों-करोड़ों प्रेमियों और बच्चों के मन में चांद की जो पवित्र व भव्य छवि थी, उसे थोड़ा कलंकित कर दिया है और जो लोग सोचते हैं कि, विज्ञान मानव के लिए बड़ा भारी वरदान है उसका क्या कारण है?

पहले इसी गांव में हाथ से घुमाए जाने वाली पत्थर की चक्की से अनाज पीसा जाता था। बाद में नदी के प्रवाह का उपयोग करने वाली पनचक्की बनी, जिसकी गति पत्थर की चक्की से कहीं ज्यादा थी। फिर कुछ बरस पहले पनबिजली पैदा करने के लिए एक बांध बांधा गया और उस बिजली से बिजली की चक्की बनाई गई।

आप क्या सोचते हैं, यह प्रगति मानव के हित में क्या काम करती है? चावल को पीस कर आटा बनाने के पहले उसे एकदम सफेद-चिट्टा बनाने के लिए पॉलिश किया जाता है। इसका मतलब होता है दाने को झटकारकर उसके जीवाणु और चोकर को, जो कि अच्छे स्वास्थ्य के आधार होते हैं, उससे अलगकर बचे-खुचे को संजोया जाता है और इस उच्च ‘तकनीक’ का नतीजा यह है कि पूरे, संपूर्ण अनाज के दाने को अलग-अलग चीजों में बदल दिया जाता है। यदि बहुत ही आसानी से पच जाने वाले सफेद चावल को हम अपना प्रमुख आहार बना लेते हैं तो उसकी पौष्टिकता घट जाती है और अन्य पूरक आहार जरूरी हो जाते हैं। पनचक्की और आटा चक्कियां जो हमारे पेट और आंतों का काम करने लगी हैं, उससे हमारे शरीर के अंग सुस्त पड़ गए हैं।

यही बात ईंधन के मामले में भी हो रही है। खनिज तेल धरती की गर्भ में पड़े हुए लाखों साल पुराने पौधों के रूपांतरित होने से बनता है। यह पदार्थ मरूस्थलों में खोदकर निकाला जाता है। पाईप लाइन के जरिए बंदरगाहों तक पहुंचाकर जहाजों पर लद कर जापान आता है और वहां शोधन संयंत्रों (रिफायनरी) द्वारा केरोसीन और पेट्रोल में बदलता है।

अब आप किसे अधिक तेज और गर्मी देने वाला ईंधन मानेंगेः केरोसीन को या अपने घर के सामने उग रहे चीड़ और देवदार की सूखी डालियों को?

दोनों ईंधन एक पौधों से ही बने हैं। फर्क यह है कि केरोसीन को यहां तक आने के लिए कई गुना ज्यादा फासला तय किया है।

अब लोग कह रहे हैं कि, जीवाष्म ईंधन भी काफी नहीं है। इसलिए हमें परमाणु ऊर्जा विकसित करनी चाहिए। दुर्लभ यूरेनियम को खोजना, फिर उसे दबाकर रेडियोधर्मी ईंधन में बदलना तथा परमाणु भट्टी में जलाना आपको ज्यादा आसान लगता है या सूखे पत्तों को दियासलाई दिखाकर जलाना। इतनी ही नहीं अंगीठी की आग के बाद सिर्फ राख ही बचती है, जबकि रेडियोधर्मी कूड़े का खतरा कई हजारों साल तक बना रहता है।

यही सिद्धांत खेती पर भी लागू होता है। पानी भरे खेत में आप एक नाजुक और मोटा सा ऐसा पौधा भी उगा सकते हैं जिसे कीड़े और बीमारियाँ आसानी से लग जाती हैं। यदि आप कथित ‘सुधरी हुई’ किस्मों का उपयोग करते हैं तो आपको कीटनाशकों और उर्वरकों का भी सहारा लेना पड़ता है।

दूसरी तरफ यदि आप स्वस्थ्य वातावरण में छोटा और हृष्टपुष्ट पौधा उगाते हैं तो इन रसायनों की जरूरत ही नहीं रह जाती है।

पानी भरे चावल के खेत को हल या ट्रैक्टर से एक बार जोत दीजिए और मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाएगी, मिट्टी की संरचना टूट-फूट जाएगी, तथा फिर वह सख्त और बेजान हो जाएगी। एक बार ऐसा होने के बाद जुताई के द्वारा मिट्टी को पलटना हर साल जरूरी हो जाता है।

लेकिन यदि आप कोई ऐसी विधि अपनाते हैं जिसमें धरती प्राकृतिक रूप से चीजें उगाई जाती हैं, तो हल या जुताई मशीनों की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती।

मिट्टी के भीतर के जैव पदार्थों और सूक्ष्म जीवाणुओं को एक बार जला डालने के बाद, तेजी से क्रियाशील होने वाले उर्वरकों का उपयोग जरूरी हो जाता है। यदि रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है तो चावल का पौधा तेजी से और खूब ऊंचा बढ़ता है। लेकिन उसी तेजी के साथ खरपतवार भी बढ़ती है। तब शाकनाशी (हरबिसाइड्स) का प्रयोग किया जाता है और सोच लिया जाता है कि इससे खूब लाभ होगा।

लेकिन यदि अनाज के साथ बन मेथी भी बो दी जाती है और पौधों का सारा पुआल और बचे जैविक पदार्थ खाद-मिट्टी के रूप में खेत की सतह पर वापस डाल दिए जाते हैं तो आप अच्छी फसलें बगैर शाकनाशियों, रासायनिक उर्वरकों या तैयार की गई खाद के ही ले सकते हैं।

खेती में बहुत कम ऐसी चीजें हैं, जिनके उपयोग को टाला न जा सके। तैयार की हुई खाद, शाकनाशी, कीटनाशक दवाएं, मशीनें सब गैरजरूरी होते हैं लेकिन यदि आप ऐसे हालात पैदा कर दें कि, ये आवश्यक बन जाएं तो आपको विज्ञान की ताकत का सहारा लेना पड़ता है।

अपने खेतों के जरिए मैंने कर दिखलाया कि प्राकृतिक कृषि के जरिए भी उतनी ही पैदावार ली जा सकती है जितनी आधुनिक वैज्ञानिक विधियों की मदद से ली जाती है। यदि बिना सक्रिय काम किए खेती के नतीजे वैज्ञानिक कृषि के जैसे ही रहते हैं और श्रम तथा संसाधन पर भी निवेश नाम-मात्र का ही होता है, तो फिर वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी से आखिर क्या फायदा है?

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