युद्ध और शांति से मुक्त एक गांव

Submitted by Hindi on Fri, 09/09/2011 - 13:23
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

आंधी-तूफान के समय किसी बड़े दरख्त के नीचे खड़े रहने से ज्यादा खतरनाक और कोई अन्य चीज नहीं हो सकती और किसी ‘परमाणु-छतरी’ के नीचे आसरा लेना तो सबसे बड़ी नादानी है, क्योंकि आगामी युद्ध में पहला निशाना इसी छतरी को बनाया जाएगा। इन दिनों हम इस छतरी के नीचे अपने खेत जोत रहे हैं। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि संकट हमारी तरफ बाहर और भीतर दोनों से बढ़ा चला आ रहा है।

सर्प अपने मुंह में एक मेंढक को झपटकर हरी घास में रेंग जाता है। इसे देख एक बालिका चीख पड़ती है। एक निडर लड़का अपनी घृणा की भावना व्यक्त करते हुए सर्प की तरफ एक पत्थर उछाल देता है। अन्य लोग हंस पड़ते हैं। मैं पत्थर उछालने वाले लड़की को तरफ मुड़कर उससे पूछता हूं, ‘तुम्हारे खयाल में, तुम इससे क्या हासिल कर पाओगे?’ बाज सर्प का शिकार करता है। भेड़िया बाज पर हमला करता है और मानव उसे मार कर खुद तपेदिक का शिकार हो मर जाता है। मानव के पार्थिव शरीर में कीटाणु पनपते हैं और न जीवाणुओं की गतिविधियों से जो पोषक तत्व निर्मित होते हैं, उनसे अन्य प्राणी, घास तथा वृक्ष फलते-फूलते हैं। वृक्षों पर फिर कीड़े हमला करते हैं और इन कीड़ों को मेंढक खा जाते हैं। प्राणी, पौधे, सूक्ष्म जीवाणु सभी जीवन-चक्र के अंग हैं। एक उपयुक्त संतुलन बनाए रखते हुए वे प्राकृतिक रूप से नियमित जीवन जीते हैं। लोग चाहें तो इस दुनिया को ताकतवर द्वारा कमजोर पर हावी होने या एक दूसरे को फायदा पहुंचाते हुए सहअस्तित्व का नियम मान सकते हैं। दोनों ही तरह से यह एक ऐसी मनमानी व्याख्या है, जिसमें गर्म हवाएं चलती हैं, ऊंची-ऊंची तरंगे उठती हैं, अव्यवस्था और भ्रम पैदा होते हैं।

प्रौढ़ लोग सोचते हैं कि मेंढक हमारी दया का पात्र है और उसके मरने पर उनके मन में उसके प्रति करूणा तथा सर्प के प्रति तिरस्कार उपजता है। यह भावना हमें स्वाभाविक प्रतिक्रिया लग सकती है। लेकिन क्या वास्तव में यह सब वैसा ही है जैसा हम उसके बारे में सोच रहे हैं। एक युवक बोलाः यदि जीवन को हम एक ऐसी प्रतियोगिता के रूप में देखें, जिसमें ताकतवर, कमजोर को खा जाता है, तो यह धरती विनाश और मारकाट का नर्क ही बन जाती है लेकिन ताकतवर जी सके इसके लिए कमजोर का बलिदान जरूरी है। जीत ताकतवर की ही हो, वही जिंदा रहे, तथा कमजोर मर जाए, यह तो प्रकृति का नियम ही है। लाखों साल का समय बीतने के बाद, इस समय धरती पर जो लोग रह रहे हैं, वे अस्तित्व के संघर्ष में विजयी रहे हैं। आप कह सकते हैं कि योग्यतम का ही टिक पाना यह प्रकृति द्वारा तय की गई नियति है।’

यह दूसरा युवक कहने लगाः ‘हां जीतने वालों को तो यह ऐसा ही लगता है। मेरे हिसाब से तो यह दुनिया सहअस्तित्व और परस्पर लाभ पहुंचाने वाली प्रणाली है। इस खेत में अनाज के पौधों में मेथी, कई किस्मों की घास तथा खरपतवार एक-दूसरे के लिए लाभप्रद जिंदगियां जी रहे हैं। लताएं पेड़ों से लिपट जाती हैं। कई और हैं जो कि वृक्षों के तनों और शाखों के सहारे जीती हैं। फर्न की झाड़ियां ऊंचे दरख्तों के शामियाने के तले रहती हैं। मेंढक, पौधे, कीड़े, छोटे प्राणी, जीवाणु, फफूंद, हर जीव की आवश्यक भूमिका होती है और वे सभी एक-दूसरे के अस्तित्व से लाभान्वित होते हैं।

तीसरे ने कहा, ‘दुनिया में दोनों ही बातें होती हैं: ताकतवर कमजोर को परास्त करके जीता है और इन दोनों के बीच सहयोग भी होता है, जो ताकतवर है वे उनकी जरूरत जितना ही भोजन प्राप्त करते हैं। यद्यपि वे दूसरे प्राणियों पर हमला करते हैं, उनके ऐसा करते हुए भी प्रकृति का संतुलन बना रहता है। प्रकृति की इच्छा एक ऐसा लौह-नियम है, जो इस धरती पर शांति और व्यवस्था बनाए रखती है।’

तीन लोग और तीन दृष्टिकोण। मैंने इन तीनों दृष्टिकोणों से सहमत होने से साफ इंकार कर दिया।

यह दुनिया खुद भी यह नहीं पूछती है कि, प्रतियोगिता के सिद्धांत पर आधारित है या सहयोग के। जब हम मानवीय बुद्धि के सापेक्ष परिपेक्ष्य से चीजों को देखते हैं, तभी हमें कोई कमजोर तो कोई ताकतवर या कोई बड़ा और कोई छोटा नजर आता है।

अब इनमें से तो किसी को संदेह नहीं है कि, इस सापेक्ष दृष्टिकोण का अस्तित्व है, लेकिन यदि हम यह मानें कि मानवीय धारणाओं की सापेक्षता गलत है, मसलन कुछ बड़ा-छोटा नहीं होता है, न कोई ऊपर है न कोई नीचे - यदि हम कहें कि ऐसा कोई दृष्टिकोण ही नहीं है, तो मानव-मूल्य और निर्णय बुद्धि ही चौपट हो जाएंगे।

‘क्या इस दुनिया को इस ढंग से देखना मात्र कल्पना की उड़ान नहीं है, वास्तविकताओं में तो छोटे देश हैं और बड़े देश हैं, गरीबी है और सम्पन्नता भी, कमजोर और ताकतवर हैं, तो फिर विवाद और झगड़े भी होंगे और यदि वे हैं तो हारने और जीतने वाले भी होंगे। क्या आप बल्कि ऐसा नहीं कह सकते कि, यह सापेक्ष सोच तथा उससे उपजने वाली भावनाएं भी इसलिए स्वाभाविक भी हैं, और वे मानव को प्राप्त एक विशिष्ट वरदान भी हैं।’

अन्य प्राणी लड़ते हैं लेकिन युद्ध नहीं करते। यदि आप कह रहे हैं कि युद्ध करना जो कि कमजोर और ताकतवर होने के विचार पर आधारित है, मानव को प्राप्त एक विशिष्ट वरदान है तो यह जीवन का एक बेतुका नाटक ही है, और इस ढोंग या तमाशे को ढोंग न समझ पाने में ही मानव की त्रासदी निहित है।

एक ऐसी दुनिया, जिसमें न कोई अंतरविरोध हो न भेदभाव, में शांति के साथ केवल बच्चे रहते हैं। वे अंधेरा भी देखते हैं, रोशनी भी, कमजोर भी देखते हैं तथा ताकतवर को भी लेकिन उनके बारे में अपनी कोई राय नहीं रखते। उसे सर्प और मेंढक का अलग अस्तित्व तो नजर आता है, लेकिन उसमें ताकतवर या कमजोर की समझ नहीं होती। जीवन का मूल आनंद तो वह महसूस करता है, लेकिन मौत का डर अभी उसमें पैदा नहीं हुआ होता।

प्रौढ़ों की निगाह में जो प्रेम और घृणा पैदा हो जाती है, वे मूलतः दो अलग चीजें नहीं थीं। वे एक ही चीज के सामने और पीछे से नजर आने वाले दो पहलू हैं, प्रेम ही नफरत का सत्व होता है। यदि आप प्रेम के सिक्के को पलट दें तो वह नफरत में बदल जाता है। केवल पार्श्व-रहितता (नो-एस्पैक्ट) के समूचे विश्व में प्रवेश करने के बाद ही, आपके लिए यह संभव होता है, कि आप इस दुनिया के दोगलेपन के चक्कर में पड़ने से बच जाएं।

लोग स्वयं और अन्य में भेद करते हैं। इससे जो कशमकश पैदा होती है, उसके चलते हुए वे एक-दूसरे पर, टकराव भड़काने का आरोप लगाते हैं। यह चीजें वैसी ही हैं कि आप ताली बजाएं और फिर बहस करने लगें कि आवाज किसने पैदा की, बायीं या दायीं हथेली ने।

सभी विवादों में न कोई सही होता है न कोई गलत, न कोई अच्छा होता है न बुरा। सारे भेद एक साथ पैदा होते हैं और वे सभी गलत होते हैं।

कोई भी किलेबंदी शुरू से ही गलत होती है। हालांकि किला बनाने वाला, बहाना यही बनाता है कि, वह नगर की सुरक्षा के लिए है। वह किला उस शासक के व्यक्तित्व का परिणाम होता है और वह आसपास के इलाके पर अपनी दादागिरी का प्रदर्शन करता है। यह कहते हुए कि उसे बाहरी आक्रमण का डर है, तथा उसने किलाबंदी शहर की रक्षा के लिए की है, यह दादा हथियार इकट्ठा कर के शस्त्रागार पर ताला ठोक देता है।

प्रतिरक्षा के इंतजाम के साथ ही आक्रमण की शुरुआत हो जाती है। सुरक्षा के लिए जमा किए गए हथियार हमेशा युद्ध भड़काने का बहाना बनते हैं। युद्ध की तबाही, यह मैं हूं, वह दूसरा है, मैं कमजोर हूं, यह प्रतिरक्षा है, यह आक्रमण है जैसे बेमानी भेदभावों को पैदा करने से ही आती है।

शांति का मार्ग एक यही है कि सभी लोग सापेक्ष सोच के किले द्वार से अलग हटकर बगीचों से गुजरते हुए अ-क्रियाशील प्रकृति के केंद्र में प्रवेश करें, यानी बजाए तलवार के आप अपने हंसिए को धार चढ़ाएं।

जहां पुराने जमाने के किसान शांतिप्रिय लोग हुआ करते थे, वे अब कभी ऑस्ट्रेलिया के साथ मांस को लेकर उलझते हैं, तो कभी रूस के साथ मछली के बारे में विवाद खड़ा कर रहे होते हैं, तो कभी गेहूं और सोयाबीन के लिए अमरीका का मुंह ताकते हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि हम जापानी लोग एक बड़े पेड़ की छांव तले रह रहे हैं और आंधी-तूफान के समय किसी बड़े दरख्त के नीचे खड़े रहने से ज्यादा खतरनाक और कोई अन्य चीज नहीं हो सकती और किसी ‘परमाणु-छतरी’ के नीचे आसरा लेना तो सबसे बड़ी नादानी है, क्योंकि आगामी युद्ध में पहला निशाना इसी छतरी को बनाया जाएगा। इन दिनों हम इस छतरी के नीचे अपने खेत जोत रहे हैं। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि संकट हमारी तरफ बाहर और भीतर दोनों से बढ़ा चला आ रहा है।

अच्छा हमारे लिए यही होगा कि हम इस ‘बाहरी’ और ‘भीतरी’ के विचारों से ही छुटकारा पा लें। दुनिया में सर्वत्र किसान मूलतः किसान ही हैं। हम कह सकते हैं कि, शांति की कुंजी भी धरती के निकट ही कहीं मौजूद है।

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