एक तिनके से आई क्रांति

Submitted by Hindi on Fri, 09/09/2011 - 13:54
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

अब एक बार फिर से अधिक खाद बनाओ अभियान शुरू हुआ है। केंचुओं और ‘खाद प्रारंभकों’ की मदद से ज्यादा-से-ज्यादा खाद बनाने पर जोर दिया जा रहा है। मेरे इस सुझाव को कि तैयार की हुई खाद का उपयोग गैर-जरूरी है, स्वीकार किए जाने का कोई कारण उन्हें फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। उनके गले यह बात उतरना मुश्किल है कि, आपका सिर्फ ताजा, बिना कटा पुआल ही खेतों में बिखेर देना काफी होगा।

इन पहाड़ी कुटियों में आकर रहने वालों में कुछ युवा ऐसे भी हैं, जो शरीर और मन से कमजोर होने के कारण सारी उम्मीदें खो चुके हैं। मैं एक ऐसा बूढ़ा किसान हूं, जिसे यही अफसोस है कि, वह इन्हें एक जोड़ी चप्पलें भी मुहैया नहीं करा सकता लेकिन एक चीज फिर भी मेरे पास ऐसी है, जो मैं उन्हें दे सकता हूं। वह है पुआल का एक तिनका। मैंने झोपड़ी के सामने पड़ा, एक मुट्ठी भर पुआल उठाया और कहा, ‘इस एक तिनके से क्रांति की शुरुआत हो सकती है।’ ‘इस वक्त जब कि मानव जाति विनाश के कगार पर पहुंच गई है, क्या आप अब भी इस तिनके का सहारा लेकर बच जाने की उम्मीद कर रहे हैं?’ अपनी आवाज में तनिक कड़वाहट लिए एक युवक ने पूछा। यह तिनका छोटा और नाजुक नजर आता है और अधिकांश लोगों को अहसास नहीं है कि, वह वजन में कितना भारी है। यदि लोगों को इस तिनके का वास्तविक मूल्य मालूम हो जाए तो उससे एक ऐसी मानवीय क्रांति आ जाएगी, जिसमें इस देश और विश्व को हिला देने की पर्याप्त ताकत होगी।

जब मैं छोटा बच्चा था, उन दिनों इनुयोज दर्रे के पास एक आदमी रहता था। ऐसा लगता था कि उसके पास पहाड़ी पर से कोयला, घोड़े पर लादकर गुंजू के बंदरगाह तक (कोई दो मील) पहुँचाने के अलावा कोई काम नहीं था। इसके बावजूद वह बहुत अमीर हो गया। आप लोग पूछेंगे कि, यह भला कैसे हुआ। तो लोग आपको बतलाएंगे कि वास्तव में वह व्यक्ति बंदरगाह से वापस लौटते हुए पुआल से बनी, फेंक दी गई घोड़ों की नालों के साथ, सड़क के किनारे से लीद भी बटोर लेता और ले जाकर दोनों को अपने खेत में बिखेर देता था। इस भले मानस के जीवन का उद्देश्य वाक्य था, ‘पुआल के हरेक तिनके को महत्पपूर्ण मानो और जिंदगी में बिना काम के एक भी कदम मत उठाओ।’ बस इसी ने उसे एक अमीर आदमी बना दिया। ‘यदि आप पुआल को जला दें तो भी मेरे खयाल से, उससे वह चिंगारी नहीं निकलेगी जिससे किसी इंकलाब की शुरुआत हो सके।’

बगीचे के पेड़ों में से होकर मध्यम बयार बह रही थी और हरी पत्तियों में सूर्य की किरणें झिलमिला रही थीं। मैंने चावल की खेती में पुआल उपयोग के बारे में बातचीत शुरू की। इस बात को अब चालीस बरस हो गए, जब मैंने महसूस किया था कि, चावल और जौ की खेती के लिए पुआल कितना महत्वपूर्ण होता है। इन दिनों कोची प्रक्षेत्र में कई बरसों से बेकार पड़े हुए चावल के एक खेत के करीब से गुजरते हुए मैंने देखा कि, खेत में उगे ढेर से झाड़-झंकार के बीच धान का एक नया लेकिन स्वस्थ्य पौधा मजे से उग रहा था। इसी दिशा में बरसों काम करने के बाद ही मैंने चावल और जौ की खेती की एक बिल्कुल अभिनव विधि पेश की। यह सोचकर कि यह खेती की एक प्राकृतिक और क्रांतिकारी विधि है, मैंने इसके बारे में किताबों और पत्र-पत्रिकाओं में लिखा तथा रेडियो और टेलिविजन पर अनेक बार बोला भी।

देखने-सुनने में यह बड़ी सरल चीज लगती है, लेकिन पुआल के उपयोग के बारे में किसानों का सोच इतना रूढ़ हो चुका है कि, इस बात की संभावना कम ही है कि वे किसी भी बदलाव को आसानी से अपना लेंगे। ताजा कटे पुआल को खेतों में फैलाना काफी जोखिम भरा है क्योंकि चावल की डंठलों और दानों में अक्सर कीड़े लगे रहते हैं। अतीत में ये बीमारियाँ काफी नुकसान कर चुकी हैं और किसान जो पुआल को जैसा-का-तैसा खेत में डालने की बजाए उसका खाद बनाकर डालते हैं, उसका मुख्य कारण यही है। बहुत समय पहले भी घुन लगने की बीमारी की रोक-थाम के लिए पुआल को बड़ी सावधानी से ठिकाने लगाया जाता था और इस प्रक्रिया में कई बार उसे जला भी दिया जाता था। होकारडो प्रांत में एक वक्त ऐसा भी था जब थोक के भाव में पुआल जलाने के बारे में कानून तक बने हुए थे।

डंठल में सुराख करने वाले कीड़े भी, सर्दियां बिताने के लिए पुआल में प्रवेश कर जाते हैं। इस बीमारी को फैलने से बचाने के लिए किसान लोग पूरी सर्दियों भर पुआल को सड़ाकर उसका खाद बनाते और वसंत आने पर ही उसे खेतों में डालते थे। इसी तरीके से जापान के किसान अपने खेतों को हमेशा साफ-सुथरा बनाए रखते हैं। उनके दैनंदिन तजुर्बे के आधार पर उन्होंने यह विचार बना लिया था कि, यदि वे अपने खेतों में पुआल यों ही बिखरा पड़ा रहने देंगे तो उनकी इस लापरवाही के लिए भगवान उन्हें दंडित करेगा।बरसों तक परीक्षण करने के बाद अब तकनीकी विशेषज्ञों ने मेरी इस विचारधारा की पुष्टि की है कि बीज बोने के छह महीने पहले खेतों में पुआल बिछाना पूरी तरह बेकार है। इस चीज ने इस विषय पर पुराने सभी विचारों को पलटकर रख दिया लेकिन अभी भी किसानों को पुआल को इस ढंग से उपयोग करने के विचार को अपनाने में बहुत समय लगने वाला है।

सर्दियों में किसान खाद निर्माण की मात्र बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। कृषि मंत्रालय खाद उत्पादन बढ़ाने के लिए नकद प्रोत्साहन देता है और हर साल इसकी प्रतियोगिताएं और नुमाइशें आयोजित की जाती रही हैं। किसान कचरे की खाद को एक तरह से मिट्टी का संरक्षक देवता मानने लगे हैं। अब एक बार फिर से अधिक खाद बनाओ अभियान शुरू हुआ है। केंचुओं और ‘खाद प्रारंभकों’ की मदद से ज्यादा-से-ज्यादा खाद बनाने पर जोर दिया जा रहा है। मेरे इस सुझाव को कि तैयार की हुई खाद का उपयोग गैर-जरूरी है, स्वीकार किए जाने का कोई कारण उन्हें फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। उनके गले यह बात उतरना मुश्किल है कि, आपका सिर्फ ताजा, बिना कटा पुआल ही खेतों में बिखेर देना काफी होगा।

टोकियो जाते हुए रेल की खिड़की में से खेतों को देखते हुए मैंने जापान के देहाती माहौल में आए बदलाव को महसूस किया है। जाड़े के मौसम में इन खेतों में पिछले दस सालों से आए परिवर्तन को देख मैं गुस्से से भर जाता हूं। अब वहां आपको हरी बार्ली (जौ) चीनी दूधिया तथा फूलते रेपसीड के साफ-सुथरे, हरे लहलहाते खेत नहीं नजर नहीं आते। उनकी जगह आपको उस अधजले पुआल के ढेर नजर आते हैं, जिन्हें वहां वर्षा में भीगने के लिए छोड़ दिया गया है। इस पुआल की जिस तरह उपेक्षा की जा रही है वह आधुनिक खेती में चल रही गड़बड़ी को प्रमाणित करती है। इन खेतों का बंजरपन बतलाता है कि, किसान की आत्मा भी बंजर को गई है। वह सरकार में बैठे नेताओं की जवाबदारी के लिए भी एक चुनौती है और साफ इंगित करता है कि, समझदारी भरी कृषि नीतियाँ पूरी तरह गायब हैं।

वह व्यक्ति जो कई बरस पहले जाड़े की फसलों के लिए ‘दया-मृत्यु’ की बात कर रहा था, तथा जिसे उसके सड़क के किनारे कुत्ते की मौत मरने पर भी कोई एतराज नहीं था, वह अब इन खाली खेतों को देखकर क्या कहना चाहेगा? जाड़े की ऋतु में जापान के खेतों को इस तरह खाली पड़े देखकर मैं अब चुपचाप नहीं बैठ सकता। इस पुआल के तिनके से मैं अकेला अपने बल पर एक नई क्रांति की शुरुआत करूंगा।

वे युवा जो अब तक खामोशी से मेरी बातें सुन रहे थे, अचानक जोरों से हंसने लगे।

‘एक अकेले आदमी का इंकलाब! आओ चलें कल ही एक बड़े से बोरे में हम जौ, चावल और बनमेथी के बीज भरकर ओकुनीनुशी-नो-भीकतो (जापान की किंवदंतियों में वर्णित चिकित्सा का वह देवता जो अपने कंधे पर एक बड़ा झोला लादे सारी दुनिया का चक्कर लगाते हुए लोगों को शुभ-आशीष बांटता फिरता है।) की तरह कंधे पर लाद कर यहां से चल पड़ें और उन बीजों को तोकाईदो के सारे खेतों में बिखेर दें।’ ‘नहीं, यह एक अकेले आदमी की क्रांति नहीं, एक पुआल के तिनके की क्रांति है,’ मैंने हंसते हुए कहा। झोपड़ी से बाहर धूप में निकला, मैं एक क्षण रुका, पके फलों से लदे फल-बाग के पेड़ों तथा खरपतवार और मेथी में अपनी चोंच मारते मुर्गी के चूजों को मैंने निहारा और फिर हमेशा की तरह अपने खेतों की तरफ उतर गया।

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