मैंग्रोव का महत्व

Submitted by Hindi on Tue, 09/13/2011 - 11:20
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विज्ञान प्रसार
मनुष्य द्वारा मैंग्रोव वनों का प्रयोग अनेक रूपों में किया जाता है। पारम्परिक रूप से स्थानीय निवासियों द्वारा इनका प्रयोग भोजन, औषधि, टेनिन, ईंधन तथा इमारती लकड़ी के लिये किया जाता रहा है। तटीक इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के लिये जीवनयापन का साधन इन वनों से प्राप्त होता है तथा ये उनकी पारम्परिक संस्कृति को जीवित रखते हैं। मैंग्रोव वन धरती तथा समुद्र के बीच एक उभय प्रतिरोधी (बफर) की तरह कार्य करते हैं तथा समुद्री प्राकृतिक आपदाओं से तटों की रक्षा करते हैं। ये तटीय क्षेत्रों में तलछट के कारण होने वाले जान-मान के नुकसान को रोकते हैं।

मूंगे की चट्टानों को समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों में सबसे अधिक जैव विविधता वाला क्षेत्र कहा जाता है। ये पारिस्थितिकी तंत्र समुद्री वातावरण में जैविक तथा अजैविक कारकों के बीच बहुत नाजुक संतुलन का उदाहरण है। इन क्षेत्रों में तथा आस-पास पाये जाने वाली बहुत सी जीव प्रजातियों के लिये प्रजनन तथा उनके छोटे बच्चों के लिये आदर्श शरण स्थल, मैंग्रोव वनों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। मैंग्रोव जड़ें तलछट तथा अन्य प्रदूषक तत्वों से प्रवाल भित्तियों यानी मूंगों की रक्षा करती हैं। बदले में मूंगे की चट्टानें तेज समुद्री लहरों के वेग को कम कर मैंग्रोव क्षेत्रों की रक्षा करती है। इस प्रकार मैंग्रोव और मूंगे एक-दूसरे की सहायता कर अपना अस्तित्व कायम रखते हैं ।

मैंग्रोवः प्राकृतिक शरण स्थल


मैंग्रोव जड़े- एक सूक्ष्म आवास स्थल हैमैंग्रोव जड़े- एक सूक्ष्म आवास स्थल हैमैंग्रोव उस क्षेत्र में पायी जाने वाली अनेक प्रजातियों को शरण उपलब्ध कराते हैं अनेक प्रकार के शैवालों तथा मछलियों द्वारा जड़ों का प्रयोग आश्रय के लिये होता है। आपस में गुंथी हुई जड़े छोटे जीवों जैसे मछलियों, झींगों की बड़े परभक्षियों से रक्षा करती हैं। पेड़ की शाखाऐं सूर्य की तीव्र किरणों से छाया प्रदान करती हैं और पक्षियों से लेकर बन्दरों तक विविध जीव-जन्तुओं के लिये आश्रय स्थल उपलब्ध कराती है। छोटी-छोटी दरारें कीटों तथा अन्य सूक्ष्म जीवों के लिये आश्रय प्रदान करती हैं। पेड़ पर चढ़ने वाले केकड़े तथा घोंघे ज्वार के समय परभक्षियों से बचने के लिये वायवीय जड़ों (ऐरियल रूट्स) पर चढ़ जाते हैं।

मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र मत्स्य उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। मछली तथा शंख मीन (शैल फिश) की बहुत सी प्रजातियों के लिए मैंग्रोव प्रजनन स्थल तथा संवर्धनग्रह की तरह कार्य करते हैं। अकेले पिचवरम वन में झींगे की 30, केकडे़ की 30, मोलस्क की 20 तथा मछली की 200 प्रजातियां पायी जाती हैं। यह माना जाता है कि मैंग्रोव समुद्र की जड़ों की तरह है।

यदि तटों पर मैंग्रोव वृक्ष न हों तब वहां या तो मछलियां होंगी ही नहीं या उनकी संख्या बहुत कम होगी। मछलियों के अतिरिक्त मैंग्रोव वनों में अन्य जीव जन्तु भी पाये जाते हैं जैसे- बाघ (बंगाल टाइगर), मगरमच्छ, हिरन, सुअर, मछली मारने वाली बिल्ली (फिशिंग कैट), कीट तथा पक्षी। मैंग्रोव पारिस्थितिकी से संबंद्ध अन्य जीव डाॅल्फिन (प्लेटेनिस्टा गैंगेटिका), मैंग्रोव बन्दर (मैकाका मुलाटा), ऊद बिलाव (लुटरा पर्सपिलाटा) आदि हैं। संकटग्रस्त जंगली गधे (ऐसिनस हेमियोनस) कच्छ के मैंग्रोव क्षेत्रों में अक्सर देखे जाते हैं। केकड़े खाने वाले बन्दर (मेकाका फेसिकुलारिस), लंगूर (प्रेसबाइटिस क्रिस्टेटस), उड़ने वाली लोमड़ी (गादुर) (टेरोपस वेम्पाइरस), माॅनीटर छिपकली (वेरनस लुबिसेन्स), जंगली सुअर (सुस विटेटस) तथा सांप की कुछ प्रजातियां भी मैंग्रोव वनों में पायी जाती हैं।

जीवित सरीसृपों में सबसे लम्बा (7 मीटर तक) जीव क्रोकोडाइलस पोरोसस तथा इसकी अनेक रंजकहीन (एल्बिनो) नस्लें उड़ीसा के भितरकनिक मैंग्रोव वनों में पायी जाती हैं। हरे समुद्री कछुए (ओलाइव रिडली टर्टल), चोसन क्षेत्र में घोंसले बना कर अण्डे देते हैं। कोरिंगा मैंग्रोव क्षेत्र में जीव जन्तुओं की लगभग 54 प्रजातियां पायी जाती हैं। जिनमें 4 उभयचरों, 12 सरीसृपों, 25 पक्षियों तथा 13 स्तनधारियों की प्रजातियां हैं। नदी-मुख क्षेत्रों में पाया जाने वाले मगरमच्छ (क्रोकोडाइलस पोरोसस) अब कोरिंगा मैंग्रोव वन से विलुप्त हो चुका है। मन्नार की खाड़ी में उगने वाली मैंग्रोव वनस्पति समुद्री कछुओं तथा समुद्री गायों (सी काऊ) के लिए भोजन उपलब्ध कराती है।

भोजन के श्रोत


अनेक जीवों द्वारा मैंग्रोव की पत्तियां खायी जाती हैं। बंदर मुलायम कोंपलों तथा पत्तियों का भोजन करते हैं और छोटे-छोटे कीट इन पत्तियों को चट कर जाते है। गिरने वाली पत्तियां तथा मैंग्रोव क्षेत्रों के अन्दर एवं मूंगे के क्षेत्रों से बहकर आई यह पत्तियां बाहर के जीवों के लिये भी पोषण का महत्वपूर्ण श्रोत है। केकड़े तथा अन्य छोटे जीव पत्तियों को खाते हैं तथा उनके द्वारा उत्सर्जित पदार्थों को जीवाणुओं द्वारा उपयोगी तत्वों में अपघटित कर दिया जाता है। इस प्रकार मैंग्रोव बहुत सारे जीव-जन्तुओं के लिये प्रकृति के वरदान की तरह है।

प्राकृतिक जल शोधक


पानी के अन्दर जड़ों का जो जाल मैंग्रोव बनाते हैं उन पर स्पंज तथा शंख मीन (शैलफिश) चिपके रहते हैं। ये जीव पानी को छान कर उसमें से तलछट तथा पोषक तत्वों को अलग कर देते हैं और समुद्र के पानी को साफ करते हैं जो मूंगे की चट्टानों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिये आवश्यक है।

मैंग्रोव वनों की तलछट में, भारी धातु तत्वों को पानी से सोख कर रोके रखने की उच्च क्षमता होती है। इस कारण ये तटीय क्षेत्रों में भारी धातुओं से होने वाले प्रदूषण को कम करते हैं। इस तलछट में पूरे तंत्र का 90 प्रतिशत मैंगनीज तथा तांबा (कॉपर) और लगभग 100 प्रतिशत लोहा, जस्ता, क्रोमियम, सीसा तथा कैडमियम पाया जाता है। कुछ प्रजातियां इस कार्य को दूसरों की अपेक्षा अच्छी तरह कर सकती हैं।

मैंग्रोव क्षेत्रों में होने वाले विक्षोभ वहां की मिट्टी की धातु-संयोजन क्षमता को कम कर सकते हैं। ऐसा होने पर वहां के मैंग्रोव वन धीरे-धीरे अपना स्थान परिवर्तन कर ऐसी जगह पर स्थापित होते हैं जहां धातुओं का जमाव कम हो।

मैंग्रोव वृक्ष पानी से कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों तथा मिट्टी के कणों को अलग कर देते हैं जिससे पानी साफ होता है तथा उसमें पोषक तत्वों की मात्रा बढ जाती हैं। यह अन्य सम्बद्ध पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए लाभप्रद हैं। मैंग्रोव क्षेत्रों में प्रवाल भित्तियां, समुद्री शैवाल तथा समुद्री घास अच्छी तरह पनपती हैं।

यह देखा गया है कि जिन क्षेत्रों से मैंग्रोव वृक्ष समाप्त कर दिये गये वहां तलछट शिथिल हो गयी तथा अन्य सम्बद्ध पारिस्थतिकी तंत्रों कें तलछट में वृद्धि हो गयी जिससे धीरे-धीरे वे भी समाप्त हो गये। कच्छ की खाड़ी में बड़े स्तर पर वनों की कटाई से तलछट में काफी वृद्धि हुई है जिसने आस-पास की प्रवाल भित्तियों को बहुत क्षति पहुंचायी है। कोचीन में नदी मुहानों पर वनों का कटाव ही वहां पर समुद्री खरपतवार ”सेलवीनिया“ के उगने का महत्वपूर्ण कारण है। मानसून ऋतु में पूरे क्षेत्र में इस खरपतवार के कारण मत्स्य उद्योग पर बुरा असर पडता है। यह पूर्णतः स्पष्ट है कि मैंग्रोव वन अन्य समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।

मैंग्रोव वन समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षा प्रदान करते हैंमैंग्रोव वन समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षा प्रदान करते हैं

सूर्य की पराबैंगनी-बी किरणों से बचाव


मैंग्रोव पौधों में सूर्य की तीव्र किरणों तथा पराबैंगनी-बी किरणों से बचाव की क्षमता होती है। उदाहरणतः ऐविसेनिया प्रजाति के मैंग्रोव पौधे गर्म तथा शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में उगते हैं जहां पर सूर्य की तीव्र किरणें प्रचुर मात्रा में पहुंचती हैं। यह प्रजाति शुष्क जलवायु के लिए भली-भांति अनुकूलित है। राइजोफोरा प्रजाति के पौधे अन्य मैंग्रोव पौधों की अपेक्षा अधिक पराबैंगनी बी-किरणों को सहन कर सकते हैं। मैंग्रोव पौधों की पत्तियों में लेवोनाइड पैदा होते हैं जो पराबैंगनी किरणों को रोकने का कार्य करते हैं। मैंग्रोव पौधों की यह क्षमता पराबैंगनी-बी किरणों के घातक प्रभावों से रक्षा करती है।

‘हरित ग्रह प्रभाव’ को कम करना


मैंग्रोव वन प्रकाश संश्लेषण द्वारा वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को घटाते हैं। वे उष्णकटिबन्धीय समुद्री क्षेत्रों में पाये जाने वाले पादप प्लवकों की अपेक्षा अधिक कार्बन डाइऑक्साइड (प्रति इकाई क्षेत्र पर) को सोखते हैं। ये बड़ी मात्रा में मिट्टी में कार्बन का संचय करते हैं। राइजोफोरा प्रजाति में वायुमंडल में उपस्थित कार्बन को मिट्टी में संचित करने की क्षमता बहुत अधिक है। वायु के कार्बन का स्थिरीकरण कर मैंग्रोव वन पर्यावरण परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मैंग्रोव, अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को भी भली-भांति सहन कर लेते हैं। क्योंकि मैंग्रोव कार्बन की काफी अधिक मात्रा को स्थिर कर संचित कर लेते हैं इसलिए उनको होने वाली हानि वैश्विक कार्बन बजट (ग्लोबल कार्बन बजट) पर भी विपरीत प्रभाव डाल सकती है। यह अनुमान लगाया गया है कि विश्व के 35 प्रतिशत मैंग्रोव वनों के समाप्त होने से, मैंग्रोव बायोमास में जमा कुल 3.8X1014 ग्राम कार्बन की क्षति हुई है।

प्राकृतिक स्थायीकारी


मैंग्रोव वृक्षों की जडें ज्वार तथा तीव्र जल धाराओं द्वारा होने वाले मिट्टी के कटाव को कम करती हैं। मैंग्रोव वृक्ष धीरे-धीरे मिट्टी को भेदकर तथा उसका वातन (वायु-मिश्रण) कर उसे पुनरुज्जीवित करते हैं। जैसे-जैसे दलदली मिट्टी की दशा सुधरती है, उसमें दूसरे पौधे भी उगने लगते हैं। मैंग्रोव वृक्ष अपनी जड़ों द्वारा मिट्टी को बांधे रखते हैं जिससे तूफान तथा चक्रवात के समय क्षति कम होती है। उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में आने वाले चक्रवात बंगाल की खाड़ी में अधिक आते हैं। इसीलिए उनका प्रभाव भी अरब सागर की अपेक्षा दक्षिण भारतीय तट पर अधिक पड़ता है। ये चक्रवात तटीय क्षेत्रों पर बहुत तीव्र गति से टकराते हैं और तट, तेज समुद्री लहरों के जल से जलमग्न हो जाते हैं जिससे तटों पर रहने वाले जीव-जन्तुओं की भारी हानि होती है। मैंग्रोव की कुछ प्रजातियां जैसे राइजोफोरा के वृक्ष इन प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध ढाल की तरह कार्य करते हैं।

मैंग्रोव वनों की सुरक्षात्मक भूमिका का सबसे अच्छा उदाहरण तब देखने को मिला, जब 29 अक्टूबर 1999 को उड़ीसा के तट पर चक्रवात आया था। इस चक्रवात में वायु की गति 310 किलोमीटर प्रति घंटा थी। इस चक्रवात ने मैंग्रोव रहित क्षेत्रों में भारी तबाही मचायी। जबकि उन क्षेत्रों में जहां मैंग्रोव वृक्षों की संख्या अधिक थी, नुकसान नगण्य था। इसी प्रकार के अधिसंख्य उदाहरण उपलब्ध है।

जान-माल की सबसे अधिक हानि, महानदी के डेल्टा में आये तूफान के बाद देखने में आयी। जहां मैंग्रोव वनों की व्यापक स्तर पर कटाई कर भूमि को दूसरे कार्यों के लिये प्रयोग में लाया गया। सन् 1970 में बांग्लादेश में आये प्रचण्ड तूफान तथा तीव्र ज्वारीय लहरों से लगभग 3 लाख व्यक्ति मारे गये थे। इस तूफान में हुई जनहानि सम्भवतः कम हुई होती यदि हजारों एकड़ भूमि से मैंग्रोव वनों को काट कर कृषि कार्य हेतु भूमि न ली गयी होती।

गुजरात के कच्छ क्षेत्र में जहां मैंग्रोव वनों की अवैध कटाई की गयी, सन् 1983 के चक्रवात में भारी जन हानि हुईं ये सारी पर्यावरण सम्बन्धी सेवाएं जो मैंग्रोव निःशुल्क प्रदान करते हैं, उन पर आश्रित प्रजातियों के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

दुर्भाग्यवश, मैंग्रोव वन जो सदियों से समुद्री तूफानों और तेज हवाओं का सामना सफलतापूर्वक करते रहे हैं आज मनुष्य के क्रिया-कलापों के कारण खतरे में है। लेकिन हाल के वर्षों में घटित घटनाओं ने मनुष्य को मैंग्रोव वनों के प्रति अपने रवैये के बारे में सोचने पर विवश किया है। सन् 2004 में तटीय क्षेत्रों में सुनामी से हुई भंयकर तबाही से वे क्षेत्र बच गये जहां मैंग्रोव वन इन लहरों के रास्ते में एक ढाल की तरह खड़े थे। उस समय इन वनों ने हजारों लोगों की जान-माल की रक्षा की। इस घटना के बाद तटीय क्षेत्र के गांवों में रहने वाले लोगों ने मैंग्रोव वनों को संरक्षण देने का निश्चय किया।

बाढ नियंत्रण


मैंग्रोव वन तटीय अपरदन को रोकते हैंमैंग्रोव वन तटीय अपरदन को रोकते हैंमैंग्रोव वन, ज्वारीय लहरों, भारी वर्षा तथा तूफानों के साथ आने वाली बाढ़ से भी तटों की रक्षा करते हैं। बांग्लादेश में यदि 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से झींगा उत्पादन तथा चावल की खेती के लिए मैंग्रोव वनों को काटा नहीं गया होता तो सन् 1991 में बाढ़ से हुई हानि काफी कम हुई होती। बाढ़ नियंत्रण में मैंग्रोव वृक्षों की भूमिका उनकी फैली हुई जड़ों के कारण है जिनका विकास जल प्लावित क्षेत्र में उगने के कारण हुआ है।

मैंग्रोव वन समुद्री पानी को स्थलीय क्षेत्रों में आने से रोकते हैं जिससे भू-जल तंत्र की सुरक्षा होती है। साल्ट लैट (समुद्र तट पर वह स्थान जहां एकत्रा समुद्री खारे पानी के सूखने से लवण की एक मोटी परत बन जाती है) तथा मैंग्रोव क्षेत्रों के नीचे भूजल में लवणों की सान्द्रता में बहुत अन्तर होता है। इससे इस सिद्धान्त का बल मिलता है कि मैंग्रोव, भू-जल के खारेपन को कम कर उसकी गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं।

तटीय क्षरण को कम करना


मैंग्रोव वन लहरों की तीव्रता को कम करके तटों के क्षरण को रोकते हैं। तटों पर वनस्पति की सघनता तथा पानी की गहराई जितनी अधिक होगी उतना ही अधिक प्रभावी ढंग से लहरों की तीव्रता को कम किया जा सकेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि मैंग्रोव वन तटों पर एक सजीव समुद्री दीवार की तरह होते हैं जो तटों का क्षरण रोकने के लिये बनायी जाने वाली कंक्रीट की दीवार या अन्य उपायों की अपेक्षा बहुत ही सस्ती होती है।

तलछट को अलग करना


मैंग्रोव वृक्ष पानी से तलछट को अलग करते हैं इसलिये ये पानी में तैरती तलछट के लिये एक कुण्ड की तरह कार्य करते हैं। मैंग्रोव वृक्ष अपनी जटिल वायवीय जड़ों की सहायता से तलछट को बांध लेते हैं। इस प्रकार ये भूमि विस्तारक की तरह भी कार्य करते हैं। यह भी माना जाता है कि मैंग्रोव वन ज्वारीय लहरों को कम करते हैं। ऐसा सम्भवतः उनकी जड़ों द्वारा उत्पन्न घर्षण के कारण होता है। ज्वारीय लहरों के साथ मिट्टी के कण पानी में तैरते हुए मैंग्रोव क्षेत्र में प्रवेश करते हैं तथा वापस लौटती लहरों द्वारा ये कण दलदल तथा जड़ों में छोड़ दिये जाते हैं। यह कण ज्वार उतरने पर नीचे जम जाते हैं। ऐसा सम्भवतः इसलिये होता है कि ज्वार उतरने पर पानी की लहरों की तीव्रता इतनी नहीं होती कि वह इन कणों को बहा कर वापस ले जा सके। तलछट को रोकने की यह प्रभावी क्षमता ऐविसेनिया प्रजाति में अधिसंख्य वातरंध्र तथा राइजोफोरा प्रजाति में सघन स्टिल्ट जड़ों के कारण होती है। तलछट को अलग करने में मैंग्रोव पौधों की सघनता तथा उनकी जड़ों की जटिलता सबसे महत्वपूर्ण कारक होते हैं।

औषधीय उपयोग


तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग जिनका इन वन क्षेत्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है उन्हें इन पौधों की औषधीय विशेषताओं का ज्ञान है। मैंग्रोव पौधों की प्रजातियों का उपयोग सर्पदंश, चर्मरोग, पेचिश तथा मूत्रा सम्बन्धी रोगों के उपचार के लिये तथा रक्त शोधक एवं गर्भ निरोधक के रूप में करते हैं। एकेन्थस इलिसीफोलियस प्रजाति के फलों का उपयोग सर्पदंश तथा गुर्दे की पथरी के उपचार के लिये किया जाता है। ऐविसीनिया के पेड़ से निकलने वाले गोंद का उपयोग गर्भ निरोधक के रूप में किया जाता है।

ऐविसेनिया ऑफिशिनेलिस की पत्तियों को उबाल कर उनके रस का उपयोग स्थानीय मछुआरों द्वारा पेट तथा मूत्रा सम्बन्धी रोगों के उपचार के किये किया जाता है। बू्रगेरिया सिंलिंड्रिका की पत्तियों में पाये जाने वाले एल्केलॉयड में कैंसर रोधी क्षमता होती है। ऐक्सोकेरिया एगालोका से निकलने वाला दूध जैसा पदार्थ यद्यपि जहरीला है तथा आंख में गिरने पर अन्धा कर सकता है परन्तु इसका उपयोग स्थानीय लोगों द्वारा दांत दर्द के उपचार के लिये किया जाता है।

तटीय क्षेत्रों में सामान्यतः उगने वाले समुद्री गुड़हल की पत्तियां ठंडक पहुंचाती हैं तथा इनका उपयोग बुखार के समय किया जाता है। मैंग्रोव की औषधीय विशेषताओं की प्राचीन तथा पारम्परिक जानकारी मानव संस्कृति का अहम हिस्सा है। यदि मैंग्रोव ही लुप्त हो जाएंगें तब इसमें से अधिकांश जानकारी तो समाप्त हो जाएंगी तथा बची खुची भी किसी काम की नहीं रहेंगी ।

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