जंगल का विनाशक बना आय का साधन

Submitted by Hindi on Thu, 09/15/2011 - 10:52
Printer Friendly, PDF & Email
Source
चरखा फीचर्स

कुछ अध्ययनों में यह भी सिद्ध हुआ है कि पिरूल में कुछ ‘फाइटोटाक्सिन्स’ नामक हानिकारक रसायन होते हैं जो सड़ने की प्रक्रिया के समय नमी के माध्यम से जल्दी ही मिट्टी तक पहुंच जाते हैं और पुनरूत्पादन में बाधक होते हैं। इसके अलावा पिरूल की फिसलन भरी सतह स्थानीय लोगों तथा घरेलू मवेशियों के लिए कई बार जानलेवा सिद्ध होती हैं वहीं सूखा पिरूल ज्वलनशील होने के कारण अक्सर वनाग्नि का कारण बनता है, जिसके व्यापक हानिकारक परिणाम सर्वविदित हैं।

प्रकृति के गर्भ में आज भी इतना सब कुछ छिपा है कि मनुष्य इसका सिर्फ अंदाजा ही लगा सकता है। जिसे हम अपने फायदे का सौदा समझते हैं कभी-कभी वही हमारी बर्बादी का कारण बन जाता है और जिसे बेकार समझने की भूल कर बैठते हैं वह जीवन के अस्तित्व की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होता है। हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले चीड़ के पेड़ ऐसी ही श्रेणी में रखे जा सकते हैं। गर्मियों में चीड़ के पेड़ों से झरने वाले पिरूल अर्थात इसकी पत्तियां वनाग्नि का मुख्य कारण रहे हैं। इस पेड़ के आसपास दूसरे प्रजाति के पेड़ न उग पाने व जमीन की नमी को सोख लेने के कारण इसे पहाड़ों में पेयजल संकट के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। उत्तराखंड के वनों में चीड़ प्रजाति के वनों की संख्या सबसे अधिक है और यह अन्य प्रजाति के पेड़ पौधों वाले इलाके में अतिक्रमण कर लगातार अपना क्षेत्रफल बढ़ाते रहते हैं। इसकी पत्तियां गर्मियों में सूखकर जमीन पर गिरती हैं और जंगलों में लगने वाली आग का सबसे बड़ा कारण बनती हैं। इसकी वजह से हर साल जंगल का एक बड़ा क्षेत्र आग की भेंट चढ़ जाता है। एक अनुमान के मुताबिक हर वर्ष सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र पिरूल के कारण जल जाते हैं।

लेकिन यही पिरूल अब ग्रामीणों की आजीविका का भरोसेमंद साथी बन गया है। एक ओर देश में जहां कोयला खनन से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है वहीं पिरूल से कोयला बनाने की पद्धति लोगों को आजीविका उपलब्ध करा रही है। वन सम्पदा के संरक्षण व समुदाय की ईंधन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड सरकार द्वारा ग्राम्य परियोजना चलाई जा रही है। यह परियोजना कुमाऊँ क्षेत्र के नैनीताल, पिथौरागढ़, चंपावत व बागेश्वर जनपद के विभिन्न विकासखंडों में हिमालय अध्ययन केन्द्र द्वारा संचालित की जा रही है। इसमें चीड़ की पत्तियों (पिरूल) से कोयला यानि पाइन ब्रिकेट बनवाने की गतिविधि शुरू की गई है। यह गतिविधि ईंधन की आवश्यकता पूरी करने तथा वनाग्नि का खतरा कम करने के साथ-साथ आय का अच्छा स्रोत भी सिद्ध हो रही है। ग्राम्या के मुख्य परियोजना निदेशक एम.एच.खान इसे ग्राम समुदाय के लिए अभिनव गतिविधि बताते हैं, उनका मानना है कि इससे दीर्घकाल तक अधिकतम लाभ कमाया जा सकता है।

पिरुल से कोयला बनाते लोगपिरुल से कोयला बनाते लोगपिरूल से कोयले का निर्माण कर न सिर्फ उसे ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा रहा है, अपितु यह आय अर्जन का स्रोत भी सिद्ध हो रहा है। इसके निर्माण की विधि भी आसान है। पहले पिरूल को एक विशेष रूप से बनाये गये ड्रम में जलाते हैं। ड्रम के भीतर कम ऑक्सीजन की स्थिति में पिरूल पूरी तरह जल कर राख नहीं हो पाता और यह चारकोल में परिवर्तित हो जाता है, फिर लगभग 10 प्रतिशत गोबर का घोल बनाकर चारकोल को आटे की तरह गूंथा जाता है। इस मिश्रण को पाइन क्रिक्वेट मोल्डिंग मशीन में डालकर आसानी से कोयला बनाया जाता है। पिरूल से बनने वाले इस कोयले की विशेषता है कि यह धुंआ रहित होता है। इसमें राख अत्यंत कम मात्रा में पैदा होती है। विशेष चूल्हे में लगभग 600 ग्राम पिरूल कोयले को डेढ़ घंटे तक उपयोग में लाया जा सकता है। धुंआ रहित होने के कारण इससे महिलाओं का स्वास्थ्य ठीक रहता है साथ ही जंगलों में लगने वाली आग पर भी काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। इसके अलावा जलावन के लिए लकड़ियों की कम कटाई से पर्यावरण संतुलन भी बना रहता है।

आज राज्य के दो दर्जन से अधिक स्वयं सहायता समूह इस काम में लगे हैं। अकेले जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट विकास खंड में परियोजना के तहत 32 मशीनें व 100 चूल्हे लोगों को प्रदान किए जा चुके हैं। इससे करीब 800 परिवार लाभान्वित हो रहे हैं। राज्य के 11 जनपदों के 18 विकासखंडों के 76 चयनित सूक्ष्म जलागम क्षेत्रों के बीच यह परियोजना सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। इनमे अधिकांशतः महिलाएं जुड़ी हुई हैं। स्वयं सहायता समूह से जुड़ी कुछ महिलाएं कहती हैं कि इससे जहां हमारी आंखों को नुकसान होने से बच रहा है वहीं रोज जंगल से लकड़ी लाने का झंझट भी समाप्त हो रहा है। गढ़वाल मंडल के चमोली गांव की हेमा डोबरियाल के अनुसार क्षेत्र के कई गांवों में ग्रामीणों ने पिरूल से कोयला निर्माण हेतु समूह का गठन किया है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद परियोजना के तहत मशीन व ड्रम प्राप्त किए हैं। मशीन के रखरखाव, बिजली का बिल इत्यादि की व्यवस्था के लिए समूह 25 रुपया मासिक जमा भी कर रहा है। इस परियोजना के शुरू होने के बाद से गांव में स्वच्छ व धुंआ रहित वातावरण तो बना ही है वहीं महिलाएं प्राकृतिक सम्पदा संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। पिरूल से बने इस कोयले का उपयोग घरेलू कार्यों, होटलों में खाना पकाने व कपड़ों में प्रेस करने में किया जा रहा है।

पिरुल से बना हुआ कोयलापिरुल से बना हुआ कोयलाचीड़ का वानस्पतिक नाम ‘पाइनेवस्ट रौक्स बरगाई’ है तो वहीं पीरूल को ‘पाइन निडील’ कहा जाता है। वास्तव में पिरूल के कारण अन्य वनस्पत्तियां जैसे घास, झाड़ियां अथवा अन्य वृक्ष की प्रजातियाँ नहीं उग पाती हैं क्योंकि इसकी मोटी सतह के नीचे प्रकाश नहीं पहुच पाता है। इसलिए अन्य वनस्पतियों के प्राकृतिक पुनरूत्पादन की संभावनायें कम हो जाती हैं। प्राकृतिक अवस्था में पिरूल अन्य पत्तियों की अपेक्षा सड़ने में अधिक समय लेता है, इसके परिणाम स्वरूप कम पोशक तत्व मिट्टी में पहुंचते हैं। कुछ अध्ययनों में यह भी सिद्ध हुआ है कि पिरूल में कुछ ‘फाइटोटाक्सिन्स’ नामक हानिकारक रसायन होते हैं जो सड़ने की प्रक्रिया के समय नमी के माध्यम से जल्दी ही मिट्टी तक पहुंच जाते हैं और पुनरूत्पादन में बाधक होते हैं। इसके अलावा पिरूल की फिसलन भरी सतह स्थानीय लोगों तथा घरेलू मवेशियों के लिए कई बार जानलेवा सिद्ध होती हैं वहीं सूखा पिरूल ज्वलनशील होने के कारण अक्सर वनाग्नि का कारण बनता है, जिसके व्यापक हानिकारक परिणाम सर्वविदित हैं। अब तक पिरूल का उपयोग जानवरों के नीचे बिछाने तथा मक्खी, मच्छरों से उनकी सुरक्षा के लिए धुंआ करने के लिए किया जाता है, लेकिन अब यही अपशिष्ट और जंगल का विनाशक मनुष्य और पर्यावरण के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है।

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा