बाढ़ के रास्ते

Submitted by Hindi on Tue, 09/20/2011 - 11:41
Source
जनसत्ता, 19 सितंबर 2011

पहले वर्षा का बहुत–सा पानी तालाबों-पोखरों में समा जाता था। इन पर अतिक्रमण या इन्हें पाट दिए जाने के कारण यह पानी बाढ़ का सबब बनता है और रिहायशी इलाके या खेती को चौपट करता है। आज भी बाढ़ और सूखे दोनों का समाधान यही है कि इन तालाबों पोखरों को साफ और गहरा किया जाए और इनमें पानी आने के मार्ग अवरोध-मुक्त किए जाएं।

हाल के वर्षों में विश्व का एक बड़ा क्षेत्र बाढ़ के बेहद विनाशक दौर से गुजरा है। पिछले वर्ष अनेक देशों खासकर ब्राजील, आस्ट्रेलिया और श्रीलंका में बाढ़ ने कहर बरपाया था। ब्राजील के मुख्य शहर भी इस अति-विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आए और वहां सात सौ से अधिक लोग मारे गए। आस्ट्रेलिया में बाढ़ जब अपने चरम पर थी तो बाढ-प्रभावित क्षेत्र जर्मनी और फ्रांस इन दो देशों के संयुक्त क्षेत्रफल की बराबरी कर रहा था। श्रीलंका में बाढ़ के कारण इतनी व्यापक क्षति हुई कि स्थानीय राहत-प्रयास पर्याप्त नहीं हो सके; भारत और चीन तक से सहायता पहुंचानी पड़ी। पाकिस्तान में तो बाढ़ ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए; वहां लगभग सत्तर लाख परिवार पिछले वर्ष की बाढ़ से प्रभावित हुए।

इन बेहद विनाशक बाढ़ों के बारे में एक विशेष चर्चित मुद्दा यह बना है कि उन क्षेत्रों को भी बाढ़ ने तहस-नहस किया जहां बाढ़ नियंत्रण के काफी उपाय अपनाए गए थे। विशेषकर आस्ट्रेलिया जैसे देश में और इसके ब्रिसबेर जैसे विख्यात शहरों के इतने क्षतिग्रस्त होने पर लोग आश्चर्यचकित हैं, क्यों यहां बाढ़ से बचाव पर खर्च करने के लिए धन की कोई कमी नहीं थी। तटबंध और बांध बहुत बनाए गए थे। इसी तरह ब्राजील में भी शहरी इलाकों की बहुत क्षति हुई है और विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक लोग मारे गए हैं। पाकिस्तान का सिंधु नदी-प्रबंध अनेक बांधों, नहरों, तटबंधों के निर्माण के लिए जाना जाता है। इस तरह काफी सुरक्षित किए गए क्षेत्रों में बाढ़ द्वारा अधिक विनाश होना चिंता का विषय बन रहा है।

एक दूसरी प्रवृत्ति अप्रत्याशित वर्षा और मौसम में आकस्मिक बदलाव की उभरी है। पाकिस्तान में जितनी वर्षा की उम्मीद पूरे वर्ष में होती थी, वह कुछ दिनों में ही बरस गई। उधर आस्ट्रेलिया के एक बड़े क्षेत्र मंह पहले तो अनेक वर्षों तक सूखा रहा, फिर वर्षा आई तो बहुत अधिक। कुछ क्षेत्रों में सूखे की स्थिति लगभग दस वर्ष तक रही और उसके बाद बाढ़ आई तो ऐसी कि अधिकतर लोगों ने अपने जीवन में कभी नहीं देखी थी।

इन दोनों प्रवृत्तियों को जोड़ कर देखें तो कुछ विशेषज्ञ यह मानते हैं कि तटबंधों-बांधों के जरिए जो सुरक्षा-व्यवस्था बनाई गई थी वह पिछले कुछ दशकों के वर्षा के रिकार्ड पर आधारित थी, पर जलवायु बदलाव और अप्रत्याशित मौसम के दौर में यह आधार बहुत सहायक नहीं है। जब पानी इन रिकार्डों पर आधारित उम्मीद से ज्यादा आता है तो बांधों को अचानक बहुत पानी छोड़ना पड़ता है और तटबंध टूटने की आशंका भी बढ़ जाती है। इस स्थिति में बहुत विनाशकारी बाढ़ का खतरा पैदा होता है। इस्लामाबाद के विशेषज्ञ मुश्ताक गादी ने कुछ समय पहले कहा, ‘बाढ़ नियंत्रण के लिए किए गए निर्माण ही बाढ़ को और उग्र करने का कारण बने।’

‘इंटरनेशनल रिवर’ नामक विख्यात विशेषज्ञ संस्थान के कार्यकारी निदेशक पैट्रिक मैक्कली ने कहा है कि जहां छोटे और मध्यम स्तर की बाढ़ को बांधों और तटबंधों से कुछ कम किया गया है वहीं इस प्रक्रिया में बड़े स्तर की बाढ़ से होने वाली क्षति और बढ़ गई है। उनका कहना है कि जलवायु बदलाव के इस दौर में आप पिछली जानकारी के आधार पर ही नई चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते; नए सिरे से नई संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए नदी- प्रबंधन करना पड़ेगा।

जहां पिछले वर्ष और इस वर्ष भारत का एक बड़ा क्षेत्र बाढ़-प्रभावित हुआ वहीं चीन को भी भयंकर बाढ़ झेलनी पड़ी है। बड़े बांध बनाने में चीन भारत से कहीं आगे रहा है। चीन की कुछ सबसे विशाल और प्रतिष्ठित बांध परियोजनाएं खासकर बाढ़ नियंत्रण के बड़े दावे कर रही थीं। अतः यह सोचना होगा कि बाढ़ नियंत्रण के उपायों में निवेश का समुचित लाभ भारत और आस-पड़ोस के देशों को क्यों नहीं मिला और बाढ़-नियंत्रण की नीतियों परियोजनाओं में क्या बदलाव जरूरी हैं।

वैसे तो देश के एक बड़े भाग में बाढ़ की समस्या काफी समय से व्यापक रूप में उपस्थित रही है, पर जलवायु बदलाव के दौर में यह और भी गंभीर हो सकती है और इसके रूप में कुछ बदलाव आ सकते हैं। वैज्ञानिक जिस तरह के बदलते मौसम की तस्वीर हमारे सामने रख रहे हैं उसमें प्रायः वर्षा की मात्रा बढ़ने पर वर्षा के दिन कम होने की बात कही गई है। दूसरे शब्दों में, अपेक्षा कम समय में अधिक वर्षा होने की संभावना है। कम समय में अधिक वर्षा केंद्रित होगी तो बाढ़ की ही सूरत बनेगी। इसी तरह ग्लोबल वार्मिंग के दौर में ग्लेशियर अधिक पिघलने से चाहे दीर्घकाल में जल-संकट उत्पन्न हो, पर कुछ वर्षों तक इससे नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है और अपेक्षाकृत कम वर्षा होने पर भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ग्लेशियरों के नीचे बनी नई झीलों के अवरोध हटने पर फ्लैश फ्लड या अचानक अधिक वेग की बाढ़ आ सकती है।

आज भी बाढ़ और सूखे दोनों का समाधान यही है कि इन तालाबों-पोखरों को साफ और गहरा किया जाए और इनमें पानी आने के मार्ग अवरोध-मुक्त किए जाएं। तब वर्षा का बहुत-सा पानी इन तालाबों में समा जाएगा और सूखे दिनों में राहत भी देगा, भू-जल में वृद्धि भी करेगा। जहां-जहां छोटे चेकडैम, मेड़बंदी, वर्षा जल संग्रहण (वाटर हार्वेस्टिंग) आदि उपायों से वर्षा के जल को यथासंभव रोका जाएगा, बाढ़ और सूखे दोनों से बचाव का कार्य साथ-साथ होगा।

बड़े बांधों के बारे में प्रायः यह देखा गया है कि अधिक वर्षा होने पर उनसे अचानक इतना पानी छोड़ने पर उनसे अचानक इतना पानी छोड़ने की नौबत आ जाती है कि वह अधिक वेग की, अधिक विनाशक बाढ़ का कारण बनती है। जल-प्रबंध में बाढ़-नियंत्रण को कम महत्व देने और बांध प्रबंधन की खामियों के बारे में कई बार सवाल उठे हैं। पर अब यह सवाल उठाना भी जरूरी हो गया है कि इन बांधों से पानी छोड़ने से आई बाढ़ों के अनुभवों को देखते हुए हम महंगे, कई अन्य समस्याओं से भी जुड़े बांध–निर्माण को बाढ़ नियंत्रण का उपाय कब तक मानते रहेंगे?

इसी तरह कुछ स्थानों पर तटबंध निर्माण की जरूरत को मानते हुए भी बड़े पैमाने के अधिकतर तटबंध निर्माण की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगे हैं, क्योंकि इन तमाम तटबंधों के निर्माण के बाद भी न केवल बाढ़ आ रही है बल्कि इन क्षेत्रों की कई अन्य समस्याएं पहले से और विकट हो गई हैं। तटबंधों के बीच फंसे परिवार तो खैर बहुत ही बुरी स्थिति में हैं, पर तटबंध बार-बार टूटने से या अन्य कारणों से कुछ स्थानों पर बाढ़ की समस्या अधिक विकट रूप में उपस्थित हुई है। नहरों के ठीक रखरखाव के अभाव में उनमें दरारें पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।

जिन नदियों में गाद-मिट्टी की मात्रा अधिक होती है (जैसे कि हिमालय की अनेक नदियों में है) उन पर बांध और तटबंध निर्माण की उपयोगिता और भी संदिग्ध है। हिमालय में और अन्य पर्वतों में भूस्खलन की और गंभीर होती समस्या अपने आप में बड़ी चिंता का कारण है, साथ ही इससे नीचे के मैदानों में बाढ़ की समस्या और भयावह होती है। बढ़ते भूस्खलन के कारण अनेक पर्वतीय आवासों, गांवों और सड़कों का अस्तित्व संकट में है। अनेक गांवों की हालत ऐसी हो गई है कि किसी बड़े हादसे से बचाने के लिए उन्हें अन्यत्र बसाना होगा। यह समस्या बहुत हद तक मानव निर्मित कारणों से बढ़ी है। विभिन्न निर्माण-कार्यों के लिए संवेदनशील, कच्चे पहाड़ों में विस्फोटकों का अंधाधुंध उपयोग किया गया है। बांध निर्माण के क्षेत्र में खासकर भू-स्खलन बढ़ गए हैं। टिहरी जलाशय के किनारे के अनेक गांवों में स्थिति गंभीर है। सड़क निर्माण में पर्याप्त सावधानी न बरतने के कारण भी भूस्खलन की समस्या विकट होती है। हिमालय जैसे अधिक भूकंपीयता के क्षेत्र बढ़ते रहे तो भूकंप से होने वाली क्षति भी बहुत बढ़ जाएगी।

भूस्खलन से नदियों में गाद और मलबा गिरता है तो उनसे बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। अगर मलबे में किसी नदी का प्रवाह रुक जाए और कृत्रिम झील बन जाए तो यह झील टूटने पर बहुत भयानक बाढ़ आती है, जैसे कि कुछ वर्ष पहले उत्तराखंड में कनोडिया गाड की बाढ़ के समय देखा गया। भूस्खलन में भारी चट्टानें और मलबा बांध के जलाशय (जैसे टिहरी जलाशय) में गिर जाएं तो भी प्रलयकारी बाढ़ आ सकती है। दूसरी ओर वन-रक्षा और हरियाली बढ़ा कर और भू-संरक्षण उपायों से भूस्खलन कम किया जा सकता है।

इस तरह जहां विभिन्न कारणों से अधिक वेग की अचानक बाढ़ आने की आशंका बढ़ रही है, वहीं अनेक अन्य स्थानों पर बाढ़ के पानी के देर तक रुके रहने से जल-भराव की समस्या विकट हो रही है। सड़कों, राजमार्गों, रेललाइनों, तटबंधों, नहरों आदि के निर्माण में निकासी और पुलिया पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया, जिससे यह समस्या बढ़ी है। सदियों से बाढ़ से प्रभावित हो रहे कुछ क्षेत्रों में पहले बाढ़ के साथ जीना इसलिए मुश्किल नहीं था, क्योंकि बाढ़ का पानी बड़ी मात्रा में आता था मगर तेजी से निकल भी जाता था। उसके साथ आई उपजाऊ मिट्टी से बाद में अच्छी खेती होती थी। लेकिन देर तक जल-भराव रहने के कारण खेती समय पर नहीं हो पाती और मच्छरों और बीमारियों का प्रकोप बढ़ता है। शहरों में निर्माण-कार्यों में असावधानी, निकासी की गड़बड़ी और मलबों के ढेर के कारम जल-भराव की समस्या तेजी से बढ़ रही है। पॉलीथिन के बढ़ते कूड़े ने भी यह समस्या बढ़ाई है।

पहले वर्षा का बहुत-सा पानी तालाबों-पोखरों में समा जाता था। इन पर अतिक्रमण या इन्हें पाट दिए जाने के कारण यह पानी बाढ़ का सबब बनता है और रिहाइशी इलाके या खेती को चौपट करता है। आज भी बाढ़ और सूखे दोनों का समाधान यही है कि इन तालाबों-पोखरों को साफ और गहरा किया जाए और इनमें पानी आने के मार्ग अवरोध-मुक्त किए जाएं। तब वर्षा का बहुत-सा पानी इन तालाबों में समा जाएगा और सूखे दिनों में राहत भी देगा, भू-जल में वृद्धि भी करेगा। जहां-जहां छोटे चेकडैम, मेड़बंदी, वर्षा जल संग्रहण (वाटर हार्वेस्टिंग) आदि उपायों से वर्षा के जल को यथासंभव रोका जाएगा, बाढ़ और सूखे दोनों से बचाव का कार्य साथ-साथ होगा। इस पर और निकासी की व्यवस्था पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

कई बार कहा जाता है कि अधिक जल वाली नदियों का जल कम जल वाली नदियों में ले जाने की विशालकाय योजना बनाई जाए। प्रायः पूरब में अधिक जल माना जाता है और पश्चिम में कम पर इस मानसून के आरंभिक दिनों के देखें तो पश्चिम (राजस्थान और गुजरात) में बाढ़ आई हुई थी, जबकि पूर्व में वर्षा कम थी। इस तरह जलवायु बदलाव के अप्रत्याशित दौर में ऐसी विशालकाय परियोजनाओं में स्थिति और बिगड़ सकती है। ये योजनाएं वैसे भी भारी विस्थापन और पर्यावरणीय नुकसान का कारण बन सकती हैं। ऐसी योजनाएं कागज पर आकर्षक लग सकती हैं, पर नदियों के प्राकृतिक बहाव से खिलवाड़ करके तबाही लाएंगी। अतः तालाब, पोखर, छोटे चेकडैम, मेड़बंदी, वर्षाजल संचय को आगे बढ़ाने और निकासी को दुरुस्त करने, पहाड़ों में हरियाली और वन बढ़ाने का ही रास्ता सही है।

पहले से बने तटबंधों और बांधों के ठीक रखरखाव और बेहतर प्रबंधन पर भी ध्यान देना जरूरी है। इनके रखरखाव में होने वाले भ्रष्टाचार और लापरवाही को रोकना होगा।

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